वास्तविक भजनका स्वरूप
कृपापत्र मिला। आप श्रीभगवान्का भजन करना चाहते हैं, अपनी शक्तिभर करते भी हैं; परंतु जैसा चाहिये वैसा नहीं बनता, इस बातसे आपको बड़ा दु:ख रहता है, सो यह बड़ी ही अच्छी धारणा है। शक्तिभर भजन करनेमें त्रुटि न होने दे और सदा अपने भजनमें कमी ही देखता रहे, इसीसे तो भजन बढ़ता है और उसमें उच्च भावोंका संयोग होता है। मेरे लिये पूछा सो मैं क्या बताऊँ? मुझसे यदि यथार्थरूपसे भजन बनता तो मेरी स्थिति कुछ दूसरी ही होती। फिर तो आपके लिखनेके अनुसार अवश्य ही मेरे दर्शन और स्मरणमात्रसे आपका कल्याण हो जाता। परंतु मैं वैसा हूँ ही नहीं। आप सच मानिये, मैं देखता हूँ, मेरे मनमें असंख्य वासनाएँ भरी हैं। मैं अपने मनको श्रीभगवान्के चिन्तनमें ही लगाये रखना चाहता हूँ और यत्किंचित् चेष्टा भी करता हूँ, परंतु मेरा दुष्ट मन अनन्यभाक् होकर भगवच्चिन्तनमें लगता ही नहीं। मैं यह भी अनुभव करता हूँ कि भगवान्की मुझपर अनन्त कृपा है। मुझसे जो कुछ भजन बनता है; सब उस महान् कृपाके कारण ही बनता है। यह भी देखता हूँ कि भजनसे मेरा चित्त ऊबता नहीं, भगवत्कृपा मुझे बार-बार उत्साह दिलाती है। भजनके बदलेमें किसी दूसरी वस्तुके पानेकी कामना भी मनमें प्राय: नहीं देखता, भजनसे भजनकी ही सिद्धि चाहता हूँ; भजनकी सिद्धिका तात्पर्य यह कि बस, लगातार तैलधारावत् भजन ही होता रहे और मन, बुद्धि, प्राण, शरीर सब उसीमें तल्लीन हो जायँ। परंतु अभी वैसा हो नहीं पाता, इसी बातका बड़ा दु:ख है; मन भाँति-भाँतिके फरेब करके धोखा देता है। ऐसी हालतमें अवश्य ही निराश तो कभी नहीं होता, क्योंकि हँसती हुई भगवत्कृपाको निरन्तर मैं अपने मस्तकपर हाथ धरे देखता हूँ, परंतु अपने मनकी नीचतापर बड़ा दु:खी होता हूँ कि कहाँ तो भगवत्-कृपाकी मुझपर इतनी अनुकम्पा और कहाँ मेरा नीच और कृतघ्न मन, जो अब भी सब कुछ छोड़कर— सबसे नाता तोड़कर, सारे संस्कारोंको त्यागकर केवल भगवच्चिन्तनमें ही नहीं लग जाता। मेरी वह दशा कब होगी जब मैं उनके चिन्तनमें सब कुछ भुलाकर—केवल उन्हींकी याद करूँगा और याद करते-करते याद करनेवाले अपनेको भी भूल जाऊँगा।