अद्भुतकर्मी श्रीकृष्ण
शोणास्निग्धांगुलिदलकुलं जातरागं परागै:
श्रीराधाया: स्तनमुकुलयो: कुंकुमक्षोदरूपै:।
भक्तश्रद्धामधुनखमह: पुञ्जकिञ्जल्कजालं
जंघानालं चरणकमलं पातु न: पूतनारे:॥
भगवान् श्रीकृष्ण लीलापुरुषोत्तम हैं, उनके पवित्र कर्मोंका रहस्य कौन जान सकता है? उन्होंने अपने जीवनमें ऐसे-ऐसे अद्भुत कर्म किये हैं, जिन्हें पढ़कर आश्चर्यमें डूब जाना पड़ता है, यहाँ ऐसे ही अद्भुत कर्मोंमेंसे कुछका अत्यन्त संक्षिप्त वर्णन किया जाता है।
अवतरण
भाद्रकृष्ण ८ के दिन कंसके कैदखानेमें आधी रातके समय भगवान् प्रकट हुए। वसुदेवने देखा ‘बड़ा ही अद्भुत बालक है, उसके विशाल नेत्र हैं, चार भुजाएँ शंख, चक्र, गदा, पद्मसे शोभित हैं, वक्ष:स्थलमें श्रीवत्सका चिह्न है, गलेमें कौस्तुभमणि चमक रही है, नव-नील-नीरद श्यामशरीरपर पीताम्बर शोभायमान है, सुन्दर काले घुँघराले केशोंपर महामूल्यवान् वैदूर्यमणियोंसे जड़ा हुआ किरीट-मुकुट है, कानोंमें मकराकृति कुण्डल है, अति उत्तम मेखला, अंगद, कंकण आदि आभूषणोंसे शरीरकी प्रतिभा और भी बढ़ रही है।’ भगवान् के अंगोंकी प्रभासे अन्धकारमय कारागृह परम प्रकाशमय हो गया, वसुदेव-देवकीने भगवान् समझकर स्तुति की, भगवान् ने प्रसन्न होकर कहा कि ‘स्वायम्भुव मन्वन्तरमें तुम्हारा नाम सुतपा-पृश्नि था, तुम दोनोंने दिव्य बारह हजार वर्षतक मुझमें तन्मय होकर तप किया था। मैंने तुम-लोगोंको दर्शन दिये, परंतु मेरी मायासे मोहित हो तुमलोगोंने मुक्ति नहीं माँगी। तुमने मेरे समान पुत्र चाहा, इससे मैं स्वयं पृश्निगर्भ नामसे तुम्हारे यहाँ उत्पन्न हुआ था। दूसरे जन्ममें तुम कश्यप और अदिति थे, तब मैं उपेन्द्र या वामन नामसे तुम्हारे यहाँ पुत्ररूपसे अवतरित हुआ था। यह तुम्हारा तीसरा जन्म है, तुमलोगोंके पूर्वजन्मकी बातें स्मरण दिलानेके लिये ही मैंने तुम्हें अपना चतुर्भुज स्वरूप दिखलाया है। पुत्रभाव या ईश्वरभावसे मेरा ध्यान तथा मुझपर स्नेह करनेके कारण तुमलोगोंको परम गति प्राप्त होगी।’
इतना कहकर भगवान् बालक बन गये। वसुदेवजी उनके आज्ञानुसार उन्हें गोकुल ले जानेका उद्योग करने लगे, पैरोंकी बेड़ियाँ खुल गयीं, जेलका दरवाजा खुल गया, पहरेदार अचेत हो गये। यमुनाने रास्ता दे दिया। वसुदेवजीने गोकुल पहुँचकर श्रीकृष्णको यशोदाके पास सुला दिया और यशोदाकी कन्याको ले आये। बंदीगृहमें वापस लौटते ही द्वार बंद हो गये, पैरोंमें बेड़ियाँ पड़ गयीं और पहरेदार सजग हो गये।
कुबेरपुत्रोंका उद्धार
नलकूबर और मणिग्रीव नामक कुबेरके दो पुत्र शराब पीकर स्त्रियोंके साथ नंगे गंगामें विहार कर रहे थे। नारदजी वहाँ जा पहुँचे। उनके सामने भी वे धनके मदमें अंधे होनेके कारण नंगे ही खड़े रहे, उनकी यह दशा देखकर देवर्षिने उनपर अनुग्रह करके उन्हें शाप दिया—नारदजीने कहा—‘अहो! धनके घमंडमें स्त्री-संग, जुआ और शराबखोरी बढ़ जाती है, ऐश्वर्यका मद विषयासक्त मनुष्यकी बुद्धिको बिलकुल भ्रष्ट कर देता है। लक्ष्मीके मदमें अंधे हुए दुष्टके लिये दरिद्रता ही असली अंजन है। ये कुबेरके पुत्र भी मदान्ध होकर जडकी तरह खड़े हैं। इससे इनको स्थावर जड-योनि ही मिलनी चाहिये। ऐसा होनेसे इनके घमण्डका नशा उतर जायगा। ये एक सौ दिव्य वर्षोंतक वृक्ष होकर रहेंगे, परंतु उस जड-योनिमें भी इन्हें स्मरण-शक्ति रहेगी, अन्तमें इन्हें भगवान् श्रीहरि दर्शन देकर कृतार्थ करेंगे, तब इनकी वह योनि दूर हो जायगी।’ नारदजीके शापसे नलकूबर-मणिग्रीव दोनों भाई जुड़े हुए अर्जुनके वृक्ष हुए।*
अपने भक्त देवर्षि नारदकी वाणी सत्य करनेके लिये भगवान् श्रीकृष्णने लीला रची। आप इस समय छोटेसे बालक थे। एक दिन यशोदा मैयाकी आँख चुराकर आप ऊखलपर चढ़ गये और छीकेसे माखन उतारकर खुद खाने लगे और वानरोंको लुटाने लगे। इतनेमें माता आ गयीं। उनको बड़ा गुस्सा आया। पकड़कर ऊखलसे बाँधने लगीं। भगवान् शिशुकी तरह रोने-चिल्लाने लगे। रस्सी छोटी हो गयी, माता और रस्सी लायी, वह भी छोटी हो गयी। यशोदाने घरसे और अड़ोसी-पड़ोसियोंके यहाँसे सारी रस्सियाँ ला-लाकर जोड़ दीं, परंतु वे श्रीकृष्णको न बाँध सकीं, रस्सी दो अंगुल छोटी ही रह गयी। माँ थक गयीं, शरीर पसीनेसे भींग गया, भगवान् को दया आयी और आप ही बँध गये। इसीसे आपका नाम ‘दामोदर’ पड़ा। माता दूसरे काममें लगी। इधर आप ऊखलसहित रस्सीको खींचते-खींचते दोनों वृक्षोंके बीचमें चले गये और ऊखलको उनमें अड़ाकर जोरसे खींचा। भगवान् की शक्तिसे दोनों वृक्ष जड़से उखड़कर जमीनपर गिर पड़े। भयानक शब्दसे आकाश भर गया। वृक्षोंके गिरते ही उनमेंसे अग्निके समान तेजस्वी दो सिद्ध पुरुष निकले, इन दोनों कुबेरपुत्रोंने जगदीश्वर श्रीकृष्णको दण्डवत् प्रणामकर उनकी स्तुति करते हुए, अन्तमें वरदान माँगा—
वाणी गुणानुकथने श्रवणौ कथायां
हस्तौ च कर्मसु मनस्तव पादयोर्न:।
स्मृत्यां शिरस्तव निवासजगत्प्रणामे
दृष्टि: सतां दर्शनेऽस्तु भवत्तनूनाम्॥
(श्रीमद्भा०१०।१०।३८)
‘भगवन्! हमारी वाणी आपके गुणगानमें लगी रहे, हमारे कान आपकी कथाके परायण रहें, हाथ आपकी सेवामें, चित्त आपके चरणोंके चिन्तनमें, सिर आपके निवासस्थल सम्पूर्ण संसारको प्रणाम करनेमें और दृष्टि आपकी प्रत्यक्षमूर्ति संतोंके दर्शनमें लगी रहे।’ भगवान् की दयासे वे कृतकृत्य होकर उत्तर-दिशाको चले गये।
ब्रह्माजीको लीलाप्रदर्शन
एक दिन भगवान् श्रीकृष्ण ग्वाल-बालोंके साथ परस्पर हँसते-हँसाते हुए तन्मय होकर बालवत् भोजन कर रहे थे। इसी अवसरमें उनके सारे बछड़े हरी घासके लोभसे दूर चले गये। बछड़ोंको दूर निकले देखकर ग्वाल-बालक डरे। तब श्रीकृष्णने उनसे कहा कि ‘तुम डरो नहीं, बछड़ोंको मैं अभी लौटा लाता हूँ।’ इतना कहकर आप भोजनका ग्रास हाथमें लिये ही अपने मित्रोंके बछड़ोंकी खोजमें चल दिये। ब्रह्माजी भगवान् की यह सारी लीला देख रहे थे, उन्हें मायाशिशु हरिकी लीला देखकर मोह हो गया। भगवान् श्रीहरिकी महिमा देखनेकी इच्छासे ब्रह्माजी पहले तो बछड़ोंको हर ले गये और अब श्रीकृष्णके चले जानेपर सारे ग्वाल-बालोंको उठा ले गये तथा सबको अचेतकर अपने लोकमें रख आये।
भगवान् लौटकर आये और ग्वाल-बालों को न पाकर तथा यह सारी करतूत ब्रह्माजीकी समझकर ग्वाल-बालकों और बछड़ोंकी माता गोपियों और गौओंको संतुष्ट रखने तथा ब्रह्माको छकानेके लिये, विश्वरचयिता हरि स्वयं उतने ही बछड़े और बालक बन गये। जिस बछड़े और बालकका जैसा शरीर, जैसे हाथ-पैर, जैसी लकड़ी, जैसी सींगड़े, जैसी बाँसुरी, जैसा छींका, जैसे कपड़े और गहने थे तथा जैसा शील, गुण, नाम, आकृति, प्रकृति, अवस्था और आहार-विहार आदि था, सर्व-स्वरूप श्रीहरिने ठीक वैसे ही प्रकट होकर सारा विश्व ‘विष्णुमय’ है, इस बातको प्रत्यक्ष सिद्ध कर दिया। गोपियों और गौओंका स्नेह बालकों और बछड़ोंपर असीम रूपसे बढ़ गया। पहले व्रजवासियोंका श्रीकृष्णपर परम स्नेह था, परंतु अब वह अपने-अपने पुत्रोंपर अत्यधिक हो गया। छोटे बछड़े पास होनेपर भी गौएँ इन बड़े बछड़ोंको देखकर दौड़ छूटती थीं और उनके स्तनोंसे दूध बहने लगता था, बड़े-बूढ़े गोप अपने पुत्रोंको गले लगाकर बड़ी कठिनाईसे स्नेहकी उमंगको रोक सकते थे। इन सबका कारण यह था कि प्रेमार्णव श्रीकृष्ण ही सब कुछ बने हुए थे। सालभर यों ही बीत गया। श्रीबलदेवजीको व्रजवासी स्त्री, पुरुष और गौओंका अपने पुत्रोंपर स्नेह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने ज्ञाननेत्रोंसे देखा तो उन्हें दिखलायी दिया कि बछड़े और उनकी रक्षा करनेवाले ग्वाल-बालक सभी श्रीकृष्णरूप हैं। बलदेवजीके पूछनेपर श्रीभगवान् ने उन्हें सारा भेद बतलाया। ब्रह्माजीने आकर देखा कि श्रीकृष्ण पूर्वकी भाँति उसी प्रकार अपने साथी ग्वाल-बालोंके साथ खेलते-खाते हुए बछड़े चरा रहे थे। उनको बड़ा अचरज हुआ, उन्होंने अपने लोकमें जाकर देखा कि बालक और बछड़े ज्यों-के-त्यों अचेत पड़े हैं। फिर आकर देखा तो यहाँ भी पूर्ववत् सब दिखलायी दिये। अब इन्हें यह भ्रम हो गया कि इन दोनोंमेंसे वास्तवमें कौन-से बालक और बछड़े असली हैं और कौन-से नकली हैं। ब्रह्माजीकी बुद्धि चकरा गयी। इतनेमें उन्हें दिखायी दिया कि समस्त बछड़े और उनके रक्षक बालक श्रीकृष्णरूप हो रहे हैं। सभी श्यामसुन्दर पीताम्बर पहने, चतुर्भुज, शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किये और किरीट, कुण्डल, हार, वनमाला आदि आभूषण तथा भक्तोंद्वारा अर्पित की हुई तुलसीकी मालाओंसे सुशोभित हैं। ब्रह्मासे लेकर एक तिनकेतक समस्त चराचर जीव मूर्तिमान् होकर भगवान् की सेवा-पूजा कर रहे हैं। आठों सिद्धियाँ, विभूतियाँ, चौबीसों तत्त्व, काल, स्वभाव, संस्कार, काम, कर्म, गुण आदि सभी मूर्तिमान् होकर भगवान् की उपासनामें लगे हैं। यह सब चमत्कार देखकर ब्रह्माजी बेसुध होकर गिर पड़े। जब ब्रह्माजीको बाह्यज्ञान हुआ तब उन्होंने देखा कि अच्युतकी विहारभूमि होनेके कारण श्रीवृन्दावन काम, क्रोध, लोभ आदि संसारके तापोंसे रहित रम्य और मनोहर वस्तुओंसे पूर्ण है। वहाँ सभी निर्वैर और सुखी हैं। अद्वितीय, परम, अनन्त, अगाधबोध ब्रह्म गोपबालकरूप नाट्यवेष धरकर हाथमें भोजनका ग्रास लिये पहलेकी भाँति इधर-उधर खोये हुए बछड़ों और बालकोंको खोज रहे हैं। यह देखते ही ब्रह्माजी कनक-दण्डके समान पृथ्वीपर गिरकर भगवान् के चरणकमलोंमें प्रणामकर आनन्दाश्रुओंकी धारासे उनके चरण धोने लगे। तदनन्तर उठकर भगवान् की स्तुति करते हुए उन्होंने कहा—
तद् भूरिभाग्यमिह जन्म किमप्यटव्यां
यद् गोकुलेऽपि कतमाङ्घ्रिरजोऽभिषेकम्।
यज्जीवितं तु निखिलं भगवान् मुकुन्द-
स्त्वद्यापि यत्पदरज: श्रुतिमृग्यमेव॥
(श्रीमद्भा० १०।१४।३४)
‘इस भूमिपर, वृन्दारण्यमें और उसमें भी गोकुलमें जन्म होना परम सौभाग्यका विषय है, क्योंकि यहाँपर जन्म लेनेसे किसी-न-किसी आपके प्यारे गोकुलवासीकी चरणधूलि सिरपर पड़ ही जायगी। गोकुलवासी धन्य हैं, समस्त श्रुतियाँ निरन्तर जिनकी खोजमें लगी हुई हैं, वही आप इन व्रजवासियोंके जीवन हैं।’
परंतु भगवन्!
विषविषमस्तनापि कृतमातृसुवेशतया
समजनि पूतना तव सुधाम्नि सहावरजा।
धनजनजीवनाद्यखिलदानकृतां किमहो
व्रजपुरवासिनां विवरितेति भवाम्यपधी:॥
(श्रीआनन्दवृन्दावनचम्पू:)
‘पूतना राक्षसी स्तनोंमें विषम विष लगाकर भी माताका-सा सुन्दर वेश धारण कर आयी थी, इसीसे वह अपने छोटे भाई (बकासुर) सहित आपके सुन्दर परम धामको प्राप्त हो गयी। तब फिर इन व्रजवासियोंको आप क्या देंगे, जिन्होंने अपना धन-जन, जीवन, माता, पिता, वन-बगीचे आदि सब आपके अर्पण कर दिये हैं? इसलिये आपका इनके प्रेम-ऋणमें बँधे रहना ही उचित है। इस प्रसंगको देखकर मेरी बुद्धि विलुप्त-सी हो रही है।’
जगत्-स्रष्टा ब्रह्माजी भगवान् की स्तुति, प्रदक्षिणा और उन्हें प्रणामकर तथा भगवान् की आज्ञा लेकर अपने लोकको चले गये।
दावानल-पान
एक बार आधी रातके समय रेंड़के वनमें आग लग गयी। आगने सबको घेर लिया। व्रजवासी भगवान् से पुकार मचाने लगे। अनन्त शक्तिशाली जगदीश्वर भगवान् ने स्वजनोंको विकल देखकर तत्काल ही अग्निको पी लिया। इसी प्रकार एक बार फिर आग लगी, तब पुन: सबने श्रीकृष्ण-बलदेवको पुकारकर कहा—‘हे कृष्ण! हे बलरामजी! आप महान् बलशाली और अपरिमित पराक्रमी हैं, इस दुर्दान्त दावानलसे हमें बचाइये।’ भगवान् ने कहा—‘तुमलोग डरो मत, आँखें मूँद लो।’ भगवान् के आज्ञानुसार जब सबने आँखें बंद कर लीं, तब योगाधीश्वर श्रीकृष्ण तुरंत अग्निको पी गये और इस प्रकार श्रीहरिने अपने जनोंको बचा लिया।
तथेति मीलिताक्षेषु भगवानग्निमुल्बणम्।
पीत्वा मुखेन तान् कृच्छ्राद् योगाधीशो व्यमोचयत्॥
(श्रीमद्भा० १०।१९।१२)
गोवर्द्धन-पूजा
व्रजमें प्रतिवर्ष इन्द्रका यज्ञ हुआ करता था, कालरूपभगवान् ने इन्द्रका दर्प चूर्ण करनेकी इच्छासे नन्दजी आदिको समझाकर इन्द्रका यज्ञ बंद करा दिया और उसके बदलेमें गोवर्द्धन-पर्वत और गौओंकी पूजा करवायी। भगवान् के आज्ञानुसार ब्राह्मणोंको दान दिया गया, गौओंको हरी घास और बढ़िया चारा खिलाया गया, तदनन्तर सब गोपियाँ सज-धजकर छकड़ोंपर सवार हो श्रीकृष्णके गुणगान करती हुई गिरिराजकी प्रदक्षिणा करने लगीं। फिर सब पहाड़पर गये, भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं वहाँ दूसरे चतुर्भुज विशाल रूपमें प्रकट हो गये। भगवान् श्रीकृष्णने अपने ही दूसरे शरीरको व्रजवासियोंसहित प्रणाम किया और स्वयं उनकी पूजा करने लगे। इस प्रकार पूजाकर, करवाकर भगवान् सबको साथ लेकर व्रजमें लौट आये। इन्द्रने इस घटनासे अपना बड़ा अपमान समझा और व्रजको विध्वंस करनेके लिये वे प्रलयकालीन वर्षा करने लगे। बिजली कड़काने, ओले बरसाने, आँधी चलाने और जलराशि बरसानेमें इन्द्र जहाँतक शक्ति रखते थे, आज उसका पूरा प्रयोग करनेको तैयार हो गये। गोप-गोपियाँ घबराकर श्रीकृष्णके शरणापन्न हुईं, भगवान् ने उन्हें धीरज देकर लीलापूर्वक एक ही हाथसे गोवर्द्धन-गिरिको वैसे ही उखाड़कर उठा लिया, जैसे कोई बच्चा खेलते-खेलते धरतीके बरसाती छत्तेको अनायास ही उखाड़ ले—
इत्युक्त्वैकेन हस्तेन कृत्वा गोवर्धनाचलम्।
दधार लीलया कृष्णश्छत्राकमिव बालक:॥
(श्रीमद्भा० १०। २५। १९)
समस्त व्रजवासी अपने घरके सामान और गाय-बैलोंको लेकर उसके नीचे आ गये। श्रीकृष्णने भूख, प्यास, व्यथा और सुखकी इच्छा छोड़कर इस प्रकार लगातार सात दिनोंतक पहाड़को उसी प्रकार अचल-अटलरूपसे हाथपर उठाये रखा। गोप-गोपियाँ भगवान् के इस अलौकिक कर्मको देखकर तथा अपनेको ऐसे महान् परम पुरुषके कृपापात्र समझकर आश्चर्य तथा प्रेमभरी एकटक दृष्टिसे श्रीकृष्णके अम्लान मधुर मुखकी ओर देखती रहीं। भगवान् के इस अद्भुत कार्यको देखकर इन्द्र चकरा गये, उनका सारा अभिमान चूर्ण हो गया। इन्द्रने थककर वर्षा बंद कर दी, सूर्यदेव निकल आये। गोप-गोपी पहाड़के नीचेसे निकलकर श्रीकृष्णको यथायोग्य सत्कार, पूजन, आलिंगन और आशीर्वादसे प्रसन्न करने लगीं। इन्द्र आये और उन्होंने आते ही अपना सूर्यसदृश तेजपूर्ण मुकुट उतारकर भगवान् के चरणोंपर रख दिया और स्तुति करते हुए अन्तमें कहा—
मयेदं भगवन् गोष्ठनाशायासारवायुभि:।
चेष्टितं विहते यज्ञे मानिना तीव्रमन्युना॥
त्वयेशानुगृहीतोऽस्मि ध्वस्तस्तम्भो वृथोद्यम:।
ईश्वरं गुरुमात्मानं त्वामहं शरणं गत:॥
(श्रीमद्भा० १०।२७।१२-१३)
‘भगवन्! मुझको बड़ा अभिमान था, इसीसे यज्ञका न होना देखकर मैंने क्रोधमें पागल हो प्रचण्ड वर्षा और तूफानसे व्रजको विध्वंस करना चाहा था। स्वामिन्! आपने मेरा दर्प चूर्ण करके बड़ा ही अनुग्रह किया, मेरा उद्योग नष्ट होनेसे मुझे मालूम हो गया कि मुझसे भी अधिक शक्तिशाली कोई हैं। अब मैं ईश्वर, गुरु और आत्मस्वरूप आपकी शरणमें आया हूँ, मेरी रक्षा कीजिये।’
भगवान् ने उत्तरमें जो शब्द कहे, वे प्रत्येक मनुष्यको सदा अपने हृदयमें धारण करके रखने चाहिये। आपने कहा—
मया तेऽकारि मघवन् मखभंगोऽनुगृह्णता।
मदनुस्मृतये नित्यं मत्तस्येन्द्र श्रिया भृशम्॥
मामैश्वर्यश्रीमदान्धो दण्डपाणिं न पश्यति।
तं भ्रंशयामि सम्पद्भ्यो यस्य चेच्छाम्यनुग्रहम्॥
(श्रीमद्भा० १०।२७।१५-१६)
‘देवराज! तुम ऐश्वर्यके मदमें मतवाले हो गये थे, इसीसे मैंने तुमपर अनुग्रह करके (तुम्हारी आँखें खोलनेके लिये) तुम्हारा यज्ञ रोक दिया, अब तुम मेरा स्मरण करो। जो मनुष्य ऐश्वर्यके मदसे अंधा हो जाता है, वह मुझ दण्डपाणिको नहीं देख पाता, ऐसे लोगोंमेंसे मैं जिसपर कृपा करना चाहता हूँ, उसकी सम्पत्ति हर लेता हूँ जिससे उसका मद उतर जाता है।’
इसके बाद उदार चित्तवाली सुरभी गौने गोपरूप भगवान् को प्रणाम किया और स्तुति करनेके अनन्तर अपने दुग्धसे उनका अभिषेक किया। तदनन्तर माता अदितिकी आज्ञासे इन्द्रने भी देवोंके साथ ऐरावतद्वारा लाये हुए आकाशगंगाके पवित्र जलसे भगवान् का अभिषेक किया और उनका ‘गोविन्द’ नाम रखा।
इति गोगोकुलपतिं गोविन्दमभिषिच्य स:।
अनुज्ञातो ययौ शक्रो वृतो देवादिभिर्दिवम्॥
(श्रीमद्भा० १०।२७।२८)
‘इस प्रकार गो और गोकुलके स्वामी गोविन्दका अभिषेक करके उनकी अनुमति लेकर इन्द्र अपने देवताओंसमेत स्वर्गलोकको लौट गये।’
वरुणलोकमें पूजा
श्रीनन्दजीने एकादशीका व्रत किया था, द्वादशी बहुत थोड़ी होनेके कारण वे शीघ्र पारण करनेके लिये, सूर्योदयसे बहुत ही पहले आसुरी बेलामें ही स्नानार्थ यमुनाजीमें घुस गये। वरुणका एक जलचारी अनुचर वहाँ घूम रहा था, वह उन्हें पकड़कर वरुणके पास ले गया। सबेरा हो गया, नन्दजी जलसे बाहर नहीं निकले यह देखकर सब घबरा गये। चारों ओर ‘कृष्ण बचाओ’, ‘बलराम दौड़ो’ की पुकार मच गयी। श्रीकृष्णजी सारे भेदको जान सबको धीरज देकर वरुणलोकमें चले गये। वहाँ पहुँचते ही लोकनायक वरुणने बड़े ही समारोहसे उनका स्वागत-पूजन करते हुए कहा—
अद्य मे निभृतो देहोऽद्यैवार्थोऽधिगत: प्रभो।
त्वत्पादभाजो भगवन्नवापु: पारमध्वन:॥
नमस्तुभ्यं भगवते ब्रह्मणे परमात्मने।
न यत्र श्रूयते माया लोकसृष्टिविकल्पना॥
अजानता मामकेन मूढेनाकार्यवेदिना।
आनीतोऽयं तव पिता तद् भवान् क्षन्तुमर्हति॥
(श्रीमद्भा० १०।२८।५—७)
‘प्रभो! आज मेरा जीवन सफल हो गया, आज मुझे महान् सम्पत्ति प्राप्त हो गयी। आपके चरण-सेवक मोक्ष लाभ करते हैं, आज मैं भी मुक्त हो गया। स्वामिन्! आप परम ब्रह्म हैं, आप परमात्मा हैं, भ्रम उत्पन्न करनेके लिये लोक-सृष्टिकी कल्पना करनेवाली माया आपमें नहीं सुन पड़ती। मैं आपको नमस्कार करता हूँ। प्रभो! कर्तव्यज्ञानशून्य मूर्ख सेवक बिना ही समझे आपके पिताजीको यहाँ ले आया है, कृपापूर्वक इस अपराधको क्षमा कीजिये।’ वरुणकी सच्ची स्तुतिसे उसपर प्रसन्न होकर ईश्वरेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण नन्दबाबाको लेकर व्रज लौट आये।
गोपोंको ब्रह्म और परम-धामदर्शन
नन्दबाबाको वरुणदेवके द्वारा अपने पुत्र श्रीकृष्णकी इस प्रकार समारोहके साथ महान् पूजा होते देखकर बड़ा ही आश्चर्य हुआ, उन्होंने व्रज लौटकर गोपोंसे अपने आँखों देखी भगवान् के प्रभावकी सारी बातें कहीं। गोपोंने समझ लिया कि श्रीकृष्णचन्द्र साक्षात् ईश्वर हैं, तब उन लोगोंके मनमें यह कामना हुई कि ‘भगवान् कभी हमलोगोंको भी अपना वह सूक्ष्म रूप दिखलावें तो बड़ा अच्छा हो।’ अन्तर्यामी सर्वज्ञ करुणासागर भगवान् गोपोंके मनकी बात जान गये और उनपर कृपा करके अपने मायातीत वैकुण्ठ लोकमें ले गये और वहाँ लोगोंको अपने ‘सत्यं ज्ञानमनन्तम्’ निर्गुण ब्रह्मस्वरूपका दर्शन कराया। गोपगण उस ब्रह्मह्रदमें निमग्न हो गये। तब भगवान् ने उन्हें उससे बाहर निकाला। तदनन्तर उन्हें वह परमधाम परम ब्रह्मलोक दिखलाया। इसी लोकको भगवत्कृपासे यमुनाजीके अंदर श्रीअक्रूरजीने देखा था। गोपोंने वहाँ प्रत्यक्ष देखा कि श्रीकृष्णचन्द्र विराजमान हैं और चारों वेद उनकी स्तुति कर रहे हैं। नन्दजी आदि यह सब देखकर अत्यन्त आश्चर्य और परमानन्दमें निमग्न हो गये।
रासलीला
शरद्-पूर्णिमाके दिन भगवान् ने असंख्य गोपियोंके साथ पवित्र रासक्रीडा की। उस समय दो-दो गोपियोंके बीचमें आपने अपना एक-एक रूप बना लिया और दोनों ओर अपने दोनों हाथ पकड़ा दिये। इस प्रकार अगणित गोपियोंमें अगणित स्वरूप धारणकर भगवान् ने रासलीला की। साथ ही प्रत्येक गोपीके घरपर भी उसका रूप धारण करके निवास किया, जिससे उसके घरवालोंको यही प्रतीत हुआ कि हमारे घरकी स्त्री घरमें ही है।
सुदर्शनका उद्धार
एक समय श्रीनन्दजी आदि गोपोंने अम्बिकावनमें जाकर विविध सामग्रियोंसे भगवान् शंकर और भगवती अम्बिकाजीकी पूजा की और अनेक प्रकारका दान करके उपवास किया। देर हो जानेसे रातको वहीं सरस्वती नदीके किनारेपर सो रहे। रातके समय एक भयानक अजगरने आकर नन्दजीके पैरको पकड़ लिया। भयभीत नन्दजी ‘हे कृष्ण, हे श्यामसुन्दर, मुझे महासर्प निगले जाता है, इस संकटसे बचाओ।’ पुकारने लगे। गोपोंने अनेक उपाय किये परंतु अजगरने उन्हें नहीं छोड़ा। अन्तमें श्रीकृष्णने आकर अपने पैरसे अजगरको जरा-सा छू दिया। भगवान् का चरणस्पर्श होते ही उसके समस्त पाप नष्ट हो गये और उसी क्षण वह सर्पयोनिसे छूटकर परम सुन्दर विद्याधर बन गया। दिव्यस्वरूप और वस्त्राभूषणधारी उस देवप्रतिम पुरुषने भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंपर गिरकर प्रणाम किया और कहा—‘भगवन्! मैं सुदर्शन नामक विद्याधर हूँ, मैंने अपने सुन्दर रूपके मदमें चूर होनेके कारण एक दिन रास्तेमें अंगिरा ऋषिके वंशज कुछ कुरूप मुनियोंको देखकर हँस दिया था। इसीसे उन्होंने मुझे सर्प होनेका शाप दे दिया था। मैं देखता हूँ कि मुझपर उन मुनियोंने शाप देकर बड़ा ही अनुग्रह किया, जिसके प्रतापसे आज मैं आप त्रैलोक्यगुरुके दुर्लभ चरणकमलोंका स्पर्श प्राप्तकर पापरहित हो गया।’
ब्रह्मदण्डाद् विमुक्तोऽहं सद्यस्तेऽच्युत दर्शनात्।
यन्नाम गृह्णन्नखिलान् श्रोतॄनात्मानमेव च।
सद्य: पुनाति किं भूयस्तस्य स्पृष्ट: पदा हि ते॥
(श्रीमद्भा० १०।३४।१७)
‘प्रभो! आपका दर्शन होते ही मैं जो ब्रह्मशापसे मुक्त हो गया, इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। आपका नाम-कीर्तन करनेवाला ही जब सुननेवालोंसहित तत्काल पवित्र हो जाता है, तब मुझे तो आपके चरणकमलोंका स्पर्श प्राप्त हुआ है। फिर मेरे मुक्त होनेमें क्या संदेह है?’
शंखचूड़का उद्धार
एक समय रातको वनमें श्रीकृष्ण-बलदेव मधुर गान कर रहे थे और गोपियाँ प्रेमविह्वल होकर सुन रही थीं, इतनेमें कुबेरका एक शंखचूड़ नामक अनुचर यक्ष कुछ गोपियोंको उठाकर चल दिया, गोपियाँ चिल्लाने लगीं, परंतु उसने छोड़ा नहीं, तब श्रीकृष्ण-बलदेव उन्हें आश्वासन देते हुए उसके पीछे दौड़े और शीघ्र ही उसके पास जा पहुँचे, वह गोपियोंको छोड़ प्राण लेकर भागा, परंतु श्रीकृष्णने उसका पीछा किया और उसे मारकर उसके सिरकी चूड़ामणि निकाल लाये।
मथुरायात्रामें अक्रूरको भगवद्दर्शन
श्रीकृष्ण-बलदेवको साथ लेकर अक्रूरजी मथुराको चले। श्रीकृष्णप्राणा गोपियाँ विरहचिन्तासे अत्यन्त कातर हो, सारी लोक-लाजको त्यागकर ऊँचे स्वरसे ‘हे गोविन्द, हे दामोदर, हे माधव’ कहकर विलाप करने लगीं। रात गोपियोंके विलापमें बीत गयी। सबेरा होते ही संध्या-वन्दन करके अक्रूरजीने रथ हाँक दिया। थोड़ी देरमें श्रीकृष्ण-बलदेवका रथ यमुनाजीके किनारे पहुँच गया। वहाँ दोनों भाइयोंने स्नान किया और मीठा जल पीकर वृक्षोंकी छायामें खड़े रथपर वे बैठ गये। अक्रूरजी स्नान करके जलमें घुसकर गायत्रीका जप करने लगे। जप करते-करते उन्होंने देखा, उसके अंदर श्रीकृष्ण-बलदेव दोनों भाई विराजमान हैं। अक्रूरने सोचा कि ‘वे दोनों तो रथपर थे, यहाँ कैसे आ गये?’ यों विचारकर अक्रूरजीने जलसे बाहर निकलकर रथकी ओर देखा तो उन्हें दोनों भाई रथमें बैठे दिखायी दिये। अक्रूरजी अचरजमें डूब गये, उन्होंने सोचा कि ‘मैंने उन्हें जो जलमें देखा सो क्या मेरा भ्रम था?’ यों विचारकर उन्होंने फिर जलमें गोता लगाया, इस बार वे देखते हैं कि ‘जलमें सिद्ध, सर्प और असुरोंद्वारा सेवित श्रीअनन्त शेषनागजी विराजमान हैं, उनके हजार मस्तक हैं, सबपर मुकुट है, कमलकी नालके समान श्वेत शरीरपर नीलाम्बर सुशोभित है। उन श्रीशेषजीकी गोदमें पीताम्बरधारी नव-नील-नीरद-वर्ण चतुर्भुज भगवान् विराजमान हैं। देवता, ऋषि, किन्नर और सभी देवियाँ उनकी सेवा कर रही हैं।’ अक्रूरजीको यह अपूर्व दृश्य देखकर बड़ा ही आनन्द हुआ; प्रेमके कारण उनका शरीर पुलकित हो गया। नेत्रोंमें आँसू भर आये। भक्तिभावसे उनका हृदय गद्गद हो गया। श्रीकृष्णका प्रभाव उन्होंने जान लिया और वे हाथ जोड़कर भगवान् की स्तुति करने लगे।
अक्रूरजी स्तुति कर ही रहे थे कि श्रीकृष्ण जलके अंदर अन्तर्धान हो गये—
स्तुवतस्तस्य भगवान् दर्शयित्वा जले वपु:।
भूय: समाहरत् कृष्णो नटो नाट्यमिवात्मन:॥
(श्रीमद्भा० १०।४१।१)
‘भगवान् श्रीकृष्णने स्तुति करते हुए अक्रूरजीको जलके अंदर अपना अद्भुत (चतुर्भुज)-रूप दिखाकर पुन: उसको वैसे ही छिपा लिया, जैसे नट अपनी बाजीगरी दिखाकर फिर उसे गायब कर देता है।’ अक्रूरजी जलमें भगवान् को न देखकर बाहर आये, तब हृषीकेश भगवान् श्रीकृष्णने मुसकराते हुए उनसे पूछा—‘चाचाजी! आप अचरजमें कैसे डूब रहे हैं, क्या आज आपने कोई अद्भुत बात देखी है?’ अक्रूरने कहा—
अद्भुतानीह यावन्ति भूमौ वियति वा जले।
त्वयि विश्वात्मके तानि किं मेऽदृष्टं विपश्यत:॥
यत्राद्भुतानि सर्वाणि भूमौ वियति वा जले।
तं त्वानुपश्यतो ब्रह्मन् किं मे दृष्टमिहाद्भुतम्॥
(श्रीमद्भा० १०।४१।४-५)
‘स्वामिन्! पृथ्वी, आकाश और जलमें जो कुछ अद्भुत है सो सब आप विश्वरूपमें ही प्रतिष्ठित है। मैंने जब आपको तत्त्वसे देख लिया तब कौन-सी अद्भुत वस्तु देखनी शेष रह गयी? ब्रह्मन्! पृथ्वी, आकाश और जलकी सभी वस्तुएँ आपमें हैं। आपके अतिरिक्त संसारमें और क्या अद्भुत है जो मैं देखता?’
इतना कहकर अक्रूरजीने रथ हाँक दिया।
कुब्जाको सीधी करना
भगवान् मथुराजी पहुँचे, वहाँ राजमार्गपर कंसके शरीरपर अंगराग लगानेवाली कुब्जाको चन्दन लेकर जाते देखा। भगवान् ने उसपर कृपाकर उसे सीधा करना चाहा। अनन्तर श्रीहरिने अपने दोनों पैरोंसे कुब्जाके दोनों पैरोंको आगेसे दबाकर, उसकी ठोड़ीपर अपनी दो अँगुलियाँ रखकर एक झटका दिया। झटका लगते ही उसका जन्मका टेढ़ा शरीर सीधा हो गया।
अनेक रूप दिखाना
इसके बाद कंसके शस्त्रागारमें जाकर रक्षकको गिराकर विशाल इन्द्रधनुषको अनायास ही तोड़ डाला और मुष्टिक, चाणूर आदि पहलवानों तथा कुवलयापीड मतवाले हाथीको मारकर अत्याचारी कंसका वध कर दिया। उस कंसकी राजसभामें श्रीकृष्ण सबको भिन्न-भिन्न रूपोंमें दीख पड़े थे। वे मल्लोंको वज्रके समान, मनुष्योंको सर्वश्रेष्ठ पुरुष, स्त्रियोंको साक्षात् कामदेव, गोपोंको स्वजन, दुष्ट राजाओंको दण्डदाता, माता-पिताको बालक, कंसको प्रत्यक्ष काल, अज्ञानियोंको जडरूप, योगियोंको परब्रह्म और यादवोंको परम देवतास्वरूप दिखायी दिये।*
मृत गुरु-पुत्रको लाना
पिता-माता श्रीवसुदेव-देवकीजीको अपने विनम्र बर्तावसे प्रसन्न करते हुए भगवान् ने कहा—‘चतुर्वर्ग-फलकी प्राप्ति करानेवाला मनुष्यशरीर जिन माता-पितासे उत्पन्न हुआ और जिनके द्वारा पाला गया, उन माता-पिताके ऋणसे सौ वर्षतक सेवा करनेपर भी मनुष्य उऋण नहीं हो सकता।’
यस्तयोरात्मज: कल्प आत्मना च धनेन च।
वृत्तिं न दद्यात्तं प्रेत्य स्वमांसं खादयन्ति हि॥
मातरं पितरं वृद्धं भार्यां साध्वीं सुतं शिशुम्।
गुरुं विप्रं प्रपन्नं च कल्पोऽबिभ्रच्छ्वसन् मृत:॥
(श्रीमद्भा० १०।४५।६-७)
‘जो समर्थ पुत्र तन-मन-धनसे माता-पिताकी सेवा नहीं करते, मरनेपर यमराजके दूत उन कुपुत्रोंको उन्हींका मांस खिलाते हैं। जो मनुष्य वृद्ध पिता, माता, साध्वी पत्नी, पुत्र, शिशु, गुरु, ब्राह्मण और शरणागतका भरण-पोषण नहीं करता, वह जीते ही मरेके समान है।’
माया-मानुष-विश्वात्मा श्रीहरिने माता-पिताको अपनी सेवासे सुखी करनेके उपरान्त गर्ग मुनिसे यज्ञोपवीत संस्कार करवाया, तदनन्तर दोनों भाई विद्या पढ़ने उज्जैन गये। वहाँ वे इन्द्रियोंका दमन करके गुरुके परम अनुगामी और श्रद्धायुक्त होकर परम भक्तिके साथ इष्टदेव ईश्वरके सदृश मानकर गुरुकी सेवा करते हुए विद्या पढ़ने लगे। उन्होंने सांगोपांग वेद, उपनिषद्, मन्त्र और देवताके ज्ञानसहित धनुर्वेद, धर्मशास्त्र, नीतिशास्त्र, न्याय, राजनीति आदि सारी विद्याएँ और चौंसठ कलाएँ सिर्फ चौंसठ दिनोंमें पढ़ लीं। भगवान् ने जगदीश्वर और सब विद्याओंके प्रकाशक तथा सर्वज्ञ होनेपर भी मानवलीलाके हेतुसे विद्याध्ययनका यह खेल किया। पढ़ना समाप्त होनेपर उन्होंने गुरुसे दक्षिणा माँगनेके लिये प्रार्थना की। सान्दीपनि गुरुने अपने प्रभासक्षेत्रमें डूबे हुए पुत्रको ला देनेके लिये कहा। भगवान् ‘तथास्तु’ कहकर चले। जाकर समुद्रसे गुरु-पुत्रको माँगा। समुद्रने कहा, ‘देव! मैंने बालकका हरण नहीं किया था, उसे तो शंखरूपधारी पंचजन नामक दैत्य ले गया था। वह खा गया होगा।’ भगवान् ने जलके अंदर प्रवेशकर उक्त दैत्यका वध किया; परंतु उसके पेटमें भी जब बालक नहीं मिला, तब वे यमपुरीको गये। यमराजने स्वागत करते हुए प्रार्थना की कि ‘भगवन्! आज्ञा कीजिये, हम आपकी क्या सेवा करें?’ भगवान् ने गुरु-पुत्र ला देनेकी आज्ञा दी। आज्ञाकारी यमराजने बालकको ला दिया। भगवान् उसे लेकर गुरुके चरणोंमें उपस्थित हुए और उन्हें देकर संतुष्ट किया।
नृगका उद्धार
राजा नृग एक बार दान की हुई गौको पुन: दान देनेके पापसे गिरगिट-योनि भोगते हुए कुएँमें पड़े थे। एक दिन कुछ यदुकुमारोंने उपवनमें खेलते-खेलते कुएँमें झाँककर उन्हें देखा। वे उन्हें बाहर निकालनेका उद्योग करने लगे, परंतु उनके न निकलनेपर उन्होंने आकर सारा वृत्तान्त भगवान् से कहा। कमललोचन विश्वम्भरभगवान् ने आकर उनको निकाला और देखकर उनके हाथ लगाया, इतनेमें ही वह गिरगिट-योनिसे छूटकर सुन्दर पुरुष बनकर भगवान् की स्तुति करने लगे।
ऋषियोंद्वारा स्तुति
वसुदेवजीने कुरुक्षेत्रमें यज्ञ किया। वहाँ कुन्ती, गान्धारी, द्रौपदी, सुभद्रा, अन्यान्य राजस्त्रियाँ तथा गोपियाँ आदि सभी आयी थीं। सभी सम्बन्धी पुरुष एकत्र हुए थे। इसी अवसरपर श्रीकृष्ण-बलरामके दर्शनार्थ वहाँ महर्षि व्यास, नारद, च्यवन, देवल, असित, विश्वामित्र, शतानन्द, भारद्वाज, गौतम, परशुराम, वसिष्ठ, गालव, भृगु, पुलस्त्य, कश्यप, अत्रि, मार्कण्डेय, बृहस्पति, द्वित, त्रित, एकत, ब्रह्मपुत्र सनकादि, अंगिरा, अगस्त्य, याज्ञवल्क्य और वामदेवादि महर्षिगण पधारे। भगवान् ने बड़ी ही नम्रताके साथ ऋषियोंका स्वागत करके पाद्य, अर्घ्य, माला, चन्दन, धूप, दीप आदिसे उनका पूजन किया और कहा कि ‘आज हमलोगोंका आपके दर्शन करनेसे जन्म सफल हो गया। सच्चे देव और तीर्थ तो आप महात्मालोग ही हैं।’ श्रीकृष्णके द्वारा धर्मयुक्त वाक्य सुनकर वे मोहित हो गये। उन्होंने समझ लिया, भगवान् की यह नर-लीला है। तदनन्तर सब महर्षियोंने विनयके साथ भगवान् की स्तुति करते हुए अन्तमें भक्तिका वरदान माँगा। वसुदेवजीने ऋषियोंसे ज्ञानोपदेशके लिये प्रार्थना की, तब नारदजीने कहा—‘वसुदेव! तुम तो कृतार्थ हो चुके, तुम्हारी परम भक्तिको धन्य है, जिसके कारण साक्षात् जगदीश्वर तुम्हारे यहाँ पुत्ररूपसे प्रकट हुए हैं।’
यज्ञ समाप्त होनेपर सब लोग द्वारका लौट आये। सुप्रसिद्ध ज्ञानी मुनियोंके मुखसे श्रीकृष्ण-बलदेवकी महिमा सुनकर वसुदेवको विश्वास हो गया कि ये साक्षात् सर्वशक्तिमान् हरि हैं। अतएव एक दिन एकान्तमें वसुदेवजी श्रीकृष्ण-बलरामकी स्तुति करने लगे। स्तुति समाप्त होनेपर भगवान् ने विनय और मर्यादायुक्त वाणीसे नम्रतापूर्वक हँसते हुए रहस्यमय वचन कहे—‘पिताजी! आपने मेरे बहाने जो ब्रह्मतत्त्वका निरूपण किया है सो सर्वथा युक्तियुक्त ही है। मैं, आप सब, ये द्वारकावासी लोग, यहाँतक कि समस्त चराचर विश्व ही ब्रह्मरूप है। प्रत्येक जिज्ञासु पुरुषको इसी प्रकार व्यापक ब्रह्मका विचार करना चाहिये।’
मृत देवकीपुत्रोंको लाना
माता देवकीने मरे हुए गुरु-पुत्रको लौटा लानेकी बात सुनकर एक दिन रोकर श्रीकृष्ण-बलरामसे कहा—‘कृष्ण-बलराम! मैं जानती हूँ तुम अपरिमित प्रभावशाली और योगेश्वरोंके भी ईश्वर हो। मैंने सुना है तुमने मरे हुए गुरुपुत्रको यमराजके यहाँसे ला दिया; इससे मैं भी चाहती हूँ मेरे जिन छ: पुत्रोंको कंसने मार डाला था, उन्हें एक बार मुझे आँखोंसे दिखा दो।’ माताकी आज्ञा पाकर दोनों भाई चले। सुतल लोकमें जाकर राजा बलिसे मिले। दैत्यराज दर्शन करके कृतार्थ हो गया। उसने स्वागत, प्रणाम, स्तुति, पूजन किया और चरण धोकर चरणोदकको परिवारसहित अपने मस्तकपर छिड़का। तदनन्तर भगवान् ने कहा कि मरीचि मुनिके स्मर, उद्गीथ, परिष्वंग, पतंग, क्षुद्रभुक् और घृणि नामक छ: पुत्र, जो शापवश आसुरी योनिको प्राप्त हो गये थे, फिर योगमायाके द्वारा देवकीके गर्भसे उत्पन्न होकर कंसके द्वारा मार डाले गये थे, उन्हें माता देवकी पुत्रस्नेहके कारण एक बार देखना चाहती है। वे तुम्हारे लोकमें हैं, अतएव उन्हें मेरे साथ भेज दो, वे मेरी कृपासे शापसे मुक्त होकर मोक्षको प्राप्त होंगे। बलिने छहों ऋषिकुमारोंको बुला दिया। श्रीकृष्ण-बलराम उन्हें लेकर माताके पास पहुँचे। पुत्रोंको देखते ही माताके स्तनोंसे दूधकी धारा बह चली। माताने प्रेमपूर्वक उन्हें स्तनपान कराया। श्रीकृष्णभगवान् के पीनेसे बचा हुआ अमृतमय दूध पीने तथा श्रीकृष्णके अंगस्पर्श होनेके कारण बालकोंके शुद्ध अन्त:करणमें ज्ञानकी उत्पत्ति हो गयी और तदनन्तर वे सब देखते-ही-देखते गोविन्द, बलदेव, देवकी और वसुदेवजीको प्रणाम करके आकाशमार्गसे देवलोकको सिधार गये।
तं दृष्ट्वा देवकी देवी मृतागमननिर्गमम्।
मेने सुविस्मिता मायां कृष्णस्य रचितां नृप॥
(श्रीमद्भा० १०।८५।५७)
‘देवी देवकीको मरे पुत्रोंका आना-जाना देखकर बड़ा ही आश्चर्य हुआ और उन्होंने जान लिया कि यह सब श्रीकृष्णकी माया है।’
मिथिलामें विविध रूप
एक बार भगवान् श्रीकृष्ण नारद, व्यास, वामदेव, अत्रि आदि बहुत-से मुनियोंके साथ मिथिला-नगरी पहुँचे। वहाँके राजा बहुलाश्व भगवान् के बड़े भक्त थे। मिथिला-नगरीमें ही श्रुतदेव नामक एक शान्त, दक्ष, ज्ञानी, संतोषी ब्राह्मण रहते थे। वे भी भगवान् के अनन्य भक्त थे। जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्णको मिथिलामें आया देखकर मिथिलानरेश बहुलाश्व और दीन ब्राह्मण श्रुतदेव दोनोंने एक ही साथ भगवान् को प्रणामकर उनसे आतिथ्य ग्रहण करनेके लिये प्रार्थना की। भगवान् के दोनों ही समान भक्त थे, इसलिये भगवान् ने दोनोंका आतिथ्य स्वीकार किया। दोनोंकी प्रसन्नताके लिये आप मुनियोंसहित दो-दो रूप धरकर दोनोंके यहाँ गये। परंतु राजा बहुलाश्वने समझा कि भगवान् हमारे यहाँ पधारे हैं और ब्राह्मण श्रुतदेवको प्रतीत हुआ कि भगवान् हमारे ही यहाँ आये हैं। इस प्रकार एक ही साथ अनेक रूप धारणकर दोनों भक्तोंको सुख दिया।
हरेक महलमें श्रीकृष्ण
श्रीनारदजीने सोचा कि भगवान् के सोलह हजार एक सौ आठ रानियाँ हैं, वे अकेले सबके महलोंमें कब, कैसे जाते होंगे? इसी कौतुकको देखनेके लिये नारदजी द्वारका आये और सीधे श्रीरुक्मिणीजीके महलमें चले गये। नारदजीने वहाँ श्रीभगवान् को बैठे तथा श्रीरुक्मिणीजीको उनकी सेवा करते देखा। नारदजीको देखते ही धार्मिक श्रेष्ठ भगवान् ने सहसा उठकर मुनिका स्वागत किया। मुनिने स्तुति करके दूसरे महलमें जानेका विचार किया। वे दूसरे महलमें गये। वहाँ भगवान् को उद्धवके साथ खेलते देखा। वहाँसे तीसरेमें गये। यों प्रत्येक महलमें नारद घूमे, किंतु भगवान् को सभी जगह पाया। नारदजीने देखा कि कहीं भगवान् पूजन कर रहे हैं, कहीं स्नान करने जा रहे हैं, कहीं बच्चोंको खिला रहे हैं, कहीं शस्त्र चला रहे हैं, कहीं घोड़े या हाथीपर सवार होकर बाहर जानेको तैयार हैं, कहीं सो रहे हैं, कहीं मन्त्रियोंसे गुप्त परामर्श कर रहे हैं, कहीं ब्राह्मणको दान दे रहे हैं, कहीं इतिहास-पुराणादि सुन रहे हैं। सारांश यह कि भगवान् सब महलोंमें मौजूद हैं। योगेश्वर भगवान् की इस लीलाको देखकर नारदजी मुग्ध हो गये।
परमधाम-प्रयाण
भगवान् परमधाम पधारनेकी इच्छासे वनमें एक वृक्षके नीचे शान्तभावसे बैठे थे। इस समयकी आपकी शोभा अनिर्वचनीय थी। व्याधके बाणको निमित्त बनाना शेष था, आप उसीकी प्रतीक्षा कर रहे थे। इतनेहीमें व्याधने दूरसे भगवान् के मृगाकार चरणको मृग समझकर बाण मारा, परंतु समीप आकर भगवान् को देखते ही वह भयके मारे भगवान् के चरणोंपर गिरकर कहने लगा—‘मधुसूदन! मैं महापातकी हूँ, मुझसे अनजानमें यह अपराध हो गया है। प्रभो! क्षमा कीजिये।’ भगवान् ने हँसते हुए कहा—‘भाई! उठ, तू डर मत, इसमें तेरा कोई अपराध नहीं है। मेरी इच्छासे यह कारण बना है। तू दिव्य स्वर्गलोकको जा।’ भगवान् के इतना कहते ही दिव्य विमान आ गया और वह भगवान् को प्रणाम-प्रदक्षिणाकर विमानपर सवार होकर स्वर्गको चला गया। तदनन्तर भगवान् का गरुड़-चिह्नवाला रथ घोड़े तथा ध्वजा आदि सामग्रीसहित आकाशमें उठकर अदृश्य हो गया। भगवान् ने अपने सारथि दारुकको मोक्ष पानेका वरदान देकर वहाँसे द्वारका भेज दिया। तदनन्तर ब्रह्माजी, पार्वतीसहित श्रीशंकर, इन्द्रादि देवता, मुनि, प्रजापति, पितृ, सिद्ध, गन्धर्व, विद्याधर, महानाग, चारण, यक्ष, किन्नर, द्विज, अप्सरा आदि सभी भगवान् की इस लीलाको देखनेके लिये आकाशपर छा गये। अगणित विमानोंसे आकाश भर गया और सब लोग भगवान् का गुणगान करते हुए पुष्पवृष्टि करने लगे।
भगवान् ने दिव्य देवोंकी ओर देखकर आँखें बंद कर लीं और त्रिभुवनमोहन दिव्य-विग्रह शरीरसहित परमधामको पधार गये। श्रीहरिके साथ ही सत्य, धर्म, धृति, कीर्ति और लक्ष्मी भी पृथ्वीको छोड़कर चली गयीं। विमानोंपर बैठे हुए ब्रह्मा, शिव आदि देवताओंने परमधाममें पधारते हुए भगवान् को देखा।
इस प्रकार अवतरणसे लेकर परमधाम-गमनतक भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रने अनन्त अद्भुत लीलाएँ की हैं। यहाँ उनमेंसे बहुत थोड़ी-सी लीलाओंका अति संक्षिप्त वर्णन किया गया है।
बालकपनमें ही पूतना, तृणावर्त, वत्सासुर, बकासुर, अघासुर, धेनुकासुर, प्रलम्बासुर, अरिष्टासुर आदिको मारना; शकट-भंजन, कालियनाग नाथना, मल्लों और कंसका वध करना; भौमासुर, रुक्मी, शिशुपाल, शाल्व आदिको मारना; सुदामाको एक ही रातमें परम ऐश्वर्यवान् बना देना, अल्पकालमें ही विलक्षण द्वारकापुरीको बसाना, द्रौपदीका चीर बढ़ाना, अर्जुनकी प्रतिज्ञापर मरे हुए ब्राह्मण-पुत्रोंका लौटाकर लाना, जयद्रथ-वधके समय सूर्यको अकालमें ही छिपाना, उत्तराके मरे हुए पुत्र परीक्षित् को जीवित कर देना, जले हुए अर्जुनके रथको धारण किये रहना आदि अनेकों अद्भुत लीलाएँ हैं। जिन महानुभावोंको भगवान् की लीलाओंका आनन्द लेना और प्रत्यक्ष देखना हो, वे मन लगाकर श्रद्धाके साथ महाभारत, श्रीमद्भागवत, हरिवंश, ब्रह्मवैवर्त आदि ग्रन्थरत्नोंका अध्ययन करें और भगवान् के भजनसे अन्त:करणको शुद्ध करके उनके परम अनन्य प्रेमको प्राप्त करें।
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—
एवंविधान्यद्भुतानि कृष्णस्य परमात्मन:।
वीर्याण्यनन्तवीर्यस्य सन्त्यनन्तानि भारत॥
(श्रीमद्भा० १०।८५।५८)
‘राजन्! अनन्तवीर्य परमात्मा श्रीकृष्णकी इस प्रकार अनन्त अद्भुत लीलाएँ हैं।’
सूतजी महाराजने कहा है—
य इदमनुशृणोति श्रावयेद् वा मुरारे-
श्चरितममृतकीर्तेर्वर्णितं व्यासपुत्रै:।
जगदघभिदलं तद्भक्तसत्कर्णपूरं
भगवति कृतचित्तो याति तत्क्षेमधाम॥
(श्रीमद्भा० १०।८५।५९)
‘शौनकजी! महात्मा श्रीव्यासपुत्र शुकदेवजीके द्वारा वर्णन किये हुए जगत् के समस्त पापोंको नाश करनेवाले, भगवद्भक्तोंके परम सुखदायी कर्णालंकार-सदृश सुधासम्पन्न भगवान् के इन अद्भुत चरित्रोंको मन लगाकर सुनने-सुनानेवालोंका चित्त दृढ़रूपसे भगवान् में लग जाता है, जिससे वे भगवान् के कल्याणमय परम धामको प्राप्त होते हैं।’