वैराग्यका भ्रम
आपका कृपापत्र मिला। आप लिखते हैं—‘मुझे घरसे वैराग्य हो गया है, घरमें माता-पिता, भाई-बहन, स्त्री-बालक सभी हैं; परंतु किसीमें मन नहीं अटकता, उनसे मनका मेल ही नहीं खाता। सबसे नफरत-सी हो चली है। चाहता हूँ—संसार त्यागकर वनमें चला जाऊँ। परंतु कठिनता यह है कि शरीरके सुख और आरामकी इच्छा अभी बनी हुई है। कभी-कभी पाप-भावना भी मनमें आ जाती है। काम-क्रोध हैं ही। शारीरिक तकलीफ सहन नहीं होती। यहाँ तो कुछ-कुछ लोग सेवा भी करते हैं। दु:ख तो यह है कि मुझसे भगवान्का भजन भी नहीं होता। चित्तमें उचाट-सी रहती है कि कहीं भाग जाऊँ। न घर सुहाता है, न कहीं भागते ही बनता है। चित्त शान्त नहीं है! बताइये क्या करूँ?’
आपने अपनी सच्ची हालत लिख दी, कुछ छिपाया नहीं, इससे मालूम होता है, आपका हृदय बड़ा सरल है और सरल हृदय साधना करनेपर बहुत ही शीघ्र भगवान्का निवासस्थान बन सकता है। सच्ची बात तो यह है कि आपको वैराग्य नहीं हो गया है। वैराग्य होनेपर काम-क्रोध नहीं रह पाते। न सुख और आरामका ही खयाल रहता। जब किसी विषयमें आसक्ति ही नहीं रही, तब कामना कहाँसे पैदा होती और कामना न होनेपर क्रोध भी क्योंकर होता? आपने इस स्थितिको वैराग्य समझ लिया—यही आपकी भूल है। यह तो वस्तुत: आसक्तिका ही एक रूपान्तरमात्र है। आपको जो नफरत-सी हो चली है, घरवालोंके प्रति घृणा होती है, इसका कारण यही है कि आप उनसे जैसा और जितना सुख चाहते हैं, अपनी कामनाकी जितनी पूर्ति आप उनसे करवाना चाहते हैं उतनी नहीं हो पाती। बल्कि कभी-कभी आपको ऐसा प्रतीत होता है कि ये लोग तो मेरे सुखके मार्गमें बाधक हैं, मेरे मनोरथके प्रतिकूल हैं। इसीसे आपहीके शब्दोंमें—उनसे ‘आपके मनका मेल ही नहीं खाता।’ इसीसे नफरत होती है। और आश्चर्यकी बात तो यही है कि इसको आपने वैराग्य मान लिया है। यह वैराग्य नहीं है, यह है झुँझलाहटभरी अकर्मण्यता, जो आपको कर्तव्यपथसे विमुख करना चाहती है। असलमें आप जिनसे घृणा करते हैं—उनको छोड़ना नहीं चाहते हैं, उनको छोड़ते आपको दु:ख होता है; क्योंकि उनमें आपकी सुदृढ़ आसक्ति है और आप उनको सर्वथा अपने अनुकूल तथा अपने सुखके साधक देखना चाहते हैं। इसीलिये चित्तमें उचाट है, इसीलिये अशान्ति है और इसीसे आपकी बुद्धि कर्तव्यका निर्णय करनेमें असमर्थ हो रही है। आप मेरी इन बातोंसे अपनी स्थितिका मिलान करके देखिये, मुझे विश्वास है मेरी धारणा अक्षरश: सत्य साबित होगी।
आप लिखते हैं—‘‘भगवान्का भजन नहीं होता’’ और मैं कहता हूँ—भजन हुए बिना ‘वैराग्य हो ही नहीं सकता।’
जब भजनमें रस मिलेगा और उससे भगवत्प्रेमका प्रादुर्भाव होगा तब विषयोंसे वैराग्य आप ही हो जायगा। फिर कोई मनोरथ भी अपूर्ण नहीं रह जायगा। आप जो कुछ भी चाहते हैं, सभी कुछ भगवान्में पूर्ण है। सारे सुख, सारा आराम, कामिनी, कांचन, कीर्ति, भोग, मोक्ष सभी कुछ उनमें हैं। उनको भूलकर—उनकी ओरसे लापरवाह रहकर, भजनमें चित्त न लगाकर जहाँ संसारको छोड़ने जायँगे, वहाँ संसार और भी जोरसे आपको जकड़ लेगा। यों भागनेसे बन्धनकी रस्सी टूटेगी नहीं, उसकी गाँठ और भी गहरी घुल जायगी, पक्की हो जायगी। अतएव पहले भगवान्में अनुराग कीजिये, फिर अपने-आप ही विषयोंमें विराग हो जायगा। श्रीमद्भागवतमें ब्रह्माजी कहते हैं—
न भारती मेऽङ्ग मृषोपलक्ष्यते
न वै क्वचिन्मे मनसो मृषा गति:।
न मे हृषीकाणि पतन्त्यसत्पथे
यन्मे हृदौत्कण्ठ्यवता धृतो हरि:॥
(२।६।३३)
‘प्रिय नारदजी! मैंने प्रेमपूर्ण और उत्कण्ठित हृदयसे भगवान्को हृदयमें धारण कर लिया है। इससे न तो कभी मेरी वाणी असत्यको लक्ष्य करके निकलती है, न कभी मनकी गति मिथ्याकी ओर होती है, और न मेरी इन्द्रियाँ ही कभी असत् मार्गपर जाती हैं।’ मतलब यह है कि भगवान्में मन लगनेपर असत् विषयोंकी ओर मन जाता ही नहीं (यह याद रखना चाहिये कि एकमात्र भगवान् ही सत् है और सब असत् हैं), यही असली वैराग्य है।
अतएव आप उसे वैराग्य न समझकर अपनी एक दुर्बलता समझिये और घरमें ही प्रतिकूलताको सानन्द सहते हुए भगवान्का भजन कीजिये। जबतक मनमें राग-द्वेष है, तबतक पूरी अनुकूलता कहीं भी नहीं मिलेगी। भगवान्ने कहा है—
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥
(गीता ३।३४)
‘प्रत्येक इन्द्रियके विषयमें राग और द्वेष भरे हैं। इन राग-द्वेषके वशमें नहीं होना चाहिये। क्योंकि ये दोनों ही परमार्थधनके लुटेरे हैं।’
यह समझ रखिये कि राग-द्वेषके रहते अनुकूलताके साथ प्रतिकूलता भी रहेगी ही। वनमें ही क्यों, कहीं भी चले जायँ—मन तो आपके साथ ही जायगा न; फिर केवल स्थान बदलनेसे क्या होगा। जो तकलीफ यहाँ है वही वहाँ भी रहेगी। बल्कि नयी जगहमें शारीरिक आराम न मिलनेपर और भी कष्टका अनुभव होगा। घरवाले कितने ही प्रतिकूल हों आखिर आपके दु:खमें कुछ तो साथ देते ही हैं। सेवा भी करते ही हैं। यह आपने भी स्वीकार किया है। अलग जानेपर यह भी नहीं मिलेगा। एक बात यह भी विचारणीय है कि जब आपको उनकी बातें प्रतिकूल मालूम होती हैं, तब निश्चय ही आपके विचार उनके प्रतिकूल हैं। और जब वे लोग अपने प्रतिकूल विचारवाले आपको अपने साथ रखना चाहते हैं और समय-समयपर आपकी सेवा करते हैं तब आपको तो और भी नम्र होना चाहिये तथा उनके प्रतिकूल विचारोंको आनन्दके साथ सहकर उन्हें सुख पहुँचानेकी चेष्टा करनी चाहिये।
साथ ही यह भी सत्य है कि यहाँ जो कुछ भी सुख-दु:ख आपको मिलता है यह आपके ही पूर्वकृत कर्मोंका फल है और भगवान्ने आपके कल्याणके लिये इसका मंगल-विधान किया है। इसके भोगसे आपका प्रारब्ध क्षय होता है, और यदि इसे भगवान्का विधान मानकर सिर चढ़ावें तो भगवान्की कृपा प्राप्त होती है। इसलिये मेरी तो यही सलाह है कि सहनशील बनकर घरमें रहिये, घरको भगवान्का मन्दिर और घरवालोंको भगवत्स्वरूप जानकर उनकी यथायोग्य सेवा कीजिये। तथा श्रीभगवान्की कृपापर विश्वास करके उनके पवित्र नामका जप करते हुए उनके दिये हुए जीवनको उन्हींके समर्पण करके आनन्दसे संसार-यात्रा पूरी कीजिये। आप निश्चय समझिये, जब आपको उनकी याद बनी रहने लगेगी, तब सारे पाप-सन्ताप, आसक्ति-कामना, विरक्ति-अशान्ति, मोह, भय अपने-आप ही भाग जायँगे। उस समय आप स्वत: ही सच्चे वैराग्यको प्राप्त होकर परम सुखी हो जायँगे।