सत्संग-वाटिकाके बिखरे सुमन

(नित्यलीलालीन श्रीभाईजीके पुराने सत्संगसे चयन किये हुए)

मानव-जीवन भगवान‍्का बननेके लिये प्राप्त हुआ है। हम वास्तवमें भगवान‍्के हैं, पर हमने अपनेको काम-क्रोध आदिका गुलाम बना रखा है। यही मूर्खता है। जो भगवान‍्का बना, उसका जीवन सार्थक; जो जगत‍्का बना, उसका जीवन सार्थक नहीं, निरर्थक।

किसी भी साधनासे हो, किसी भी प्रकारसे हो, करना है एक ही काम—भगवान‍्के चरणोंमें अनुराग। भगवान‍्के चरणोंमें उत्तरोत्तर अनुराग बढ़ता रहे, इसीमें जीवनकी सार्थकता है। अतएव भगवान‍्के प्रति प्रेमकी लालसा जगानी चाहिये। इसके लिये प्रेमस्वरूप भगवान‍्से प्रार्थना करनी चाहिये और जहाँतक बने, प्रेम प्राप्त करनेके लिये निरन्तर प्रयत्न करते रहना चाहिये।

सच्चे मनसे, श्रद्धा-विश्वासपूर्वक भगवान‍्से माँगनेपर कोई भी संकट रह नहीं सकता। प्रार्थनाके समय मनमें यह भाव होना चाहिये कि ‘भगवान् मेरा यह संकट दूर कर दें’ और प्रार्थनामें आर्तभाव होना चाहिये तथा यह विश्वास होना चाहिये कि ‘इस संकटको भगवान् दूर कर ही देंगे’। जो भगवान‍्से भगवान‍्का प्रेम ही चाहते हैं, वे तो सर्वोत्तम हैं; पर जो पापमें रत हैं,पापसे पैसा बटोरते हैं,वे यदि भगवान‍्से कुछ माँगें तो यह बुरा नहीं है। जगत् से, पापसे माँगनेकी अपेक्षा भगवान‍्से माँगना कहीं श्रेयस्कर है।

नाम-जपसे जो भी उँची-से-उँची स्थिति अन्य किसी साधनसे प्राप्त हो सकती हैं, वह प्राप्त हो जाती है—यह मेरा विश्वास है।

साधककी वृत्ति उत्तरोत्तर भगवान‍्के नाम-रूप-गुण-चिन्तनमें ही लगती जाय। आरम्भमें वृत्ति दूसरी ओर जाती है; पर उसमें यह सावधानी रखनी चाहिये कि वह या तो उधर जाय ही नहीं और यदि जाय तो भगवान‍्की सेवाकी भावनासे ही। भगवान‍्की सेवाकी भावनाके अतिरिक्त दूसरे किसी भी भावसे वृत्तिका जाना नीचे स्तरका है।

मन वृत्तियोंका समूह है। वृत्ति जब एक विषयमें जाकर उसके रूपकी हो जाती है, तब उसको ‘ध्यान’ कहते हैं।

शरीरका आराम, नामका नाम और जीभका स्वाद —साधकके लिये ये तीन बडे़ विघ्न हैं।

भगवान‍्के प्र्रति कई भाव हो सकते हैं। सर्व-साधारणके लिये सीधा सरल भाव है—भगवान‍्के प्रति स्वामीका भाव। ‘भगवान् मेरे स्वामी, मैं उनका दास’—यह सर्वथा एवं सर्वदा निर्दोष भाव है; इसमें कहीं भी पतनकी गुंजाइश नहीं है।

दूसरा भाव है—भगवान‍्को अपना सखा मानना। यह भाव दास्य-भावसे ऊँचा है। इस भावमें मानसिक रूपसे सदा-सर्वत्र भगवान‍्के साथ रहे और भगवान‍्की लीलाका चिन्तन करे। इसमें भगवान‍्के बालस्वरूपका या पार्थसखारूपका चिन्तन करे।

तीसरा भाव है—भगवान‍्को अपना बालक मानकर उनकी लीलाको देखे, अर्थात् भगवान‍्के प्रति वात्सल्यभाव। भगवान‍्ने बालपनेमें जो-जो लीलाएँ की हैं, उन-उन लीलाओंका चिन्तन करे। बस, भगवान‍्की उन लीलाओंके प्रति मनमें अनुराग हो तथा उन्हें सर्वथा सत्य माने।

चौथा भाव है—मधुर भाव, अर्थात् भगवान‍्को अपने प्रियतमरूपमें अनुभव करे। ‘गोपी-भाव’ इसीका नाम है। गोपी-भावके कई स्तर हैं, जिनमें मञ्जरी-भाव सर्वोत्तम है। श्रीराधामाधव मञ्जरीके इष्ट हैं और श्रीराधामाधवके सुखका आयोजन करना मञ्जरीका जीवन। मञ्जरीपर श्रीराधारानीकी सबसे बड़ी कृपा रहती है और इसीसे श्रीकृष्ण उसपर कृपा करनेके लिये सदा तत्पर रहते हैं।

इससे भी एक ऊँचा भाव है—श्रीराधामाधवने मुझे अपनेमें विलीन कर लिया है, उन्होंने अपने अंगोंमें मुझे प्रवेश करा लिया है। वहाँ पहले श्रीराधामाधवकी एकता अनुभव होती है, पीछे साधककी एकता हो जाती है।

सेवा वह उत्तम होती है, जिसमें सेवकका नामतक सेव्यको ज्ञात न हो सके।

अभिमानका स्वभाव है—अपमान करना। अभिमानीसे अपमान किये बिना नहीं रहा जाता—चाहे जिस क्षेत्रमें देख लिया जाय।

जिस प्रकारके वातावरणका हम सेवन करेंगे मनसे, शरीरसे, वाणीसे—वैसा ही बननेकी हमारी इच्छा होगी। संगसे वृत्ति, वृत्तिसे क्रिया और क्रियासे स्वरूप बनता है।

आज हम धर्मके नामसे लजाते हैं। भगवान‍्को माननेवाले भी समाजमें, सबके सामने अपनेको भगवान‍्को माननेवाला कहनेमें लज्जा अनुभव करते हैं।

साधककी यह वृत्ति रहती है कि वह भोगियोंसे सर्वथा उलटा चलता है। भोगी साधककी वृत्तिको समझते नहीं और वे उसे भ्रमित मानते हैं; पर साधक उनकी इस मान्यतासे उद्वेग नहीं करता, वह अन्तरमें प्रसन्न होता है।

साधक और भोगीके दृष्टिकोणमें बड़ा अन्तर होता है। भोगी भोगोंमें ही जागता-सोता है और साधक भोगोंके त्यागमें ही जागता-सोता है।

साधकका यह स्वरूप है कि वह भोगोंसे स्वाभाविक अपनी चित्तवृत्तिको हटाये।

भोगी जिन चीजोंको चाहता है तथा ग्रहण करता है—सुखके लिये, साधक उन चीजोंके ग्रहणसे घबराता है। उसे उन चीजोंके ग्रहणमें दु:ख अनुभव होता है। भोगीको मान अमृतके समान लगता है और साधक को मान विषके समान। भोगीको प्रशंसा बड़ी सुखकर प्रतीत होती है और साधकको प्रशंसा अग्निके सदृश।

साधकका आदर्श त्यागी है, भोगी नहीं। इसीसे साधक भोगीद्वारा प्रलोभन दिये जानेपर भी भोगोंको स्वीकार नहीं करता।

वृन्दावनवासका बड़ा माहात्म्य है, पर वृन्दावनमें केवल रहना वृन्दावनवास नहीं है; वृन्दावनवासका अर्थ है—जीवनका श्रीकृष्णमय हो जाना।

पर्देपर चित्रित गहनोंको देखकर उसके प्रति आसक्ति, प्रलोभन नहीं जागता। यह संसार, यहाँके भोग-पदार्थ पर्देपरके गहने हैं—यह प्रतीति हो जाय तो स्वाभाविक ही इनके प्रति आसक्ति-उपेक्षा हो जायगी।

भगवान् पर हमारा विश्वास दृढ़ हुआ कि नहीं, इसकी कसौटी है—भगवान‍्के प्रत्येक विधानमें मंगलबुद्धि हुई कि नहीं तथा दु:खमें भगवान‍्का संस्पर्श अनुभव होता है कि नहीं। जबतक भगवान‍्के किसी भी विधानसे मनपर विषाद-चिन्ता आती है, तबतक यह स्पष्ट है कि हमारा भगवान‍्पर विश्वास दृढ़ नहीं हुआ है।

जितने भी भगवत्प्राप्त महापुरुष हुए हैं, उन सबकी स्थितियाँ पृथक्-पृथक् हैं; पर तत्त्वत: सभीने एक ही सत्यको प्राप्त किया है। साधनकालमें मार्गकी भिन्नता रहती है—जैसे किसीमें ज्ञान प्रधान होता है, किसीमें भक्ति, किसीमें निष्काम कर्म तथा किसीमें योग-साधन। पर सबका प्राप्तव्य एक ही भगवान् है। अतएव महापुरुष सभी साधनोंका आदर करते हैं; पर जिस साधनद्वारा वे वहाँतक पहुँचे हैं, उसीका वे विशेषरूपमें समर्थन करते हैं, कारण उस साधनका उन्हें व्यावहारिक ज्ञान अधिक है।

जगत‍्का कोई भी सौन्दर्य न स्थायी है और न वर्धनशील; वह अनित्य है, विनाशी है, क्षणभंगुर है, अपूर्ण है। भगवान‍्का सौन्दर्य नित्य है तथा पूर्णतम होते हुए भी नित्य वर्धनशील है।

भगवान‍्के आश्रयके लिये आवश्यकता है—

दैन्यकी। ‘दैन्य’ का अर्थ है—अभिमान-शून्यता। हममें नाना प्रकारके अभिमान भरे हैं—जैसे धनका अभिमान, पदका अभिमान, साधनका अभिमान, ज्ञानका अभिमान, त्यागका अभिमान, सेवा करनेका अभिमान आदि। जहाँ-जहाँ अभिमानका उदय होता है, वहाँ-वहाँ भगवान‍्की विस्मृति हो जाती है। पर भक्तोंका यह अभिमान कि ‘मैं भगवान‍्का हूँ, भगवान् मेरे हैं, भगवान‍्की मुझपर अपार कृपा है—वास्तवमें अभिमान नहीं है। यह एक परम सात्त्विक मान्यता है, जो साधनाका आधार है।

भगवान‍्की सब शक्तियोंमें कृपाशक्ति प्रधान है। जहाँ उनकी कृपाशक्ति चरितार्थ होती है, वहाँ उनकी अन्य सब शक्तियाँ कृपाशक्तिके अनुगत होकर कार्य करती हैं। हमारा अभिमान भगवान‍्की कृपाका अनुभव नहीं होने देता। अतएव सबसे पहले अपने अहंकारका ही शमन करना है।

संसारका सौन्दर्य सर्वथा मिथ्या है, पर सुखकी छिपी आशासे हम संसारके मिथ्या सौन्दर्यके प्रति लुब्ध हो रहे हैं। संसारके किसी भी प्राणी-पदार्थमें सौन्दर्य नहीं है—इस सत्यपर विश्वास करके हम अपनी भ्रान्तिसे जितनी जल्दी छुट्टी पा लें, उसीमें हमारा भला है।

कोई अपनी किसी साधनासे भगवान‍्को खरीदना चाहे तो यह उसकी मूर्खताके सिवा और कुछ नहीं है। कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है, जिसके विनिमयमें भगवान् मिल सकें। भगवान् मिलते हैं अपनी सहज कृपासे ही। कृपापर विश्वास नहीं तथा कृपाको ग्रहण करनेका दैन्य नहीं है। ऐसी स्थितिमें कैसे काम बने? ‘मैंने अभिमानका त्याग कर दिया, मुझमें अभिमान नहीं है’—इन उक्तियोंमें भी अभिमानकी सत्ता विद्यमान है।

‘दैन्य’ भक्तकी शोभा है। यह उसका पहला लक्षण है। भक्त अपनेको सर्वथा अकिंचन—अभावग्रस्त पाता है और भगवान‍्को यही चाहिये। बस, भगवान् ऐसे भक्तके सामने प्रकट हो जाते हैं।

भगवान‍्का बल निरन्तर हमारे पास रहनेपर भी सक्रिय नहीं होता, इसका कारण है कि हम उसे स्वीकार नहीं करते। जब भी हम भगवान‍्के बलको अनुभव करने लगेंगे, तभी वह बल सक्रिय हो जायगा और हम निहाल हो जायँगे।

हमारी भोगोंमें सुखकी आस्था इतनी दृढ़मूल हो रही है कि वैराग्यके शब्दोंसे वह दूर नहीं होती। किसी महान् विपत्तिका प्रहार तथा भगवान् अथवा उनके किसी प्रेमीजनकी कृपा ही इस आस्थाको दूर कर सकते हैं।

शरणागत वही हो पाता है, जो दीन है। जिसे अपनी बुद्धि, सामर्थ्य, योग्यताका अभिमान है, वह किसीके शरण क्यों होना चाहेगा। जब अपना सारा बल, बलोंकी आशा-भरोसा टूट जाते हैं, तब वह भगवान‍्की ओर ताकता है और उनका आश्रय चाहता है।

शरणागतमें दो चीजें अनिवार्यरूपसे आती हैं—निर्भयता एवं निश्चिन्तता। जबतक भय एवं चिन्ता बने हैं, तबतक न तो अपने दैन्यपर विश्वास हुआ है और न भगवान‍्की शरणागत-वत्सलतापर। बिना इन दोनों चीजोंपर विश्वास हुए काम बनना असम्भव है।

भगवान‍्की कृपा दीनोंकी सम्पत्ति है। हम दीन हो जायँ तो भगवत्कृपापर हमारा स्वाभाविक अधिकार हो जाय।

भजन-साधन करना चाहिये, पर इनका अभिमान मनमें न जगे, इस बातकी सावधानी रखनी चाहिये। भजन-साधनके होनेमें भगवान‍्की कृपाको ही हेतु माने। भगवान‍्की कृपाका निरन्तर स्मरण रहे और अपने पुरुषार्थकी विस्मृति; बस, काम बन जाता है।

जो जितना दीन है, उसमें भगवान‍्की कृपाशक्तिका उतना ही अधिक प्रकाश है। ‘दैन्य’ भगवान‍्की कृपाके प्राकटॺके बीच लगे पर्देको फाड़ डालता है।

जैसे ब्रह्माजीकी वाणी एक ‘द’ तीन अर्थ रखती है, वैसे ही गीता भगवान् श्रीकृष्णकी वाणी है। उसके अनेक अर्थ अधिकारी-भेदसे होते हैं। यही हेतु है कि विभिन्न आचार्यों, टीकाकारोंने गीताके अर्थ पृथक्-पृथक् किये हैं। अधिकारी-भेदसे उन सब अर्थोंका सामंजस्य है।

भगवान‍्की कृपा अधिकारी-भेदकी अपेक्षा नहीं रखती। वह केवल देखती है कि यह एकमात्र कृपाका आकाङ्क्षी है कि नहीं।

भगवान‍्की कृपा सबकी सम्पत्ति है, पर दीनोंकी सम्पत्ति विशेषरूपसे है, क्योंकि भगवान् ‘दीनवत्सल’ हैं।

अबोध बालक, जो बोलना नहीं जानता, किसी प्रकारका संकेत करना नहीं जानता, वह रोकर ही मनोव्यथा व्यक्त करता है। इसी प्रकार जिसके पास रोनेके सिवा कोई साधन नहीं, वह भगवान‍्के सामने कातर होकर रोये। जगत‍्के सामने रोना अशुभ है, कायरता है; भगवान‍्के सामने रोना परम मंगलकारी है एवं परम बलका द्योतक है।

भगवान‍्की कृपापर भरोसा करके दीनभावसे भगवान‍्के शरणापन्न हो जाना चाहिये। जब हम भगवान‍्के शरणापन्न हो जाते हैं और भगवान् पास आ जाते हैं, तब उनके दैवी गुण स्वत: हममें आविर्भूत होते हैं। फिर बन्धनोंको काटना नहीं पड़ता, बन्धन अकुलाकर स्वत: छिन्न हो जाते हैं; ग्रन्थि खोलनी नहीं पड़ती, वह स्वत: खुल जाती है।

हम कैसे भी हों, भगवान‍्की कृपा ऐसी विलक्षण है कि वह हमें सब प्रकारके दोषों-पापोंसे मुक्त करके भगवान‍्के चरणोंका आश्रय प्रदान कर देती है। अन्यथा दीन-हीनोंका काम कैसे बनता।

अग्नि सबको प्राप्त है। उसका किस प्रकार प्रयोग करना, यह प्रयोग करनेवालेपर निर्भर करता है। ऐसे ही कर्म करनेकी शक्ति भगवान‍्ने प्रदान कर रखी है; अब इस शक्तिका प्रयोग किस प्रकारके कर्मोंमें करना—यह हमपर निर्भर करता है। यदि हम अहंकारसे प्रेरित होकर, किसी विकारको लेकर कर्म करेंगे तो वह दोषयुक्त कर्म होगा तथा उसका बुरा फल हमें भोगना ही पड़ेगा; हम उससे बच नहीं सकते।

पापकर्म करना मनुष्यका स्वभाव नहीं है। पापकर्म होते हैं हमारे अन्त:करणमें संचित वासनाओंको लेकर। अतएव पहले उन वासनाओंका निराकरण करना चाहिये।

संसारके अर्थ-भोग जिनके पास जितने अधिक हैं, वे उतने ही अधिक संतप्त हैं और वे दूसरोंको अधिक संतप्त करते हैं।

माँगना बहुत बुरा, पर माँगना ही हो तो भगवान‍्से ही माँगे और भगवान‍्को ही माँगे।

भगवान‍्की शरणागतिके दो रूप संतोंने बताये हैं—जैसे (१)—अपने पुरुषार्थसे, अपने प्रयत्नसे भगवान‍्के शरणापन्न होना तथा (२)—भगवान‍्की शरणागतवत्सलतापर विश्वास करके भगवान‍्के अपनी शरणमें लेनेकी प्रतीक्षा करना। जगत‍्में इनके उदाहरण हैं—बंदरीका बच्चा एवं बिल्लीका बच्चा। बंदरीका बच्चा स्वयं अपनी ओरसे उछलकर माँकी छातीसे चिपक जाता है, पर बिल्लीका बच्चा अपनी ओरसे सक्रिय नहीं होता। बिल्ली स्वयं दाँतोंसे पकड़कर चाहे जब तथा चाहे जहाँ बच्चेको ले जाती है। रामकृष्ण परमहंसने दूसरे प्रकारके साधनको बहुत श्रेष्ठ बताया है। इस साधनमें पुरुषार्थ न करना नहीं है, पर अपने पुरुषार्थ-साधनपर निर्भरताका भाव नहीं रहता।

अन्याश्रयका सर्वथा त्याग ‘निर्भरता’ है और निर्भरता आती है विश्वाससे। यद्यपि विश्वास भगवान‍्की कृपासे ही होता है, फिर भी जीवसे भगवान् इतनी अपेक्षा अवश्य रखते हैं कि ‘वह मुझे अपना मान ले’। ‘भगवान् ही मेरे हैं’— जहाँ यह विश्वास हुआ कि निर्भरता स्वत: आ जाती है।

साधकके सामने दो चीजें आती हैं प्रधानरूपसे—प्रलोभन और भय। कहीं उसकी पूजा होने लगती है, सम्मान होने लगता है, खानेको अच्छा मिलता है, उसके मतका आदर होता है—आदि-आदि प्रलोभन आते हैं और साधक उनमें रम जाता है और कहीं शरीरके आराम-त्यागका भय, भोगोंके विनाशका भय, लोक-निन्दाका भय, अपमानका भय आदि आते हैं और साधक विचलित होकर साधनका त्याग कर देता है। जो साधक उपर्युक्त प्रलोभनों एवं भयोंकी परवाह न करके अपनी साधनामें दत्तचित्त रहता है, वह लक्ष्यतक पहुँच जाता है।

‘दैन्य’ का अर्थ यह नहीं है कि साधक अपनेको इतना पतित मान ले कि उसके मनमें यह बात आ जाय कि वह भगवान‍्का कैसे हो सकता है। इसके विपरीत उसके मनमें यह भाव आना चाहिये कि मैं अपनी अयोग्यताके कारण और किसीका हो नहीं सकता, पर भगवान् तो पतितपावन हैं; अतएव वे मेरे हैं, मैं उनका हूँ।

खाली घरमें घुसनेका भगवान‍्का स्वभाव है। जबतक अपने अन्त:करणमें हम कुछ छिपाकर रखते हैं, तबतक भगवान् आते हैं और झाँककर लौट जाते हैं। इसलिये अपने हृदयको सर्वथा खाली कर दें—दीन-हीन हो जायँ—किसी भी साधन-गुणका अभिमान अपनेमें न रखें।

भगवान‍्ने गीतामें घोषणा की है—‘जीवनके अन्तकालमें जो मेरा स्मरण करते हुए शरीरको छोड़कर जाता है—ऐसा कोई भी हो, वह मुझको प्राप्त होता है—इसमें संदेह नहीं है।’ जगत‍्में भी हम देखते हैं कि छायाचित्र लेनेमें कैमरेका स्विच दबानेके समय सामनेवालेकी जैसी आकृति होती है, वैसी ही फोटो आती है। भगवान‍्की इस घोषणाका हम दुरुपयोग करते हैं और कहते हैं कि ‘जब अन्तकालमें भगवान‍्का स्मरण कर लेनेमात्रसे भगवान‍्की प्राप्ति हो जायगी तो अभी अन्य जरूरी-जरूरी काम कर लिये जायँ, अन्तकालमें भगवान‍्का स्मरण कर लेंगे’। इसपर भगवान‍्ने सावधान किया है कि ‘जीवनभर जिस कार्यमें मन रहेगा, अन्तकालमें उसीका स्मरण होगा—यह निश्चय है। अतएव सब समय मेरा स्मरण करते हुए जगत‍्का काम करो।’ जीवनभर मुझे भुलाये रहकर अन्तकालमें मेरे स्मरणकी आशा कदापि न करो; यह धोखा है। इससे सावधान हो जाओ।

कुछ करना नहीं है, केवल अपने मुखको भगवान‍्के सम्मुख मोड़ देना है। भगवान‍्के सम्मुख होते ही भगवान‍्के विरोधी अपने-आप विमुख हो जायँगे। भोग-विमुखता और भगवत्-सम्मुखता—दोनों साथ-साथ होती हैं। भोगका अर्थ है—भगवान‍्से रहित स्थिति।

भगवान‍्को सर्वत्र देखकर, सब जीवोंमें उनकी अनुभूति करके जीवमात्रकी सेवामें संलग्न रहना—यह संतका सहज स्वभाव होता है। संत सदैव सचेष्ट रहता है कि उसकी प्रत्येक चेष्टा भगवान‍्की पूजा होती रहे।

जो भगवान‍्से भोग चाहता है, वह भोगोंका गुलाम है; उसके आराध्य भगवान् नहीं, भोग हैं। भगवान् उसके साध्य नहीं होते, भगवान् उसके लिये भोग-प्राप्ति करानेके साधनमात्र होते हैं।

भगवान‍्के लिये जीना, भगवान‍्के लिये मरना जिसके जीवनका स्वभाव है, वह प्रेमका निगूढ़ भाजन है। ऐसे जीवनके लिये भगवान‍्से प्रार्थना करनी चाहिये।

‘प्रेम’ का अर्थ है—भगवत्प्रेम। ‘प्रेम’ के नामपर जगत‍्में ‘काम’ चलता है। वह हमारी चर्चाका विषय नहीं है। भगवत्प्रेमकी प्राप्ति सहजमें नहीं होती। बहुत ऊँची साधनाकी सिद्धिके पश्चात् भगवत्प्रेमकी प्राप्ति होती है।

भगवत्प्रेम क्या है—यह कोई बता नहीं सकता। कहनेके लिये कुछ सांकेतिकरूपसे समझनेके लिये कह सकते हैं—यह भगवान‍्की अपनेमें ही अपनेसे ही अपनी लीला है।

भगवान‍्के साथ खेले—ऐसा भगवान‍्का साथी कौन है? भगवान् जिस खेलको खेलें, ऐसा खेल कौन-सा है? वास्तवमें उनके योग्य न कोई साथी है न कोई खेल ही। अतएव भगवान् ही प्रेमास्पद हैं, भगवान् ही प्रेमी हैं और भगवान् ही प्रेम हैं।

स्वयं ही प्रेमी और प्रेमास्पद बनकर—एक-दूसरेकी प्रीतिके आश्रयालम्बन और विषयालम्बन बनकर जो भगवान‍्की परम दिव्य अचिन्त्यानन्त गौरवमयी पवित्रतम लीला चलती है—वास्तवमें इसे ही भगवत्प्रेम कहते हैं। इस प्रेममें ऐसा माना जाता है और यह परम सत्य है कि भगवान् ही स्वयं अपने आनन्द-स्वरूपको—अपने भावस्वरूपको लेकर अनन्त लीलारूप धारण किये रहते हैं।

भगवान् श्रीकृष्ण ही ‘राधा’ स्वरूपमें लीला करते हैं। अतएव श्रीराधा भगवान‍्से सर्वथा अभिन्न हैं। श्रीराधाके बिना श्रीकृष्णका और श्रीकृष्णके बिना श्रीराधाका अस्तित्व नहीं। दोनोंका अविनाभाव-सम्बन्ध है। रसराज महाभावके प्रेमके विषय बनते हैं महाभाव रसराजके प्रेमका विषय बनता है। इस प्रकार परस्पर बड़ी पवित्र लीला चलती है।

श्रीराधा महाभावरूपा हैं और श्रीराधाके आराध्य, प्रेमास्पद, परमप्रेष्ठ हैं—रसराज श्रीकृष्ण।

श्रीराधाके भावोंका, श्रीराधाके अचिन्त्यानन्त भाव-समुद्रकी परम विभिन्न परमानन्दमयी तरंगोंका न तो कोई वर्णन कर सकता है, न गणना और न इनके स्वरूपका विश्लेषण। अनादिकालसे अनन्तकालतक प्रेमकी विशुद्ध परमाह्लादमयी तरंगें—रसमयी मधुर तरंगें उठती रहती हैं और बडे़-बड़े प्रेमी भक्त, बडे़-बड़े भाग्यशाली ऋषि-मुनि और कोई-कोई देवता ही उन रस-मधुर-तरंगोंके दर्शन कर पाते हैं, आस्वादन तो बहुत दूर।

श्रीराधाके प्रेमकी विभिन्न तरंगोंका वर्णन नहीं हो सकता—केवल शाखाचन्द्रन्यायसे संकेतमात्र होता है। जैसे किसीको द्वितीयाका चन्द्रमा दिखलाना है तो यह कहा जाता है कि ‘देखिये, सामने उस डालसे इतना ऊपर चन्द्रमा दिखायी दे रहा है।’ डालसे उतना ऊपर चन्द्रमा नहीं है, पर डालका संकेत करके चन्द्रमाको दिखानेकी प्रक्रिया होती है। इसी प्रकार श्रीराधाके गुणोंका, भावोंका संकेतमात्र किया जाता है, वर्णन नहीं। वर्णन तो असम्भव है।

जगत‍्में धनविषयक मान्यता पृथक्-पृथक् है— किसीका धन विद्या है, किसीका धन बुद्धि है, किसीका धन विषय हैं, किसीकी सम्पत्ति, किसीका धन सोना, किसीका धन पारलौकिक सुख। पर सर्वस्व-समर्पण-मयी श्रीराधाके जीवनका धन क्या है—श्रीकृष्ण।

जहाँ प्रेमका प्रारम्भ होता है, वहीं त्यागकी पराकाष्ठा होती है। त्याग जहाँ पूर्णताको प्राप्त हो जाता है, पहुँच जाता है, वहाँसे भगवत्प्रेमका आरम्भ होता है।

भगवत्प्रेमी सर्वदा, सर्वथा मुक्त होते हैं; मायाका राज्य उनके समीप नहीं जा पाता। वह तो दूरसे ही विलीन हो जाता है। जैसे पौ फटना आरम्भ होते ही अन्धकार मरने लगता है, उसी प्रकार प्रेम-सूर्यके उदयकी तो बात ही क्या, प्रेमके उष:कालमें ही मायाका अन्धकार सारित हो जाता है, मिट जाता है, मर जाता है।

भगवान‍्की मधुर लीलामें उनका ऐश्वर्य छिपा रहता है, क्रियाशील नहीं होता। जिन भगवान‍्के भयसे भय काँपता है, जिनके भयसे काल, यमराज आदि अपने-अपने कर्तव्यमें संलग्न हैं, वे ही श्रीकृष्ण वात्सल्यकी मूर्ति श्रीयशोदा मैयाकी डाँटसे भयभीत हो जाते हैं।

भगवान् श्रीकृष्ण अपने स्वरूप, लीला आदिसे माधुर्यका इतना प्रसार करते हैं कि सबका चित्त उनकी ओर खिंचता चलता है। उनकी आकर्षण-लीला निरन्तर चलती रहती है।

मधुर लीलामें ऐश्वर्य आता है तो वह सेवा करनेके लिये; छिपकर माधुर्यको कम करने या हटानेके लिये नहीं।

प्रेमीमें जब प्रियतम भगवान‍्से मिलनकी इच्छा जगती है, तब वह मार्गकी कठिनाइयोंकी ओर दृष्टि नहीं डालता। बस, मिलनकी त्वरामें वह चल पड़ता है। फिर चाहे वह मार्गकी गर्मीसे जलकर भस्म क्यों न हो जाय, उसकी उसे कुछ परवा नहीं। वह प्रियतमसे मिले बिना रह नहीं सकता। एक कथा आती है—भगवान् श्रीश्यामसुन्दर पहाड़पर सघन छायामें जाकर बैठ गये। पहाड़पर जानेका रास्ता पथरीला, सीधी चढ़ाई, मार्गमें एक भी पेड़ नहीं और मध्याह्नका समय। एक सखीको प्रियतमके समीप जाना है। वह पहाड़पर चढ़ने लगी। देखनेवालोंने उसे रोका—‘इतनी कड़ी धूपमें पहाड़पर कैसे चढ़ोगी, झुलस जाओगी’ पर उसने किसीकी एक बात भी नहीं सुनी। तप्त पत्थरोंपर जब उसके चरण टिकते थे, तब उसे अनुभव होता कि कोई शीतल गद्दी बिछी हुई है और ऊपर कोई शीतल छाया करता चला जा रहा है। प्रत्येक चरण उसे प्रियतमके निकट अनुभव करा रहा था; बस, इसी हेतुसे उसे ऐसा सुखद अनुभव हो रहा था। यह है प्रेमकी विलक्षणता।