बालगोपाल सच्चिदानन्दकी स्तुति

एक बार सच्चिदानन्दघन भगवान् श्रीकृष्ण अपने साथी गोपबालकों और बछड़ोंको साथ लेकर वनमें गये। वहाँ पूतना तथा बकासुरका भाई अघासुर एक बहुत बड़े अजगरका रूप बनाकर इस ताकमें बैठा था कि ‘कब श्रीकृष्ण आवें और मैं उनका वध करूँ।’ उस अजगररूप राक्षसका आकार इतना बड़ा था कि वह एक पर्वतकी श्रेणी-सा जान पड़ता था। उसको देखकर ग्वाल-बाल आपसमें कहने लगे ‘देखो न, यह कैसा विचित्र अजगराकार पर्वत है, ऐसा जान पड़ता है कि इस पर्वतरूपी अजगरका ऊपरी होंठ बादलोंसे मिला हुआ है तथा नीचेका नदीपर रखा है। इसकी ये गुफाएँ दो जबड़ेकी तरह, चोटियाँ दाढ़ोंकी तरह और यह चौड़ा-सा मार्ग जिह्वाकी तरह जान पड़ता है।’ यह कहते और हँसते-खेलते सभी ग्वाल-बाल अपने बछड़ोंके समेत उस भयानक अजगरके मुखमें प्रवेश कर गये। भगवान् श्रीकृष्णने जब इस प्रकार अपने मित्रोंको अघासुरके मुँहमें पड़ा हुआ देखा, तो वे झटपट उस दुष्ट राक्षसके वध और अपने भक्तोंकी रक्षाके लिये स्वयं भी उसके मुँहमें पैठ गये।

अघासुर तो यह चाहता ही था, उसने भगवान् के घुसते ही अपना मुँह बंद कर लिया। किंतु भगवान् के सामने उसकी शक्ति ही क्या थी? भगवान् ने अपने शरीरको बढ़ाना आरम्भ कर दिया। इससे अघासुरके गलेमें डाट-सी लग गयी और उसका दम घुटने लगा। अन्तमें उसकी दोनों आँखें बाहर निकल पड़ीं और वह मौतके घाट छटपटाने लगा। तबतक उसके प्राण-पखेरू भी ब्रह्मरन्ध्रको फोड़कर ज्योतिरूपमें बाहर निकल आये। तब भगवान् ने अपना पहले-जैसा बालरूप बना लिया और ग्वाल-बाल तथा बछड़ोंके सहित हँसते-हँसाते बाहर निकल आये। अघासुरके शरीरसे निकली हुई दिव्य-ज्योति भगवान् में समा गयी।

इसके अनन्तर भगवान् विचरते हुए यमुना-तटपर पहुँचे और वहाँ भोजनकी तैयारी करने लगे। ग्वाल-बालोंने अपनी-अपनी भोजनकी पोटलियाँ खोलीं और जितने भोज्य-पदार्थ थे, सब एकमें मिलाकर एक-दूसरेको बाँट दिये गये। भगवान् ने अपने बायें हाथकी हथेलीमें ग्रास रखा, अँगुलियोंमें चटनी आदि रखी और सब बालकोंके मध्यमें खड़े होकर, सबको हँसाते हुए भोजन करने लगे। तबतक सबने बछड़ोंपर दृष्टि डाली। बछड़े वहाँ नहीं थे, वे हरी-हरी घास चरते कहीं दूर निकल गये थे। यह देखकर गोपबालक आतुर हो उठे। भगवान् ने उन सबको धीरज बँधाते हुए कहा—‘तुमलोग भोजन करना न छोड़ो। मैं अभी बछड़ोंको ले आता हूँ।’ ऐसा कहकर उसी प्रकार हाथमें भोजनकी सामग्री लिये हुए भगवान् आगे बढ़ गये।

बात यह थी कि ब्रह्माजीको अघासुरका आश्चर्यजनक मोक्ष देखकर यह उत्कण्ठा पैदा हो गयी कि वे भगवान् की और भी अधिक आनन्ददायिनी महिमा देखें। इसीसे उन्होंने बछड़े छिपा दिये थे। यहींतक नहीं, भगवान् जब ग्वाल-बालोंको छोड़कर आगे बढ़ गये, तब ब्रह्माजीने ग्वाल-बालोंको भी एक पर्वतकी कन्दरामें छिपाकर सुला दिया। किंतु ब्रह्माजीकी यह सारी करतूत भगवान् से कब छिपी रह सकती थी! जगत्-प्रतिपालक भगवान् श्रीकृष्णने अपने मनमें यह विचार किया कि ‘यदि मैं इस समय ग्वाल-बाल और बछड़ोंको घर नहीं ले जाऊँगा तो उनकी माताओंको अत्यन्त दु:ख होगा। परंतु यदि ब्रह्माजीद्वारा चुराये गये ग्वाल-बाल और बछड़ोंको लौटाता हूँ तो ब्रह्माजीको मोह नहीं होगा।’ अत: भगवान् ने एक लीला रची, उन्होंने अपनेको ही उन नाना प्रकारके गोवत्स और गोपालोंके रूपमें परिणत कर दिया।

भगवान् ने जिन गोवत्सों और गोप-बालकोंको बनाया, वे ठीक उन्हीं गोवत्सों और गोप-बालकोंके समान थे, जिनको ब्रह्माजीने छिपा रखा था। ये ठीक उन्हीं-जैसी शकल-सूरतवाले, उन्हीं-जैसे सजे-बजे और वंशी लिये हुए थे। गोकुलमें पहुँचकर सब बालक और बछड़े अपनी-अपनी जगहपर चले गये। उनके माता या पिता किसीको भी यह भ्रम नहीं हुआ कि ‘वे उनके बालक नहीं हैं।’ बल्कि भगवत्-रूप होनेके कारण उन बछड़ों और बालकोंमें उनकी प्रीति और भी बढ़ गयी!

इधर ब्रह्माजीने इस कार्यमें अपनी दृष्टिसे केवल रंचमात्रका समय लगाया था, किंतु उनके इतने ही समयमें व्रजवासियोंका एक वर्ष व्यतीत हो गया। ब्रह्माजी अपने छिपाये हुए बछड़ों और गोप-बालकोंको भगवान् के साथ देखकर बड़े आश्चर्यचकित हुए। वे सोचने लगे कि ‘मैंने तो इन्हें छिपाकर सुला रखा है, ये उतने ही बछड़े, वैसे ही बालक भगवान् के पास कैसे आ गये?’ ब्रह्माजीने इस रहस्यको समझनेकी बहुत चेष्टा की, किंतु वे कुछ भी नहीं समझ सके। उन्हें यह कुछ भी नहीं मालूम पड़ा कि ये बछड़े और ग्वाल-बाल सत्य हैं या मायारचित हैं! इस प्रकार ब्रह्माजी मोहरहित किंतु जगत् को मोहित करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णको मोहमें डालनेके लिये प्रवृत्त हुए थे, परंतु उनको अपनी मायासे स्वयं ही मोहित हो जाना पड़ा!

मोहमग्न ब्रह्माजीने देखा कि उनके सामने जितने बछड़े और गोप-बालक थे, सभी चतुर्भुज-मूर्ति हो गये हैं और हमारे-जैसे अनेकों ब्रह्मा देवताओंके साथ उनका पूजन कर रहे हैं! अब तो ब्रह्माजीके मोहका कुछ ठिकाना ही न रहा। वे मायामें सर्वथा डूब गये। इतनेमें दयामय भगवान् ने उनका क्लेश दूर करनेके लिये अपनी मायाका परदा हटा लिया। ब्रह्माजीकी आँखें खुलीं, उस समय उन्होंने केवल भगवान् को ही देखा। बस, क्या था, वे दौड़े हुए गये और सुलाकर छिपाये हुए बछड़ों और गोप-बालकोंको जल्दीसे लाये। इसके पश्चात् भगवान् के चरणोंमें दण्डकी भाँति गिरकर गद्‍गद वाणीसे स्तुति करने लगे (श्रीमद्भागवत १०।१४)—

नौमीड्य तेऽभ्रवपुषे तडिदम्बराय

गुंजावतंसपरिपिच्छलसन्मुखाय।

वन्यस्रजे कवलवेत्रविषाणवेणु-

लक्ष्मश्रिये मृदुपदे पशुपांगजाय॥ १॥

हे स्तुत्य! मेघके समान श्यामल शरीरधारी! बिजली-जैसे चमकीले वस्त्रोंसे आच्छादित, गुंजाओंके झुमकों और मोरपंखोंके मुकुटसे सुशोभित मुखवाले! गलेमें वैजयन्ती माला, हाथोंमें ग्रास, बेंत, सींग और वंशी धारणकर इनकी शोभासे युक्त हुए कोमल चरणोंवाले! नन्दगोपके लाड़ले! आपको मैं नमस्कार करता हूँ।

अस्यापि देव वपुषो मदनुग्रहस्य

स्वेच्छामयस्य न तु भूतमयस्य कोऽपि।

नेशे महि त्ववसितुं मनसाऽऽन्तरेण

साक्षात्तवैव किमुतात्मसुखानुभूते:॥ २॥

हे देव! भक्तोंकी इच्छाके अनुसार प्रकट हुए और मेरे ऊपर अनुग्रह करनेवाले आपके इस अतिसुलभ अवतारकी, जो पांचभौतिक नहीं, अपितु अचिन्त्य शुद्ध सत्त्वमय है, महिमाको मनसे भी जाननेके लिये मैं (ब्रह्मा) समर्थ नहीं हूँ। अथवा और भी कोई समर्थ नहीं है। जब अवतारकी महिमा नहीं जानी जाती तो आत्मसुखके अनुभवसे ज्ञात होनेवाले गुणातीतस्वरूप साक्षात् आपकी ही महिमाको एकाग्र किये गये मनसे भी जाननेके लिये कौन समर्थ होगा? अर्थात् कोई भी समर्थ नहीं है!

ज्ञाने प्रयासमुदपास्य नमन्त एव

जीवन्ति सन्मुखरितां भवदीयवार्ताम्।

स्थाने स्थिता: श्रुतिगतां तनुवाङ्मनोभि-

र्ये प्रायशोऽजित जितोऽप्यसि तैस्त्रिलोक्याम्॥ ३॥

जो लोग ज्ञानकी प्राप्तिके लिये कुछ भी प्रयास न करके, केवल साधुओंके निवास-स्थानमें रहकर भक्तोंके मुँहसे स्वभावत: नित्य प्रकटित हुई, आप (भगवान्)-की चर्चाको सुनकर, उसका शरीर, वाणी और मनसे आदर करते हुए जीवन व्यतीत करते हैं, हे अजित! उन पुरुषोंने त्रिलोकीमें औरोंसे नहीं जीते जानेवाले आपको भी जीत लिया है (अर्थात् उनको आप प्राप्त हो गये हैं)।

श्रेय:स्रुतिं भक्तिमुदस्य ते विभो

क्लिश्यन्ति ये केवलबोधलब्धये।

तेषामसौ क्लेशल एव शिष्यते

नान्यद् यथा स्थूलतुषावघातिनाम्॥ ४॥

हे प्रभो! जैसे सरोवरसे अनेकों स्रोत बहते हैं, वैसे ही आपकी भक्तिसे कल्याणरूपी स्रोत बहते हैं। आपकी ऐसी भक्तिको त्यागकर जो पुरुष केवल ज्ञानकी प्राप्तिके लिये शास्त्रोंका अभ्यास करते हैं, उनको केवल क्लेश ही मिलता है, जैसे धानकी भूसी (छिलके)-को कूटनेवालेको केवल क्लेश ही शेष रहता है—चावल नहीं मिलते।

तद् भूरिभाग्यमिह जन्म किमप्यटव्यां

यद् गोकुलेऽपि कतमाङ्घ्रिरजोऽभिषेकम्।

यज्जीवितं तु निखिलं भगवान् मुकुन्द-

स्त्वद्यापि यत्पदरज: श्रुतिमृग्यमेव॥ ३४॥

(हे नाथ!) मुझको वैसा परम सौभाग्य प्राप्त हो, जिससे मनुष्यलोकमें, विशेषत: गोकुलमें और उससे भी विशेषत: व्रजके वनमें (पशु, पक्षी, वृक्ष, कीट आदि योनियोंमेंसे) किसी भी योनिमें मेरा जन्म हो। वहाँपर इन गोकुलवासियोंमेंसे किसीकी तो चरणरजका अभिषेक मेरे ऊपर होगा! क्योंकि उनका जीवन मुकुन्दपरायण है। अर्थात् उनके गृह, वृत्त, पुत्रादि सर्वस्व भगवान् मुकुन्द ही हैं, जिनकी चरणरजको भगवती श्रुति भी अनादिकालसे अबतक खोजती है (परंतु देख नहीं पाती)।

एषां घोषनिवासिनामुत भवान्

किं देव रातेतिन-

श्चेतो विश्वफलात् फलं त्वदपरं

कुत्राप्ययन् मुह्यति।

सद्वेषादिव पूतनापि सकुला

त्वामेव देवापिता

यद्धामार्थसुहृत्प्रियात्मतनय-

प्राणाशयास्त्वत्कृते॥ ३५॥

हे देव! आप भी इन व्रजवासियोंको सर्वफलरूप अपने स्वरूपसे बढ़कर कहाँ क्या फल देंगे—इस विषयमें विचार करता हुआ, (इनके पुण्यानुरूप स्थानको सर्वत्र खोजता हुआ) हमारा (ब्रह्मा, रुद्र, सनक आदिका) चित्त मोहको प्राप्त होता है, क्योंकि आपके स्वरूपसे बढ़कर कोई स्थान ही नहीं है। (यदि कहिये कि अपनेको ही देकर मैं उऋण हो जाऊँगा, तो वह भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि) हे देव! केवल भक्तोंके वेशका अनुकरण करनेसे पापिनी पूतना अपने बन्धु-बान्धवोंके साथ आपको ही प्राप्त हुई। तो क्या, जिनके शरीर, धन, मित्र, पुत्र, प्रिय, प्राण, इन्द्रियाँ, अन्त:करण आदि सब कुछ आपके ही निमित्त हैं, उन्हें भी वही फल देंगे, जो राक्षसोंको दिया था? नहीं, वह तो बहुत थोड़ा है, अत: ऋणी रहना ही ठीक है!

तावद् रागादय: स्तेनास्तावत् कारागृहं गृहम्।

तावन्मोहोऽङ्घ्रिनिगडो यावत् कृष्ण न ते जना:॥ ३६॥

श्रीकृष्ण! जबतक मनुष्य आपकी शरणमें नहीं आता, तभीतक राग-द्वेषादि चोरकी भाँति व्यवहार करते हैं, तभीतक यह घर कारागृह-सा है और तभीतक पैर मोहरूपी बेड़ीसे बँधे हैं।

प्रपंचं निष्प्रपंचोऽपि विडम्बयसि भूतले।

प्रपन्नजनतानन्दसंदोहं प्रथितुं प्रभो॥ ३७॥

प्रभो! आप प्रपंचसे अलग होते हुए भी शरणमें आये हुए जनसमूहके आनन्दका विस्तार करनेके लिये इस भूतलमें पुत्रादिरूप प्रपंचका अनुकरण करते हैं। (नकली पुत्रका रूप स्वीकार करके गोपोंकी सच्ची सेवासे आप अनृण नहीं हो सकते।)