प्रेमसे होनेवाला भजन
भगवान्में प्रेम होनेपर उनका नाम इतना प्रिय लगता है कि फिर भुलाये भी नहीं भूलता, छुड़ाये भी नहीं छूटता। भगवान्में प्रेम बढ़े। इसके लिये भगवान्से प्रार्थना कीजिये और नाम-जप किसी भी भावसे करते चले जाइये। जब नाममें यथार्थ रुचि हो जायगी—नामकी पूरी मिठास आ जायगी; फिर तो नाम-जप अपने-आप होगा। फिर संख्याकी जरूरत नहीं होगी। संसार-सागरसे पार होनेका उपाय तो भगवान्का सहारा ही है। भगवान्ने कहा है—‘जो मुझमें मन लगाकर मेरा भजन करते हैं, उनको संसार-सागरसे मैं स्वयं बहुत जल्दी पार कर देता हूँ।’ भगवान् स्वयं पार करनेको तैयार हैं, फिर और क्या चाहिये। आप मन लगाकर भजन करनेकी चेष्टा कीजिये। असल बात तो यह है कि आप पार होनेकी बात भी क्यों सोचते हैं? इस पार रहें या उस पार, यदि भगवान्का प्रेमसे भजन होता है तो दोनों ही पार उत्तम और आनन्दमय हैं। नरक-यन्त्रणा भोगते हुए भी यदि भजन हो तो उत्तम है, तथा ऊँची-से-ऊँची गतिमें भी यदि भजन छूट जाय तो वह निकृष्ट और दु:खमयी है। इसीसे गोसाईंजीने कहा है—
अरथ न धरम न काम रुचि
गति न चहउँ निरबान।
जनम जनम रति राम पद
यह बरदान न आन॥
वे हमें इस संसार-सागरमें ही रखें, कोई आपत्ति नहीं; परंतु हृदयमेंसे कभी निकलें नहीं, आँखोंसे कभी ओझल न हों। हमें मुक्तिसे क्या प्रयोजन है। हमें तो प्रयोजन होना चाहिये उनके पादपद्मोंसे, उनके प्रेमसे, उनके स्मरणसे; फिर चाहे वे कहीं किसी भी हालतमें कैसे ही रखें।
एकान्तमें रहकर भगवान्का भजन करनेका मन होता है, सो यह तो मनकी उत्तम वासना है। परंतु याद रहे, जंगलोंमें जानेसे ही प्रियतम श्रीकृष्ण नहीं मिलते। श्रीकृष्णको प्रियतमरूपसे प्राप्त करनेके लिये तो गोपी-हृदयकी जरूरत है। गोपी-हृदय प्राप्त करनेकी साधना कीजिये। सारा प्रेम सब जगहसे हटाकर भक्ति और मुक्तिकी लालसा जरा भी न रखकर उनसे अहैतुक प्रेम कीजिये। दिन-रात उनका चिन्तन कीजिये। करते-करते उनकी कृपासे जब गोपी-हृदयकी प्राप्ति होगी तब प्रियतमरूपसे वे प्राप्त हो सकेंगे। घबराइये नहीं। परंतु एक क्षण भी उनका विस्मरण न होने दीजिये।