श्राद्धकी आवश्यकता

आपका कृपापत्र मिल गया, उत्तर लिखनेमें देर हुई, इसके लिये क्षमा करें। आपके प्रश्नोंका संक्षेपमें निम्नलिखित उत्तर है—

प्रश्न—क्या पितरोंका श्राद्ध करना जरूरी है?

उत्तर—हाँ, बहुत जरूरी है। जो सन्तान अपने पितरोंके लिये श्राद्ध-तर्पण नहीं करती, वह कृतघ्न है; और नरकगामिनी होती है। अतएव श्रद्धापूर्वक श्राद्ध अवश्य करना चाहिये। श्राद्धमें विधिके साथ-साथ श्रद्धाकी भी बड़ी आवश्यकता है। असलमें श्रद्धासे ही श्राद्ध होता है। शास्त्रोंमें कहा है—‘जो मनुष्य श्राद्ध नहीं करता, वह अन्त्यजयोनिमें उत्पन्न होकर दरिद्रताको प्राप्त होता है।’

प्रश्न—पितर किनको कहते हैं?

उत्तर—यों तो ब्रह्माजी सबके पितामह कहलाते हैं, कश्यप आदि प्रजापति भी सबके जन्मदाता होनेसे पितर हैं। पर मुख्यतया पितृलोक (जो भुवर्लोकका प्रखर प्रकाशयुक्त ‘प्रद्यौ’ नामक अन्तरिक्षका भाग है) में रहनेवाले* द्विविध पितरोंको ही पितर कहा जाता है।

इनमें पहले पितृलोकके नियामक और अधिकारी अग्निष्वात्तादि ‘दिव्य पितर’ हैं, और दूसरे ‘मनुष्य पितर’ हैं जो मरनेके बाद पितृलोकमें जाते हैं और श्राद्धादिमें, वेदमन्त्रोंद्वारा जिनका आवाहन किया जाता है। वेद, वैदिकसूत्र, स्मृति, महाभारत और पुराणादिमें इनका विस्तृत वर्णन है। हमारे यहाँ श्राद्ध-तर्पणके समय केवल अपने जन्मदाता पितरोंको ही पिण्ड और तर्पणांजलि नहीं दी जाती, बल्कि सभीको दी जाती है। यहाँतक कि सारे विश्वके प्राणिमात्रकी तृप्तिके लिये पिण्ड और जलांजलि दी जाती है। परंतु ‘पितृ’ शब्दका मुख्य अर्थ है जन्म देनेवाले माता-पिता आदि ही।

प्रश्न—श्राद्धका अर्थ माता-पिताके जीवनकालमें उनकी सेवा करना, उन्हें खिलाना-पिलाना आदि न करके मरनेपर उनके लिये ब्राह्मण-भोजन कराना, पिण्डादि देना क्यों किया जाता है?

उत्तर—अर्थ ही नहीं किया जाता, ऐसी ही बात है। जीवनकालमें तो माता-पिता आदिकी सेवा-शुश्रूषा करनी ही चाहिये। मरनेपर जब वे ‘आतिवाहिक’ देह धारण करके पितृलोक आदिमें जाते हैं, उस समय उनकी भूख-प्यास मिटानेके लिये संतानद्वारा किये हुए श्राद्ध-तर्पण ही प्रधान साधन होते हैं। यहाँपर यह भी बतला देना आवश्यक है कि मनुष्य जब मर जाता है अर्थात् जब इस पंचीकृत महाभूतोंसे गठित पार्थिवतत्त्व प्रधान स्थूल शरीरको त्यागकर सूक्ष्मशरीरयुक्त चेतन जीव निकल जाता है तब उसको अपने कर्मानुसार इन चार प्रकारकी गतियोंमेंसे कोई-सी एक गति प्राप्त होती है—१—भगवत्स्वरूपके यथार्थ ज्ञानके द्वारा सारी कर्मराशिका क्षय हो जानेके कारण सूक्ष्म शरीरका कारण देहसहित नाश हो जाना और जीवका आत्मस्वरूप परमात्मामें एकत्वको प्राप्त हो जाना। इसीका नाम केवल या सायुज्य मुक्ति है। अथवा भगवत्स्वरूपके यथार्थ ज्ञानके साथ ही भगवत्प्रेमकी प्रधानताके कारण प्रत्यक्ष सेवाधिकार प्राप्त करके दिव्य भागवती शरीर- धारणकर वैकुण्ठ, साकेत, गोलोक, कैलास आदि नामोंसे प्रख्यात भगवान‍्के नित्य दिव्य चिन्मय धामको प्राप्त हो जाना।

२—निष्काम कर्मानुष्ठान, सत्पुरुषसेवन आदिके द्वारा अधिकार-सम्पन्न होकर क्रममुक्तिके अपुनरावर्ती शुक्लपथ या अर्चिमार्गसे देवताओंद्वारा सम्मान प्राप्त करते हुए ब्रह्मलोकको जाना और ब्रह्माजीकी आयुपर्यन्त वहाँके दिव्य भोगोंको भोगकर ब्रह्माजीके साथ ही मुक्त हो जाना।

३—सकाम पुण्यकर्मोंके अनुष्ठानसे अधिकारसम्पन्न होकर स्वर्गादि सुख-भोगके लिये पुनरावर्ती कृष्णपथ या धूममार्गके द्वारा स्वर्गादि लोकोंको प्राप्त होना।

४—पापकर्मोंके कारण बाध्य होकर यमदूतोंके द्वारा यमलोक या प्रेतलोक आदिमें जाकर वहाँकी दु:सह यातनाओंको भोगना।

इन चार प्रकारकी गतियोंमें पहली गतिमें तो प्राणोत्क्रमण करते ही नहीं। कारण सूक्ष्म शरीरका भंग हो जाता है। सायुज्य-मुक्तिमें अलग कुछ बचता ही नहीं। भगवद्धामकी प्राप्तिमें भी ‘अप्राकृत भागवत तनु’ मिल जाता है। वह अलग होनेपर भी वास्तवमें भगवान‍्के साथ अलग नहीं होता। वहाँकी बात समझायी नहीं जा सकती। सारांश यह कि वह स्थिति अत्यन्त विलक्षण, हमारी प्राकृत मन-बुद्धिसे अगोचर, अनिर्वचनीय और अचिन्त्य सर्वथा भगवदीय होती है, इसलिये वहाँ प्राकृत किसी भी शरीरकी आवश्यकता ही नहीं होती। दूसरी अर्चिमार्गकी अपुनरावर्ती गतिमें भी क्रमश: दिव्यता प्राप्त होती रहती है। ज्यों-ज्यों जीवका ऊर्ध्वगमन होता है त्यों-ही-त्यों उसकी जडता नष्ट होती चली जाती है। वहाँ उसकी देह शुद्ध, सूक्ष्म, तेज:प्रधान तत्त्वोंके द्वारा निर्मित होती है।

रहे पुनरावर्ती धूममार्ग और यमधामका मार्ग। इनमें शरीरकी आवश्यकता होती है। मनुष्यके मरनेके बाद ही उसी क्षण उसे स्थूल पांचभौतिक शरीर नहीं मिल जाता। उसमें कुछ समय लगता है। वह समय बहुत थोड़ा भी हो सकता है और बहुत लंबा भी। कर्मोंके अनुसार ही कर्मफल भुगतानेवाली भागवती शक्तिके द्वारा उसकी व्यवस्था होती है। इस बीचके समयमें सूक्ष्म शरीरयुक्त जीवको एक शरीरकी प्राप्ति होती है। उस शरीरका नाम होता है ‘आतिवाहिक’। वह देखनेमें स्थूल शरीरके जैसे ही रूप-रंग और आकारका होता है, जीव उसीका आश्रय करके नरकादिकी पीड़ा और स्वर्गादिके भोग भोगता है। यह आतिवाहिक शरीर मरनेके बाद तुरन्त ही मिल जाता है—

तत्क्षणादेव गृह्णाति शरीरमातिवाहिकम्।

(विष्णुधर्मोत्तर)

यह शरीर पृथ्वी-तत्त्वप्रधान नहीं होता। क्योंकि ऊर्ध्वकी ओर जाते ही पाँच भूतोंमेंसे प्राय: दो भूत—पृथ्वी और जल नीचे रह जाते हैं और तीन भूत—अग्नि, वायु और आकाश ही उसके शरीरमें रह जाते हैं।

ऊर्ध्वं व्रजन्ति भूतानि बीण्यस्मात्तस्य विग्रहात्।

इसीसे इस शरीरमें अस्थि, मेद, मज्जादि नहीं होते। यह आरम्भमें वायुप्रधान होता है। कर्मानुसार आगे चलकर इसके दो रूप हो सकते हैं—नरकभोगके लिये ‘यातना-देह’ और स्वर्गादिभोगके लिये ‘देव-देह’। जिस मनुष्यके पाप अधिक होते हैं उसे ‘यातना-देह’ की प्राप्ति होती है। इस देहके द्वारा वह नरकोंकी भीषण यातनाएँ भोगता है। यह शरीर ऐसा होता है कि इसमें पीड़ाका अनुभव होता है परन्तु मृत्यु नहीं होती। जैसे आगमें जलनेका अनुभव होता है; परन्तु जलकर खाक नहीं हो जाता। साँपोंके डसनेसे पीड़ा होती है परन्तु मर नहीं जाता। इसीसे इसका नाम ‘यातना-देह’ है। यह वायुप्रधान ही रहता है। इसके विपरीत जिसके पुण्यकर्म अधिक होते हैं, उसे अग्नि-तत्त्वप्रधान प्रकाशमय देव-देहकी प्राप्ति होती है, इसके द्वारा वह स्वर्गादिके देवभोगोंको भोगकर कर्मक्षय होनेपर कर्मानुसार विभिन्न स्थूल योनियोंको प्राप्त होता है। इन शुक्ल-कृष्ण मार्गोंका स्वर्गादिसे तथा योनियोंके प्राप्त होनेका वर्णन बृहदारण्यक और छान्दोग्योपनिषद् में तथा श्रीमद्भागवतमें देखना चाहिये। गीतामें भी भगवान‍्ने कहा है—

ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं

क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति।

(९। २१)

‘वे उस विशाल स्वर्गलोकको भोगकर पुण्य-क्षय होनेपर पुन: मृत्युलोकको प्राप्त होते हैं।’

जो लोग स्वर्गादिमें जाते हैं, उनके लिये भी श्राद्ध-तर्पणादिकी जरूरत है; क्योंकि इससे उनको वहाँ पुष्टि-तुष्टि और बल मिलता है। परन्तु जो लोग यमलोकके नरकादिमें जाते हैं, वे तो भूख-प्याससे अत्यन्त पीड़ित रहते हैं। उनके लिये तो पिण्डदान, श्राद्ध-तर्पणादिकी बहुत ही आवश्यकता है।

प्रश्न—यहाँका पिण्डदान, श्राद्ध-तर्पण आदि दूसरे लोकमें पितरोंको कैसे प्राप्त होता है? और कैसे उनकी उनसे तृप्ति होती है? मान लीजिये; किसीकी मुक्ति हो गयी तो फिर उसके लिये जो श्राद्ध किया जाता है, वह तो व्यर्थ ही जायगा। साथ ही, दूसरी स्थूल योनि प्राप्त होनेपर भी उसका कोई उपयोग नहीं है। फिर सबके लिये श्राद्धादि क्यों करने चाहिये?

उत्तर—इस बार आपने एक ही साथ बहुत-सी बातें पूछ ली हैं। संक्षेपमें एक-एकका उत्तर ध्यानपूर्वक पढ़िये। तृप्ति दो प्रकारकी होती है—शारीरिक और मानसिक। किसी भूखेको आप कुछ खानेको दीजिये, प्यासेको जल पिलाइये, थके हुएके अंग दबा दीजिये, गर्मीके मारे घबराये हुएको पंखा झल दीजिये। इनसे जो एक शान्ति मिलती है वह शारीरिक तृप्ति है। और शोकमें किसीको ज्ञानयुक्त मधुर भाषणसे समझाइये, डरे हुएको अभयदान दीजिये, निराशको सान्त्वना देकर आश्रय दीजिये, यह मानसिक तृप्ति है। श्राद्ध-तर्पणादिसे दोनों ही प्रकारकी तृप्ति होती है। यहाँ हम पितरोंके लिये जो कुछ भी दान करते हैं, उनको वहाँ उन्हींके काममें आने योग्य रूपमें परिणत होकर वह मिल जाता है। जैसे मान लीजिये—आप अपने किसी मित्रको अमेरिका रुपये भेजना चाहते हैं, तो आप कैसे भेजेंगे। रुपयोंका पारसल करेंगे तो वे रुपये वहाँ काम नहीं आवेंगे; क्योंकि यहाँका सिक्‍का वहाँ चलता ही नहीं। अतएव आप पोस्ट-ऑफिसमें या किसी एक्सचैंज बैंकमें रुपये जमा करा देंगे और वहाँ सूचना भिजवा देंगे तो वहाँकी पोस्ट-ऑफिससे या बैंकसे वहाँके उतने ही मूल्यके सिक्‍के उन्हें मिल जायँगे। इसी प्रकार हम यहाँ पितरोंके उद्देश्यसे जो कुछ भी विधि श्रद्धापूर्वक देते हैं, उन्हें वह वहाँके अनुरूप होकर मिल जाता है।

श्रद्धासमन्वितैर्दत्तं पितृभ्यो नामगोत्रत:।

यदाहारास्तु ते जातास्तदाहारत्वमेति तत्॥

(विष्णुपुराण ३।१६।१६)

‘श्रद्धावान् पुरुषोंके द्वारा नाम और गोत्रका उच्चारण करके जो कुछ अन्न दिया जाता है, वह पितरोंको वे जैसे आहारके योग्य होते हैं, वैसा ही होकर उन्हें मिल जाता है। आपको यहाँ जो कुछ भी भोग मिल रहे हैं—यह कोई आकस्मिक घटना नहीं है। यह सारा आपके कर्मोंका फल है और वह कर्मोंका नियन्त्रण करनेवाली और यथायोग्य फल भुगतानेवाली भागवती शक्तिके द्वारा नियुक्त चेतन देवताओंके द्वारा दिया जा रहा है। वे देवता ही मनुष्यके ‘अपूर्व’ के अनुसार उसके लिये यथायोग्य भोगोंकी व्यवस्था करते हैं और उसी रूपमें करते हैं जिस रूपमें यहाँ वह उसके काममें आ सके। इसी प्रकार जब आप यहाँ पितरोंके उद्देश्यसे भोजन, जल या पिण्ड आदि जो कुछ वस्तु भी दान करेंगे, उसी क्षण वे कर्मफलदाता नियामक देवता (अग्निष्वात्तादि नित्य पितर) उस वस्तुको—आपने जिस लोकके जिस प्राणीके लिये उसे दान किया है—उस लोकके उसके भोगयोग्य रूपमें परिणत करके उसको प्राप्त करा देंगे। इन देवताओंको इस बातका पूरा पता रहता है कि कौन जीव इस समय कहाँ किस लोकमें, किस शरीरमें और किस अवस्थामें है। अतएव इन्हें उसके पास उस वस्तुको तदनुरूप रूपान्तर करके पहुँचाते जरा भी देर नहीं लगती। यह तो हुई शारीरिक तृप्तिकी बात।

इसी प्रकार पितरोंकी मानसिक तृप्तिके लिये आप यहाँ जो कुछ कीर्तन, स्वाध्याय, प्रणाम आदि करेंगे या सान्त्वना-वाक्योंका उच्चारण करेंगे उससे उनकी मानसिक तृप्ति हो जायगी। आप यहाँ जो कुछ भी बोलते हैं—वह नष्ट नहीं होता, सब आकाशमें चला जाता है। रेडियोकी बात आप जानते ही हैं। कितनी दूरके शब्द कितनी दूरतक उसी क्षण स्पष्ट सुनायी देते हैं। इन शब्दोंको जो वहन करके लाती है, वह आकाशतत्त्वकी शक्ति है। उसे वैज्ञानिक लोग ‘ईथर’ कहते हैं। नियामक देवता इसी प्रकारकी शक्तिके द्वारा आपकी क्रियाको तुरंत वहाँ पहुँचा देते हैं। जैसे जीवित माता-पितादिके चरणोंमें प्रणाम करनेसे उन्हें प्रसन्नता होती है, सुख मिलता है, वैसे ही यदि आप पितरोंको प्रणाम करते हैं तो इस बातको उपर्युक्त रीतिसे जाननेपर उन्हें भी सुख मिलता है—उनकी मानसिक तृप्ति होती है। उनके लिये की हुई आपकी प्रत्येक क्रिया सूक्ष्म आकाशमें लहराती हुई तत्काल उनतक पहुँच जाती है और उन्हें यथायोग्य मानसिक सुख-दु:ख पहुँचाती है।

आपका दूसरा प्रश्न है कि मुक्ति हो जानेपर तो श्राद्ध व्यर्थ ही हो जायगा। इसका उत्तर यह है कि प्रथम तो आपको पता नहीं लगता, आपके पास इसके जाननेका कोई उपाय ही नहीं है कि आपके किस पितरकी मुक्ति हो गयी है अथवा कौन किस लोक, किस योनि या किस दशामें हैं। आप मुक्त मानते हों और वे बेचारे कहीं नरकोंमें पड़े हों, इसलिये श्राद्ध-तर्पणादि सभीके करने ही चाहिये। मुक्ति हो गयी होगी तो आपके किये हुए उस सत्कर्मका फल आपके संचितमें लौट आवेगा और उससे आपको यथायोग्य सुख-सम्पत्ति तथा शान्तिकी प्राप्ति होगी।

रही दूसरी योनिमें जानेकी बात, सो उसमें भी श्राद्ध-तर्पणादिका उपयोग है। वायुप्रधान और तेजप्रधान शरीरोंमें तो उन पितरोंको प्राय: यह पता रहता है कि हम अमुकके सम्बन्धी हैं, हमारी अमुक सन्तान इस समय पृथ्वीपर है। वे तो सन्तानसे श्राद्ध-तर्पणादि चाहते हैं—खास करके पितृलोक या यमलोकमें रहनेवाले वायुप्रधान शरीरवाले जीव; क्योंकि उनके क्षुधा-पिपासाकी शान्तिके साधनका प्राय: अभाव-सा रहता है। परन्तु मनुष्य, पशु, पक्षी आदि स्थूल योनियोंमें भी उनके लिये पूर्वजन्मकी सन्तानद्वारा दिये हुए पदार्थोंका उनके उस योनिके अनुरूप फल मिलता है। जैसे इस समय आपका कोई सम्बन्धी हरिन-योनिमें है—आप उसके लिये किसी श्राद्धके योग्य ब्राह्मणको हलवा-पूरी खिलाते हैं, तो उसको वहाँ वह घासके रूपमें मिल सकता है। इसी प्रकार सबको मिलता है। उनके लिये किये हुए शान्ति-स्वस्त्ययन, स्वाध्याय, प्रणामादिसे उनको शान्ति और तृप्ति मिलती है। एक जगह आया है कि जब भगवान् श्रीकृष्ण जाम्बवान‍्के साथ उसकी गुफामें युद्ध कर रहे थे, तब उनके लौटनेमें बहुत समय बीत गया। बाहर बाट देखते-देखते जब साथी लोग थक गये तब उन्होंने द्वारका लौटकर अपना ऐसा अनुमान बतलाया कि सम्भवत: श्रीकृष्णका निधन हो गया है। तब घरवालोंने उनके लिये यथायोग्य श्राद्धादि क्रियाएँ कीं।

तद्‍बान्धवाश्च तत्कालोचितमखिलमुपरतक्रियाकलापं चक्रु:। तत्र चास्य युध्यमानस्यातिश्रद्धादत्तविशिष्टपात्रोपयुक्तान्नतोयादिना कृष्णस्य बलप्राणपुष्टिरभूत्।

‘श्रीकृष्णके बन्धुओंने समयोचित सारी क्रियाएँ कीं। श्रीकृष्णके समान सर्वश्रेष्ठ पुरुषके उपयुक्त अत्यन्त श्रद्धाके साथ जो अन्न-जलादि दिये गये, उनसे युद्धमें लगे हुए श्रीकृष्णको बल, प्राण और पुष्टि प्राप्त हुई।’ यद्यपि श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् थे, उन्हें बल, पुष्टि क्या मिलती। परन्तु शास्त्र-मर्यादाके अनुसार लीलाके लिये ऐसा मानना उचित ही है। इसलिये हर हालतमें श्राद्ध करना ही चाहिये।

प्रश्न—गीतामें तो भगवान् कहते हैं—

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय

नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।

तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-

न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥

(२।२२)

‘जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रोंको त्यागकर दूसरे नये वस्त्र ग्रहण करता है, वैसे ही जीव पुराने शरीरोंको छोड़कर दूसरे नये शरीरोंको प्राप्त होता है।’

इससे यह सिद्ध है कि जीवको मरते ही दूसरी देह मिल जाती है, फिर नरक-स्वर्गमें जानेकी बात कहाँ रही? शास्त्रमें कहा गया है कि जैसे जोंक अगला पैर टिकाकर ही पिछला उठाती है, वैसे ही जीव दूसरी देहमें जानेका उपक्रम करके ही पहलीको छोड़ता है। इसकी संगति कैसे लगती है?

उत्तर—गीतामें भगवान‍्ने नये ‘शरीर’ की बात कही है, ‘स्थूल शरीर’ की नहीं। मरनेपर उसी क्षण जीवको ‘आतिवाहिक देह’ मिल जाती है, यह बात ऊपर कही जा चुकी है। इसलिये इसमें कोई विरोध नहीं रह जाता।

प्रश्न—श्राद्ध कब करना चाहिये?

उत्तर—किसीके मरनेपर तीन क्रियाएँ की जानी चाहिये—पूर्व, मध्यम और उत्तर। दाहसे लेकर जितने कर्म हैं, उनको ‘पूर्वकर्म’ कहते हैं। प्रतिमास किये जानेवाले एकोद्दिष्ट श्राद्धको ‘मध्यम कर्म’ और ‘सपिण्डीकरण’ के बाद मृतक व्यक्तिके पितृत्व प्राप्त हो जानेपर किये जानेवाले कर्मको ‘उत्तर कर्म’ कहते हैं। फिर, प्रतिदिन ही श्राद्धकी विधि है। प्रतिदिन न हो तो प्रत्येक अमावस्याको श्राद्ध करना चाहिये, उसमें भी न हो सके तो कन्यागत सूर्य होनेपर (कनागतोंमें) अर्थात् आश्विन कृष्णपक्षमें मरण-तिथिको, और मनुष्यकी वार्षिक मरण-तिथिको—ये दो श्राद्ध तो अवश्य करने चाहिये। श्रीमद्भागवतमें कर्क, मकर, तुला और मेषकी संक्रान्ति, व्यतिपात, दिनक्षय, चन्द्र-सूर्य-ग्रहण, द्वादशी, श्रवणादि तीन नक्षत्र, अक्षयतृतीया (वैशाख शुक्ला ३), अक्षय नवमी (कार्तिक शुक्ला ९); मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुनकी कृष्णाष्टमी, माघ शुक्ला सप्तमी, माघकी मघा नक्षत्रसे युक्त पूर्णिमा और प्रत्येक मासकी पूर्णिमा आदि अवसरोंपर भी श्राद्ध करना बहुत लाभजनक बतलाया गया है। श्राद्धपर बहुत कुछ विवेचन किया जा सकता है, परंतु अभी उसके लिये अवकाश नहीं है। श्राद्धकी विशेष विधि मनु-पाराशर आदि स्मृतियोंमें तथा पुराणोंमें देखना चाहिये। गया-श्राद्ध भी अवश्य करना चाहिये। विष्णुपुराणमें पितरोंके वे वाक्य हैं जो ‘पितृगीत’ के नामसे प्रसिद्ध हैं। इस गीतसे पता लगता है कि पितरलोग अपने सन्तानसे पिण्ड-जल और नमस्कार आदि पानेके लिये कितने लालायित रहते हैं।

अपि धन्य: कुले जायादस्माकं मतिमान्नर:।

अकुर्वन्वित्तशाठ्यं य: पिण्डान्नो निर्वपिष्यति॥

रत्नं वस्त्रं महायानं सर्वभोगादिकं वसु।

विभवे सति विप्रेभ्यो योऽस्मानुद्दिश्य दास्यति॥

अन्नेन वा यथाशक्त्या कालेऽस्मिन्भक्तिनम्रधी:।

भोजयिष्यति विप्राग्रॺांस्तन्मात्रविभवो नर:॥

असमर्थोऽन्नदानस्य धान्यमामं स्वशक्तित:।

प्रदास्यति द्विजाग्रॺेभ्य: स्वल्पाल्पां वापि दक्षिणाम्॥

तत्राप्यसामर्थ्ययुत: कराग्राग्रस्थितांस्तिलान्।

प्रणम्य द्विजमुख्याय कस्मैचिद‍्भूप दास्यति॥

तिलैस्सप्ताष्टभिर्वापि समवेतं जलांजलिम्।

भक्तिनम्रस्समुद्दिश्य भुव्यस्माकं प्रदास्यति॥

यत: कुतश्चित्सम्प्राप्य गोभ्यो वापि गवाह्निकम्।

अभावे प्रीणयन्नस्माञ्छ्रद्धायुक्त: प्रदास्यति॥

सर्वाभावे वनं गत्वा कक्षमूलप्रदर्शक:।

सूर्यादिलोकपालानामिदमुच्चैर्वदिष्यति॥

न मेऽस्ति वित्तं धनं च नान्य-

च्छ्राद्धोपयोग्यं स्वपितॄन्नतोऽस्मि।

तृप्यन्तु भक्त्या पितरो मयैतौ

कृतौ भुजौ वर्त्मनि मारुतस्य॥

(३। १४। २२—३०)

पितृगण कहते हैं—‘हमारे कुलमें भी क्या कोई ऐसा बुद्धिमान्, धन्य पुरुष पैदा होगा जो धनके लोभको छोड़कर हमें पिण्डदान करेगा। जो प्रचुर सम्पत्तिका स्वामी होनेपर हमारे लिये ब्राह्मणोंको बढ़िया-बढ़िया रत्न, वस्त्र, सवारियाँ और सब प्रकारकी भोग-सामग्री देगा। बड़ी सम्पत्ति न होगी, केवल खाने-पहनने लायक ही होगी तो जो श्राद्धके समय भक्तिके साथ विनम्र बुद्धिसे श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको शक्तिभर भोजन ही करा देगा। भोजन करानेमें भी असमर्थ होनेपर जो श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको कच्चा धान और थोड़ी-सी दक्षिणा ही दे देगा। यदि इसमें भी असमर्थ होगा तो किन्हीं श्रेष्ठ ब्राह्मणको एक मुट्ठी तिल ही देगा; अथवा हमारे उद्देश्यसे भक्ति-विनम्रचित्तसे सात-आठ तिलसे युक्त जलकी अंजलि ही दे देगा। इसका भी अभाव होगा तो कहींसे एक दिनका चारा ही लाकर प्रीति और श्रद्धाके साथ हमारे लिये गौको खिला देगा। इन सभी वस्तुओंका अभाव होनेपर जो वनमें जाकर दोनों हाथ ऊँचे उठाकर काँख दिखाता हुआ पुकारकर सूर्य आदि लोकपालोंसे यह कहेगा कि मेरे पास श्राद्धके योग्य न वित्त है, न धन है, न कोई अन्य सामग्री है, अतएव मैं अपने पितरोंको नमस्कार करता हूँ। वे मेरी भक्तिसे ही तृप्त हों। मैंने अपनी दोनों भुजाएँ दीनतासे आकाशमें उठा रखी हैं।

सारांश यह कि अपनी शक्तिके अनुसार पितरोंके उद्देश्यसे अन्न, फल, जल और फूल कुछ भी अर्पण जरूर करते रहना चाहिये। जिनको भगवान‍्ने प्रचुर धन दिया है, उनकी तो श्रद्धापूर्वक दिल खोलकर पितरोंकी तृप्तिके लिये विधिवत् श्राद्ध तथा दानादि करने चाहिये। जिनकी आय परिमित है, उन्हें भी अपने मरे हुए माता-पिताको परलोकमें सुख पहुँचानेके लिये कष्ट पाकर भी यथासाध्य श्राद्ध-तर्पणादि करने चाहिये। उन्हींका जीवन धन्य है। जो पुरुष अपने मरे हुए माता-पिता आदि प्रियजनोंको भूल जाते हैं और उनके उद्देश्यसे कुछ भी दान नहीं करते, वे तो सर्वथा धिक्‍कारके योग्य हैं।

प्रश्न—सुना जाता है धर्म-ग्रन्थोंमें श्राद्धके अवसरपर मांसका विधान है, इस सम्बन्धमें आपकी क्या सम्मति है?

उत्तर—मांसाहारी जातियोंके लिये मांसका विधान है। यह विधान मांसकी प्रवृत्तिको घटानेके लिये ही है। नहीं तो, श्राद्धके अवसरपर मांसका सर्वथा निषेध किया गया है। विधिकी अपेक्षा निषेध-वाक्य ही अधिक बलवान् माने जाते हैं। श्रीमद्भागवतमें स्पष्ट कहा गया है—

न दद्यादामिषं श्राद्धे न चाद्याद्धर्मतत्त्ववित्।

मुन्यन्नै: स्यात्परा प्रीतिर्यथा न पशुहिंसया॥

नैतादृश: परो धर्मो नृणां सद्धर्ममिच्छताम्।

न्यासो दण्डस्य भूतेषु मनोवाक्‍कायजस्य य:॥

(७। १५। ७-८)

धर्मके तत्त्वको जाननेवाला पुरुष श्राद्धमें मांस अर्पण न करे। न स्वयं ही मांस खाय। क्योंकि पितरोंकी ऋषि-मुनियोंके योग्य हविष्यान्नसे जैसी प्रसन्नता होती है, वैसी पशुहिंसासे नहीं होती। जो लोग सद्धर्मके आचरणकी इच्छा रखते हैं उनके लिये इससे बढ़कर कोई उत्तम धर्म नहीं है कि किसी भी प्राणीको मन, वाणी और शरीरसे किसी प्रकारका भी कष्ट न दिया जाय। इससे मांसका स्पष्ट निषेध है। अत: श्राद्धमें मांसका उपयोग भूलकर भी नहीं करना चाहिये।

प्रश्न—हिंदूशास्त्रोंके सिवा अन्य मतोंके ग्रन्थोंमें श्राद्धका उल्लेख नहीं है। वे लोग श्राद्ध करते भी नहीं, उनके पितरोंका क्या होता होगा?

उत्तर—ऐसी बात नहीं है कि दूसरे धर्मवाले कुछ नहीं करते। ईसाईलोग फल-फूल चढ़ाते हैं, मृतकके लिये प्रार्थना करते हैं। इसी प्रकार मुसलमान भी करते हैं। पारसी भी करते हैं। परंतु मान भी लें कि वे लोग नहीं करते, तो इससे क्या हुआ। जो नहीं करते, उनके पितरोंको कष्ट ही होता है, मेरा तो यही विश्वास है। रही शास्त्रोंकी बात—सो यह तो अनुभवकी बात है। हमारे महर्षियोंने अपनी साधनासे प्राप्त की हुई दिव्य दृष्टिसे लोकलोकान्तरोंका ज्ञान प्राप्त किया। तपोबलसे सर्वत्र विचरणकी शक्ति प्राप्त की और देख-सुनकर सब यथार्थ लिख दिया। अन्य धर्मवाले ऐसा नहीं कर सके, तो इसके लिये क्या किया जाय।

प्रश्न—श्राद्धके अतिरिक्त पितरोंके लिये और भी कुछ करना चाहिये?

उत्तर—दान देना चाहिये, भगवान‍्से प्रार्थना करनी चाहिये और उनके उद्देश्यसे भगवन्नामका २४, ४८ घंटे या इससे अधिक कालतक अखण्ड कीर्तन करना चाहिये। घरमें ज्यादा आदमी न हों, अखण्ड कीर्तनकी व्यवस्था न हो सके, तो प्रतिदिन नियमित समयतक अकेले ही नाम-कीर्तन करना चाहिये। इससे पितरोंको बड़ा सुख मिलता है। इसके अतिरिक्त एकादशी आदि व्रतोंका, भागवतसप्ताहका, भाँति-भाँतिके पुण्योंका और तीर्थ, व्रतादिका पुण्य भी उनके अर्पण किया जाता है। भगवान‍्की भक्ति करनेसे पितरोंको बहुत शान्ति मिलती है। अत: सबको भगवद्भक्त बनना चाहिये।