साधकोंसे

.......सादर सप्रेम हरिस्मरण! यथायोग्य। आपलोगोंके कई पत्र मिले। मेरे बुरे स्वभावसे आपलोग परिचित ही हैं, अतएव पत्रोंका जवाब समयपर न लिखनेके लिये आप लोग मुझे क्षमा करेंगे। श्रीभगवान‍्की कृपासे आपलोगोंको बहुत अच्छा अवसर प्राप्त हुआ है, नवधा भक्तिके कई अंगोंकी पूर्ति अपने-आप हो रही है, अब आपलोग अपने भावोंको उच्च बनाकर इस सुअवसरसे पूरा लाभ उठानेकी चेष्टा कीजिये। ‘भाव’, ‘गुण’ और ‘साधन’—तीनों साथ-साथ चलनेसे शीघ्र और सम्यक् लाभ होता है। एक आदमी भजन-साधन करता है, परन्तु दुर्गुणोंका त्याग नहीं करता और बहुत नीची भावनासे किसी असदुद्देश्यकी पूर्तिके लिये भजन करता है, तो उसका भजन बहुत देरमें शुभ फलदायक होता है। दूसरा एक आदमी सत्य-अहिंसादि सद‍्गुणोंका तो अर्जन करना चाहता है, परंतु भगवान‍्का भजन नहीं करता और भाव भी नीची ही श्रेणीका रखता है, उसमें सद‍्गुण टिकते नहीं; और तीसरे एक आदमीका भाव तो बहुत ऊँचा है, वह मोक्षतकका त्याग करनेकी इच्छा करता है, परंतु न भजन करता है और न दुर्गुणोंका ही त्याग करता है तो उसकी भावना कार्यरूपमें शायद ही परिणत होती है। जो ‘भजन’ भी करता है, जिसका ‘भाव’ भी बहुत ऊँचा है और जो भगवान‍्को प्रिय लगनेवाले ‘सद‍्गुणों’ का भी अर्जन करता है, वह सच्चा साधक है और उसको सफलता भी मिलती ही है। भजन प्रेमभावसे हो, जिसमें किसी भी वस्तुकी चाह न रहे—भजनके लिये ही भजन हो, और दैवी गुणोंका खूब अर्जन किया जाय। यह स्मरण रखना चाहिये, जहाँ वास्तविक भक्ति है, वहाँ दैवी गुण रहेंगे ही। और जहाँ दैवी गुण टिके हुए हैं और बढ़ रहे हैं, वहाँ भगवान‍्का आश्रय है ही। सूर्य और सूर्यके प्रकाशकी भाँति इनका अविनाभाव-सम्बन्ध है।

.......आज्ञानुसार सब काम करने चाहिये। भगवान‍्की अपने ऊपर बड़ी कृपा समझनी चाहिये। जबतक भगवान‍्की कृपाके विश्वासमें कमी है, तभीतक दु:ख, भय, शोक, विषाद, चिन्ता, निराशा, उद्वेग, द्वेष आदि दोष और दु:ख रहते हैं। भगवत्कृपाकी छत्रछायामें इनकी छाया भी नहीं रह सकती। बार-बार चिन्तन करनेसे विचार पुष्ट होकर अन्तमें प्रत्यक्ष मूर्तिमान् हो जाता है। हमपर भगवान‍्की नित्य कृपा है, हम निर्भय हैं, निश्चिन्त हैं, परम सुखमय हैं, शान्तिमय हैं, ऐसा दृढ़ विचार करनेपर हम ऐसे ही बन जायँगे। वास्तवमें आत्मा या भगवान‍्की दृष्टिसे ऐसे ही हैं भी। भ्रमसे स्वरूपकी विस्मृति हो रही है।