विरह-सुख

× × × श्रीश्रीगौरांगदेवने कहा था—

युगायितं निमेषेण चक्षुषा प्रावृषायितम्।

शून्यायितं जगत्सर्वं गोविन्दविरहेण मे॥

‘गोविन्दके विरहमें मेरा एक निमेष भी युगोंके समान लम्बा हो रहा है। ये दोनों आँखें सावनकी जलधाराके समान सर्वदा बरस रही हैं और सारा जगत् मेरे लिये सूना हो रहा है।’

इस दु:खपूर्ण विरहमें कितना असीम सुख है, इस बातका प्रेमशून्य हृदयसे कैसे अनुमान लगाया जाय? विरही है, पर इस जलनमें ही महान् शान्तिका अनुभव करता है। वह कभी इस जलनको मिटाना नहीं चाहता। वह मिलनमें उतना सुख नहीं मानता जितना विरहकी अग्निमें जलते रहनेमें मानता है। ‘हा प्राणनाथ! हा प्रियतम! हा श्रीकृष्ण! इस तरह रोते-कराहते जन्म-जन्मान्तर बीत जायँ। मैं मिलना नहीं चाहता, चाहता हूँ तुम्हारे विरहमें जी भरकर रोना और तुम्हारे वियोगकी आगमें जलते रहना। मुझे इसमें क्या सुख है इसको मैं ही जानता हूँ।’

बना रहे हमेशा यह विरह-दुख दिवाना,

मैं जानता हूँ इसमें कितना मजा मुझे है।

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खुदा करे कि मजा इन्तजारका न मिटे;

मेरे सवालका वह दे जवाब बरसों में।

भगवत्प्रेमका पागल वह विरही अपने प्रियतम श्रीकृष्णके सिवा और किसीको जानता ही नहीं, वह तो अपनेको सदाके लिये उनकी चरणदासी बनाकर उन्हींकी इच्छापर अपनेको छोड़ देता है और वियोगकी ज्वालामें जलता हुआ ही उन्हें सुखी देखकर परम सुखका अनुभव करता है। महाप्रभु कहते हैं—

आश्लिष्य वा पादरतां पिनष्टु मा-

मदर्शनान्मर्महतां करोतु वा।

यथातथा वा विदधातु लम्पटो

मत्प्राणनाथस्तु स एव नापर:॥

‘वह लम्पट मुझ चरणदासीको प्रिय समझकर चाहे आलिंगन करे, चाहे अपने पैरोंसे कुचले और चाहे दर्शन न देकर विरहकी आगसे मेरे प्राणोंको जलाता रहे—जो चाहे सो करे, परंतु मेरा तो प्राणवल्लभ वही है, दूसरा कोई नहीं।’

आपको यदि भगवान‍्के विरहमें कुछ मजा आता है तो यह बड़े ही सौभाग्य की बात है। रोनेमें आनन्द आता है—यह भी बहुत उत्तम है। बस, रोते रहिये और प्रेमके आँसुओंसे सींच-सींचकर विरहकी बेल सारे तन-मनमें फैलाते रहिये। उसकी जड़को पातालमें पहुँचा दीजिये और फिर उसीकी सघन छायामें उसीसे उलझे बैठे रहिये। देखिये, आपका मजा कितना बढ़ता है—

श्रीसूरदासजीने रोते-रोते गाया था—

मेरे नैना बिरहकी बेल बई।

सींचत नीर नैनको सजनी!

मूल पताल गई॥

बिगसत लता सुभाय आपने

छाया सघन भई॥

अब कैसे निरुवारौं सजनी!

सब तन पसर गई॥

यह सच है कि ऐसा विरही मिलनसे वंचित नहीं रहता। सच्ची बात तो यह है कि वह नित्यमिलनमें ही इस विरहसुखका अनुभव करता है। भगवान् उससे कभी अलग होते ही नहीं।