सत्-असत् का विवेक
श्रीमद्भगवद्गीताका एक श्लोक है—
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत:।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभि:॥
(२। १६)
‘असत् का तो भाव (सत्ता) विद्यमान नहीं है और सत् का अभाव विद्यमान नहीं है। तत्त्वदर्शी महापुरुषोंने इन दोनोंका ही अन्त अर्थात् तत्त्व देखा है, अनुभव किया है।’
(१)
इस श्लोकके पूर्वार्धमें आये ‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत:’—इन सोलह अक्षरोंमें सम्पूर्ण वेदों, पुराणों, शास्त्रोंका तात्पर्य भरा हुआ है! चिन्मय सत्तामात्र ‘सत्’ है और सत्ताके सिवाय जो कुछ भी प्रकृति और प्रकृतिका कार्य (क्रिया और पदार्थ) है, वह सब ‘असत्’ अर्थात् जड और परिवर्तनशील है। देखने, सुनने, समझने, चिन्तन करने, निश्चय करने आदिमें जो कुछ भी आता है, वह सब ‘असत्’ है। जिसके द्वारा देखते, सुनते, चिन्तन आदि करते हैं, वह भी ‘असत्’ है और दीखनेवाला भी ‘असत्’ है। असत् और सत् —इन दोनोंको ही प्रकृति और पुरुष, क्षर और अक्षर, शरीर और शरीरी, अनित्य और नित्य, नाशवान् और अविनाशी आदि अनेक नामोंसे कहा गया है।
पूर्वोक्त श्लोकार्ध (सोलह अक्षरों)-में तीन धातुओंका प्रयोग हुआ है—
(१) ‘भू सत्तायाम्’—जैसे , ‘अभाव:’ और ‘भाव:’।
(२) ‘अस् भुवि’— जैसे, ‘असत:’ और ‘सत:’।
(३) ‘विद् सत्तायाम्’—जैसे, ‘विद्यते’ और ‘न विद्यते’।
यद्यपि इन तीनों धातुओंका मूल अर्थ एक ‘सत्ता’ ही है, तथापि सूक्ष्म रूपसे ये तीनों अपना स्वतन्त्र अर्थ भी रखते हैं; जैसे—‘भू’ धातुका अर्थ ‘उत्पत्ति’ है, ‘अस्’ धातुका अर्थ ‘सत्ता’ (होनापन) है और ‘विद्’ धातुका अर्थ ‘विद्यमानता’ (वर्तमानकी सत्ता) है।
(२)
‘नासतो विद्यते भाव:’ पदोंका अर्थ है—‘असत: भाव: न विद्यते’ अर्थात् असत् की सत्ता विद्यमान नहीं है, प्रत्युत असत् का अभाव ही विद्यमान है। असत् वर्तमान नहीं है। असत् उपस्थित नहीं है। असत् प्राप्त नहीं है। असत् मिला हुआ नहीं है। असत् मौजूद नहीं है। असत् कायम नहीं है। जो वस्तु उत्पन्न होती है, उसका नाश अवश्य होता है—यह नियम है। उत्पन्न होते ही तत्काल उस वस्तुका नाश शुरू हो जाता है। उसका नाश इतनी तेजीसे होता है कि उसको दो बार कोई देख ही नहीं सकता अर्थात् उसको एक बार देखनेपर फिर दुबारा उसी स्थितिमें नहीं देखा जा सकता। यह सिद्धान्त है कि जिस वस्तुका किसी भी क्षण अभाव है, उसका सदा-सर्वथा अभाव ही है। अत: संसारका सदा ही अभाव है। संसारको कितनी ही सत्ता दें, उसको कितना ही ऊँचा मानें, उसका कितना ही आदर करें, उसको कितना ही महत्त्व दें, पर वास्तवमें वह विद्यमान है ही नहीं। असत् प्राप्त है ही नहीं, कभी प्राप्त हुआ ही नहीं, कभी प्राप्त होगा ही नहीं। असत्का प्राप्त होना सम्भव ही नहीं है।
‘नाभावो विद्यते सत:’ पदोंका अर्थ है—‘सत: अभाव: न विद्यते’ अर्थात् सत् का अभाव विद्यमान नहीं है, प्रत्युत सत् का भाव ही विद्यमान है। दूसरे शब्दोंमें, सत् की सत्ता निरन्तर विद्यमान है। सत् सदा वर्तमान है। सत् सदा उपस्थित है। सत् सदा प्राप्त है। सत् सदा मिला हुआ है। सत् सदा मौजूद है। सत् सदा कायम है। किसी भी देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति, अवस्था, क्रिया आदिमें सत् का अभाव नहीं होता। कारण कि देश, काल, वस्तु आदि तो असत् (अभावरूप अर्थात् निरन्तर परिवर्तनशील) हैं, पर सत् सदा ज्यों-का-त्यों रहता है। उसमें कभी किंचिन्मात्र भी कोई परिवर्तन नहीं होता, कोई कमी नहीं आती। अत: सत् का सदा ही भाव है। परमात्मतत्त्वको कितना ही अस्वीकार करें, उसकी कितनी ही उपेक्षा करें, उससे कितना ही विमुख हो जायँ, उसका कितना ही तिरस्कार करें, उसका कितनी ही युक्तियोंसे खण्डन करें, पर वास्तवमें उसका अभाव विद्यमान है ही नहीं। सत् का अभाव होना सम्भव ही नहीं है। सत् का अभाव कभी कोई कर सकता ही नहीं—‘विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति’ (गीता २। १७)।
‘उभयोरपि दृष्ट:’ पदोंका तात्पर्य है कि तत्त्वदर्शी महापुरुषोंने सत्-तत्त्वको उत्पन्न नहीं किया है, प्रत्युत देखा है अर्थात् अनुभव किया है। तात्पर्य है कि असत् का अभाव और सत् का भाव—दोनोंके तत्त्वको (निष्कर्ष)-को जाननेवाले जीवन्मुक्त, तत्त्वज्ञ महापुरुष एक सत्-तत्त्वको ही देखते हैं अर्थात् स्वत:स्वाभाविक एक ‘है’ का ही अनुभव करते हैं। इसलिये असत् की सत्ता नहीं है—यह भी सत्य है और सत् का अभाव नहीं है—यह भी सत्य है। अत: दोनोंका तत्त्व सत् ही है—ऐसा जान लेनेपर उन महापुरुषोंकी दृष्टिमें एक सत्-तत्त्व (‘है’)-के सिवाय और किसीकी स्वतन्त्र सत्ता रहती ही नहीं।
असत् की सत्ता विद्यमान न रहनेसे उसका अभाव और सत् का अभाव विद्यमान न रहनेसे उसका भाव सिद्ध हुआ। निष्कर्ष यह निकला कि असत् है ही नहीं, प्रत्युत सत्-ही-सत् है।
(३)
जो सहज निवृत्त है, वह ‘असत्’ है और जो स्वत: प्राप्त है, वह ‘सत् ’ है। निवृत्तका नित्यवियोग है और प्राप्तका नित्ययोग है। असत् का केवल अभाव-ही-अभाव है और इस अभावका कभी अभाव (नाश) नहीं होता। सत् का केवल भाव-ही-भाव है और इस भावका कभी अभाव नहीं होता। असत् की सत्ता माननेसे ही निवृत्त और प्राप्त ये दो विभाग कहे जाते हैं। असत् को सत्ता न दें तो न निवृत्त है, न प्राप्त है, प्रत्युत सत्तामात्र ज्यों-की-त्यों है। दूसरे शब्दोंमें, जबतक असत् की सत्ता है, तबतक विवेक है। असत् की सत्ता मिटनेपर विवेक ही तत्त्वज्ञानमें परिणत हो जाता है। ‘उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभि:’—इसमें ‘उभयोरपि’ में विवेक है और ‘अन्त:’ में तत्त्वज्ञान है अर्थात् विवेकतत्त्वज्ञानमें परिणत हो गया और सत्तामात्र ही शेष रह गयी।
जैसे दिन और रात—दोनों अलग-अलग हैं, ऐसे ही सत् और असत्—दोनों अलग-अलग हैं। जैसे दिन रात नहीं हो सकता और रात दिन नहीं हो सकती, ऐसे ही सत् असत् नहीं हो सकता और असत् सत् नहीं हो सकता; परन्तु तत्त्वसे दोनों एक ही हैं। जैसे दिन और रात—दोनों सापेक्ष हैं, दिनकी अपेक्षा रात है और रातकी अपेक्षा दिन है, पर सूर्यमें न दिन है, न रात है अर्थात् वह निरपेक्ष प्रकाश है। ऐसे ही सत् और असत् —दोनों सापेक्ष हैं, पर परमात्मतत्त्व (सत्-तत्त्व) निरपेक्ष है। इसलिये तत्त्वदर्शी महापुरुष सत्-असत् —दोनोंके एक ही तत्त्व सत्-तत्त्व अर्थात् निरपेक्ष परमात्मतत्त्वका अनुभव करते हैं।
(४)
जैसे हम कहते हैं कि यह मनुष्य है, यह पशु है, यह वृक्ष है, यह मकान है आदि, तो इसमें ‘मनुष्य, पशु, वृक्ष, मकान’ आदि तो पहले भी नहीं थे, पीछे भी नहीं रहेंगे तथा वर्तमानमें भी प्रतिक्षण अभावमें जा रहे हैं। परन्तु ‘है’ रूपसे जो सत्ता है, वह सदा ज्यों-की-त्यों है। तात्पर्य है कि ‘मनुष्य, पशु, वृक्ष, मकान’ आदि तो संसार (असत्) है और ‘है’ परमात्मतत्त्व (सत्) है। इसलिये ‘मनुष्य, पशु, वृक्ष, मकान’ आदि तो अलग-अलग हुए, पर ‘है’ वही रहा। इसी तरह मैं मनुष्य हूँ, मैं पशु हूँ, मैं देवता हूँ आदिमें शरीर तो अलग-अलग हुए, पर ‘हूँ’ वही रहा।
संसारकी तो सत्ता नहीं है और परमात्मतत्त्वका अभाव नहीं है। अत: जो निरन्तर बदलता है, उसका भाव कभी नहीं हो सकता और जो कभी नहीं बदलता, उसका अभाव कभी नहीं हो सकता। ‘नहीं’ कभी ‘है’ नहीं हो सकता और ‘है’ कभी ‘नहीं’ नहीं हो सकता। असत् कभी विद्यमान नहीं है और ‘सत्’ सदा विद्यमान है। जिसका अभाव है, उसीका त्याग करना है और जिसका भाव है, उसीको प्राप्त करना है—इसके सिवाय और क्या बात हो सकती है! ‘है’ को स्वीकार करना है और ‘नहीं’ को अस्वीकार करना है—यही वेदान्त है, वेदोंका खास निष्कर्ष है।
(५)
असत् की नित्यनिवृत्ति है और सत् की नित्यप्राप्ति है। नित्य-निवृत्तकी निवृत्ति और नित्यप्राप्तकी प्राप्तिमें क्या कठिनता और क्या सुगमता? क्या करना और क्या न करना? क्या पाना और क्या खोना? क्योंकि वह तो स्वत:सिद्ध है—
खोया कहे सो बावरा, पाया कहे सो कूर।
पाया खोया कुछ नहीं, ज्यों-का-त्यों भरपूर॥
जब सत् के सिवाय कुछ है ही नहीं, तो फिर इसमें क्या अभ्यास करें? क्या चिन्तन करें? इसमें न कुछ करना है, न कुछ सोचना है, न कुछ निश्चय करना है, न कुछ प्राप्त करना है और न कुछ निवृत्त करना है। असत् को मिटाना भी गलती है और उसको रखनेकी अथवा प्राप्त करनेकी चेष्टा करना भी गलती है। अत: उसको न मिटाना है, न रखना है, प्रत्युत उसकी उपेक्षा करनी है। जो नहीं है, वही मिटता है और जो है, वही मिलता है। अत: असत् की निवृत्ति करनी ही नहीं है; क्योंकि असत् नित्य-निवृत्त है और सत् की प्राप्ति करनी ही नहीं है; क्योंकि सत् नित्य-निरन्तर प्राप्त है—ऐसा विचार करके चुप हो जायँ, कुछ भी चिन्तन न करें। न संसारका चिन्तन करें; न परमात्माका चिन्तन करें; क्योंकि चिन्तन करनेसे हम संसार (अन्त:करण)-के साथ जुड़ते हैं और परमात्मासे दूर होते हैं। अत: चिन्तन नहीं करना है, प्रत्युत चिन्तन करनेकी शक्ति जिससे प्रकाशित होती है, उसमें अपनी स्थितिका अनुभव करना है, जो कि स्वत:सिद्ध है। जिस ज्ञानके अन्तर्गत वृत्तियाँ दीखती हैं, उस ज्ञानमें अपनी स्थितिका अनुभव करना है, जो कि स्वत:सिद्ध है।
(६)
यद्यपि भाव परमात्माका ही है, संसारका नहीं, तथापि मनुष्यसे भूल यह होती है कि वह पहले संसार (शरीर)-को देखकर फिर उसमें परमात्माको देखता है, पहले आकृतिको देखकर फिर भावको देखता है। ऊपर लगायी हुई पालिश कबतक टिकेगी? साधकको विचार करना चाहिये कि परमात्मा पहले थे या संसार पहले था? स्वयं (स्वरूप) पहले था या शरीर पहले था? विचार करनेपर सिद्ध होता है कि परमात्मा पहले हैं, संसार पीछे है; स्वयं पहले है, शरीर पीछे है; भाव पहले है, आकृति पीछे है। इसलिये साधककी दृष्टि पहले भावरूप परमात्मा या चिन्मय सत्ताकी तरफ जानी चाहिये, संसार या शरीरकी तरफ नहीं। हम संसारमें हैं और परमात्माको प्राप्त करना है—ऐसा मानना ही गलती है; क्योंकि वास्तवमें हम परमात्मामें ही हैं। संसारकी तो सत्ता ही नहीं है— ‘नासतो विद्यते भाव:।’ साधककी दृष्टि भावरूप परमात्माकी तरफ ही रहनी चाहिये, अभावरूप संसारकी तरफ नहीं, प्रत्युत संसारसे विमुखता होनी चाहिये।
(७)
असत् का भाव निरन्तर अभावमें बदल रहा है। परन्तु जो असत् के अभावको जानता है, उस सत्-तत्त्वका भाव कभी अभावमें नहीं बदलता।
उस सत्-तत्त्वमें सबकी स्वत:सिद्ध स्थिति है, इसीलिये अपने अभावका अनुभव कभी किसीको नहीं होता। वह सत्-तत्त्व सम्पूर्ण देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, अवस्था, घटना, परिस्थिति आदिसे सर्वथा अतीत है। असत् को सत्ता और महत्ता देनेके कारण मनुष्य सत्-तत्त्वमें स्वत:सिद्ध स्थितिका अनुभव नहीं कर पाता। तात्पर्य है कि असत् की सत्तारूपसे मान्यता ही सत् की स्वीकृति नहीं होने देती। यहाँ शंका हो सकती है कि जब असत् की सत्ता है ही नहीं तो फिर वह दीखता क्यों है? इसका समाधान यह है कि जिन इन्द्रियों, मन, बुद्धि, अहम्के द्वारा असत् दीखता है, वे इन्द्रियाँ आदि भी उसी जातिके (असत्) ही हैं। तात्पर्य है कि असत् (शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि-अहम्)-के साथ तादात्म्य करनेके कारण ही असत् दीखता है। अगर असत् से तादात्म्य न करें तो असत् है ही नहीं, प्रत्युत सत्-ही-सत् है। इसलिये सत्-तत्त्व (आत्मा)-ने आजतक कभी असत् को देखा ही नहीं! जैसे, सूर्यने आजतक कभी अन्धकारको देखा ही नहीं! यह ज्ञानकी दृष्टिसे कहा गया है। अगर भक्तिकी दृष्टिसे देखें तो असत् संसार प्रकृतिका कार्य है और प्रकृति भगवान्की शक्ति है*।
भगवान् की शक्ति होनेसे प्रकृति और उसका कार्य भगवत्स्वरूप ही है; क्योंकि शक्ति शक्तिमान्से अलग नहीं हो सकती। जैसे शरीरके गोरे या काले रंगको शरीरसे अलग करके नहीं देख सकते, जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्ति अवस्थाओंको शरीरसे अलग करके नहीं देख सकते, ऐसे ही प्रकृतिको भगवान्से अलग करके नहीं देख सकते। जैस मनुष्य अपनी शक्ति (बल, ताकत, विद्वत्ता, योग्यता, चातुर्य, सामर्थ्य आदि)-के बिना तो रह सकता है, पर शक्ति मनुष्यके बिना नहीं रह सकती, ऐसे ही भगवान् तो शक्तिके बिना रह सकते हैं और रहते ही हैं*, पर शक्ति भगवान्के बिना नहीं रह सकती।
तात्पर्य है कि शक्ति भगवान्के अधीन (आश्रित) है, भगवान् शक्तिके अधीन नहीं हैं। शक्तिमान्के बिना शक्तिकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव होता है, पर शक्तिके बिना शक्तिमान्का अभाव नहीं होता। अत: भगवान्की शक्ति होनेसे प्रकृतिकी भी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव है अर्थात् एक भगवान्के सिवाय कुछ भी नहीं है। इसलिये भगवान्ने कहा है—‘सदसच्चाहमर्जुन’ (गीता ९।१९), ‘वासुदेव: सर्वम्’ (७।१९)। यह गीताका सर्वोपरि सिद्धान्त है, जिसमें सम्पूर्ण मतभेद समाप्त हो जाते हैं। कारण कि सम्पूर्ण मतभेद सूक्ष्म अहम्से पैदा होते हैं और ‘वासुदेव: सर्वम्’ में अहम्की सूक्ष्म गन्ध भी नहीं है।
(८)
जिसका अभाव है, उस असत् (‘नहीं’)-के द्वारा अपना महत्त्व मानना मूल दोष है, जिससे सम्पूर्ण दोष उत्पन्न होते हैं। जिसका भाव है, उस सत् (‘है’)-के द्वारा अपना महत्त्व मानना मूल गुण है, जिससे सम्पूर्ण गुण उत्पन्न होते हैं। भूल यही है कि जो मौजूद नहीं है उसकी सत्ता मानते हैं, उसको अपना मानते हैं और जो मौजूद है, उसकी सत्ता नहीं मानते, उसको अपना नहीं मानते। मिला हुआ तो बिछुड़ जायगा, वह अपना कैसे हो सकता है? परन्तु जो मौजूद नहीं है, उस मिले हुएको अपना माननेसे जो मौजूद है, उसको अपना माननेकी शक्ति नहीं रहती। ज्ञानकी दृष्टिसे आत्मा (स्व) अपना है और भक्तिकी दृष्टिसे भगवान् (स्वकीय) अपने हैं। ‘स्व’ में प्रीति होना ज्ञान है और ‘स्वकीय’ में प्रीति होना भक्ति है।
(९)
एक सिद्धान्त है कि जो आदि और अन्तमें होता है, वह मध्य (वर्तमान)-में भी होता है तथा जो आदि और अन्तमें नहीं होता, वह मध्यमें भी नहीं होता।*
जैसे शरीर और संसार पहले भी नहीं थे और बादमें भी नहीं रहेंगे तथा बीचमें भी वे प्रतिक्षण बदलकर नाशकी ओर जा रहे हैं अर्थात् प्रतिक्षण मर रहे हैं, उनका प्रतिक्षण अभाव हो रहा है। परन्तु शरीरी (शरीरवाला) और परमात्मतत्त्व पहले भी थे, बादमें भी रहेंगे तथा बीचमें भी ज्यों-के-त्यों विद्यमान हैं।
जो आदि और अन्तमें नहीं है, उसका ‘नहीं’-पना नित्य-निरन्तर है तथा जो आदि और अन्तमें है, उसका ‘है’-पना नित्य-निरन्तर है। जिसका ‘नहीं’-पना नित्य-निरन्तर है, वह ‘असत्’ है और जिसका ‘है’-पना नित्य-निरन्तर है, वह ‘सत्’ है। असत् के साथ हमारा नित्यवियोग है और सत् के साथ हमारा नित्ययोग है।
सुख-दु:ख, हर्ष-शोक, राग-द्वेष, काम-क्रोध आदि आने-जानेवाले, बदलनेवाले हैं, पर सत्ता अर्थात् स्वरूप ज्यों-का-त्यों रहनेवाला है। साधकसे यह बहुत बड़ी भूल होती है कि वह बदलनेवाली दशाको देखता है, पर सत्ताको नहीं देखता; दशाको स्वीकार करता है, पर सत्ताको स्वीकार नहीं करता। दशा पहले भी नहीं थी और पीछे भी नहीं रहेगी; अत: बीचमें दीखनेपर भी वह है नहीं। परन्तु सत्तामें आदि, अन्त और मध्य है ही नहीं। दशाको लेकर ही सत्ताका आदि, अन्त तथा मध्य कहा जाता है। दशा कभी एकरूप रहती ही नहीं और सत्ता कभी अनेकरूप होती ही नहीं। जो दीखता है, वह भी दशा है और जो देखनेवाली है, वह भी दशा है। जाननेमें आनेवाली भी दशा है और जाननेवाली भी दशा है। सत्तामें न दीखनेवाला है, न देखनेवाला है; न जाननेमें आनेवाला है, न जाननेवाला है; न समझनेवाला है, न समझानेवाला है; न श्रोता है, न वक्ता है। ये दीखनेवाला-देखनेवाला आदि सब दशाके अन्तर्गत हैं। दीखनेवाला-देखनेवाला आदि तो नहीं रहेंगे, पर सत्ता रहेगी; क्योंकि दशा तो मिट जायगी, पर सत्ता रह जायगी।
आश्चर्यकी बात है कि हम कामना उसकी करते हैं, जो नहीं है। भयभीत उससे होते हैं, जिसकी सत्ता ही नहीं है। सुख नहीं रहता, पर उसकी कामनाको हम पकड़े रखते हैं। दु:ख नहीं रहता, पर उसके भयको हम पकड़े रखते हैं। यह कितनी बेसमझीकी बात है! सुखकी इच्छासे ही दु:खका भय होता है। जीनेकी इच्छासे ही मरनेका भय होता है। यदि इच्छा न रहे तो न दु:ख रहेगा, न दु:खका भय रहेगा और न मरनेका भय रहेगा। इच्छाकी निवृत्ति होते ही जिज्ञासाकी पूर्ति हो जाती है अर्थात् कुछ करना, जानना और पाना शेष नहीं रहता।
सुख पापोंका कारण नहीं है, प्रत्युत सुखकी इच्छा पापोंका कारण है।१ सुखकी इच्छा ही नरकोंका दरवाजा है।२
सुखदायी परिस्थितिको रखनेमें सब परतन्त्र हैं, पर सुखकी इच्छाको छोड़नेमें सब स्वतन्त्र हैं। सुखकी इच्छाको छोड़नेमें अभ्यास नहीं है, प्रत्युत विवेक है, जो वर्तमानकी वस्तु है। जिसको रखनेमें हम परतन्त्र हैं, उसको हम छोड़ना नहीं चाहते और जिसको छोड़नेमें हम स्वतन्त्र व समर्थ हैं, उसकी इच्छाको रखना चाहते हैं—इससे बड़ी भूल और क्या होगी? यह भूल ही बन्धनका, सब पाप, दु:ख, संताप, नरक आदिका कारण है।
जो नहीं है, उसको ‘है’ मानकर उसको पानेकी अथवा मिटानेकी इच्छा करना और उससे भयभीत होना असत् का संग है। उसकी उपेक्षा करना है। दशाको न देखकर सत्ताको देखना सत् का संग है।
(१०)
दोषोंका भाव विद्यमान नहीं है और निर्दोषताका अभाव विद्यमान नहीं है अर्थात् दोषोंकी सत्ता है ही नहीं और निर्दोषता स्वत:सिद्ध है। कोई भी दोष स्थायी नहीं रहता, आता-जाता है और उसके आने-जानेका ज्ञान जिसको होता है, वह (निर्दोष तत्त्व) स्थायी रहता है। तात्पर्य है कि दोषोंका ज्ञान दोषीको नहीं होता, प्रत्युत निर्दोषको होता है और निर्दोषतासे ही होता है। दोषोंके आने-जानेका ज्ञान तो सबको होता है, पर अपने आने-जानेका ज्ञान कभी किसीको नहीं होता; क्योंकि दोष असत् हैं और हमारा निर्दोष स्वरूप सत् है। हमारेमें दोष हैं—ऐसा मानना ही दोषोंको निमन्त्रण देना है, उनको अपनेमें स्थापन करना है। अगर दोष हमारेमें होते तो फिर जैसे हम निरन्तर रहते हैं, ऐसे ही वे भी निरन्तर रहते और उनका कभी अभाव नहीं होता। दूसरी बात, अगर दोष हमारेमें होते तो हम सर्वांशमें दोषी होते, सबके लिये दोषी होते और सदाके लिये दोषी होते। परन्तु कोई भी मनुष्य सर्वांशमें दोषी नहीं होता, सबके लिये दोषी नहीं होता और सदाके लिये दोषी नहीं होता।
दोषोंको सत्ता हमने ही दी है, इसलिये दोषोंका आना-जाना हमें दीखता है। अगर दोषोंकी सत्ता न मानें तो दोष हैं ही नहीं—‘नासतो विद्यते भाव:’। जैसे सूर्यमें अमावास्याकी रात नहीं आ सकती, ऐसे ही नित्य स्वरूपमें अनित्य दोष नहीं आ सकते। जैसे परमात्मा निर्दोष हैं—‘निर्दोषं हि समं ब्रह्म’ (गीता ५। १९), ऐसे ही उनका अंश जीवात्मा भी निर्दोष है—‘अविकार्योऽयमुच्यते’ (गीता २। २५), ‘ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी॥’ (मानस, उत्तर० ११७। १) अत: दोषोंको अपनेमें मानना और दूसरोंमें मानना—दोनों ही गलती है।
अपनेमें दोषोंकी स्थापना हमने ही की है। हमने ही उनको सत्ता देकर दृढ़ किया है। अत: दोषोंको सत्ता न देकर अपनेमें और दूसरोंमें निर्दोषताकी स्थापना करना अर्थात् निर्दोषताका अनुभव करना हमारा कर्तव्य है। अपनेमें और दूसरोंमें निर्दोषताका अनुभव करना ही तत्त्वज्ञान है, जीवन्मुक्ति है।
(११)
हमारी सत्ता किसी वस्तु, व्यक्ति और क्रियाके अधीन नहीं है। प्रत्येक वस्तुकी उत्पत्ति और विनाश होता है, प्रत्येक व्यक्तिका जन्म (संयोग) और मरण (वियोग) होता है एवं प्रत्येक क्रियाका आरम्भ और अन्त होता है। परन्तु इन तीनोंको जाननेवाली हमारी चिन्मय सत्ताका कभी उत्पत्ति-विनाश, जन्म-मरण (संयोग-वियोग) और आरम्भ-अन्त नहीं होता। वह सत्ता नित्य-निरन्तर स्वत: ज्यों-की-त्यों रहती है। उस सत्ताका कभी अभाव नहीं होता—‘नाभावो विद्यते सत:’। उस सत्तामें स्वत:-स्वाभाविक स्थितिके अनुभवका नाम ही जीवन्मुक्ति है।
मनुष्यको यह वहम रहता है कि अमुक वस्तुकी प्राप्ति होनेपर, अमुक व्यक्तिके मिलनेपर तथा अमुक क्रियाको करनेपर मैं स्वाधीन (मुक्त) हो जाऊँगा। परन्तु ऐसी कोई वस्तु, व्यक्ति और क्रिया है ही नहीं, जिससे मनुष्य स्वाधीन हो जाय। वस्तु, व्यक्ति और क्रिया तो मनुष्यको पराधीन बनानेवाली हैं। उनसे असंग होनेपर ही मनुष्य स्वाधीन हो सकता है। अत: साधकको चाहिये कि वह वस्तु, व्यक्ति और क्रियाके बिना अपनेको अकेला अनुभव करनेका स्वभाव बनाये, उस अनुभवको महत्त्व दे, उसमें अधिक-से-अधिक स्थित रहे। यह मनुष्यमात्रका अनुभव है कि सुषुप्तिके समय वस्तु, व्यक्ति और क्रियाके बिना भी हम स्वत: रहते हैं; परन्तु हमारे बिना वस्तु, व्यक्ति और क्रिया नहीं रहती। जब जाग्रत् में भी हम इनके बिना रहनेका स्वभाव बना लेंगे, तब हम स्वाधीन अर्थात् मुक्त हो जायँगे। वस्तु, व्यक्ति और क्रियाके सम्बन्धकी मान्यता ही हमें स्वाधीन नहीं होने देती और हमारे न चाहते हुए भी हमें पराधीन बना देती है।
हमें विचार करना चाहिये कि ऐसी कौन-सी वस्तु है, जो सदा हमारे पास रहेगी और हम सदा उसके पास रहेंगे? ऐसा कौन-सा व्यक्ति है, जो सदा हमारे साथ रहेगा और हम सदा उसके साथ रहेंगे? ऐसी कौन-सी क्रिया है, जिसको हम सदा करते रहेंगे और जो सदा हमसे होती रहेगी? सदाके लिये हमारे साथ न कोई वस्तु रहेगी, न कोई व्यक्ति रहेगा और न कोई क्रिया रहेगी। एक दिन हमें वस्तु, व्यक्ति और क्रियासे रहित होना ही पड़ेगा। अगर हम वर्तमानमें ही उनके वियोगको स्वीकार कर लें, उनसे असंग हो जायँ तो जीवन्मुक्ति स्वत:सिद्ध है।
विचार करें, वस्तु पासमें रहते हुए भी हम रहते हैं और वस्तु पासमें न रहते हुए भी हम वही रहते हैं। व्यक्ति साथमें रहते हुए भी हम रहते हैं और व्यक्ति साथमें न रहते हुए भी हम वही रहते हैं। क्रिया करते समय भी हम रहते हैं और क्रिया न करते समय भी हम वही रहते हैं। इन दोनों अवस्थाओंका अनुभव सबको है। इससे सिद्ध होता है कि हमारा अस्तित्व (होनापन) वस्तु, व्यक्ति और क्रियाके अधीन नहीं है। हमें वस्तु, व्यक्ति और क्रियाकी अपेक्षा, आवश्यकता भी नहीं है, प्रत्युत उनको ही हमारी आवश्यकता है। अत: हम स्वतन्त्र हैं। हम वस्तुकी उत्पत्तिको भी देखते हैं और विनाशको भी देखते हैं, व्यक्तिके संयोगको भी देखते हैं और वियोगको भी देखते हैं, क्रियाके आरम्भको भी देखते हैं और अन्तको भी देखते हैं। वस्तु, व्यक्ति और क्रिया—तीनोंके अभावका तो हमें अनुभव होता है, पर अपने अभावका अनुभव कभी किसीको नहीं होता। अपने इस अनुभवमें नित्य-निरन्तर स्थित रहना साधकका काम है। यह अभ्यास नहीं है, प्रत्युत जागृति है। वस्तु, व्यक्ति और क्रियाका संयोग अनित्य है, पर वियोग नित्य है। नित्यको स्वीकार करनेसे नित्य-तत्त्वकी प्राप्ति हो जाती है। तात्पर्य है कि वस्तु,व्यक्ति और क्रियासे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर सर्वत्र परिपूर्ण उस परमात्मसत्तामें स्वत: स्थिति हो जाती है, जिसके लिये गीताने कहा है—
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।
(गीता ९। ४)
‘यह सब संसार मेरे अव्यक्त स्वरूपसे व्याप्त है।’
(१२)
असत् की सत्ता विद्यमान नहीं है और सत् का अभाव विद्यमान नहीं है—इसका तात्पर्य है कि जो भी सत्ता दीखती है, वह असत् की न होकर सत्-तत्त्वकी ही है। इस सत्ताको अस्वीकार कोई कर ही नहीं सकता। कोई परमात्माकी सत्ता मानता है, कोई आत्माकी सत्ता मानता है और कोई जगत्की सत्ता मानता है। अगर कोई कहे कि मैं किसीकी भी सत्ता नहीं मानता तो वह अपनी सत्ता तो मानता ही है! तात्पर्य यह है कि किसी-न-किसी रूपमें सत्-तत्त्व (‘है’)-की सत्ताको सभी स्वीकार करते हैं, भले ही वे उसका नाम कुछ भी रख दें। सत्ताका त्याग कोई कर सकता ही नहीं। कारण कि सत्ताका निषेध करनेसे अपना निषेध हो जायगा, जबकि अपने अभावका अनुभव कभी किसीको नहीं होता।
(१३)
जिसका अभाव विद्यमान नहीं है अर्थात् जो प्रत्येक देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, क्रिया, अवस्था, परिस्थिति, घटना आदिमें विद्यमान है, उस तत्त्वकी प्राप्ति कुछ करनेसे नहीं होती। कारण कि जो विद्यमान है, उसकी अप्राप्ति होती ही नहीं। हम कुछ करेंगे, तब प्राप्ति होगी—यह भाव देहाभिमानको पुष्ट करनेवाला है। प्रत्येक क्रियाका आरम्भ और समाप्ति होती है; अत: क्रिया करनेसे उसीकी प्राप्ति होगी, जो विद्यमान नहीं है। परन्तु प्रकृतिके साथ सम्बन्ध होनेके कारण प्रत्येक प्राणीमें क्रियाका वेग रहता है, जो उसको क्रियारहित नहीं होने देता।१ क्रियाका वेग शान्त करनेके लिये यह आवश्यक है कि जो नहीं करना चाहिये, उसको न करें और जो करना चाहिये, उसको निर्मम तथा निष्काम होकर करें अर्थात् अपने लिये कुछ न करें, प्रत्युत केवल दूसरेके हितके लिये ही करें।२
अपने लिये करनेसे क्रियाका वेग कभी समाप्त नहीं होगा; क्योंकि अपना स्वरूप नित्य है और कर्म अनित्य हैं। अत: दूसरोंके हितके लिये कर्म करनेसे क्रियाका वेग शान्त होकर प्रकृतिसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जायगा और सब देश, काल आदिमें विद्यमान सत्-तत्त्व प्रकट हो जायगा, उसका अनुभव हो जायगा।
(१४)
साधक भूत और भविष्यकी जिन वस्तुओं, व्यक्तियों और क्रियाओंको महत्त्व देता है, उनका चिन्तन बिना किये और बिना चाहे स्वत: होता रहता है। उस स्वत: होनेवाले चिन्तनको मिटानेके लिये साधक परमात्माका चिन्तन करता है। परन्तु यह सिद्धान्त है कि होनेवाले चिन्तनको किये गये चिन्तनसे नहीं मिटाया जा सकता। चिन्तन करनेसे करनेके नये संस्कार पड़ते हैं, जिससे वह नष्ट नहीं होता, प्रत्युत और पुष्ट होता है। स्वत: होनेवाला चिन्तन स्वत: होनेवाले चिन्तनसे अथवा चुप होनेसे ही मिट सकता है। तात्पर्य है कि सत्-तत्त्वका अनुभव होनेपर, निष्काम होनेपर, बोध होनेपर, प्रेम होनेपर संसारका स्वत: होनेवाला चिन्तन मिट जाता है। चुप होनेका तात्पर्य है कि साधक स्वत: होनेवाले चिन्तनकी उपेक्षा कर दे, उससे उदासीन हो जाय अर्थात् उसको न ठीक समझे, न बेठीक समझे और न अपनेमें समझे तथा अपनी तरफसे कोई नया चिन्तन भी न करे। वह न चिन्तन करनेसे मतलब रखे, न चिन्तन नहीं करनेसे मतलब रखे। वह न तो किये जानेवालेका कर्ता बने और न होनेवालेका भोक्ता बने। ऐसा करनेसे साधक धीरे-धीरे अचिन्त्य हो जायगा। परन्तु अचिन्त्य होनेका, सुख लेनेका भी आग्रह नहीं रखना है। ऐसा होनेपर साधक चिन्तन करने और चिन्तन होने—दोनोंसे रहित हो जायगा—‘नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन’। (गीता ३।१८); क्योंकि करनेमें कर्मेन्द्रियोंका और होनेमें अन्त:करणका सम्बन्ध होनेसे करना और होना—दोनों ही अनित्य हैं। करने और होनेसे रहित होनेपर ‘है’ (सत्-तत्त्व)-में अपनी स्वाभाविक स्थितिका अनुभव हो जायगा।
(१५)
असत् का भाव विद्यमान नहीं है अर्थात् असत् का भाव निरन्तर अभावमें बदल रहा है। परन्तु ‘असत् का भाव विद्यमान नहीं है’—इस बातका ज्ञान अभावमें नहीं बदलता। इस ज्ञानमें हमारी स्थिति स्वत:सिद्ध है। देह तो निरन्तर अभावमें बदल रहा है; अत: देह नहीं है, प्रत्युत देही (स्वरूप) ही है। देहीकी सत्ता देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, अवस्था, घटना, परिस्थिति आदिसे सर्वथा अतीत है।
असत् का भाव निरन्तर अभावमें जा रहा है; अत: असत् नहीं है, प्रत्युत सत् ही है। असत् की केवल मान्यता है। असत् की यह मान्यता ही सत् की स्वीकृति नहीं होने देती। गलत मान्यता सही मान्यता करनेसे मिट जाती है। वास्तवमें न सही मान्यता है, न गलत मान्यता है, केवल सत्तामात्र है।
जैसे हाथ, पैर, नासिका आदि शरीरके अंग हैं, ऐसे असत् सत् का अंग भी नहीं है। जो बहनेवाला और विकारी होता है, वह अंग नहीं होता*; जैसे—कफ, मूत्र आदि बहनेवाले और फोड़ा आदि विकारी होनेसे शरीरके अंग नहीं होते। ऐसे ही असत् बहनेवाला और विकारी होनेके कारण सत् का अंग नहीं है।
(१६)
भूतकाल और भविष्यकालकी घटना जितनी दूर दीखती है, उतनी ही दूर वर्तमान भी है। जैसे भूत और भविष्यसे हमारा सम्बन्ध नहीं है, ऐसे ही वर्तमानसे भी हमारा सम्बन्ध नहीं है। जब सम्बन्ध ही नहीं है, तो फिर भूत, भविष्य और वर्तमानमें क्या फर्क हुआ? ये तीनों कालके अन्तर्गत हैं, जबकि हमारा स्वरूप कालसे अतीत है। कालका तो खण्ड होता है, पर स्वरूप (सत्ता) अखण्ड है। शरीरको अपना स्वरूप माननेसे ही भूत, भविष्य और वर्तमानमें फर्क दीखता है। वास्तवमें भूत, भविष्य और वर्तमान विद्यमान है ही नहीं—‘नासतो विद्यते भाव:’।
(१७)
संसारमें भाव और अभाव—दोनों दीखते हुए भी ‘अभाव’ मुख्य रहता है। परमात्मामें भाव और अभाव—दोनों दीखते हुए भी ‘भाव’ मुख्य रहता है। संसारमें ‘अभाव’ के अन्तर्गत भाव-अभाव हैं और परमात्मामें ‘भाव’ के अन्तर्गत भाव-अभाव हैं। दूसरे शब्दोंमें, संसारमें ‘नित्यवियोग’ के अन्तर्गत संयोग-वियोग हैं और परमात्मामें ‘नित्ययोग’ के अन्तर्गत योग-वियोग (मिलन-विरह) है। अत: संसारमें अभाव ही रहा और परमात्मामें भाव ही रहा।
(१८)
असत् का भाव नहीं है और सत् का अभाव नहीं है; अत: सत् स्वत: विद्यमान है। जो स्वत: विद्यमान है, वही परमात्मा हैं। जो पहले नहीं था, पीछे नहीं रहेगा और अभी नहींमें जा रहा है, उसे सत्ता देना, महत्ता देना और उससे सम्बन्ध जोड़ना ही खास बाधा है। अत: उसे सत्ता न दे, महत्ता न दे और उससे सम्बन्ध न जोड़े अर्थात् उसे अपना न माने। जिसका कभी अभाव नहीं होता, उसको ही सत्ता दे, उसको ही महत्ता दे और उसीको अपना माने। जो नहीं है, उसका महत्त्व कैसा? महत्त्व तो उसीका है, जो है और वही अपना है।
जो नहीं है, उससे तटस्थ, बेपरवाह, निर्लेप, निरपेक्ष,उदासीन, विमुख होना है; उससे चिपकना नहीं है। वास्तवमें हम असत् (वस्तु, व्यक्ति और क्रिया)-से निर्लेप हैं; क्योंकि हम उसके भाव-अभावको, उत्पत्ति-विनाशको, संयोग-वियोगको और आदि-अन्तको जानते हैं। इस प्रकार अपनेको निर्लेप अनुभव करके चुप हो जायँ अर्थात् चुप होकर स्थित रहें तो स्वत:सिद्ध सत्ता (सत्-तत्त्व)-का स्पष्ट अनुभव हो जायगा। वास्तवमें सत्-तत्त्व स्वत:सिद्ध है, केवल असत् से विमुख होना है। अगर हम असत् को अस्वीकार कर दें तो वह रहेगा ही नहीं; क्योंकि वह है ही नहीं, उसमें रहनेकी ताकत ही नहीं है—‘नासतो विद्यतेभाव:’।
श्रीमद्भागवतमें आया है—‘ह्यतत्त्यजन्तो मृगयन्ति सन्त:’ (१०।१४।२८) ‘सन्तलोग संसारका त्याग करते हुए परमात्मतत्त्वकी खोज करते हैं’। खोजनेसे वह चीज मिलती है, जो पहले ही मौजूद हो। उसको खोजनेका उपाय है—जो मौजूद नहीं है, उसको छोड़ते जाना। छोड़नेका तात्पर्य है—उसकी सत्ता और महत्ता न मानना तथा उससे अपना सम्बन्ध न मानना, उसको अस्वीकार करना।