प्रेमके नामपर पाप

पत्र मिला। आपने एक जो घटना लिखी और उसपर मेरी सम्मति चाही, यह आपकी कृपा है। मेरी समझसे तो वह विदुषी बहिन और आपके पढ़े-लिखे मित्र दोनों ही बड़ी भारी गलती कर रहे हैं। सच्चे प्रेममें देहका आकर्षण क्यों होने लगा? यदि यथार्थ प्रेम है तो दोनोंमें भाई-बहनका पवित्र सम्बन्ध रहना चाहिये। एक जमाना था, जब राजपूत देवियाँ राखी भेजकर किसीको भी अपना भाई वरण कर लेती थीं और वह भाई रक्षा-बन्धनके पवित्र बन्धनमें बँधकर उस बहिनके लिये अपने प्राणोंको न्योछावर कर डालता था। किसी विवाहिता स्त्रीके बाह्य सौन्दर्यको देखकर उसपर आसक्त हो जाना, और किसी पुरुषकी यूनिवर्सिटीसे मिली हुई डिग्रियोंको और उसके ढंग-ढाँचेको देखकर अपनी कुल-मर्यादा, शील, सदाचार, लज्जा और सबसे बढ़कर महत्त्वकी वस्तु सतीत्वको नष्ट करनेपर उतारू हो जाना—कदापि प्रेम नहीं है, यह तो निरी पाशविकता है। दु:ख है कि हमारे पढ़े-लिखे नवयुवक और नवयुवतियाँ आज धर्मकी, सदाचारकी और परलोककी कुछ भी परवा न करके मोहवश अपनेको भीषण नरकाग्निमें झोंक रहे हैं! आप अपने मित्र और विदुषी बहिनको समझा दीजिये कि इस पाप-बुद्धिका त्याग कर दें, और प्रेमके नामपर मुझ-जैसे व्यक्तिसे अपने कुविचारोंका समर्थन प्राप्त करनेकी चेष्टा न करें। जिस भारतमें पवित्र सतीधर्मको स्त्रियाँ अपना गौरव समझती थीं और सतीत्वकी रक्षाके लिये हँसते-हँसते धधकती आगमें सहर्ष कूद पड़ती थीं, उसी भारतकी विदुषी कहलानेवाली युवतियाँ आज अपने सारे गौरवको खोकर पर-पुरुषोंके मोहमें फँसनेको पवित्र प्रेम बतलाकर प्रेम शब्दको कलंकित कर रही हैं, यह बड़े ही परितापका विषय है!

आपके पत्रमें यह पढ़कर कि और भी कई कुमारी और विवाहिता विदुषी बहिनें ऐसा ही विचार कर रही हैं—बहुत ही खेद हुआ। क्या विदुषी होनेका यही परिणाम है? भगवान् ऐसी विद्या और शिक्षासे आर्यदेवियोंको बचावें!

आपने ये बातें बहुत ही सद्भावसे पूछी हैं, यह ठीक है, परन्तु मैं इसके सिवा इन बातोंका दूसरा उत्तर नहीं दे सकता। मेरा तो विश्वास है कि इन सारी पाप-वृत्तियोंका परिणाम बहुत ही बुरा होगा। आत्माकी नित्यता, परमात्माके न्याय, परलोकके सुख-दु:ख-भोग एवं जन्मान्तरमें विश्वास करनेवाला होनेके नाते मैं यह कह सकता हूँ कि ऐसा करनेवाले और ऐसी बातोंका समर्थन करनेवाले सभी जन्मान्तरमें बड़ा भारी दु:ख उठावेंगे।

याद रखिये, यह प्रेम नहीं है, महापातक है और इससे बड़ी सावधानीसे बचना चाहिये। जो भाई इस कामके लिये तैयार हुए हैं, आपने लिखा है; वे मुझमें और मेरी बातोंमें श्रद्धा रखते हैं सो यह उनकी कृपा है। मेरा उनसे या आपसे कोई साक्षात् परिचय न होनेके कारण मैं तो कुछ नहीं कह सकता, परन्तु यदि मेरी बातमें जरा भी उनका विश्वास हो तो उन्हें तुरंत अपना विचार सर्वथा छोड़ देना चाहिये। और प्रेम ही हो तो उसे पवित्रतम बनाकर उन्हें भाई-बहनके रूपमें रहना चाहिये। मैं तो कहूँगा कि शारीरिक कोई भी सम्बन्ध जोड़कर प्रेम रखनेकी अपेक्षा केवल आत्मासे प्राणात्माका प्रेम रहना और भी निरापद, उत्तम और सराहनीय है। एक स्थानमें रहना, मिलना-जुलना और परस्पर प्रेम-पत्रोंका व्यवहार करना कतई बंद कर देना चाहिये। दोनोंको अपने-अपने घरोंमें सन्तोष और सुखके साथ रहकर भगवान‍्का भजन करते हुए एक-दूसरेकी सच्ची पारमार्थिक उन्नति चाहनी चाहिये, सच्चा प्रेम तो इसीमें है।

हमारी आर्यसंस्कृतिका तो यह आदेश है कि—कुमार-कुमारी वर-कन्याके निर्वाचनमें माता-पिताका ही अधिकार होना चाहिये और इसीमें लाभ है। उत्तम विवाह और गृहस्थाश्रमकी सुख-शान्तिके लिये माता-पितापर ही यह भार रहना हितकर है। माता-पिताका अपनी सन्तानमें सहज स्नेह होता है, वे स्वाभाविक ही सन्तानका हित चाहते और उसके भविष्य-जीवनको सुखी देखना चाहते हैं। उनको अवस्थाकी अधिकताके कारण अनुभव भी विशेष होता है। इसलिये उनके द्वारा जो सम्बन्ध किया जायगा, उसमें केवल क्षणिक मोह नहीं होगा। उसमें वर-कन्याके कुल, शील, स्वास्थ्य, चरित्र, स्वभाव, घरकी आर्थिक स्थिति और धर्मभाव आदि सभीकी यथा-साध्य जाँच-पड़ताल होगी और धीरताके साथ कार्य सम्पन्न होगा। यद्यपि इसमें उनकी भूल भी हो सकती है और कोई-कोई माता-पिता स्वार्थवश इन बातोंका विचार नहीं भी करते, परन्तु यह अपवादरूप है। सन्तानके प्रति स्वाभाविक स्नेह प्राय: उन्हें संतानका अहित-चिन्तन करनेसे रोकता ही है। अतएव माता-पिताके द्वारा जो भी कन्याका निर्वाचन होता है, वह प्राय: निर्दोष और उत्तम होता है। उसमें क्षणिक आवेग नहीं है। केवल चमड़ीके रंगका परीक्षण नहीं है। परंतु इसके विपरीत, युवावस्थामें युवक-युवतियोंका जो अपने लिये कन्या-वरका निर्वाचन होता है वह तो अधिकांशमें भूलभरा होता है। उनमें बड़ी उम्रका अनुभव नहीं है। युवावस्थाका जोश, कामवासना, इन्द्रियसुखकी लालसा, रूपका मोह और जल्दबाजी आदि उनकी विचारशक्तिको ढक लेते हैं और वे फतिंगे बनकर रूपकी आगमें पड़कर भस्म हो जाते हैं। फिर आजकलके वातावरण और कॉलेजोंकी दूषित सहशिक्षाने तो बड़ी भयानक स्थिति उत्पन्न कर दी है। स्कूल-कॉलेजोंकी शिक्षाका परिणाम ही है जो उक्त विदुषी बहिन और आपके मित्रभाई इस प्रकार बहक रहे हैं। भला, जो अभीतक ससुराल गयी ही नहीं, जिसने पतिसे अभीतक बातचीत ही नहीं की, उसने कैसे जान लिया कि पति पढ़े-लिखे होनेपर भी उसके योग्य नहीं है और स्कूलके ये पुराने मित्र उसके पति होनेयोग्य हैं? ससुराल जानेपर भक्तिपूर्वक पतिसेवा करनेपर आपकी परिचिता विदुषी बहिनको यह अनुभव हो सकता है, वे जिनको चाहती थीं उनकी अपेक्षा उनके पति कहीं अधिक सुयोग्य और सुशील हैं। फिर आर्यरमणी तो यह विचार भी कैसे कर सकती है कि पति योग्य है या अयोग्य? उसके लिये तो पति परमेश्वर ही है। पतिके सिवा दूसरा कोई पुरुष है ही नहीं।

उत्तम के अस बस मन माहीं।

सपनेहु आन पुरुष जग नाहीं॥

माता-पिताने जो वर चुन दिया और भगवान‍्की इच्छासे जिनसे विवाह हो गया, उन्हींको जीवन अर्पण कर देना चाहिये। अर्पण तो हो ही चुका। मनमें जो कभी दूसरा भाव आता है उसे निकाल देना चाहिये और आपके मित्रको पर-नारीसे साँपके जहरके समान परहेज करना चाहिये। बुरी नीयतसे जरा भी पर-स्त्रीका चिन्तन करना पाप है और जो दूसरी कुमारी युवती बहनें भी कुल-मर्यादाको तोड़कर पिता-माताकी सम्मतिके विरुद्ध मनमानी वर खोजना चाहती हैं, उन्हें भी समझ रखना चाहिये कि इसमें बड़ा खतरा है। ऐसे स्वेच्छा-विवाहोंका परिणाम तलाक होता है। और हिन्दू-शास्त्रोंकी सत्यताके आधारपर यह कहा जा सकता है कि स्त्रीके लिये यह एक बड़ा पाप और उसके लिये भविष्य-दु:खका महान् कारण है। उक्त विदुषी बहिनको भी, जो ऐसे महापातकका विचार करती हैं, सावधान कर देना चाहिये। मेरा यह पत्र उनके पास पहुँचा देना चाहिये। आपने उनके नाम-पते नहीं लिखे सो अच्छा किया, मुझे जाननेकी आवश्यकता भी नहीं है।