आवश्यक साधन
‘कल्याण’ के पाठक बड़े-बड़े संतोंके अनुभूत वचनोंसे यह जान चुके हैं कि मनुष्यजीवनका परम लक्ष्य ‘श्रीभगवान्’ को या उनके ‘अनन्यप्रेम’ को प्राप्त करना है। वस्तुत: मुक्ति, मोक्ष, ज्ञान, सनातन शान्ति, परम आनन्द आदि सब इसीके पर्याय हैं। जीवन बहुत थोड़ा है और वह भी अनेक बाधा-विघ्नोंसे भरा हुआ है। आजकल तो चारों ओरसे ही विघ्न-बाधाओंकी और दु:ख-कष्टोंकी मानो बाढ़-सी आ रही है। ऐसे आपद्-विपद्से पूर्ण क्षुद्र जीवनमें जो मनुष्य शीघ्र-से-शीघ्र अपने लक्ष्यकी ओर ध्यान देकर सावधानीके साथ चलकर अपने लक्ष्यको प्राप्त कर लेता है, वही बुद्धिमान् है, उसीका जन्म सार्थक है और उसीका मनुष्यजीवन सफल है। याद रखना चाहिये, यह मनुष्यजीवन यदि यों ही व्यर्थकी बातोंमें बीत गया तो पीछे पछतानेके सिवा और कोई उपाय नहीं रह जायगा। इसलिये प्रत्येक मनुष्यको अपनी स्थितिपर विचार करके इस ओर लग जाना चाहिये। जो लगे हुए हैं, वे आगे बढ़ें; जो अभी नहीं लगे हैं, वे लगें और जल्दी लगें। आजकल मौत बहुत सस्ती हो रही है। कुछ लोग तो कहते हैं कि बहुत ही शीघ्र पृथ्वीमें मनुष्योंकी संख्या आधीसे भी अधिक घट जायगी। उस घटनेवाली मनुष्यसंख्यामें हमलोग भी तो होंगे। इसलिये और भी शीघ्र सजग होकर लग जाना चाहिये। विशेष कुछ न हो तो नीचे लिखे नियमोंका पालन स्वयं विश्वासपूर्वक करना चाहिये तथा अपने इष्ट-मित्रोंसे करवाना चाहिये। रोज अपनी रिपोर्ट लिखनी चाहिये और यदि हो सके तो अपने कुछ मित्रोंकी एक मण्डली बनाकर उसमें परस्पर रिपोर्ट सुनानी चाहिये और नियम टूटनेपर दण्डविधान करना चाहिये। दण्ड पैसोंका न होकर नाम-जप आदि किसी साधनका ही होना चाहिये, जिसमें आगेसे नियम न टूटे और उत्साह भी न घटे। मण्डली हो तो दण्डमें जबरदस्ती या पक्षपात न हो, इस बातका पूरा ध्यान रहे।
१—सूर्योदयसे पहले जग जाना।
२—प्रात:काल जगते ही भगवान् का स्मरण करना।
३—दोनों समय भगवान् की प्रार्थना करना या संध्या करके गायत्रीका जप करना।
४—कम-से-कम २१,६०० भगवन्नामोंका जप नित्य कर लेना।
५—कम-से-कम आध घण्टे उपनिषद्, गीता, रामायण या अन्य किसी भी पारमार्थिक ग्रन्थ या संतवाणीका स्वाध्याय करना या सत्संग करना।
६—जानकर किसीका बुरा न करना।
७—जानकर झूठ न बोलना
८—पुरुष हो तो परस्त्रीको और स्त्री हो तो परपुरुषको बुरी नजरसे न देखना। न जानकर स्पर्श करना।
९—किसीकी निन्दा करनेसे बचना।
१०—भोजन, फलाहार और जलपानके समय भगवान् को याद करना। उन्हें मन-ही-मन अर्पण करके खाना-पीना।
११—दूसरेके हककी किसी चीजको न लेना, न उसपर मनको ही चलने देना।
१२—अपनी शक्तिके अनुसार प्रतिदिन कुछ दान करना।
१३—हँसी-मजाक न करना।
१४—माता-पिता आदि बड़ोंको प्रतिदिन प्रणाम करना।
१५—सब जीवोंमें भगवान् हैं, सारा जगत् भगवान् से भरा है, सारा जगत् भगवान् से ही निकला है, भगवान् में ही है, इस बातको याद रखनेकी चेष्टा करना।
१६—क्रोधके त्यागका अभ्यास करना। क्रोध आनेपर प्रत्येक बार सौ बार भगवान् का नाम लेकर उसका प्रायश्चित्त करना।
१७—किसी भी जीवसे घृणा न करना।
१८—सोनेके समय प्रतिदिन भगवान् को स्मरण करना।
१९—प्रतिज्ञापूर्वक नियमोंका पालन करना। और किसी नियमके टूट जानेपर दण्डकी व्यवस्था करना।
२०—नियमोंके पालनका ब्यौरा रोज लिखना।
यदि भगवत्प्राप्तिके लिये इन नियमोंके पालनका साधन होता रहेगा तो आशा है भगवत्कृपासे बहुत शीघ्र अन्त:करणकी शुद्धि होगी और आप भगवान् के प्रेमपथपर अग्रसर एक सच्चे साधक हो सकेंगे। संत-महात्माओंने बहुत तरहके साधनोंका वर्णन किया है और वे सभी साधन अधिकारभेदसे उत्तम हैं, परंतु अन्त:करणकी शुद्धि प्राय: सभी साधनोंमें आवश्यक है, इसलिये उपर्युक्त साधनोंका अभ्यास सभीको करना चाहिये। इनसे अन्त:करणकी शुद्धि होगी और फिर यही परम साधन बनकर भगवत्प्राप्तिमें मुख्य हेतु बन जायँगे।