शरीरका मोह छोड़कर भजन करना चाहिये

सप्रेम हरिस्मरण! शरीरकी जरा भी चिन्ता नहीं करनी चाहिये। शरीरसे भगवान‍्का भजन और भगवत्स्वरूप जगत‍्के प्राणियोंकी सेवा बने, तभी शरीरकी सार्थकता है। नहीं तो, शरीर नरक-तुल्य है और ऐसे शरीरको धारण किये रहना नरकरूपसे ही जीना है। श्रीशंकराचार्यजीने कहा है—‘को वास्ति घोरो नरक: स्वदेह:।’ और तुलसीदासजी महाराज कहते हैं—ते नर नरकरूप जीवत जग भव-भंजन-पद-बिमुख अभागी।’ जबतक शरीर भीषण रोगोंसे आक्रान्त नहीं हो जाता, तबतक इससे भजन और सेवाका काम भलीभाँति लेना चाहिये। आरामतलबी बहुत बुरी है। रात-दिन शरीरको धोने-पोंछने और सजानेमें लगे रहना, और इसीकी चिन्तामें रमे रहना जरा भी बुद्धिमानी नहीं है।

अमेध्यपूर्णे कृमिजालसङ्कुले

स्वभावदुर्गन्धिविनिन्दितान्तरे।

कलेवरे मूत्रपुरीषभाविते

रमन्ति मूढा विरमन्ति पण्डिता:॥

ऐसे रक्त-मांस, मज्जा और कीटाणुओंसे भरे, दुर्गन्धिपूर्ण मल-मूत्रसे युक्त शरीरके लिये, उसके भोगविलासके लिये भगवान‍्को भूले रहना बहुत बड़ी मूर्खता है। शरीर और शरीरका सुख कितने दिनोंका है? जन्म-मृत्यु और जरा-व्याधिसे ग्रस्त इस देहका कोई भरोसा नहीं, कब नष्ट हो जाय। इसमें और इसके सम्बन्धी विषयोंमें सुख समझना सर्वथा मोहका ही कार्य है। खेदकी बात तो यही है कि मनुष्य-शरीरकी सेवामें और इसके लिये भोगोंके जुटानेमें ही दिन-रात व्यस्त रहता है, उसे स्वाद, शौकीनी, धन-पुत्र, स्त्री-सुख आदिमें ही रसकी भ्रान्त अनुभूति होती है। अप्राकृत भगवदीय प्रेमरसके तो समीप भी वह नहीं जाना चाहता। कितने दु:खकी बात है यह कि मनुष्य जान-बूझकर नरककी और उसकी दीर्घकालव्यापिनी यन्त्रणाओंको तो सिर चढ़ाकर स्वीकार कर लेता है, परंतु जिसकी जरा-सी झाँकीसे सारे दु:ख सदाके लिये मिट जाते हैं, जिसके ध्यानमात्रसे प्राणोंमें अमृतका झरना फूट निकलता है, जिसकी लीला-कथाके कथन और श्रवणका प्रेम अनन्त जीभों और कानोंकी अदम्य कामनाएँ जगा देता है, जिसके रूप, गुण और नामकी महिमा जीवको नरकोंसे निकालकर दिव्यधाममें पहुँचा देती है, उस भगवान‍्से सदा दूर रहना चाहता है!

आपसे यही प्रार्थना है कि आप इस बातको अच्छी तरह समझिये और शरीरका मोह छोड़कर उसे आरामतलबीसे छुड़ाकर भगवान‍्की सेवामें लगानेका प्रयत्न कीजिये। निश्चित समझिये—शरीरके पालन-पोषणमात्रसे कभी सुख नहीं मिलेगा। न तो यह हजार पालन-पोषण करनेपर भी बीमारी और मौतसे ही बचा रहेगा और न इसकी सेवा आपको सुख-शान्ति ही देगी। शरीरका पालन-पोषण तो कुत्ते-सूअर आदि भी करते हैं, वे भी खाते, पीते, सोते और मैथुन करते हैं। जो मनुष्य भगवान‍्का भजन नहीं करता वह तो दर-दर दुरदुराये जानेवाले कुत्ते, इधर-उधर मल खाकर भटकनेवाले सूअर, काँटे खाकर जीनेवाले ऊँट और दिन-रात बोझ ढोनेवाले गधेके समान ही है। श्रीमद्भागवतमें कहा है—वह हृदय पत्थरके तुल्य है जो भगवान‍्के नाम-गुण-कीर्तनको सुनकर गद‍्गद नहीं होता, जिसके शरीरमें रोमांच नहीं होता और आँखोंमें आनन्दके आँसू नहीं उमड़ आते। गोसाईंजी महाराजने भी कहा है—

हिय फाटहु फूटहु नयन

जरउ सो तन केहि काम।

द्रवइ स्रवइ पुलकइ नहीं

तुलसी सुमिरत राम॥