सेवा-साधन
सप्रेम हरिस्मरण! आपके पत्रका उत्तर कई दिनों बाद लिख रहा हूँ। क्षमा करेंगे। आपके प्रश्नोंके उत्तर निम्नलिखित हैं—
भगवद्बुद्धिकी सेवा
(१) आपके पास जो कुछ भी है, सब भगवान्का है। घर-द्वार, धन-दौलत, कुटुम्ब-परिवार सब भगवान्के हैं। आप तो उन सबकी यथायोग्य सेवा और सदुपयोग करनेके लिये भगवान्के द्वारा नियुक्त किये हुए मैनेजर हैं। आपने जो उन वस्तुओंको अपनी और अपने भोगसुखके लिये ही मिली हुई मान लिया है, यही आपकी गलती है। आप उनके मालिक कदापि नहीं हैं और न वे सब वस्तुएँ आपके भोगके लिये ही हैं। आप ‘गृहस्थी’ हैं, यह ठीक है। परन्तु गृहस्थीका अर्थ ‘घरके मालिक’ नहीं हैं। गृहस्थके माने है ‘घरके सेवक’। घरमें जितने लोग हैं, वे सब आपके सेव्य हैं। स्वाँगके अनुसार यथायोग्य व्यवहार-बर्ताव करते हुए आप उन सबकी सेवा कीजिये। सेवासे मुँह मोड़िये नहीं और अपना कुछ भी मानिये नहीं। ईमानदार मैनेजर मालिकके कारबारकी देख-रेख और सार-सँभाल पूरी सावधानीके साथ करता है; परन्तु अपना कुछ भी नहीं मानता। वह वफादारीसे सजग रहकर काम न करे तो नमकहराम होता है और मालिकके धनपर मन चलावे तो बेईमान! इसी तरह आप घरको मालिककी दूकान समझकर उनकी दी हुई उन्हींकी वस्तुओंसे उन्हींके आज्ञानुसार यथायोग्य उन्हींकी सेवा करते रहिये। इस कर्तव्यपालनसे कभी न चूकिये।
धन साथ नहीं जाता, वह यहीं रह जाता है और सच्ची बात तो यह है कि जैसे किसी गड्ढेमें रुका हुआ पानी कुछ ही समयमें गंदा, दुर्गन्धभरा, विषैला और पीनेवालोंके लिये रोगरूपी फल देनेवाला बन जाता है, वैसे ही सदुपयोगसे रहित जमा हुआ धन नाना प्रकारसे दूषित और दोष उत्पन्न करनेवाला बनकर महान् पीड़ा पहुँचानेमें कारण बन जाता है। धनको अपना न मानकर भगवान्के कार्यमें उसका मुक्तहस्तसे उपयोग करना चाहिये। असलमें वह है ही इसीलिये। इसीलिये वह आपको मिला है। मालिककी चीज मालिकके माँगनेपर भी न देना और अपनी मानकर मोहवश उसे अपने अधीन बनाये रखनेका प्रयत्न करना जैसे अपराध है, वैसे ही भगवान्की वस्तु भगवान्के माँगनेपर ममता और अहंकारवश उन्हें न देना भी बड़ा अपराध है। जहाँ जिस वस्तुका अभाव है, वहीं मानो भगवान् उस वस्तुको माँग रहे हैं। भगवान्की इस माँगको ठुकरा देनेवाला भगवान्का चोर ही है। मरनेसे पहले ही या मरते समय वह वस्तु तो उससे छीन ही ली जाती है; क्योंकि वह उसकी थी नहीं, बेईमानी और चोरीके अपराधके दण्डस्वरूप उसे परलोकमें भीषण दु:ख और बुरी-बुरी योनियोंकी प्राप्ति विशेष रूपसे होती है। इसलिये जहाँ गरीबी है, जहाँ दु:ख है, जहाँ अन्न-वस्त्र और आश्रयका अभाव है, वहीं आदरपूर्वक भगवान्की चीज भगवान्के अर्पण करते रहना चाहिये। परन्तु इस अर्पणमें भी अभिमान न आने पावे। जिनकी चीज थी, उनके माँगनेपर उन्हें दे दी इसमें अभिमानकी कौन-सी बात है, यह तो साधारण कर्तव्यमात्र है।
प्रेमभावकी सेवा
(२) अथवा निर्मल प्रेमभावसे तन-मन-धनके द्वारा सबकी सेवा करनी चाहिये। प्रेममें ऊँच-नीचकी भावना न होकर बराबरीका भाव होता है। वरं प्रेमास्पद विशेष आदरका पात्र होता है। माता, पत्नी या मित्र अपनी सन्तान, पति या मित्रकी सेवा करते हैं, उसमें उनके मनमें यही रहती है कि किस प्रकार स्वाभाविक सेवासे हम इन्हें सुख पहुँचा सकें। उनको सुख पहुँचानेमें इनको सुख मिलता है, अन्य कोई उद्देश्य नहीं रहता और इस सेवाके लिये वे बड़े-से-बड़ा त्याग भी आसानीसे कर डालते हैं। इस त्यागमें उन्हें कभी क्षोभ नहीं होता, वरं आनन्द होता है और न कर सकनेपर दु:ख होता है। प्रेम प्रतिक्षण बढ़नेवाला होता है, ‘प्रतिक्षणवर्धमानम्’(नारदभक्तिसूत्र ५४)। इसलिये प्रेमसे की जानेवाली सेवा भी प्रतिपल बढ़ती रहती है। उससे कभी उकताहट नहीं होती और न ऐसी सेवाकी कोई सीमा ही निर्धारित होती है। जितनी हो उतनी ही थोड़ी। इसमें न उपकारकी भावना है और न बदलेकी। न कभी अहसान बताया जाता है और न मनमें कोई गौरव या अभिमान ही होता है। इसमें सेव्यको सुखी देखनेपर प्रेमवश स्वाभाविक ही सुख मिलता है, और इसी सुखकी अदम्य अभिलाषाके कारण नित नयी-नयी सेवा की जाती है। इस सेवामें उत्साह और सेवाभाव बढ़ता ही रहता है। इसमें की हुई सेवाकी स्मृति नहीं रहती; क्योंकि यह सेवा उपकाररूप नहीं होती, यह तो आत्मसुख-सम्पादनकी चेष्टामात्र होती है। जैसे अपना भला करके कोई यह नहीं मानता—मैंने किसीका उपकार किया है, इसी प्रकार प्रेमभावसे की हुई पर-सेवामें भी ‘स्व’ भाव रहनेसे उपकारकी भावना नहीं होती। ‘पर’ को ‘स्व’ और ‘स्व’ को ‘पर’ बनाकर दोनोंका एकीकरण कर देना प्रेमका ही काम है।
दयावृत्तिकी सेवा
(३) प्रेमभाव न हो तो दयासे सेवा करनी चाहिये। प्रेमकी भाँति दयामें सेवा ग्रहण करनेवालेके प्रति सम्मानका शुद्धभाव सेव्यभाव नहीं रहता और न बराबरीका भाव ही रहता है। दया उसीपर होती है, जो ‘दयाका पात्र’ समझा जाता है। इसका यही अर्थ है कि दयावश जिसकी सेवा की जाती है, वह दीन—दया पानेयोग्य है और सेवा करनेवाला दयालु है। संसारमें कोई भी स्वाभिमानी जीव दूसरोंकी दयाका पात्र नहीं बनना चाहता! बाध्य होकर बनना पड़ता है। दया पाया हुआ मनुष्य दब-सा जाता है। उसमें बराबरीके भावसे सिर ऊँचा करनेकी हिम्मत प्राय: नहीं रह जाती। ऐसा करनेपर उसे कृतघ्न या अकृतज्ञ समझे जानेका डर रहता है। यह बात प्रेममें नहीं है। इसीलिये प्रेमका स्तर दयासे कहीं ऊँचा है। इतना होनेपर भी दया बहुत बड़ी चीज है। दया साधुपुरुषका स्वभाव होता है। जो हृदय बड़े-से-बड़े दु:खमें भी सदा निर्विकार, सम और अचल रहता है वही पराये दु:खको देखकर उससे जलने लग जाता है और तुरंत ही पिघल जाता है। उससे वह दु:ख सहन नहीं होता। इसीसे तुलसीदासजीने कहा है—
संत हृदय नवनीत समाना।
कहा कबिन्ह पै कहै न जाना॥
निज परिताप द्रवइ नवनीता।
पर दुख द्रवहिं संत सुपुनीता॥
कवियोंने संत-हृदयको मक्खनके समान कोमल बतलाया है; पर असलमें वे संत-हृदयका यथार्थ निरूपण नहीं कर सके। क्योंकि मक्खन तो स्वयं ताप पाकर पिघल जाता है; परन्तु संत अपने तापसे कभी नहीं पिघलते। वे अपने दु:खोंकी जरा भी परवा नहीं करते। महान् पवित्र आत्मा संत तो दूसरोंके तापसे द्रवित होते हैं। पर-दु:ख देखकर दयालु पुरुषके हृदयमें दयाका पवित्र आवेश होता है और उस आवेशका इतना प्रभाव होता है कि उस समय उसे यह भी पता नहीं रहता कि यह दु:खी पुरुष—जिसके दु:खको देखकर दयाका आवेश हुआ है अपना है या पराया, मित्र है या शत्रु! शास्त्रमें कहा है—
परे वा बन्धुवर्गे वा मित्रे द्वेष्टरि वा तथा।
आपन्ने रक्षितव्यं तु दयैषा परिकीर्तिता॥
(अत्रिसंहिता)
‘पराये हों या अपने, मित्र हों या वैरी, किसीको भी दु:खमें देखकर रक्षा करनेकी जो स्वाभाविक चेष्टा होती है उसीका नाम दया है।’
शुद्ध दयाके भावसे की हुई सेवामें भी अहसान बतानेकी भावना नहीं रह सकती। वहाँ तो दयाकी वृत्तिसे हृदय इतना प्रभावित होता है कि दु:खीको दु:खसे बचानेका सक्रिय प्रयत्न किये बिना उसमें शान्ति होती ही नहीं। सारांश यह कि दयालु पुरुष भी दीनोंकी सेवा अपने ही चित्तकी प्रसन्नता और शान्तिके लिये करता है। जहाँ अपने-परायेका भेद है, अपना या अपना मित्र हो तो दु:ख दूर करनेकी चेष्टा की जाय, पराया या शत्रु हो तो उसे दु:खमें देखकर भी उपेक्षा की जाय। यह शुद्ध दयाका कार्य नहीं है। शुद्ध दयाको भेदजनित उपेक्षा कभी सहन नहीं होती। आजकल जो उपकार या सेवा-कार्य होता है, वह प्राय: शुद्ध दयाका भी नहीं होता, ईश्वर-बुद्धि या प्रेमभावकी तो बात ही दूसरी है। सेवा करके या किसीको देकर तो उसे भूल ही जाना चाहिये। उसकी पहचान भी ठीक नहीं। ऐसी चेष्टा कभी होनी ही नहीं चाहिये जिससे आपके द्वारा किसी समय सेवा प्राप्त किये हुए मनुष्यको सकुचाना पड़े, सेवा ग्रहण करनेके लिये पश्चात्ताप करना पड़े, अपने हृदयके शुभ विचारोंको दबाना या छोड़ना पड़े और बदला उतारनेके लिये चेष्टा करनी पड़े। किसीको कुछ देना हो तो चुपके-से देना चाहिये, जिसमें दूसरोंके सामने उसको अपमानित न होना पड़े। उसको सदा गुप्त रखना चाहिये। कभी उसके लिये उसपर अहसान नहीं करना चाहिये और न उसपर किसी बातके लिये दबाव डालना या उससे बदला चुकानेकी आशा रखनी चाहिये। भगवान्की चीज भगवान्के काममें लगी समझकर प्रसन्न होना चाहिये।
अधिक धनसे हानि
(४) अधिक धन कमानेकी चेष्टा भी परमार्थके साधनमें विघ्नरूप ही होती है। धनका मोह मनुष्यकी बुद्धिको अनिश्चयात्मिका बना देता है। खास करके बटोरकर जमा रखनेकी बात तो और भी बुरी है। बहता हुआ धन ही उत्तम पोषक और पवित्र होता है। रुका हुआ तो, जैसे हृदयसे रक्तके संचालनकी क्रिया बंद होनेपर वह दूषित होकर मृत्युका कारण बन जाता है, वैसे ही, पारमार्थिक भावोंके विनाशका ही कारण होता है।
साथ ही यह बात भी ध्यानमें रखनेकी है कि जो कुछ भी धन कमाया जाय, वह न्याय और धर्मके आधारपर ही होना चाहिये। अन्यायका धन तो अपने या पराये, जिसके भी काममें आयेगा, बुद्धिको बिगाड़कर आत्माका पतन ही करनेवाला होगा।