साधक संन्यासीके कर्तव्य
आपका स्वास्थ्य अब अच्छा होगा। असलमें यह स्वस्थता तो प्रकृतिस्थता ही है। असली स्वस्थता तो आत्मामें स्थित होना है, जिसके लिये सारा प्रयत्न है। संसारमें यही मोहकी भाषा है कि ‘प्रकृतिस्थ’ अपनेको ‘स्वस्थ’ कहता है। पंचदशीमें कहा है—
क्षुधेव दृष्टबाधाकृद् विपरीता च भावना।
जेया केनाप्युपायेन नास्त्यत्रानुष्ठिते क्रम:॥
‘सत्य ब्रह्मवस्तुमें असत्ताकी भावना और असत्य प्रपंचमें सत्-भावनारूपी विपरीत भावना सदा ही क्षुधाके समान दु:खदायिनी है। इसे किसी भी उपायसे जीतना चाहिये। इसमें किसी अनुष्ठानके क्रमकी अपेक्षा नहीं।’ अतएव हम यथार्थमें स्वस्थ होना चाहें तो इसके लिये चेष्टा करनी चाहिये और इस चेष्टामें निरन्तर ब्रह्मचिन्तन ही प्रधान है।
तच्चिन्तनं तत्कथनमन्योन्यं तत्प्रबोधनम्।
एतदेकपरत्वं च ब्रह्माभ्यासं विदुर्बुधा:॥
‘उसीका चिन्तन, उसीका कथन, उसीको परस्पर समझना, इस प्रकार उसमें जो एकपरता होती है, उसीको विद्वान् लोग ब्रह्माभ्यास कहते हैं।’ श्रीभगवान्ने भी—
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्त: परस्परम्।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥
(गीता १०।९)
इस श्लोकमें यही उपदेश किया है। उपर्युक्त श्लोक इसी श्लोकका अनुवाद-सा है। मतलब यह कि इस प्रकार अभ्यास-परायण होकर स्वरूपस्थितिरूप स्वस्थता प्राप्तकर लेनेमें ही हमारे जीवनकी सार्थकता है। आप इस अभ्यासमें लगे ही हैं। फिर मैं क्या लिखूँ? मेरी प्रार्थना है नीचे लिखी बातोंपर ध्यान रखें।
१—अवश्य ही ज्ञानी महापुरुष शास्त्रके शासनसे सर्वथा मुक्त तथा विधि-निषेधसे ऊपर उठा हुआ है तथापि ज्ञानके नामपर विहित कर्मत्याग और निषिद्धाचरणका न तो कभी उपदेश करना चाहिये, न वैसा कोई आचरण ही अपनेमें आने देना चाहिये।
२—सम्मान, बड़ाई, स्त्री तथा धनसे सदा दूर रहना चाहिये। ‘हमें इनके संसर्गसे कोई नुकसान नहीं होगा’—वस्तुत: किसीकी ऐसी स्थिति हो तो भी ऐसा मानना नहीं चाहिये। संन्यासीके बाह्य स्वरूपकी रक्षाके लिये भी इनका त्याग सर्वथा आवश्यक है।
३—मठस्थापन, स्थान-निर्माण, पन्थ-प्रतिष्ठा, शिष्य-ग्रहण और सम्प्रदाय-स्थापनादिसे त्यागी विरक्त संन्यासीको सदा दूर रहना चाहिये। कर्तव्यकी भावना और परिस्थितिवश कभी-कभी इनकी आवश्यकता प्रतीत भी हो तो भी इनसे डरना चाहिये। पहुँचे हुए महापुरुषोंकी बात तो अलग है, साधारणतया तो इन बातोंसे राग-द्वेषकी वृद्धि, प्रपंचके विस्तार और परमार्थपथसे च्युतिकी ही सम्भावना रहती है।
४—किसी भी स्थान, वस्तु या कर्तव्य विशेषमें अनुराग नहीं बढ़ाना चाहिये। अनुरागसे ममत्व होता है और ममत्वसे बन्धन! जड़भरतकी कथा याद रहे।
५—जीवनका एक क्षण भी व्यर्थ न जाने देना चाहिये। चाहे अपने लिये कुछ भी कर्तव्य न भासता हो। आवश्यकतानुसार शौच-स्नान, भिक्षा और शयनादिमें जितना नियमित और परिमित समय बीते, उसको छोड़कर शेष सब समय मनसे ब्रह्मचिन्तन और शरीरसे ब्रह्मसेवनके कार्यमें ही लगना चाहिये। शरीर-निर्वाहकी क्रियाओंको करते समय भी चित्त सदा ब्रह्मचिन्तनमें ही संलग्न रहना चाहिये।
६—पर-दोष तथा पर-गुणोंका चिन्तन नहीं करना चाहिये। इनमें पर-दोषोंका तो बिलकुल ही नहीं करना चाहिये।
७—जहाँतक हो खण्डन-मण्डन अथवा वाद-विवादमें समय नहीं लगाना चाहिये। क्योंकि विवादसे विवादके बढ़नेकी और द्वेष-क्रोधादिके उत्पन्न होनेकी सम्भावना रहती है। विजयमें अभिमान और पराजयमें विषाद होता है। समय तो व्यर्थ जाता ही है।
८—किसी प्रकारका संग्रह नहीं करना चाहिये।
ये बातें मैंने उपदेशके तौरपर नहीं, आपकी आज्ञाके अनुसार स्नेह-सम्बन्धको लेकर ही प्रार्थनाके रूपमें लिखी हैं। वस्तुत: मैं तो सभी प्रकारसे आपके द्वारा उपदेश प्राप्त करनेका ही अधिकारी हूँ। कृपा बनी रहे। ये बातें भी साधककी दृष्टिसे ही हैं। सिद्धके लिये तो कुछ कहना ही नहीं बनता।