समाजका पाप
एक पढ़ी-लिखी बहिनका बड़ा ही करुणापूर्ण पत्र मिला है। पत्रसे पता लगता है बहिन बहुत विचारशील हैं और उच्च पातिव्रतके आदर्शको मानती हैं; परंतु लगातार दुर्व्यवहारसे इस समय घबड़ा-सी गयी हैं। लिखती हैं—मैं भारतकी अभागिनी स्त्रियोंमेंसे ही एक हूँ।......मैंने प्राचीन भारतकी आदर्श नारियोंका आदर्श सामने रखकर ही......पतिगृहमें प्रवेश किया।......सासुजीका स्वभाव अत्यन्त उग्र था....मैं हर तरह उनके अनुकूल चलती थी...किन्तु फिर भी वे प्रसन्न न रहती थीं। मैं कुछ तो स्वभावसे ही भीरु हूँ, तथा कुछ विचार इस प्रकारके थे कि ‘जो मेरे सर्वस्व हैं, ये उन्हींकी जननी हैं, यह एक बड़ा गुण और सारी बातोंपर परदा डालनेके लिये पर्याप्त था, इसीसे मैं उनका मन देखती रहती थी। माँ-बेटेमें परस्पर कलह न हो, इसी डरसे उनकी बात पतिसे छिपा रखती थी......धीरे-धीरे फल यह हुआ कि मेरे स्वामीकी मुझपर अरुचि बढ़ने लगी। उनका कहना था मैं माँका पक्ष लेती हूँ—माँका कहना था कि मैं पतिको सिखाकर उनसे लड़ाती हूँ और इस तरह मैं (सचमुच निर्दोष होनेपर भी) दोनोंकी सहानुभूति खो बैठी! सब तरफसे प्रतिसमय मुझपर वाग्बाणोंकी वर्षा होती रहती।.... मेरी सेवामें पतिको अवगुण-ही-अवगुण दीखते।....मैं अधिक दु:खी होनेपर एकान्तमें रोकर आँखें पोंछ फिर तैयार हो जाती! सुननेमें शायद कुछ नहीं लगता; किन्तु मेरा वह समय कितना कठिन था, उसे शब्दोंमें कैसे बताऊँ? आधार मेरे दो ही थे—एक मेरा आदर्शवाद और दूसरा पतिका स्वच्छ चरित्र।’
इसके बाद पतिके चरित्रमें दोष आनेकी बात लिखकर वे लिखती हैं—‘मैंने हर तरह चेष्टा कर देखी, प्रेमसे समझाया, नम्रतासे विनय की, बुराइयाँ दिखायीं, रोयी, कलपी, सभी कुछ किया परंतु कुछ न हुआ....। आजकल वेश्याओंसे भी अधिक जुल्म ‘सोसाइटी गर्ल्स’ ने ढा रखा है। अत्यन्त लज्जाकी बात है, किन्तु आजकलके बिगड़े हुए पुरुष वेश्याओंसे भले घरोंकी कन्याओंको ही अधिक पसंद करते हैं और वे (कुमारियाँ) भी सोसाइटीमें बैठकर सभी कुछ खुशीसे करती हैं। कॉलेजकी लड़कियोंमें—शेक्सपियरको लेकर दुर्भावना फैली हुई है। ‘कुछ भी पाप नहीं—मनुष्यका सोचना ही पाप-पुण्यको गढ़ना है। व्यभिचार पाप नहीं, मन-बहलाव है!’ दया आती है, घृणा भी और अत्यन्त वेदना भी।....अब मैं विश्वास करने लगी हूँ कि मेरा एकमात्र कल्याण अपनेको भगवान्के चरणोंमें समर्पित कर देनेमें ही है। परंतु जब-जब मैं भगवान्की रूप-माधुरी आँखोंमें बिठाना चाहती हूँ। तभी-तभी जैसे बरबस भगवान्की मूर्तिमें पतिका स्वरूप दीखने लगता है। या ऐसा कहूँ कि उन्हींकी कल्पना करने लगती हूँ और मन उपासनामें नहीं लगता।’
अन्तमें लिखती हैं—‘....पतिने मेरे साथ ऐसे बर्ताव किये किन्तु जिस दिन उन्हें दिनभरके बाद भी न देख पाऊँ तो हृदय विकल हो उठता है। एक अभाव-सा प्रतीत होता है। वे जैसे भी हैं किन्तु मैं उन्हें देखती रहूँ, यही मनमें रहता है। यदि दो चार दिन भी किसी कारणवश उपासनाके लिये पूजागृहमें न जाऊँ तो हृदयमें उतनी विकलता नहीं होती।....आह! जितना प्रेम स्वामीसे करती हूँ, उतना ही यदि भगवान्से कर सकूँ....।’
लंबे पत्रमेंसे कुछ ही अंश ऊपर उद्धृत किया गया है। भारतकी इन आदर्शपर चलनेवाली देवियोंको धन्य है। मैं तो इनके पत्रके उत्तरमें इतना ही लिखना चाहता हूँ कि आप अपने आदर्शपर दृढ़तासे स्थिर रहें। जरा भी शंका-सन्देह न करें दूसरोंकी ओर देखनेसे अपने आदर्शकी रक्षा तो एकांगी ही होती है, और होती है अपने ही बलिदानसे! आजकलके पाप-पुण्य न माननेवाले स्वेच्छाचारी पुरुष और कॉलेज गर्ल्सकी बुराइयोंका फल समाजके लिये बहुत ही भयानक होगा। इससे समाजमें ऐसी भयानक दु:खकी आग भड़केगी जो सबको जला देगी—वैसे समय आप-सरीखी देवियोंकी यह तपस्या ही उस आगसे किसी हदतक समाजको बचानेमें समर्थ होगी। आप अपनी तपस्यासे कभी मुँह न मोड़ें। भगवान् पर अटल विश्वास रखें, निश्चय समझें कि—इस जन्ममें नहीं तो, अगले जन्ममें—सत्यकी और सतीत्वकी विजय अवश्य होगी। ‘न हि कल्याणकृत् कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति॥’ (गीता ६।४०) भगवान्ने अर्जुनसे कहा है—‘कल्याणकर कर्म करनेवाला कोई भी मनुष्य दुर्गतिको प्राप्त नहीं होता।’ पता नहीं किस कर्मके फलस्वरूप आप इस समय कष्ट पा रही हैं। अवश्य ही यह कष्ट आपके इस जीवनके पवित्र आदर्शवाद, ईश्वरविश्वास, सहनशीलता, नम्रता और भलेपनका परिणाम कदापि नहीं है। इनका सुन्दर परिणाम जब सामने आवेगा, तब आप आनन्दसे पूर्ण हो जायँगी और साथ ही उसका सुन्दर प्रभाव आपके पतिदेवके लिये परम कल्याणकारी होगा। आप जहाँतक बने—अलग रहनेकी भावना छोड़ दीजिये। आपके विचार बहुत सुन्दर हैं। भगवान्से प्रार्थना कीजिये, वे सबको सुबुद्धि देकर सन्मार्गपर लगावें। भगवान्के नामका जप कीजिये और मन-ही-मन पतिदेवके परम कल्याणकी भावना करती रहिये। विश्वास कीजिये—वृन्दावन-विहारीमें आपकी लगन सच्ची होगी तो वे अवश्य आपको अपनावेंगे। अपना विशुद्ध प्रेम देंगे और उससे आपका जीवन सफल हो जायगा। इस समय तो आपका यह तप हो रहा है। सचमुच इसे कष्ट न समझकर तप मानिये।
‘हारिये न हिम्मत बिसारिये न राम।’