शान्ति भगवान‍्के आश्रयसे ही मिल सकती है

संसारकी बात तो ऐसी ही है। आप सच मानिये—भगवान‍्से रहित जगत‍्में गड्ढे-ही-गड्ढे, खाई-ही-खाई हैं। इसमें कहीं ऊँची जगह है ही नहीं, जहाँ मनुष्य सुखसे रह सके। एक गड्ढेमें पड़ा हुआ मनुष्य उससे दु:खी होकर दूसरे गड्ढेकी चाह करता है और कदाचित् उससे निकलकर दूसरेमें गिर जाता है एवं फिर उन्हीं दु:खोंका सामना करता है। इसमें तो परमात्माका आश्रय, भगवद्भावका निश्चय, सर्वत्र एकमात्र भगवत्सत्ताका अनुभव और भगवान‍्की लीलाका दर्शन करनेपर ही शान्ति मिलती है। फिर तो प्रत्येक गड्ढा एक सुन्दर सुरम्य आनन्दस्थलीके रूपमें परिणत हो जाता है। दु:ख, संकट, विपत्ति, असफलता—सभी सुख, शान्ति, सम्पत्ति और सफलताके रूपमें पलट जाते हैं। लोकदृष्टिमें बुरी-से-बुरी स्थिति भी फिर दु:खदायिनी नहीं होती। संहार और सृजन दोनों ही उनकी लीलाके दो अंग दीखते हैं। फिर लौकिक मान-अपमान, स्तुति-निन्दा, अनुकूलता-प्रतिकूलता, जीवन-मरण, लाभ-हानि, उत्थान-पतन—सभीमें लीलानन्दका अनुभव होता है। ऐसा हुए बिना—केवल जगत‍्को पकड़े रहकर मनुष्य यदि शान्ति, सुख और सफलता चाहता है तो वे उसके लिये आकाश-कुसुमके समान सदा असम्भव ही रहते हैं। दु:खालयमें सुख कैसा? अनित्यमें नित्य कहाँसे आवे? याद रखना चाहिये—जो मनुष्य केवल विषयोंमें सुख खोजता है, उसके जीवनका अन्त तीनों बातोंमें होता है—अतृप्ति, असफलता और पापसंग्रह। इसलिये भगवान‍्को ही जीवनका लक्ष्य बनाकर भगवान‍्के लिये ही जगत‍्के यथायोग्य सब कार्य करने चाहिये। समस्त जीवन उनकी पूजाका उपकरण बन जाय। जीवनका प्रत्येक पल उनके प्रार्थना-ग्रंथका एक-एक पृष्ठ बन जाय। तभी सुख-शान्ति और सच्ची स्थायी सफलताके दर्शन होंगे। मैंने खूब परीक्षा करके देखा है—भगवान‍्से रहित जगत‍्में बड़े-से-बड़े सुखों और भोगोंको प्राप्त सफल-जीवन समझे जानेवाले पुरुष भी महान् दु:खी और सर्वथा असफल ही हैं। उनका हृदय सदैव अतृप्तिकी आगसे जलता रहता है। भोगोंसे तृप्ति कभी होती ही नहीं। इसके सिवा और भी नाना प्रकारके ऐसे दु:ख, जिनकी दूसरे कल्पना भी नहीं कर सकते, उनके जीवन-संगी बने रहते हैं, जो सदा उन्हें सताया करते हैं। यह सत्य है।