सेवा-धर्म और आनन्दका स्वरूप

आपका कृपापत्र मिला था। मैं स्वभावसे ही पत्रादि लिखनेमें प्रमाद कर जाता हूँ, इधर बाढ़-पीड़ितोंकी सेवाका कुछ काम भी रहा। इसीसे पत्र नहीं लिख पाया। ‘सेवा’ शब्द ठीक है या नहीं, निश्चय नहीं होता। बहुत बार मनुष्य दूसरेकी सेवा करने जाकर उसकी सेवा तो नहीं करता, वरन् उसीको अपनी सेवामें लगा लेता है। सेवा तो वही है, जिसमें बदला पानेकी भावना न हो, जिसकी सेवा की गयी उसका इसलिये कृतज्ञ हुआ जाय कि उसने हमारी सेवा स्वीकार की, भगवान‍्की दया मानी जाय कि उन्होंने सेवाके कार्यमें हमको नियुक्त किया। वस्तुत: जिसकी हमने सेवा की उसकी सेवा तो होती ही; क्योंकि मनुष्यको जो कुछ भी भला-बुरा फल प्राप्त होता है, उसका कारण किसी-न-किसी रूपमें पहलेसे तैयार रहता है। कार्यके पहले कारण होना ही चाहिये। भगवान‍्ने किसीकी भलाईमें हमें निमित्त बनाया, यह उनकी कृपा है। यथार्थमें जिन वस्तुओंसे हमने किसीकी सेवा की वे वस्तुएँ भी तो भगवान‍्की ही थीं, जिनकी सेवा की वे भी तो भगवान‍्के स्वरूप हैं और जिस प्रेरणासे सेवा हुई उस प्रेरणाके देनेवाले और सेवा करनेवाले हमारे इस स्वरूपको अनुप्राणित करनेवाले तथा आत्मरूप देकर इसे प्रकट करनेवाले भी तो भगवान् ही हैं। फिर हम किसीकी सेवा करनेका अलग अभिमान करनेवाले कौन? जो कुछ हुआ, सब श्रीभगवान‍्की लीला हुई। भगवान‍्ने ही कृपा करके हमें शुद्ध प्रेरणा करके और सेवाके योग्य वस्तुएँ प्रदान करके सेवामें निमित्त बनाया। सेवा बातोंसे नहीं होती। सेवा तो मनकी चीज है। सेवाकी दूकान न खोलकर जो चुपचाप सच्चे मनसे सेवा करता है यही वास्तविक सेवा है। सेवामें कृतज्ञता है, अहसान नहीं है; आत्मतृप्ति है, अभिमान नहीं है; आनन्द है, विषाद नहीं है; त्याग है, ग्रहण नहीं है और प्रेम है, दिखावट नहीं है। जहाँ केवल सेवाका विज्ञापन है, सेवा करानेवालेपर अहसान है, अपने मनमें अभिमान है, बदलेमें कुछ पानेकी इच्छा या आकांक्षा है, वहाँ शुद्ध सेवा नहीं है।

याद रखिये, अन्तर्यामी भगवान् हमारे हृदयको देखते हैं, शब्दोंकी छटाको नहीं। इसलिये मनुष्यको बहुत बोलनेवाला न बनकर चुपचाप काम करनेवाला बनना चाहिये। वाणी और आचरण दोनोंमें सत्य होना चाहिये। जहाँ बातें अधिक होती हैं, वहाँ सत्य छिप जाता है। सत्यका प्रकाश निरन्तर रहना चाहिये। तभी सच्ची सेवा बन सकती है। हमलोगोंकी बाढ़-पीड़ितोंकी ‘सेवा’ में यह सत्य है या हमारे व्यक्तित्वका विज्ञापन, इस बातका निर्णय भगवान् ही कर सकते हैं। अस्तु!

आनन्दका स्वरूप

आपने सदा आनन्दमें रहनेका उपाय पूछा, सो बड़ी अच्छी बात है। आनन्दमें रहनेका उपाय जाननेसे पहले आनन्दका कुछ स्वरूप जान लेना आवश्यक है। आनन्द भगवान‍्का स्वरूप है। किसी कामनाकी पूर्ति होनेपर क्षणभरके लिये जो आनन्द प्राप्त होता है, वह आनन्द नहीं है, वह तो आनन्दाभास है, क्योंकि वह विषयजन्य है। वह चित्तका एक विकारमात्र है जो विषयके साथ इन्द्रियका संयोग होनेपर प्राप्त होता है, वह आनन्द नहीं है, उसे सुख कह सकते हैं। आनन्द सुख-दु:खसे अतीत है। आनन्द स्वतन्त्र है, उसका प्रकाशक कोई निमित्त नहीं है; वह आनन्द शुद्ध है, निरंजन है, नित्य है, सत् है और स्वप्रकाश है; चेतन है, अखण्ड है, एकरस है, सम है, सर्वत्र है, एक है; उस आनन्दमें न सजातीय-विजातीय भेद है, न स्वगत भेद है, न किसी प्रकारका अंगांगिभाव या भोक्ताभोग्यभाव है। वह केवल आनन्द है। ‘एकमेवाद्वितीयम्’ है। उसमें न अशान्ति है और न विक्षेप है; वह नित्य शान्त, समाहित और स्निग्ध है। वह असीम है और अपार है; उसमें उदय और अस्त नहीं है—उत्पत्ति और विनाश नहीं है—वह सान्त नहीं है, अनन्त है! वह आनन्द निर्बाध है। उसमें तू-मैं और तेरे-मेरेका भेद नहीं है। उसमें आदि-मध्य-अन्त, सृष्टि-स्थिति-संहार, भूत-भविष्यत् -वर्तमान्, दृश्य-द्रष्टा-दर्शन नहीं है। वही ‘तू’ है, वही ‘मैं’ है, वही सब कुछ है; साथ ही वह ‘तू’ भी नहीं है, ‘मैं’ भी नहीं है, वह कुछ भी नहीं है। है केवल आनन्द, परम आनन्द, अपार आनन्द, अमर आनन्द, महान् आनन्द, शान्त आनन्द, सत् आनन्द, चित् आनन्द, आनन्द-ही-आनन्द, आनन्द-ही-आनन्द!

उस आनन्दमें अस्ति-नास्तिका भेद नहीं है, दोनों ही उसमें हैं, दोनों ही उससे हैं, वही दोनों है और वह दोनोंसे ही परे है। प्रकाश-अन्धकार, ज्ञान-अज्ञान, विद्या-अविद्या अगुण-सगुण, सुख-दु:ख, लाभ-हानि आदि परस्परविरुद्ध सभी धर्मोंका वही आधार है! उसीमें और उसीसे इन सबका अस्तित्व व्यक्त होता है। ऐसा होनेपर भी उसकी महिमामें, उसकी निरंजनतामें कोई बाधा नहीं पहुँचती; वह सदा ही एकरस है। जिन परस्पर विरुद्ध धर्मोंका व्यक्त होना कहा जाता है, वे भी वस्तुत: हैं नहीं; यह तो उसकी लीला है। है केवल वही और वही आनन्द ही। वह आनन्द आप ही अपनेसे पूर्ण है, उसी नित्य सनातन आनन्दसे ही बाह्य सभी आनन्दोंका प्रकाश है। वही सबका हेतु है, सभी उसीसे जन्य हैं। परंतु स्वयं नित्य अहैतुक है और अजन्य है। वह भूमा है, अल्प नहीं है। वह आनन्द ही आपका अपना स्वरूप है, उसी आनन्दसे आपका अस्तित्व है; आप उसी आनन्दसे आये हैं, उसी आनन्दमें हैं और उसी आनन्दमें प्रविष्ट होंगे। आप उस आनन्दसे कभी पृथक् हो ही नहीं सकते, क्योंकि वही आपका अपना स्वरूप है। फिर उसका वर्णन भी कौन करे और कैसे करे? आप आनन्दकी खोजमें हैं, आनन्द चाहते हैं, और आनन्द-प्राप्तिका उपाय पूछते हैं, यह ठीक ही है। सभी जीव ऐसा ही चाहते हैं—भोगसे हो या त्यागसे, रागसे हो या वैराग्यसे, सृजनसे हो या संहारसे, कैसे भी हो प्राप्त होना चाहिये आनन्द। जीवकी यही सहज आकांक्षा है। जीव अनादिकालसे इसी खोजमें लगा है; परंतु वह बाहर जितना ही खोजता है उतना ही उसे निराश होना पड़ता है, आनन्दके बदले विषाद ही मिलता है। क्योंकि आनन्द बाहर है नहीं, आनन्दका अटूट खजाना तो अंदर है। बस, एक बार हिम्मत करके पर्दा हटा देना चाहिये, फिर आनन्द-ही-आनन्द है। पर्दा हटते ही अंदरका वह अनन्त आनन्द समस्त जगत‍्में फैल जायगा। फिर दु:ख-दैन्यका नाश हो जायगा। शोक-विषाद मर जायँगे। फिर दीखेगी सर्वत्र आनन्दकी छटा, सर्वत्र हँसी-खुशी, सर्वत्र सुख-शान्ति। सर्वत्र—अखिल विश्व आनन्दकी अनूप सुषमासे सुशोभित हो उठेगा। सब ओर आनन्दमयका आनन्द-ही-आनन्द दिखायी देगा। फिर जगत‍्में दिखायी देगा सभी सुन्दर, सभी मधुर, सभी स्निग्ध, सभी ज्योत्स्नामय; इस अनन्त असीम आनन्दकी अजस्र धारामें समस्त विश्व बह जायगा। भगवान‍्का बतलाया हुआ यह ‘दु:खालय’ और ‘अशाश्वत’ जगत् इस सच्चिदानन्दमयी आनन्दधारामें बहकर नित्य आनन्दमय हो जायगा।

इस आनन्दकी प्राप्तिका उपाय है—निरंतर आनन्दका विचार, आनन्दका ध्यान। ‘नित्य आनन्द’ पर जो अज्ञानका पर्दा पड़ा है ज्ञानरूपी तलवारसे उसे काट डालना चाहिये। यह आनन्द कहींसे आयेगा नहीं, यह तो है ही। आनन्दकी नित्य सन्निधिमें रहनेपर भी, आनन्दकी ही सन्तान होकर भी जीव इस आनन्दसे वंचित है। यही तो मोह है। परंतु आनन्दसे निकला हुआ, आनन्दकी खोजमें लगा हुआ जीव तबतक तृप्त नहीं हो सकता जबतक कि वह जीवत्वके पर्देको फाड़कर अपने स्वरूप आनन्दमय ब्रह्मत्वको प्राप्त न कर ले वह तो प्राप्त ही है; प्राप्तिमें जो अप्राप्तिका भ्रम है—सत्संग, वैराग्य, विचार, ध्यान और अटूट श्रद्धाके द्वारा उस भ्रमको मिटा देना है। फिर आनन्द-ही-आनन्द है! क्योंकि वही असलमें है।