श्रीभगवान‍्के शृंगारका ध्यान

आपने लिखा....... परंतु अब दो दिनसे दीवालीके कारण साधन छूटा है। दीवाली बाद फिर शुरू करनेका विचार है, सो फिरसे शुरू किया या नहीं? असल बात यह है कि जिस वस्तुको पानेके लिये प्राण छटपटाता हो, उसका साधन छूट ही कैसे सकता है। छूट जाता है, इससे यही सिद्ध होता है कि उसके छूटनेकी परवा नहीं है। खैर, किसी तरह करना चाहिये।

करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।

रसरी आवत-जातमें पाथर परे निसान॥

यह तो अभ्यासकी खूबी है ही, फिर भगवत्सम्बन्धी अभ्यासमें तो दैवी सहारा भी मिलता है।

श्रीभगवान‍्के मधुर अनूपरूपका ध्यान करना बहुत उत्तम है। उनकी सुरीली वंशी-ध्वनिका, उनके दिव्य विग्रहका, दिव्य गन्धका, चरणोंके नूपुरोंकी मधुर-ध्वनिका तथा अंगस्पर्शका ध्यान बहुत ही उत्तम है। परंतु इसमें डर यही है कि ऐसा करनेवाले लोग बहुधा भगवान‍्को छोड़कर विषयका ध्यान करने लगते हैं। भगवान‍्को छोड़ देनेपर ध्वनि, गन्ध, स्पर्श आदि सब ‘विषय’ होते हैं। इस सम्बन्धमें साधक बहुत भूलकर जाता है। मन्दिरमें भगवान‍्की मूर्ति और महान् सुन्दर शृंगारको देखकर प्रसन्नता होती है। वह प्रसन्नता शृंगारकी सामग्री और मूर्तिकी बनावटको देखकर होती है या भगवत्प्रेमजनित है—यह बतलाना बहुत मुश्किल है। यदि भगवत्प्रेमजनित है तो भगवान‍्की प्यारी मूर्ति यदि बनावटमें कुढंगी और शृंगारहीन हो तो क्या उससे प्रसन्नता नहीं होनी चाहिये? भक्तका तो भगवान‍्से प्रेम है, गहनों, कपड़ों और रूप-रंगसे तो नहीं। गहने, कपड़े और रूप-रंग भी अवश्य ही बड़े दर्शनीय हैं, क्योंकि उनका भगवान‍्के साथ संयोग हो गया है। अपने प्रियतमको जिस वस्तुसे सुख पहुँचे, जो चीज प्यारेके अंगपर चढ़े, जिसे प्यारा धारण करे, वह वस्तु देखते ही परम हर्ष और रोमांच होना स्वाभाविक है। परंतु उसका कारण ये वस्तुएँ नहीं हैं, कारण है हमारा वह प्रियतम जो इन वस्तुओंको ग्रहण करता है। इसीलिये ये वस्तुएँ प्रिय हैं। यदि प्रियतम इन्हें नहीं धारण करे या धारण करनेमें ये वस्तुएँ उसे दु:ख पहुँचानेवाली हों तो हमारे मनके महान् अनुकूल होनेपर भी प्रतिकूल दीखने लगें और तत्काल त्याज्य हो जायँ। यही तो प्रेमका भाव है। प्रसादका स्वाद नहीं देखा जाता, उसमें देखा जाता है केवल यही कि वह प्रियतमकी जूँठन है। चाहे वह रुचिर हो या कड़ुआ, अमृत हो या विष, जिसे प्रियतमने मुँहमें रख लिया—बस, वही हमारे लिये परम मधुर और अमृत है। मीराका प्रसादरूपसे जहर पीना प्रसिद्ध है। यही हाल शृंगारका है। भगवान् श्रीकृष्णके हाथकी मुरली और माँ कालीके हाथकी भयंकर करवाल और नरमुण्डोंकी माला इसीलिये भक्तोंको प्यारी और सुहावनी लगती हैं। वहाँपर यह नहीं देखा जाता कि वह क्या वस्तु है। देखा जाता है केवल यही कि यह हमारे इष्ट प्रभुकी प्यारी वस्तु है। भगवान‍्की उपासना और पूजासे यहाँ बहुत भूलकी सम्भावना है। सुन्दर बनावट, बढ़िया शृंगार-पोशाक, भजनकी मधुर ध्वनि, विशाल मन-मोहन-मन्दिर आदिको देखकर मनुष्य भगवान‍्के बदले विषयोंपर विमुग्ध हो जाता है। इससे इन वस्तुओंका खण्डन करना इष्ट नहीं। बढ़िया-से-बढ़िया चीज ही भगवान‍्के काममें लगानी चाहिये। परंतु उस वस्तुका महत्त्व बढ़िया होनेके नाते नहीं है; वह भगवान‍्को चढ़ गयी, इसीसे उसका महत्त्व है। शृंगारकी सामग्रियोंसे भगवान‍्की शोभा नहीं, भगवान‍्के संयोगसे उनकी शोभा और महत्त्व है। श्रीभगवान‍्के रूपके ध्यानमें उनकी मुरली-ध्वनि, नूपुर-ध्वनि, अंग-स्पर्श, गन्ध आदिके ध्यानमें इसीलिये ऊँचे वैराग्ययुक्त अधिकारकी आवश्यकता है। श्रीराधाजी या श्रीसीताजीसहित भगवान‍्के ध्यानमें यही प्रधान बाधा समझनी चाहिये कि हमारी विषय-प्रवण बुद्धि कहीं शृंगारयुक्त स्त्रीरूपमें विषय-बुद्धि न कर ले कहीं, जगज्जननी हमारे विकारका कारण न बन जायँ। इसीलिये विषयी पुरुषोंको श्रीराधाप्रेम और गोपीभाव विषका काम देनेवाला होता है, एवं वही वैराग्य सम्पन्न अधिकारी पुरुषोंके लिये परमतत्त्वके साक्षात्कारका कारण होता है। इस भेदको जान और समझकर ही उपासना होनी चाहिये। इसीलिये शायद तुलसीदासजी महाराजने सेव्य-सेवकभावको सबके लिये परम उपादेय माना है, जिसमें विकारकी बहुत कम गुंजाइश है।

बस, भगवान‍्की कृपापर भरोसा रखकर उनका निरन्तर स्मरण करनेकी चेष्टा करनी चाहिये।