श्रीकृष्णचरित्रकी उज्ज्वलता

× × × × आपके पत्रमें ऐसे प्रश्न थे जिनका उत्तर श्रीकृष्णचरित्रके स्मृतियोगमें स्थित चित्तकी सुस्थिर अवस्थामें ही किसी अंशमें लिखा जा सकता है। यह भी देर होनेका एक कारण है। आशा है आप मुझे क्षमा करेंगे।

आपने अपने प्रश्नोंमें भगवान् श्रीकृष्णके व्रजचरित्रपर जो आक्षेप किये हैं और व्यंग्यात्मक वाक्य लिखे हैं वे तो ठीक नहीं हैं। यह ठीक है कि आप श्रीकृष्णको बहुत ही उज्ज्वलरूपमें देखना चाहते हैं और यह भी सत्य है कि आपको श्रीकृष्णचरित्रका जो ‘अपवित्र’ वर्णन मिलता है, उसे पढ़-सुनकर दु:ख होता है। आपकी नीयत ठीक है, परंतु श्रीकृष्णचरित्रका मर्म समझे बिना ही उसपर दोषारोपण करना और उसे अपवित्र बतला देना उचित नहीं है। आज आपके-ऐसे और बहुत-से लोग हैं जो सच्चे हृदयसे श्रीकृष्णके चरित्रको अपनी कल्पनाके अनुसार उज्ज्वलताके साँचेमें ढला हुआ देखना चाहते हैं। परंतु वह उनकी कल्पना है। भगवान‍्को अपनी मर्यादाके अंदर बाँध रखनेकी उनकी यह कल्पना सचमुच हास्यास्पद ही है। भगवान् भगवान् ही हैं—उनकी लीलाओंकी परीक्षा हमारी मायाच्छन्न बुद्धि नहीं कर सकती।

आप श्रीकृष्णका भजन-चिन्तन कीजिये। भजनके प्रतापसे उनकी कृपाके द्वारा शुद्ध मतिके प्राप्त होनेपर आप श्रीकृष्णके व्रजचरित्रका महत्त्व कुछ समझ सकेंगे। उनका उज्ज्वल चरित्र देखना हो तो उनकी श्रीमद्भगवद‍्गीताको देखिये, जिसमें कहीं भी किंतु-परंतुके लिये गुंजाइश नहीं है। इसका यह अर्थ नहीं है कि उनका व्रजचरित्र उज्ज्वल नहीं है। वह तो परमोज्ज्वल है और परम पवित्र है, परंतु पहले उज्ज्वलकी उपलब्धि होनेपर ही परमोज्ज्वलकी ओर अग्रसर हुआ जा सकता है। गीताके चरम उपदेश भगवत्-शरणागतिको प्राप्त होनेपर ही आगे चलना सम्भव है। जो उनके गीतोक्त उज्ज्वल चरित्रको समझे बिना ही उनके परम उज्ज्वल व्रजचरित्रकी आलोचना करनेका दु:साहस करते हैं, उनकी विवेककी आँखें चौंधिया जाती हैं और वे अपनेको एक विलक्षण अँधेरेमें पाते हैं, जो उनकी आँखोंके न सहनेयोग्य आत्यन्तिक प्रकाशके कारण उत्पन्न होता है। इसीसे वे वास्तविक रहस्यको न समझकर नाना प्रकारके कुतर्क करके श्रीभगवान् पर दोषारोपण करते हैं या उनके उक्त चरित्रको मिथ्या करार देकर बड़े भयानक पाप-पंकमें अपनेको फँसा लेते हैं। इसका यह अर्थ नहीं है कि मैं व्रजचरित्रके रहस्यको पूर्णतया जानता हूँ। मैं तो उनके उज्ज्वल गीता-रहस्यको भी नहीं जानता। आपने प्रश्नोंके उत्तरमें मेरी अपनी ‘सम्मति’ पूछी है, इसीसे कुछ लिख रहा हूँ। यही ठीक रहस्य है, यह मेरा दावा नहीं है। आपके लम्बे प्रश्नोंका अलग-अलग उत्तर न लिखकर संक्षेपमें एक ही साथ लिखता हूँ। कोई बात छूट जाय तो क्षमा कीजियेगा।

मैं श्रीगोपीजनोंके साथ की हुई भगवान् श्रीकृष्णकी लीलाओंको सर्वथा सत्य और परम पवित्र मानता हूँ। मेरी समझसे उनमें व्यभिचारका जरा भी दोष नहीं है। वह तो साधनके ऊँचे-से-ऊँचे स्तरकी परम पवित्र दिव्य अनुभूति है, जो परम दुर्लभ अत्यन्त कठिन गोपीरतिकी साधनामें सिद्ध परम विरक्त, एकान्त भगवद्-रसिक महापुरुषोंको ही उपलब्ध होती है।

श्रीराधारानीका नाम अवश्य ही श्रीमद्भागवतमें नहीं है। इससे यह कहनेका साहस नहीं करना चाहिये कि श्रीराधारानीकी ‘कहानी’ कल्पित है। वह ‘कहानी’ नहीं है, सत्य सत्य है। श्रीमद्भागवतमें नाम नहीं है तो कहीं विरोध भी नहीं है। उसमें तो किसी भी गोपीका नाम नहीं है। अत्यन्त प्राचीन पद्मपुराणमें, ब्रह्मवैवर्तमें तथा गर्ग-संहितादि सम्मान्य ग्रन्थोंमें उनकी लीला लिखी है और इससे भी बढ़कर उन महात्मा पुरुषोंकी अनुभूति प्रमाण है, जिन्होंने श्रीराधारानीका और उनकी कृपाका प्रत्यक्ष किया है। कोई न माने तो उसपर न तो कोई जोर है, न आग्रह है। परन्तु किसीके मानने-न-माननेसे सत्यका विनाश नहीं हो सकता। श्रीराधारानीका श्रीकृष्णके साथ विवाह हुआ था या नहीं, इस खोजकी आवश्यकता नहीं है, यद्यपि इसका भी वर्णन मिलता है। मेरा तो कहना यह है कि यदि केवल स्थूलदृष्टिसे श्रीकृष्णको साधारण मानकर विचार करते हैं तब तो श्रीकृष्ण जिस समय वृन्दावन छोड़कर मथुरा चले गये थे, उस समय उनकी उम्र ११ वर्षकी थी। रासलीलादि तो इससे भी बहुत पहलेका वर्णन है। इतनी छोटी अवस्थामें कामक्रीडा हो नहीं सकती। और यदि उन्हें सर्वशक्तिमान्, सर्वान्तर्यामी, सबके एकमात्र आत्मा, सर्वलोकमहेश्वर, सच्चिदानन्दघन—स्वयं भगवान् मानते हैं, तब श्रीराधारानी बाहरसे कोई भी क्यों न हों, वे साक्षात् भगवती हैं, भगवान् श्रीकृष्णकी ह्लादिनी शक्ति हैं, उनके आनन्द-स्वरूपका मूर्तरूप हैं, उनकी स्वरूपा शक्ति हैं। वे उनसे कदापि अलग नहीं हैं। आनन्द और प्रेमकी अति दिव्य लीलामें उनका—एक ही रूपका दो भावोंमें दिव्य नित्य प्रकाश है। श्रीराधारानी महाभावरूपा हैं, और भगवान् श्रीकृष्ण परम प्रेमस्वरूप हैं। प्रेमका स्वरूप है प्रेमास्पदके सुखसे सुखी होना। जहाँ निजेन्द्रिय-तृप्तिकी वासना है, वहाँ तो प्रेम है ही नहीं, वहाँ तो कल्पित काम है। भगवान् श्रीकृष्ण श्रीमती राधारानीके प्रेमास्पद हैं और श्रीराधारानी श्रीकृष्णकी प्रेमास्पदा हैं। श्रीराधारानी जो कुछ करती हैं, श्रीकृष्णके लिये करती हैं। और श्रीकृष्णको सुखी देखती हैं तो उनके सुखसे सुखी होनेका स्वभाव होनेके कारण श्रीराधारानीको अपार सुख होता है। इधर श्रीराधारानीको सुखी देखकर श्रीकृष्णका सुख बढ़ता है, क्योंकि श्रीराधारानी उनकी प्रेमास्पदा हैं और उनको सुखी करनेके लिये ही श्रीकृष्णकी प्रेमलीला होती है। इस प्रकार दोनों परस्पर एक-दूसरेको सुखी करते हुए और एक-दूसरेके सुखसे अपने सुखकी वृद्धि करते हुए लीलामें संलग्न रहते हैं। श्रीगोपीजन इन्हीं श्रीकृष्णकी स्वरूपा शक्ति ह्लादिनीकी घनीभूत मूर्ति हैं जो दिन-रात श्रीराधा-कृष्णके मिलन-सुखमें सुखका अनुभव करती हुई उनकी लीलामें संयुक्त रहती हैं। यह लीला अत्यन्त दिव्य है। श्रीराधा और श्रीकृष्ण दोनों ही प्रेमी हैं—दोनों ही प्रेमास्पद हैं, इसीसे भक्त कवि श्रीभगवतरसिकजीने एक पदमें कहा है—

परसपर दोउ चकोर दोउ चंदा।

दोउ चातक, दोउ स्वाती, दोउ घन,

दोउ दामिनी अमंदा॥

दोउ अरविंद, दोउ अलि लंपट,

दोउ लोहा, दोउ चुंबक।

दोउ आशिक, महबूब दोउ मिलि,

जुरे जुराफा अंबक॥

दोउ मेघ, दोउ मोर, दोउ मृग,

दोउ राग-रस-भीने।

दोउ मनि बिसद, दोउ बर पन्नग,

दोउ बारि, दोउ मीने॥

भगवतरसिक बिहारिनि प्यारी,

रसिक बिहारी प्यारे।

दोउ मुख देखि जियत अधरामृत

पियत होत नहिं न्यारे॥

परन्तु इन्हीं भगवतरसिकजीने ठीक ही कहा है—

भगवतरसिक रसिककी बातें

रसिक बिना कोउ समुझि सकै ना॥

यह सत्य है कि रासलीला आदिसे शृंगारका खुला वर्णन है और नायक-नायिकाओंकी भाँति चरित्रचित्रण है; परंतु उसके पढ़नेसे काम-वासना जाग्रत् होती है, यह बात ठीक नहीं है। रासपंचाध्यायीका पाठ तो हृद्रोग—कामका नाश करनेवाला माना गया है, और है भी यही बात। हाँ, उनकी बात दूसरी है जो भगवद्विहीन हैं और उनके लिये रासलीलाका पढ़ना उचित भी नहीं है। यही तो अधिकारी भेदका रहस्य है। मेरी समझसे इसे शृंगार और नायक-नायिकाकी लीलामें कुछ भी दोष नहीं है।

स्वयं समग्र ब्रह्म, पुरुषोत्तम, सर्वान्तर्यामी, सर्वलोकमहेश्वर, सर्वात्मा, सर्वाधिपति, अखिल विश्वब्रह्माण्डके एकमात्र आधार, तमाम विश्वसमष्टिको अपने एक अंशमात्रसे धारण करनेवाले, सच्चिदानन्दविग्रह श्रीभगवान् तो गोपीनाथस्वरूपसे इस रसके नायक हैं; और उपर्युक्त ह्लादिनी शक्तिकी घनीभूत मूर्ति—तत्त्वत: अभिन्नरूपा श्रीगोपीजन नायिका हैं। इनकी वह लीला भी सच्चिदानन्दमयी, अत्यन्त विलक्षण और हमलोगोंके प्राकृत मन-बुद्धिके, सर्वथा अगोचर दिव्य और अप्राकृत हैं; परंतु यदि थोड़ी देरके लिये यह भी मान लें कि इस लीलामें मिलन-विलासादिरूप शृंगारका ही रसास्वादन हुआ था, तो भी इसमें तत्त्वत: कोई दोष नहीं आता। अत्यन्त मधुर मिश्रीकी कड़वी तूँबीके शकलकी कोई आकृति गढ़ी जाय जो देखनेमें ठीक तूँबी-सी मालूम होती हो, परंतु इससे वह तूँबी क्या कड़वी हो जायगी? अथवा क्या उसमें मिश्रीके स्वभावगुणका अभाव हो जाता है। बल्कि वह और भी लीला-चमत्कारकी बात होती है। लोग उसे खारी तूँबी समझते हैं, होती है वह मीठी मिश्री। इसी प्रकार सच्चिदानन्दघनमूर्ति भगवान् श्रीकृष्ण और उनकी अभिन्न-स्वरूपा ह्लादिनीशक्तिकी घनीभूत मूर्ति श्रीगोपीजनोंकी कोई भी लीला कैसी भी क्यों न हो, उसमें लौकिक कामका कड़ुवा आस्वादन है ही नहीं! वहाँ तो नित्य दिव्य-सच्चिदानन्दरस है। जहाँ मलिना माया ही नहीं है, वहाँ मायासे उत्पन्न कामकी कल्पना कैसे की जा सकती है? कामका नाश तो इससे बहुत नीचे स्तरमें ही हो जाता है। हाँ, इसकी कोई नकल करने जाता है, तो वह अवश्य पाप करता है। श्रीभगवान‍्की नकल कोई नहीं कर सकता। मायिक पदार्थोंके द्वारा अमायिकका अनुकरण या अभिनय नहीं हो सकता। कड़वी तूँबीके फलसे चाहे जैसी मिठाई बनायी जाय और देखनेमें यह चाहे जितनी भी सुन्दर हो, परंतु उसका कड़वापन नहीं जा सकता। इसीलिये जिन्होंने श्रीकृष्णकी रासलीलाकी नकल करके नायक-नायिकाका रसास्वादन करना चाहा है या जो चाहते हैं, वे तो डूबे हैं और डूबेंगे ही। श्रीकृष्णका अनुकरण केवल श्रीकृष्ण ही कर सकते हैं।

हाँ, आपका यह प्रश्न विचारणीय अवश्य है कि ‘फिर भगवान् लोकसंग्रहके आदर्श कैसे माने जा सकते हैं?’ इसका उत्तर यह है कि प्रथम तो किसीके बचपनके कार्य लोकसंग्रहके आदर्श हुआ नहीं करते। संसारके बहुत बड़े-बड़े आदर्श महात्माओंके बचपनके कार्य भी महात्माओंके योग्य ही हुए हैं, ऐसी बात नहीं है। व्रजलीला ११ वर्षकी उम्रके पहले ही समाप्त हो जाती है। दूसरे, यह रहस्य है कि व्रजलीलामें यह गोपीलीला अत्यन्त गोपनीय वस्तु है। इसका साक्षात्कार तो श्रीभगवान् और उनकी अन्तरंग शक्तियोंको ही होता है। अन्य किसीका इसमें प्रवेश ही नहीं है। यह लीला न तो लोकालयमें होती है और न लोकसंग्रह इसका उद्देश्य ही है। यह तो बहुत ऊपर उठे हुए महात्माओंके अनुभव-राज्यमें होनेवाली अप्राकृत लीला है। इसका बाह्य लोकसंग्रहसे कोई सम्बन्ध नहीं। व्रजमें भी इस लीलाको प्राय: कोई नहीं जानते थे। बाहरवालोंकी तो बात ही क्या है, गोपोंने तो अपनी-अपनी पत्नियोंको अपने पास सोये हुए देखा था।

मन्यमाना: स्वपार्श्वस्थान् स्वान् स्वान् दारान् व्रजौकस:॥

(श्रीमद्भा० १०।३३।३८)

ब्रह्मादि देवता केवल-मण्डपके अंदर होनेवाले कार्यको न देख पाकर, बाहरसे मण्डपकी शोभा देखकर ही मुग्ध और चकित होनेवाले लोगोंकी भाँति बाह्यभावको देख-देखकर चकित हो रहे थे। भगवान् शंकर और नारदको तथा किसीके कालमें अर्जुनको गोपीभावकी प्राप्ति होनेपर ही इस लीलाके दर्शन हुए थे। इसीलिये शिशुपालने भगवान् पर गालियोंकी बौछार करते समय कहीं गोपीलीलाका संकेत भी नहीं किया। अगर उसे पता होता तो वह इस विषयमें चुप न रहता। इसका यह तात्पर्य नहीं समझना चाहिये कि यह लीला हुई ही नहीं थी। महाभारतमें ही द्रौपदीने अपनी आर्तपुकारमें श्रीभगवान‍्को ‘गोपीजन-प्रिय’ कहकर पुकारा है। द्रौपदी अन्तरंग भक्त थी, इससे उनको इस रहस्यका कुछ पता था। अतएव लोकसंग्रहसे इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। तब लोकसंग्रहके आदर्शमें कोई बाधा कैसे आ सकती है? यह तो साधारण लोककी बात है। जो अन्तरंग साधक हैं, उनके लोकके लिये तो यही लोकसंग्रहका आदर्श है।

गोपियोंके चित्तमें वंशीध्वनि सुनकर काम (अनंग)-की वृद्धि हुई थी, यह बात सचमुच भागवतमें ही है और यह सत्य है, परंतु ऊपर कहा ही जा चुका है कि वह काम हमलोगोंका दूषित काम नहीं था। प्रेम भी अंगरहित ही होता है। गोपियोंका यह ‘काम’— श्रीकृष्णविषयक प्रेम था—नित्यसिद्ध प्रेम था, जो वंशीकी ध्वनि सुनते ही प्रबल हो उठा और जिसने गोपीजनोंको प्रेममें बावली बनाकर श्रीभगवान‍्की ओर तत्क्षण ही प्रेरित कर दिया। भगवान् उनकी प्रेमसेवा स्वीकार करनेके लिये ही यमुनापुलिनपर उपस्थित थे। उन्होंने वंशीकी मोहिनी ध्वनिसे आवाहन करके गोपीजनोंको अपने निकट बुला लिया। यही प्रेमी भक्त और भगवान‍्की प्रेमलीला है! इसमें कामकी कहीं गन्ध भी नहीं है।

रही कवियोंकी बात, सो मेरी समझसे कवि तीन श्रेणियोंमें बाँटे जा सकते हैं—(१) वे भक्त कवि जिन्होंने लीलाका प्रत्यक्ष किया; (२) वे कवि जिन्होंने लीलापर विश्वास करके श्रद्धा, भक्ति और पवित्रभावसे व्रजलीलाकी रचना की है; और भाव (३) वे शृंगारी कवि जो पवित्र या अपवित्र भावसे भी शृंगारका वर्णन करनेके लिये श्रीकृष्ण और श्रीराधारानी या गोपीजनोंको नायक-नायिकाके स्थानमें बैठाकर काव्यरचना करते हैं। नाम बतलानेकी और कौन किस श्रेणीमें है, यह निर्णय करनेकी मेरी सामर्थ्य नहीं। किसके मनमें क्या था कौन जान सकता है? हाँ, श्रीसूरदासजी, तुलसीदासजी, नन्ददासजी आदि भक्त कवियोंके प्रति मेरी श्रद्धा है और उन्होंने जो कुछ कहा है; अत्यन्त पवित्रभावसे कहा है—यह मेरा विश्वास है। तुलसीदासजी यद्यपि श्रीरामभक्त थे, इसलिये यह आवश्यक नहीं कि वे श्रीकृष्णचरित्रका वर्णन करते ही, तथापि उन्होंने श्रीकृष्ण-गीतावलीमें श्रीकृष्णकी बाल-लीलाओंका संक्षेपमें बड़ा ही मधुर वर्णन किया है।

अब मुझे आपके अन्तिम प्रश्नका उत्तर देना है—यद्यपि इसका उत्तर देनेमें बड़ा ही संकोच है; परंतु आपने शपथ दिलाकर सत्य पूछा है। इसलिये यह कहना पड़ता है कि मैंने अपने विश्वासकी जो बातें ऊपर लिखी हैं ये केवल पढ़ी-सुनी हुई ही नहीं हैं। इनके माननेका कोई ऐसा भी कारण अवश्य है—जिसपर कम-से-कम मैं अपने लिये कभी अविश्वास नहीं कर सकता। वह कारण क्या है, यह मैं बतलाना नहीं चाहता। न मेरा यही आग्रह है कि मैंने जो कुछ लिखा है उसे आप मान लें। श्रीभगवान् सभी रूपोंमें हैं। आपको श्रीभगवान‍्का जो रूप प्रिय और उज्ज्वल प्रतीत होता है, आपके लिये वही ठीक है, आप उसीकी उपासना कीजिये। मेरा तो इतना ही निवेदन है कि दूसरे रूपोंकी बाबत कटु और हेय आलोचना मत कीजिये। यदि करनी ही हो तो मेरी तुच्छ सम्मतिके अनुसार बहुत ही मर्यादाके अन्दर रहकर करनी चाहिये। हिंदू सम्प्रदायोंकी तो बात ही क्या, ईसाई, मुसलमान, पारसी आदिके भी वही एक भगवान् हैं, जो हमारे हैं। हमारे ही भगवान‍्की वे विभिन्न रूपोंमें उपासना करते हैं। अतएव भगवान‍्के किसी भी रूपका खण्डन नहीं करना चाहिये।

पत्र बहुत लंबा हो गया है। तत्त्व क्या है, यह मैं पूरा जानता नहीं। जो कुछ जानता हूँ वह मनमें सदा जाग्रत् नहीं रहता और जितनी बातें मनमें आती हैं, उतनी शब्द, भाव, समय आदिके संकोच और अन्यान्य कारणोंसे लिखी नहीं जा सकतीं। आशा है, आप क्षमा करेंगे।