अशरण-शरण

भगवान् अशरणके शरण हैं, जो सब कुछ होते हुए भी अपने मनसे सबकी शरण छोड़ देता है वही भगवान् की शरण पानेका अधिकारी होता है। जबतक वह धन, जन, प्रभुत्व, विद्या, बुद्धि, साधन, पुरुषार्थ, कर्म, योग, ज्ञान, मनुष्य, यक्ष, देवता आदिका आश्रय लिये रहता है, तबतक भगवान् का अनन्याश्रयी नहीं होता। कभी भगवान् की प्रार्थना करता है; कभी अन्य किसी देवताको मनाता है, कभी दान-पुण्यके फलसे परम सुख पाना चाहता है, कभी सिद्धियोंके चमत्कारसे आनन्द लूटना चाहता है और कभी साधनके बलपर भवसागरसे तरना चाहता है। ऐसी अवस्थामें वह भगवान् से भी उतना ही आश्रय पाता है जितना वह उनसे चाहता है। परंतु जब वह सबका आश्रय छोड़कर एकमात्र भगवान् पर निर्भर हो जाता है तब भगवान् भी उस अनन्याश्रयी भक्तकी सारी जिम्मेवारी अपने ऊपर ले लेते हैं। जगत् का भरोसा रखनेवाले लोग न तो इस स्थितिके सुखका अनुमान ही कर सकते हैं और न ऐसा बनना ही चाहते हैं; इसीसे वे बारंबार एक दु:खके बाद दूसरे दु:खसे पीड़ित होते और विविध प्रकारके तापोंसे जलते रहते हैं। वे लोग भगवान् को अशरण-शरण और दीनबन्धु तो कहते हैं परंतु स्वयं जगत् की शरण छोड़कर अशरण होना और अभिमान त्यागकर दीन बनना नहीं चाहते। गीतामें भगवान् ने अपने श्रीमुखसे स्थान-स्थानपर इसी अनन्याश्रयतापर जोर दिया है और अनन्याश्रयी अशरण भक्तको शरण देकर उसका योगक्षेम स्वयं वहन करने और उसे सर्वपापोंसे मुक्तकर प्रेम प्रदान करने और भवसागरसे अति शीघ्र तारनेकी प्रतिज्ञाएँ की हैं। तनमें, मनमें, बुद्धिमें दूसरेके लिये स्थान ही नहीं होना चाहिये। जो स्त्री अपने प्रेमका जरा-सा भी भाग पति-बुद्धिसे किसी दूसरेको देती है, वह व्यभिचारिणी है। अव्यभिचारिणी तो वह है जिसके पति-प्रेमका पूरा अधिकारी एकमात्र पति ही है। इसी प्रकार जो अपने एकमात्र स्वामी भगवान् के अतिरिक्त अन्य किसी आश्रयसे सुख चाहता है और वह भगवान् का भक्त भी बनता है, उसकी भक्ति व्यभिचारिणी है। कबीरजी कहते हैं—

कबिरा काजर-रेख भी अब तो दई न जाय।

नैननि प्रीतम रमि रहा दूजा कहाँ समाय॥

आँखोंमें काजलकी रेखतक लगानेकी गुंजाइश नहीं रही। कारण उनमें सर्वत्र एकमात्र प्रियतम ही रम रहा है, दूसरेके लिये स्थान ही नहीं! जब स्थूल आँखकी यह गति होती है, तब मनके लिये तो कहना ही क्या है। इसीलिये भगवान् के प्रेमी भक्त मोक्ष भी नहीं चाहते। यदि वे मोक्ष चाहें तो उनकी शरणागतिमें व्यभिचार हो जाय; वे पूरे अशरण न रहें और अशरण हुए बिना भगवान् के शरणका अधिकार नहीं मिल सकता। श्रीभगवान् ने इसीलिये स्पष्ट आज्ञा दी है—

सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।

‘सब धर्मोंको यानी सब प्रकारके कर्मोंके आश्रयको त्यागकर केवल एक मेरी शरणमें आ जा’ ऐसे शरणप्राप्त भक्त त्रिभुवनका साम्राज्यविभव मिलनेपर भी आधे पलके लिये भगवान् को भुलाना नहीं चाहते; क्योंकि उन्हें एकमात्र भगवान् के सिवा अन्य किसीके आश्रयसे सुख नहीं मिलता। बात भी वस्तुत: यही है। जो स्वयं विनाशी है, वह अविनाशी पूर्ण सुख कैसे दे सकता है, जगत् की सारी वस्तुएँ विनाशी हैं, सारे साधन साध्यकी प्राप्ति होनेपर नष्ट हो जाते हैं, फिर उनसे कभी नष्ट न होनेवाली स्थिति कैसे मिल सकती है? जो स्वयं अधूरा है वह दूसरेको पूरा कैसे बना सकता है? फिर बुद्धिमान् पुरुषको ऐसे पदार्थोंका आश्रय क्यों ग्रहण करना चाहिये? इसीलिये मीरा पुकार उठी थी—

ऐसे बरको क्या बरूँ जो जनमै और मर जाय।

बर बरिये एक साँवरो मेरो चुड़लो अमर हो जाय॥

सदा सुहागिन तो वही रह सकती है जिसका स्वामी अमर हो। अमर एक भगवान् हैं, इसलिये उन्हींको पतिरूपमें वरणकर जीवरूप स्त्री सदाके लिये सौभाग्य प्राप्त कर सकती है। विषयोंका सुहाग कितने दिनका। आज है कल नहीं। पलक मारते-मारते विषय ध्वंस हो जाते हैं, उनपर आस्था रखनेवाला पुरुष कदापि सुखी नहीं हो सकता। इसलिये उनका आश्रय त्यागकर एकमात्र उन परमात्मदेवका आश्रय ग्रहण करना चाहिये, जो नित्य, अचल, ध्रुव, सनातन, सर्वसुखाकर और परमानन्दरूप हैं। वह आश्रय दूसरे सारे आश्रयोंको छोड़नेसे ही मिल सकता है। जिस किसीने जगत् का आसरा छोड़कर भगवान् की शरण चाही, उसीके मस्तकपर उनका अभय हस्त स्थापित हो गया। फिर वह सदाके लिये निश्चिन्त हो गया, मौज पा गया, मस्त हो गया, अशरण-शरण भगवान् की गोदमें पहुँचकर धन्य हो गया। इसके बाद चाहे सारा विश्व बदल जाय, उसको कुछ भी सुख-दु:ख नहीं होता। वह द्वन्द्वातीत और नित्य आनन्दमय बन गया। स्वामी रामके मतवाले शब्दोंमें उस प्रेममें डूबे हुए निश्चिन्त निर्भय मौजी भक्तकी स्थिति सुनिये—

बादशाह दुनियाँके हैं मुहरे मेरी शतरंजके।

दिल्लगीकी चाल है, सब रंग सुलहो-जंगके॥

रक्शे शादीसे मेरे जब काँप उठती है जमीं।

देखकर मैं खिलखिलाता, कहकहाता हूँ वहीं॥

वह भक्त परमात्माकी शरण पाकर तद्‍रूप हो जाता है। उसमें और उसके स्वामीमें कोई अन्तर नहीं रह जाता। स्वामीका गोत्र ही सेवकका गोत्र और स्वामीकी सत्ता ही सेवककी सत्ता होती है।

गुसाईंजी कहते हैं—

मेरे जाति-पाँति न चहौं काहूकी जाति-पाँति,

मेरे कोऊ कामको न हौं काहूके कामको।

लोक परलोक रघुनाथहीके हाथ सब,

भारी है भरोसो तुलसीके एक नामको॥

अति ही अयाने उपखाने नहिं बूझें लोग,

मालिकको गोत, गोत होत है गुलामको।

साधु कै असाधु, कै भलो कै पोच, सोच कहा,

का काहूके द्वार परौं, जो हौं सो हौं रामको॥