श्रीजगन्नाथजीके प्रसादकी महिमा
आपका कृपापत्र मिला। श्रीजगन्नाथपुरी (पुरुषोत्तमक्षेत्र) काशीकी भाँति ही बहुत ही प्राचीन तीर्थ है। पुराणोंमें इसका बड़े विस्तारसे वर्णन है। स्कन्दपुराणके विष्णुखण्डमें पुरुषोत्तममाहात्म्यके ५१ अध्याय हैं। परिवर्तन तो सभी क्षेत्रोंमें हुए हैं। यहाँ भी हुए हैं। आपने श्रीजगन्नाथजीके प्रसादके सम्बन्धमें पूछा सो इस सम्बन्धमें यह निवेदन है कि भगवान्के प्रसादमें साधारण अन्न-बुद्धि करना पाप माना गया है। प्रसाद प्रसाद ही है और बिना किसी संकोचके सबको उसको ग्रहण करना चाहिये फिर, जगन्नाथजीके प्रसादके सम्बन्धमें तो यहाँतक वचन मिलते हैं—
पाकसंस्कारकर्तॄणां सम्पर्कोऽत्र न दुष्यति।
पद्माया: सन्निधानेन सर्वे ते शुचय: स्मृता:॥
वेश्यालयगतं तद्धि निर्माल्यं पतितादय:।
स्पृशन्त्यन्नं न दुष्टं तद्यथा विष्णुस्तथैव तत्॥
निन्दन्ति ये तदमृतं मूढा: पण्डितमानिन:।
स्वयं दण्डधरस्तेषु सहते नापराधिन:॥
येषामत्र न दण्डश्चेद् ध्रुवा तेषां हि दुर्गति:।
कुम्भीपाके महाघोरे पच्यन्ते तेऽतिदारुणे॥
कुक्कुरस्य मुखाद्भ्रष्टं तदन्नं पतते यदि।
ब्राह्मणेनापि भोक्तव्यं सर्वपापापनोदनम्॥
(स्कन्दपुराण, विष्णुखण्ड)
‘रसोई बनानेवालोंके सम्पर्कमें कोई दोष नहीं होता; क्योंकि श्रीलक्ष्मीकी सन्निधिके कारण वे सभी पवित्र हो जाते हैं। महाप्रसाद यदि वेश्यालयमें हो अथवा पतितादिके द्वारा स्पर्श किया हुआ हो, तब भी दूषित नहीं होता। वह विष्णुकी तरह पवित्र ही रहता है। जो पण्डिताभिमानी मूढ़ लोग अमृतरूप प्रसादकी निन्दा करते हैं, भगवान् उनके अपराधको न सहकर स्वयं उन्हें दण्ड देते हैं। यहाँ कदाचित् उनको दण्ड भोगते हुए न भी देखा जाय परंतु यह तो निश्चय ही है कि उनकी दुर्गति अवश्य होती है। मरनेके बाद वे महाघोर भयानक कुम्भीपाक नरकमें यातना भोगते हैं। सारे पापोंका नाश करनेवाला प्रसाद यदि कुत्तेके मुखसे गिरा हुआ हो, उसको भी ब्राह्मणतक खा सकते हैं।’
इसी प्रकार पद्मपुराणमें आया है—
चाण्डालेनापि संस्पृष्टं ग्राह्यं तत्रान्नमग्रजै:।
पवित्रं भुवि सर्वत्र यथा गंगाजलं द्विज।
तथा पवित्रं सर्वत्र तदन्नं पापनाशनम्॥
‘पुरुषोत्तमक्षेत्रमें चाण्डालके द्वारा स्पर्श किया हुआ प्रसाद भी द्विजोंको ग्रहण करना चाहिये। द्विज! जैसे पृथ्वीमें गंगाजल सर्वत्र ही पवित्र है, वैसे ही यह प्रसाद भी सर्वत्र पवित्र और पापनाश करनेवाला है।’
प्रसिद्ध भक्त श्रीरघुनाथ गोस्वामी तो पुरुषोत्तमक्षेत्रमें नालेमें बहकर आता हुआ प्रसाद बटोरकर उसे खाया करते थे। वह प्रसाद इतना पवित्र माना जाता था कि स्वयं श्रीचैतन्य महाप्रभुने एक दिन उनके हाथसे छीनकर उसको खा लिया था। असल बात तो यह है कि श्रीभगवान्का प्रसाद भक्तोंके लिये साधारण अन्न नहीं है। वह तो परम दुर्लभ, सर्वपापनाशक महाप्रसाद है। प्रसादका स्वाद, उसकी बाहरी पवित्रता, उसका मीठा या कड़ुवापन नहीं देखा जाता। उसमें देखनेकी बात केवल एक ही है कि वह भगवान्का प्रसाद है। जिसको हमारे प्रभुने मुँहमें रख लिया, वही हमारे लिये परम पवित्र, परम मधुर और परम अमृत है। अतएव भक्तोंको बिना किसी विचारके भक्ति-श्रद्धापूर्वक तथा सत्कारके साथ प्रसादको ग्रहण करना चाहिये।
इसका यह अर्थ नहीं कि साधारण खान-पानमें पवित्रताका खयाल छोड़ दिया जाय। वहाँ तो शास्त्रोक्त सभी प्रकारकी पवित्रताका खयाल पहले करना चाहिये। भगवत्प्रसाद साधारण अन्नकी श्रेणीसे परे है।