रुपयेका मोह
.....ने रुपये कमाये लिखा सो अच्छी बात है। भैया! यह ऐसी चीज है—जिसको मिलती है, वह भी दु:खी होता है और न मिलती है, वह तो अपनेको दु:खी मानता ही है। ‘संसारके सब काम रुपयोंसे होते हैं।’ ऐसा देखते हैं और यही विश्वास है; यद्यपि सब काम नहीं होते। इसीसे रुपयेका मोह बहुत प्रबल होता है। कभी सफलता, कभी विफलता—यों जीवन बीतता चला जाता है। अन्तमें मनुष्य-जीवनकी सन्ध्याके समय तीन बातें हाथ लगती हैं—१—अमूल्य और एक खास महत्त्वपूर्ण कामके लिये मिले हुए जीवनकी व्यर्थता, २—परितापमयी अतृप्ति और ३—जीवनभर विषयासक्तिके कारण किये हुए पापोंका बोझ! परंतु क्या कहा जाय। कुएँ भाँग पड़ी है! भगवत्कृपासे कहीं कुछ स्वाध्याय-सत्संगका यदि अवसर मिलता रहता है तो कभी जीवनके असली ध्येयका जरा-सा खयाल हो आता है, नहीं तो जीवन ऐसा बन जाता है कि बस चौबीस घंटे उद्देश्यहीन उधेड़-बुनमें ही बीत जाते हैं। लक्ष्यका कभी खयाल ही नहीं होता। उसकी तो ऐसी विस्मृति होती है कि कभी याद दिलाये जानेपर भी स्मृति नहीं होती। और ज्यों-ज्यों ममताका विस्तार होता है, त्यों-ही-त्यों दु:खोंकी वृद्धि होती रहती है।
यावत: कुरुते जन्तु: सम्बन्धान्मनस: प्रियान्।
तावन्तोऽस्य निखन्यन्ते हृदये शोकशंकव:॥
जीव जितने ही प्रियताके सम्बन्ध स्थापित करते हैं, उतने ही उनके हृदयमें शोकके काँटे चुभते हैं, परंतु मोहवश इसीमें सुखकी प्रतीति होती है। गोसाईंजी महाराज कहते हैं—
नहिं सतसंग भजन नहिं हरिको
स्रवन न रामकथा अनुरागी।
सुत-बित-दार-भवन-ममता-निसि
सोवत मति अति कबहुँ न जागी॥
तुलसिदास हरिनाम-सुधा तजि
सठ हठि पियत बिषय बिष माँगी।
सूकर स्वान शृगाल सरिस जन,
जनमत जगत जननि दुख लागी॥
जो लोग लोकसेवा करना चाहते हैं, वे भी भगवान्को लक्ष्य नहीं बनाते; इसलिये उनकी भी वह सेवा वैसी ही होती है, जैसे जड़को छोड़कर डाली-पत्तोंमें जल सींचना होता है। उसमें भी बस, वही लौकिक दृष्टि ही रहती है—विषयाभिलाष ही रहता है और विषय हैं—दु:खयोनि, तब सुख कैसे हो?
भैया! प्रसन्न रहना। मैं कुछ कहने लायक तो नहीं, परंतु कभी-कभी जीवनके लक्ष्यकी ओर खयाल करना भूलना नहीं। ढिढोरा पीटनेकी जरूरत नहीं है—जरूरत तो चुपचाप मार्गपर अग्रसर होनेकी है—ध्येयको न भुलाते हुए।