सर्वोत्तम चाह
आपलोगोंसे तो नहीं ऊबा, अवश्य ही अपनी कमजोरियोंसे घबराता हूँ और इसीलिये सब काम छोड़कर एकान्तमें रहनेकी कामना भी प्रबल होती है। परन्तु मेरी कामनासे क्या होता है। आखिर नटवर जैसे नचाते हैं, वैसे ही नाचना पड़ता है। सन्तोषकी बात इतनी ही है कि उनके द्वारा उनके इच्छानुसार नचाये जानेमें सुख मिलता है और उनके मंगलविधानपर जरा भी क्षोभ न होकर प्रसन्नता होती है। यह भी उन्हींकी कृपा है। यह जानता हूँ—कहता हूँ—‘करी गोपालकी सब होय। जो अपनो पुरुषारथ मानत अति झूँठो है सोय॥’ तथापि कामना भी होती है और तदनुसार उद्योग भी। फिर मनमें आता है कि यह कामना भी उन्हींकी प्रेरित है। मैं इसे छोड़नेका अभिमान करनेवाला भी कौन होता हूँ। तब फिर जो कुछ होता है—कभी-कभी उनके प्राणोल्लासकारी करकमलका स्पर्श पाकर, कभी-कभी उनकी मधुर मुसकानभरी मुख-छबिके दर्शन पाकर निहाल हो जाता हूँ और उनके पावन चरणोंमें लुट पड़ता हूँ—यह दशा है। आपको क्या लिखूँ। मनमें क्या-क्या आती है—इस बातको मनके मालिक अन्तर्यामी ही जानते हैं।
रही ‘अवकाश हो और कष्ट न हो तो उपदेशप्रद बातें’ लिखनेकी बात, सो अवकाश भी है, कष्ट भी नहीं होता, आलस्य अवश्य घेरे रहता है! परन्तु ‘उपदेशप्रद’ क्या लिखूँ यह समझमें नहीं आता। जो कुछ भी कहना चाहता हूँ, इच्छा होती है, यह देखनेकी कि वह बात मुझमें है या नहीं। और यदि नहीं है तो वह उपदेश पहले अपनेको ही करना चाहिये न? जो उपदेश अपने लिये नहीं होता, वह तो नाटकका अभिनयमात्र है। नाट्यमंचपर शंकराचार्य, चैतन्य और बुद्धका बड़ा सुन्दर पार्ट हो सकता है। परन्तु इससे अभिनेता वैसा ही है, यह नहीं माना जा सकता। गोस्वामीजी महाराजका एक पद लिखता हूँ। चाहता हूँ—ऐसा ही बन जाऊँ और आपसे भी प्रार्थना करता हूँ, आप भी ऐसे ही बननेकी कोशिश कीजिये। होगा तो भगवान्की कृपासे पूर्ण उनके मंगल-विधानसे ही।
यह बिनती रघुबीर गोसाँई।
और आस बिसवास भरोसो
हरो जियकी जड़ताई॥
चहौं न सुगति सुमति संपति कछु
रिधि सिधि बिपुल बड़ाई।
हेतुरहित अनुराग रामपद
बढ़ै अनुदिन अधिकाई॥
कुटिल करम लै जाँहिं मोहि
जहँ जहँ अपनी बरिआई।
तहँ तहँ जनि छिन छोह छाँड़ियो,
कमठ अंडकी नाई॥
या जगमें जहँ लगि या तनुकी
प्रीति-प्रतीति-सगाई।
सो सब तुलसिदास प्रभु ही सों
होंहि सिमिटि इक ठाई॥
इसी प्रकारके भक्त वृत्रासुरके वचन हैं—
अहं हरे तव पादैकमूल-
दासानुदासो भवितास्मि भूय:।
मन: स्मरेतासुपतेर्गुणांस्ते
गृणीत वाक् कर्म करोतु काय:॥
न नाकपृष्ठं न च पारमेष्ठ्यं
न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम्।
न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा
समंजस त्वा विरहय्य काङ्क्षे॥
अजातपक्षा इव मातरं खगा:
स्तन्यं यथा वत्सतरा: क्षुधार्ता:।
प्रियं प्रियेव व्युषितं विषण्णा
मनोऽरविन्दाक्ष दिदृक्षते त्वाम्॥
ममोत्तमश्लोकजनेषु सख्यं
संसारचक्रे भ्रमत: स्वकर्मभि:।
त्वन्माययाऽऽत्मात्मजदारगेहे-
ष्वासक्तचित्तस्य न नाथ भूयात्॥
(श्रीमद्भा० ६।११।२४—२७)
हरे! जो आपके श्रीचरणकमलोंके आश्रित भक्त हैं, मैं फिर उन्हींके दासोंका दास बनूँ। प्राणप्रियतम! मेरा मन आपके मंगलमय गुणोंका स्मरण करे, मेरी वाणी आपका गुण-गान करे और शरीर सदा आपके सेवाकार्यमें लगा रहे। सर्वसौभाग्यनिधे! मैं आपको छोड़कर स्वर्ग, ब्रह्मलोक, सार्वभौम साम्राज्य, रसातलका आधिपत्य, योगकी सिद्धियाँ—यहाँतक कि मोक्ष भी नहीं चाहता। जैसे पक्षियोंके पंखहीन बच्चे अपनी माँकी बाट देखते रहते हैं, जैसे भूखे बछड़े अपनी माँका दूध पीनेके लिये आतुर रहते हैं और जैसे वियोगिनी पत्नी अपने परदेश गये हुए पतिसे मिलनेके लिये व्याकुल रहती है वैसे ही कमलनयन! मेरा मन आपके दर्शनके लिये छटपटा रहा है। प्रभो! मुझे अपने कर्मवश संसारचक्रमें जहाँ कहीं भी भटकना पड़े वहीं-वहीं मेरी आपके प्यारे भक्तोंसे प्रीति रहे। भगवन्! जो लोग आपकी मायासे स्त्री-पुत्र और देह-गेहमें आसक्त हों, उन विषयी पुरुषोंसे मेरा कोई भी सम्बन्ध न हो।
सचमुच इसीमें परमानन्द है, यही परमानन्द है। सारी शक्ति इसीकी ओर लगा देनी चाहिये। श्रीध्रुवजीने कहा है—
नूनं विमुष्टमतयस्तव मायया ते
ये त्वां भवाप्ययविमोक्षणमन्यहेतो:।
अर्चन्ति कल्पकतरुं कुणपोपभोग्य-
मिच्छन्ति यत्स्पर्शजं निरयेऽपि नॄणाम्॥
या निर्वृतिस्तनुभृतां तव पादपद्म-
ध्यानाद्भवज्जनकथाश्रवणेन वा स्यात् ।
सा ब्रह्मणि स्वमहिमन्यपि नाथ मा भूत्
किं त्वन्तकासिलुलितात्पततां विमानात्॥
(श्रीमद्भा० ४।९।९-१०)
हे प्रभो! इन शवतुल्य शरीरोंके द्वारा भोगा जानेवाला इन्द्रिय और विषयोंसे उत्पन्न सुख तो नरकमें भी मिल जाता है। जो लोग इस विषय-सुखके लिये ललचाते हैं और जन्म-मृत्युमय संसारसे छुड़ा देनेवाले कल्पवृक्षरूप आपकी उपासनाको भगवत्प्राप्तिके बदले दूसरे किसी उद्देश्यकी पूर्तिमें लगाते हैं, उनकी बुद्धि निश्चय ही आपकी मायाके द्वारा ठगी गयी है। आपके चरण-कमलोंका ध्यान करनेसे और आपके भक्तोंके चरित सुननेसे प्राणियोंको जो आनन्द प्राप्त होता है, वह निजानन्दस्वरूप ब्रह्ममें भी नहीं मिल सकता। फिर जिनको कालकी तलवार काटे डालती है, उन स्वर्गके विमानोंसे गिरनेवाले पुरुषोंको तो वह सुख मिल ही कैसे सकता है।
आपने लिखा ‘मैं बड़ी-बड़ी बातें तो बना जाता हूँ लेकिन मुझसे थोड़ा-सा भी होता नहीं।’ सो आज तो मैंने ही बड़ी-बड़ी बातें बनायी हैं। होना भी सब उनके हाथ है। वे करायेंगे तभी होगा। हमें बस, उन्हींकी अनुकम्पाकी प्रतीक्षा करनी चाहिये। और हो सके तो नाम-स्मरण, नामोच्चारण किसी भी प्रकारसे करते रहना चाहिये।
सचमुच ‘मन’ बड़ा प्रबल है और यह भी ठीक है कि वह आपका है भी नहीं। फिर आप क्यों चिन्ता करते हैं? जिसका है, वह आप ही जैसा चाहता है, उसे बनाता है, रखता है। उसकी चीजपर उसीका अधिकार होना चाहिये न?
आपने बड़ा पत्र लिखकर मेरा अमूल्य समय लिया, मैंने ब्याजसमेत उसे उगाह लिया है। आप जीतमें नहीं रहे।
भैया! मजाककी बात जाने दीजिये। असल बात तो यह है कि हमारा जीवन जा रहा है। हमारे सम्बन्धी, मित्र, बन्धु चले जा रहे हैं—मानव-जीवनको समाप्त करके। हमें इसे समाप्त होनेसे पहले ही भगवान्का बना देना चाहिये। अवश्य-अवश्य!
जरि जाहु सो जीवन जानकिनाथ
जिवे जगमें तुम्हरो बिनु ह्वै॥