उलटी राह
आपने लिखा मुझमें बुद्धि, धैर्य और उत्साह नहीं है, सो बड़ी अच्छी बात है। बुद्धि, धैर्य, उत्साह तो इस प्रेम-मार्गके बाधक हैं। इनका न होना ही शुभ लक्षण है। बुद्धिमान् मनुष्य तर्क-जालमें फँसकर प्रेमसे वंचित रह जाता है। उसकी बुद्धि, प्रेम तो दूर रहा, प्रेमास्पदका अस्तित्व ही मिटा देना चाहती है। धैर्य तो प्रेमीको कभी होता ही नहीं। उसका एक-एक पल युगके समान बीतता है। और उत्साह तो उसको हो जो प्रिय-मिलनका सुख प्राप्त कर रहा है। प्रिय-वियोगमें उत्साह कहाँ? यहाँ तो केवल रोना ही शेष रह जाता है और रोते-रोते ही उम्र बीतती है। नींद-भूख भी रोनेमें बह जाती है। ‘दिन नहिं भूख, रैन नहिं निदरा पियको विरह सतावै’। वियोगकी तो कुछ ऐसी दशा होती है कि स्वप्नके दर्शन भी मिट जाते हैं।
नितके जागत मिटि गयो, वा सँग सुपन मिलाप।
चित्र दरसहूँ को लग्यो आँखिन आँसू पाप॥
रोग तो इस दशाका एक सुलक्षण है। तनुता, मलिनता, स्वरभंग, वैवर्ण्य, व्याधि, उन्माद, प्रलाप और प्रलय आदि तो इसके आवश्यक अंग हैं।
नारायण घाटी कठिन जहाँ प्रेमको धाम।
बिकल मूर्च्छा सिसकिबो ये मगके विश्राम॥
बस, अधीर होकर रोते रहिये। तनको सुखा दीजिये प्यारेके वियोगमें। जीते ही मर जाइये उसके विरहमें। यही तो परम सौभाग्य है।
विरही उसे दयालु क्यों मानने लगा। उसके लिये तो वह परम निष्ठुर है, निर्दय है, प्राणोंका ग्राहक है। परंतु इतनेपर भी वह परम प्यारा है, वह परम दु:खदायी होनेपर भी उसके बिना चैन नहीं पड़ता। यही तो उसका जादू है।
सत्संगकी इच्छा भी क्यों हो? सत्संगमें तो उस निष्ठुरके ही गुण गाये जायँगे न? उस निपट निर्दयीमें भी कोई गुण है? हम क्यों सुनें उसके गुणोंको जो हमें इतना तरसाता है, मिलनेपर भी फिर वियोगका दूना दु:ख साथ ही लेकर आता है? उस छलियेके भी गुणोंकी तारीफ होती है? भाँड़लोग तारीफ ही किया करते हैं। खुशामदियोंका यही पेशा है, वे करते रहें हमें इससे क्या? वियोगी विरहीकी यही मनोदशा तो उसकी साधन सम्पन्नताकी निशानी है।
अजब पागलपन है। सेवाकुंजकी राह-सीधी-सी राह पूछी जाती है। होगा क्या उस कँटीली गैलमें जानेसे? वहाँ न शान्ति है, न सुख है, न आराम है, न सन्तोष है, न ब्रह्मचर्य है, न ज्ञान है, न निष्कामभाव है, न निरभिमानिता है, न अपरिग्रह है और न वैराग्य है। जो कुछ है, सब इससे उलटा है। इसपर भी इच्छा हो तो सेवाकुंजकी सीधी राहपर जाइये। ‘अनोखे अज्ञान’ का सारा सामान-साज साथ लेकर निराले मोहके मार्गसे! जब पूर्णरूपसे मोहाच्छन्न हो जायँ तब समझिये कि राहपर आ गये। परंतु अभी आपकी इस राहपर जानेकी इच्छा नहीं मालूम होती; क्योंकि अभी तो आप ‘अज्ञान कब दूर होगा?’ ऐसी प्रार्थना करते हैं। जब पाथेय ही नहीं होगा तो फिर चलेंगे किस बलपर?
यह तो उलटी राह है। जो सब तरहकी सुलटी राहपर चलनेके बाद, उनके फलस्वरूप मिलती है, सुलटी चलनेके बाद उलटी चलती है, यही तो पहेली है। इसका अर्थ ही रहस्य है, जो समझानेसे नहीं समझमें आता।