सर्वत्र भगवद्दर्शनका साधन

श्रीमद्भगवद‍्गीतामें भगवान‍्ने कहा है—

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।

मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थित:॥

न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्।

भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावन:॥

(९। ४-५)

‘यह सब संसार मेरे अव्यक्त स्वरूपसे व्याप्त है। सम्पूर्ण प्राणी मेरेमें स्थित हैं; परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ तथा वे प्राणी भी मेरेमें स्थित नहीं हैं—मेरे इस ईश्वर-सम्बन्धी योग (सामर्थ्य)-को देख! सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाला और उनको धारण, भरण-पोषण करनेवाला मेरा स्वरूप उन प्राणियोंमें स्थित नहीं है।’

भगवान‍् ने इस बातको समझनेके लिये आकाश और वायुका दृष्टान्त दिया है—‘यथाकाशस्थितो नित्यं वायु: सर्वत्रगो महान्’ (गीता ९। ६)। भगवान‍्की दृष्टिसे यह सिद्धान्त बहुत ठीक है; क्योंकि जैसे आकाश और वायु निराकार हैं, ऐसे ही परमात्मा और सूक्ष्म तथा कारण संसार भी निराकार हैं। बादल आकाशमें सर्वत्रग (सब जगह विचरनेवाले) नहीं होते, पर वायु सर्वत्रग होती है। परन्तु हम यहाँ सुगमतापूर्वक समझनेकी दृष्टिसे आकाश और बादलका दृष्टान्त देते हैं; क्योंकि जैसे हमें आकाश नहीं दीखता, पर बादल दीखते हैं, ऐसे ही परमात्मा नहीं दीखते, पर संसार दीखता है। बादल आकाशमें ही रहते हैं; क्योंकि आकाश असीम है, बादल सीमित हैं। आकाश बादलोंमें रहता है; क्योंकि उन बादलोंके कण-कणमें आकाश परिपूर्ण है। आकाशमें बादल और बादलोंमें आकाश होनेपर भी आकाश तो हरदम रहता है, पर बादल हरदम नहीं रहते, प्रत्युत बनते हैं और मिट जाते हैं। इसी प्रकार परमात्मामें संसार है और संसारमें परमात्मा हैं। परमात्मा तो सदा ज्यों-के-त्यों रहते हैं, पर संसार बनता है और मिट जाता है।

भगवान‍् कहते हैं कि मेरे निराकार स्वरूपसे सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है तो जगत‍्के अन्तर्गत हमारे शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण और अहम‍् (मैंपन) भी आ जाते हैं। अत: हमारे शरीरमें भी परमात्मा हैं, इन्द्रियोंमें भी परमात्मा हैं, मनमें भी परमात्मा हैं, बुद्धिमें भी परमात्मा हैं, प्राणोंमें भी परमात्मा हैं और अहम‍्में भी परमात्मा हैं। तात्पर्य है कि हमारे शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण और अहम‍्के सहित यह सम्पूर्ण संसार परमात्मामें ही है। यह परमात्मासे अलग नहीं हो सकता और परमात्मा इससे अलग नहीं हो सकते। ये दो विभाग हुए। एक विभाग (संसार) निरन्तर बदलता रहता है और एक विभाग (परमात्मा) कभी नहीं बदलता।

आगे भगवान‍् कहते हैं कि संसार मेरेमें नहीं है और मैं संसारमें नहीं हूँ। जैसे, आकाशमें बादल नहीं हैं और बादलोंमें आकाश नहीं है; क्योंकि आकाश नित्य है, बादल अनित्य (उत्पन्न और नष्ट होनेवाले) हैं। आकाश स्वतन्त्र है, बादल परतन्त्र हैं। आकाश सर्वदेशीय है, बादल एकदेशीय हैं। ऐसे ही परमात्मा नित्य हैं, संसार अनित्य है। परमात्मा ज्यों-के-त्यों रहनेवाले हैं, संसार बदलनेवाला है। जैसे, जहाँ बादल हैं, वहाँ भी आकाश है और जहाँ बादल नहीं हैं, वहाँ भी आकाश है अर्थात् आकाश बादलोंके बिना भी रहता है, पर बादल आकाशके बिना नहीं रहते। ऐसे ही जहाँ संसार है, वहाँ भी परमात्मा हैं और जहाँ संसार नहीं है, वहाँ भी परमात्मा हैं अर्थात् परमात्मा संसारके बिना भी रहते हैं, पर संसार परमात्माके बिना नहीं रहता।*

तात्पर्य यह हुआ कि जैसे आकाशके बिना बादलोंकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है, ऐसे ही परमात्माके बिना संसारकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है।

विचार करें कि बादल कैसे बनता है? बादल भापसे बनता है। भाप ठण्डकसे भी बनती है और गरमीसे भी। भापमें जल और तेज (अग्नि)—दोनों रहते हैं। सूर्यकी गरमीसे समुद्रका जल भाप बनता है और वही भाप ऊपर उठकर बादल बन जाती है। उपनिषद् में आया है—

तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाश: सम्भूत:। आकाशाद्वायु:। वायोरग्नि:। अग्नेराप:। अद‍्भ्यः पृथिवी। (तैत्तिरीय० २।१)

‘उस परमात्मासे पहले आकाश उत्पन्न हुआ। आकाशसे वायु, वायुसे अग्नि, अग्निसे जल और जलसे पृथ्वी उत्पन्न हुई।’

वायु आकाशसे ही उत्पन्न होती है, आकाशमें ही रहती है और आकाशमें ही लीन हो जाती है; अत: वायु आकाशरूप ही हुई। ऐसे ही अग्नि वायुसे ही पैदा होती है, वायुमें ही रहती है और वायुमें ही लीन हो जाती है; अत: अग्नि वायुरूप ही हुई। जैसे, फूँक मारनेसे अग्नि तेज हो जाती है। एक घड़ेमें धधकते अंगार रखकर उसका मुख बन्द कर दें तो वायुका सम्बन्ध न रहनेसे अंगार बुझ जाते हैं। अग्निसे जल पैदा होता है। जैसे, परिश्रम करनेसे (शरीरमें गरमी बढ़नेपर) पसीना आ जाता है। जल अग्निसे ही पैदा होता है, अग्निमें ही रहता है और अग्निमें ही लीन हो जाता है; अत: जल अग्निरूप ही हुआ। इस प्रकार सूक्ष्म दृष्टिसे देखें तो आकाश-तत्त्व ही वायु, अग्नि, जल आदि रूप धारण करता है; क्योंकि अग्निके बिना जलकी सत्ता नहीं है, वायुके बिना अग्निकी सत्ता नहीं है और आकाशके बिना वायुकी सत्ता नहीं है।*

अग्निसे भाप बनती है, भापसे बादल बनते हैं और बादलोंसे वर्षा होती है तो तत्त्वसे बादल आकाशरूप ही हुए। आकाशके सिवाय बादल कोई चीज नहीं है। जबतक बादल हैं, तबतक आकाशमें बादल हैं और बादलोंमें आकाश है। जब बादल बिखर जाते हैं, तब न आकाशमें बादल रहते हैं और न बादलोंमें आकाश रहता है, प्रत्युत केवल आकाश रहता है। इसी तरह जबतक सृष्टि है, तबतक परमात्मामें सृष्टि है और सृष्टिमें परमात्मा हैं। जब सृष्टि नहीं रहती, तब न परमात्मामें सृष्टि रहती है और न सृष्टिमें परमात्मा रहते हैं, प्रत्युत केवल परमात्मा रहते हैं। तात्पर्य है कि सम्पूर्ण संसार परमात्मासे ही पैदा होता है, परमात्मामें ही रहता है और परमात्मामें ही लीन हो जाता है। अत: सृष्टि है, तो भी परमात्मा हैं और सृष्टि नहीं है, तो भी परमात्मा हैं। परमात्माके सिवाय सृष्टिकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। यही सिद्धान्त गीताको मान्य है।

गीतामें भगवान‍् भक्तिकी दृष्टिसे कहते हैं—‘वासुदेव: सर्वम्’ (७। १९) ‘सब कुछ वासुदेव ही है’ और ‘सदसच्चाहमर्जुन’ (९। १९) ‘सत् और असत् मैं ही हूँ’। जब भगवान‍्के सिवाय कुछ है ही नहीं तो फिर संसार कहाँ रहा? संसार न तो भगवान‍्की दृष्टिमें है, न महात्माओंकी दृष्टिमें है, प्रत्युत जीवकी दृष्टिमें है—‘ययेदं धार्यते जगत्’ (गीता ७। ५)। इसलिये भगवान‍् कहते हैं कि मेरेको जाननेके बाद कुछ भी जानना बाकी नहीं रहता—‘यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते’ (गीता ७।२); क्योंकि मेरे सिवाय कुछ है ही नहीं—‘मत्त: परतरं नान्यत्किंचिदस्ति धनञ्जय’ (गीता ७। ७)। इस तरह भक्तिके द्वारा परमात्माका ‘ज्ञान’ भी हो जाता है और संसारसे ‘वैैराग्य’ भी हो जाता है; क्योंकि जब संसारकी सत्ता ही नहीं रहेगी तो फिर उसमें राग कैसे रहेगा?

उपर्युक्त विवेचनसे यह बात सिद्ध होती है कि जबतक साधकको संसार दीखता है, तबतक उसको यह मानना चाहिये कि संसारमें परमात्मा हैं और परमात्मामें संसार है। यह शरीर भी संसारका ही एक अंश है; अत: इसमें भी परमात्मा हैं। प्राणोंमें भी परमात्मा हैं, मनमें भी परमात्मा हैं, बुद्धिमें भी परमात्मा हैं, अहम‍् (मैंपन)-में भी परमात्मा हैं। मैं, तू, यह, वह—सबमें परमात्मा परिपूर्ण हैं। संसार बदल जाता है, पर परमात्मा ज्यों-के-त्यों रहते हैं। शरीर बदलता है, मन बदलता है, बुद्धि बदलती है, अहम‍् बदलता है, पर परमात्मा सदा ज्यों-के-त्यों रहते हैं—

बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च।

सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥

(गीता १३। १५)

‘वे परमात्मा सम्पूर्ण प्राणियोंके बाहर-भीतर परिपूर्ण हैं और चर-अचर प्राणियोंके रूपमें भी वे ही हैं एवं दूर-से-दूर तथा नजदीक-से-नजदीक भी वे ही हैं। वे अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे जाननेमें नहीं आते।’

सब रूपोंमें परमात्मा ही हैं। अनन्त युगोंसे पहले भी परमात्मा थे और अनन्त युगोंके बाद भी परमात्मा रहेंगे तथा वर्तमानमें भी जड़-चेतन, स्थावर-जंगम आदि अनन्त रूपोंमें परमात्मा ही हैं। हम उनको नहीं जान सके तो यह हमारी कमी है! इसलिये भागवतमें आया है—

यावत् सर्वेषु भूतेषु मद्भावो नोपजायते।

तावदेवमुपासीत वाङ्मन:कायवृत्तिभि:॥

(११। २९। १७)

‘जबतक सम्पूर्ण प्राणियोंमें मेरा भाव अर्थात् ‘सब कुछ परमात्मा ही है’ ऐसा वास्तविक भाव न होने लगे, तबतक इस प्रकार मन, वाणी और शरीरकी सभी वृत्तियों (बर्ताव)-से मेरी उपासना करता रहे।’

तात्पर्य है कि जबतक सब रूपोंमें परमात्मा न दीखें, तबतक मन, वाणी और शरीरसे परमात्माकी उपासना करे अर्थात् मनसे किसीका बुरा मत चाहे, वाणीसे कड़ुआ मत बोले और शरीरसे किसीका बुरा मत करे। ऐसी सावधानी रखे कि मेरे मन-वाणी-शरीरसे किसीको दु:ख न पहुँचे, किसीका अहित न हो। कभी भूल हो जाय तो माफी माँग ले कि ‘भैया! मैं कड़ुआ बोल गया, मुझे क्षमा कर देना।’ इस प्रकार उपासना (बर्ताव) करते-करते ‘वासुदेव: सर्वम्’ का अनुभव हो जायगा—

सर्वं ब्रह्मात्मकं तस्य विद्ययाऽऽत्ममनीषया।

परिपश्यन्नुपरमेत् सर्वतो मुक्तसंशय:॥

(श्रीमद्भा० ११। २९। १८)

‘पूर्वोक्त साधन (मन-वाणी-शरीरके द्वारा उपासना) करनेवाले भक्तको ‘सब कुछ परमात्मस्वरूप ही है’—ऐसा अनुभव हो जाता है। फिर वह इस अध्यात्मविद्या (ब्रह्मविद्या) द्वारा सब प्रकारसे संशयरहित होकर सब जगह परमात्माको भलीभाँति देखता हुआ उपराम हो जाय अर्थात् ‘सब कुछ परमात्मा ही हैं’—यह चिन्तन भी न रहे, प्रत्युत साक्षात् परमात्मा ही दीखने लगें।’

जबतक हमें संसारकी सत्ता दीखती है, तबतक ‘सब कुछ भगवान‍् ही हैं’—ऐसी मान्यता करनी है। फिर इस मान्यताको भी छोड़कर ‘चुप’ (चिन्तनरहित) हो जाना है। जैसे, मकानमें जबतक कूड़ा-कचरा रहता है, तबतक झाड़ू देते हैं। जब सब कूड़ा-कचरा निकल जाता है, तब झाड़ूको भी फेंक देते हैं। ऐसे ही यह संसार कूड़ा-कचरा है और ‘सब कुछ भगवान‍् ही हैं’—यह मान्यता झाड़ू है। जब संसारकी सत्ता रही ही नहीं, तो फिर ‘सब कुछ भगवान‍् ही हैं’—ऐसा चिन्तन (मान्यता) करनेसे क्या लाभ? अत: ‘भगवान‍् हैं’—यह चिन्तन भी छोड़कर ‘चुप’ हो जायँ तो स्वाभाविक तत्त्व प्राप्त हो जायगा। यह सबसे ऊँची चीज है। इससे ऊँची कोई चीज थी नहीं, है नहीं, होगी नहीं, हो सकती नहीं। अगर यहाँतक हम पहुँच जायँ तो हमारा मनुष्यजन्म सफल हो जायगा। हमारा मैं-मेरापन मिट जायगा, जड़-चेतनकी ग्रन्थि मिट जायगी। कारण कि जब जड़ चीज रही ही नहीं, केवल चेतन-ही-चेतन रह गया तो फिर ग्रन्थि कैसे रहेगी? ग्रन्थि (गाँठ) तो दो चीजोंमें होती है। उपनिषद‍्में आया है—

भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशया:।

क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे॥

(मुण्डक० २।२।८)

‘कार्य-कारणस्वरूप उस परात्पर परमात्माको तत्त्वसे जान लेनेपर इस जीवके हृदयकी (अविद्यारूप) गाँठ खुल जाती है, सम्पूर्ण संशय कट जाते हैं और समस्त शुभाशुभ कर्म नष्ट हो जाते हैं।’

जब एक परमात्माके सिवाय दूसरी सत्ता रही ही नहीं, तो फिर चिज्जडग्रन्थि कैसे रहेगी? संशय कैसे रहेंगे? पाप-पुण्य कैसे रहेंगे? सब समाप्त हो जायगा! अनुकूल-प्रतिकूल, शुद्ध-अशुद्ध, ठीक-बेठीक कुछ नहीं रहेगा, एक परमात्मा-ही-परमात्मा रह जायँगे। इस आनन्दसे बढ़कर कोई आनन्द हुआ नहीं, है नहीं, होगा नहीं, हो सकता नहीं। इसलिये साधकको ठीक अनुभव करना चाहिये कि सब कुछ परमात्मा-ही-परमात्मा हैं। यही गीताका सर्वश्रेष्ठ सिद्धान्त है—

बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।

वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ:॥

(गीता ७। १९)

‘बहुत जन्मोंके अन्तमें अर्थात् मनुष्यजन्ममें ‘सब कुछ वासुदेव ही है’—ऐसा जो ज्ञानवान् मेरे शरण होता है, वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।’

यह मनुष्यजन्म बहुत जन्मोंका अन्तिम जन्म है। भगवान‍्ने अपनी तरफसे हमें यह अन्तिम जन्म दिया है। अब आगेका जन्म अथवा मुक्ति हमारे अधीन है। इसलिये भगवान‍्ने कहा है—

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।

तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावित:॥

(गीता ८। ६)

‘हे कुन्तीपुत्र अर्जुन! मनुष्य अन्तकालमें जिस-जिस भी भावका स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है, वह उस (अन्तकालके) भावसे सदा भावित होता हुआ उस-उसको ही प्राप्त होता है अर्थात् उस-उस योनिमें ही चला जाता है।’

एषा ब्राह्मी स्थिति: पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।

स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥

(गीता २। ७२)

‘हे पृथानन्दन! यह ब्राह्मी स्थिति है। इसको प्राप्त होकर कभी कोई मोहित नहीं होता। इस स्थितिमें यदि अन्तकालमें भी स्थित हो जाय तो निर्वाण (शान्त) ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है।’

जब हमने यह अनुभव कर लिया कि सब कुछ परमात्मा ही हैं; तो फिर दुबारा जन्म कहाँ होगा और क्यों होगा? परमात्माके सिवाय दूसरी चीज है ही नहीं तो जन्म कहाँ होगा? और हमें किसी वस्तुकी चाहना है ही नहीं तो जन्म क्यों होगा? जब परमात्माके सिवाय कुछ है ही नहीं तो फिर मन भी परमात्माको छोड़कर कहाँ जायगा? अत: यह बात धारण कर लें कि ‘एक परमात्मा-ही-परमात्मा हैं’—यह बात हमें पता लग गयी और हमारे मनमें कोई चाहना नहीं है, कोई बुराई नहीं है तो अब हमारा दुबारा जन्म कभी हो ही नहीं सकता!

प्रश्न—सब कुछ भगवान‍् ही हैं—ऐसा अनुभव करनेका साधन क्या है? किस तरह इसकी सिद्धि होती है?

उत्तर—अगर आप ‘वासुदेव: सर्वम्’ का अनुभव करना चाहते हैं तो बड़ी दृढ़तासे इस बातको मान लें कि जिस शरीरको हम अपना मानते हैं, वह हमें संसारसे मिला है और छूट जायगा; अत: वह मेरा नहीं है। प्रत्यक्ष बात है कि शरीर जन्मसे पहले मेरा नहीं था और मृत्युके बाद मेरा नहीं रहेगा और अभी भी प्रतिक्षण मेरेसे अलग हो रहा है। जितनी उम्र बीत गयी, उतना तो शरीर हमसे अलग हो गया है, अब बाकी कितना रहा है, इसका पता नहीं। कर्मयोगकी दृष्टिसे शरीर संसारका है, ज्ञानयोगकी दृष्टिसे प्रकृतिका है और भक्तियोगकी दृष्टिसे परमात्माका है। शरीरको किसीका भी मानें, पर यह मेरा नहीं है—यह सर्वसिद्धान्त है। जो वस्तु मिली हुई है और बिछुड़ जायगी, वह अपनी कैसे हुई? शरीर मिला हुआ है, बिछुड़ जायगा और निरन्तर बिछुड़ रहा है—ये तीनों बातें सन्देहरहित हैं।

इस प्रकार शरीरको संसारका मानकर संसारकी सेवामें लगा दें और शरीर, मन, वाणीसे किसीका भी बुरा न चाहें तो ‘वासुदेव: सर्वम्’ का अनुभव हो जायगा। हमें वही सेवा करनी है, जिसको करनेकी हमारेमें सामर्थ्य है और सेवा लेनेवाला हमारेसे न्याययुक्त सेवा चाहता है। जो हमारेसे अन्याययुक्त, शास्त्रविरुद्ध सेवा चाहता है, उसको नहीं करना है। हम ‘वासुदेव: सर्वम्’ का अनुभव करना चाहते हैं तो अन्याययुक्त काम हम नहीं करें और न्याययुक्त काम भी उतना करें, जितनी हमारी शक्ति है। एक मार्मिक बात है कि भला करनेकी अपेक्षा बुरा न करना (बुराईका त्याग) बहुत ऊँची साधना है। भलाई करनेमें जोर आता है, पर बुराई न करनेमें कोई जोर नहीं आता। बुराई न करनेसे दो बातें होंगी—केवल भलाई करेंगे अथवा कुछ भी नहीं करेंगे। कुछ भी नहीं करनेसे परमात्मामें स्वत: स्थिति होती है; क्योंकि कुछ करनेसे ही संसारमें स्थिति होती है। भलाई करनेसे अभिमान आ सकता है, पर बुराई न करनेसे अभिमान आता ही नहीं। इसलिये बुराईका त्याग करें अर्थात् न बुरा करें, न बुरा सोचें और न बुरा कहें।

भागवतमें ‘वासुदेव: सर्वम्’ का साधन बताया है—

विसृज्य स्मयमानान् स्वान् दृशं व्रीडां च दैहिकीम्।

प्रणमेद् दण्डवद् भूमावाश्वचाण्डालगोखरम्॥

(११। २९। १६)

‘हँसी उड़ानेवाले अपने लोगोंको और अपने शरीरकी दृष्टिको भी लेकर जो लज्जा आती है, उसको छोड़कर अर्थात् उसकी परवाह न करके कुत्ते, चाण्डाल, गौ एवं गधेको भी पृथ्वीपर लम्बा गिरकर भगवद‍्बुद्धिसे साष्टांग प्रणाम करे।’

जो भी प्राणी सामने आये, उसको साष्टांग प्रणाम करें। शरीरकी लज्जा आती हो तो उसको छोड़ दें और लोग हँसी उड़ाते हों तो उसकी परवाह मत करें; क्योंकि हमें उससे क्या मतलब? हमें तो ‘वासुदेव: सर्वम्’ सिद्ध करना है। दृढ़ निश्चय हो जायगा तो ऐसा करनेमें कठिनता नहीं होगी। अगर कठिनता लगती हो तो मनसे ही दण्डवत् प्रणाम कर लें। ऐसा कोई प्राणी न छूटे, जिसको नमस्कार न किया हो। किसी भी वर्ण, आश्रम, जाति, धर्म, सम्प्रदायका मनुष्य हो, वह भगवान‍् ही है। इसमें चार बातें हैं—१. इन प्राणियोंके भीतर भगवान‍् हैं, २. ये भगवान‍्के भीतर हैं, ३. ये भगवान‍्के हैं और ४. ये भगवान‍् ही हैं। चारोंमें जो सुगम लगे, वह मान लें। ये भगवान‍्के हैं—ऐसा मानना सबसे सुगम है। अत: ऐसा मान लें कि ये भगवान‍्के हैं, भगवान‍्को प्यारे हैं,* इसलिये हम इनको प्रणाम करते हैं।

ऐसा करनेका परिणाम क्या होगा, यह भगवान‍् बताते हैं—

नरेष्वभीक्ष्णं मद्भावं पुंसो भावयतोऽचिरात्।

स्पर्धासूयातिरस्कारा: साहङ्कारा वियन्ति हि॥

(श्रीमद्भा० ११। २९। १५)

‘जब भक्तका सम्पूर्ण स्त्री-पुरुषोंमें निरन्तर मेरा ही भाव हो जाता है अर्थात् उनमें मुझे ही देखता है, तब शीघ्र ही उसके चित्तसे ईर्ष्या, दोषदृष्टि, तिरस्कार आदि दोष अहंकारसहित सर्वथा दूर हो जाते हैं।’

इसलिये मनुष्यमात्रमें भगवान‍्का भाव रखें। कहीं भाव न हो सके तो मनसे माफी माँग लें। किसीको कहनेकी, जनानेकी जरूरत नहीं। शरीर-मन-वाणीसे संसारकी सेवा करनी है और संसार भगवान‍्का विराट्‍‍रूप है। अत: भगवान‍्के ही शरीर-मन-वाणीसे भगवान‍्की ही सेवा करनी है। फिर ‘वासुदेव: सर्वम्’ सिद्ध हो जायगा; क्योंकि यह कोई नया निर्माण नहीं है, प्रत्युत पहलेसे ही है। इसके लिये विद्याध्ययन, धन-सम्पत्ति, बल, अनुष्ठान आदिकी जरूरत नहीं है। इसको हरेक भाई-बहन कर सकता है।

सन्तोंने कहा है—

हाथ काम मुख राम है, हिरदै साची प्रीत।

दरिया गृहस्थी साध की, याही उत्तम रीत॥

हाथसे काम करते रहें और मुखसे राम-राम करते रहें। इसके साथ ही भगवान‍्से बार-बार कहते रहें कि ‘हे नाथ! मैं आपको भूलूँ नहीं’। किसीको बुरा मत मानें। किसीको बुरा मान लिया तो समझें कि हमारा व्रत भंग हो गया! अत: उसको प्रत्यक्ष अथवा मनसे नमस्कार करके क्षमा माँग लें। फिर भगवान‍्से प्रार्थना करें कि ‘हे नाथ! मैं भूलूँ नहीं; हे प्रभो! मेरा यह साधन सिद्ध हो जाय!’ एक साधु थे। उनको सत्संगमें कोई बात अच्छी लगती तो भगवान‍्से कह देते कि ‘महाराज! यह बात आप अपने खजानेमें जमा कर लो, अगर मैं भूल जाऊँ तो मेरेको याद दिला देना’। भगवान‍्के समान कोई मालिक नहीं, कोई नौकर नहीं, कोई मित्र नहीं! अचानक बैठे-बैठे भगवान‍्की याद आ जाय तो यह समझकर बड़े खुश हो जाना चाहिये कि भगवान‍् मेरेको याद कर रहे हैं! भगवान‍्ने मेरे ऊपर बड़ी कृपा कर दी! मैं तो भूल गया था, पर भगवान‍्ने याद कर लिया, जिससे मेरेको भगवान‍् याद आ गये। इस प्रकार भगवान‍्की कृपाका आश्रय लेनेपर ‘वासुदेव: सर्वम्’ का साधन सुगम हो जायगा; क्योंकि ‘सब कुछ भगवान‍् ही हैं’—यह बात कृपासे ही समझमें आती है, अपनी बुद्धिमानीसे, अपने उद्योगसे नहीं। उद्योग करनेसे तो कर्तृत्व आता है, जो इसके अनुभवमें बाधक है। आजतक जितने भी महात्मा हुए हैं, वे भगवत्कृपासे ही जीवन्मुक्त, तत्त्वज्ञ और भगवत्प्रेमी हुए हैं, अपने उद्योगसे नहीं। इसलिये साधकको उद्योगका आश्रय न लेकर भगवत्कृपाका ही आश्रय लेना चाहिये। शरीर-इन्द्रियोंकी सार्थकताके लिये उद्योग करना चाहिये, पर परमात्मतत्त्व उद्योगसाध्य नहीं है।