भगवान् को आर्तभावसे पुकारते ही रक्षा हो गयी
अपबल तपबल और बाहुबल चौथो बल है दाम।
सूर किसोर कृपातें सब बल हारेको हरिनाम॥
कुछ वर्षों पूर्व कलकत्ते और पूर्व-बंगालमें जो अमानुषिक अत्याचार हुए थे उनमें कई ऐसी घटनाएँ हुईं, जिनमें भगवान् की कृपासे विलक्षणरूपसे लोगोंकी गुंडोंके हाथोंसे रक्षा हुई थी। उन घटनाओंसे यह प्रत्यक्ष प्रकट होता है कि आर्तभावसे भगवान् को पुकारनेपर तत्काल उत्तर मिलता है और किसी-न-किसी प्रकारसे विपत्तिसे छुटकारा मिल जाता है। यहाँ ऐसी कुछ घटनाओंका उल्लेख किया जाता है। पाठकोंको इन घटनाओंसे यह शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये कि जिस समय मनुष्य सब ओरसे असहाय होकर विश्वासके साथ भगवान् को पुकारता है उस समय भगवान् उसकी बड़ी विचित्र रीतिसे रक्षा करते हैं। खेदकी बात है कि आज हमारा भगवान् पर उतना विश्वास नहीं रहा। इसीसे हम भगवत्कृपासे वंचित रहते और पद-पदपर विपत्तिके जालमें फँसते हैं। आज भी यदि हम विश्वासपूर्वक सामूहिकरूपसे भगवान् को पुकारें तो हमारे सारे संकट टल सकते हैं।
(१)
कलकत्तेकी घटना है। एक हिंदू-गृहस्थके बड़े परिवारको आक्रमणकारी गुंडोंने घेर लिया था। बाहरी फाटक तोड़कर गुंडे अंदर घुसना ही चाहते थे। तब घरके लोग घबराकर हतबुद्धि-से हो गये और एक-दूसरेका मुँह ताकने लगे कि अब क्या होगा? किसीने कहा कि ‘इस विपद्से तो भगवान् ही बचा सकते हैं। द्रौपदीने भगवान् को ही पुकारा था। अत: उसी अशरण-शरण प्रभुको ही पुकारना चाहिये, वे ही हम अनाथोंके नाथ हमें बचा सकते हैं और कोई उपाय नहीं है।’ बात भी सच्ची है। जब मनुष्य सब ओरसे निराश हो जाता है तब एकमात्र भगवान् की शरण खोजता है और वे अकारण दयालु प्रभु उसे सँभाल लेते हैं। किंतु इस भगवद्विश्वासके विरोधी विषैले वातावरणके कारण भोले-भाले मानवोंकी बुद्धि भ्रमित-सी हो रही है, अत: इसीके प्रभावमें आये हुए एक भाईने निराशाके स्वरमें उत्तर दिया, ‘क्या होगा भगवान् को पुकारनेसे?’ इसपर दूसरेने आश्वासन देते हुए कहा, ‘भाई! पुकारो तो सही, इसमें अपना लगता ही क्या है?’ इसपर सब कोई मिलकर व्याकुल होकर भगवान् को पुकारने लगे। पुकारते-पुकारते उन्हींमेंसे एक सज्जन ऊपर छतपर चले गये, सड़कपर उनकी दृष्टि पड़ी। देखा कि फौजी सिपाहियोंकी एक लारी मकानके नीचेसे जा रही है। यह देखकर वे और भी जोरसे भगवान् को पुकारकर कहने लगे, भगवान् बचाओ, रक्षा करो। यह करुणक्रन्दन भगवान् ने सुना, लारी वहीं रुक गयी। गुंडे भागे। उस हिंदू-परिवारके सब लोगोंको लारीवालोंने लारीमें बैठा लिया और उन्हें सुरक्षित स्थानमें पहुँचा दिया।
(२)
कलकत्तेकी ही एक दूसरी घटना है। किसी फ्लावर मिलमें कुछ आदमी काम कर रहे थे, बदमाशोंके एक दलको आते देखकर उन्होंने जल्दीसे फाटक बंद कर लिये। इतनेमें ही आक्रमणकारी गुंडे वहाँ पहुँच गये और बाहरसे किंवाड़ तोड़ने लगे। इससे अंदरवाले लोग घबराकर आर्तभावसे भगवान् को पुकारने लगे। पुकारका ही यह फल था कि उन गुंडोंमेंसे एकने अपने साथियोंसे कहा कि ‘अरे, यहाँ क्या मिलेगा। चलो आगे बढ़ो।’ आक्रमणकारी अनायास ही वहाँसे चल दिये। सबकी जान बची।
(३)
नोआखालीसे लौटते हुए एक परिवारके एक वीर युवकने हवड़ा स्टेशनपर अपना हाल बतलाया था कि मैं किसी आवश्यक कामसे बाहर गया हुआ था, घरपर मेरे माता-पिता और पत्नी—इतने लोग थे। बाहरसे लौटनेपर पड़ोसियोंसे ज्ञात हुआ कि आक्रमणकारी गुंडे मेरे पिताकी हत्या करके मेरी माता और पत्नीको अपहरण करके ले गये। यह सुनते ही मैं ‘मैं’ नहीं रहा। भगवान् से मैंने प्रार्थना की, कहींसे मुझे एक छुरा दिला दो। मुझे तुरंत एक छुरा मिला। उसे उठाकर भगवान् के भरोसे मैं पता लगाता हुआ उन बदमाशोंके अड्डेपर जा पहुँचा। देखा, मेरी माता और पत्नी वहाँ मौजूद हैं और दोनों बदमाश वहाँ अकड़े बैठे हैं। मैंने तुरंत भगवान् का नाम लेकर एकके पेटमें छुरा भोंक दिया। वह घावको हाथसे दबाकर उठा, उसका दूसरा साथी भी मुझपर टूट पड़ा। मैंने अपनी माता और स्त्रीको ललकारा कि ‘बैठी क्या देखती हो। मारो इन दुष्टोंको।’ भगवान् की कृपासे हम तीनोंने मिलकर उन दोनोंका काम तमाम किया और वहाँसे निकलकर चले आ रहे हैं। उस युवकके शरीरमें भी कई घाव थे। तीनों ही भगवान् का स्मरणकर प्रफुल्लित हो उठते थे।
(४)
नोआखालीके एक मारवाड़ी व्यापारीपर कुछ बदमाशोंने आक्रमण किया। वह भयभीत हुआ भागकर निकटकी पुलिस-चौकीपर चला गया। उसने पुलिस दारोगासे रक्षाके लिये प्रार्थना की। दारोगाने कहा कि ‘भैया! हम तुम्हें नहीं बचा सकते, न हमारे पास काफी पुलिस है, न हथियार ही। तुम अपना बचाव आप ही कर लो।’ लाचार वह वहींके एक पाखानेमें छिप गया और वहीं एकाग्र मनसे अशरण-शरण, अनाथोंके नाथ, जगत् के एकमात्र रक्षक, परम दयालु भगवान् को आर्तभावसे पुकारने लगा। वह व्यक्ति तत्कालीन बीकानेर जिलेके साँडवा ग्रामका अधिवासी था। उसने बताया कि ‘गुंडोंने आकर पुलिस दारोगासे मेरा नाम लेकर पूछा कि वह कहाँ है? दारोगाने कह दिया, ‘हम नहीं जानते, यहाँ तो कोई वैसा आदमी आया ही नहीं।’ गुंडोंने कोना-कोना छान डाला! मैं जिस पाखानेमें छिपा था, वहाँ भी ये लोग कई बार आकर निकल गये। मैं उन्हें देखता रहा। वे मुझे, पता नहीं कैसे, देख नहीं सके। भगवन्नामका ही यह प्रभाव था जिसे सोचकर मैं गद्गद होता रहता हूँ।’ स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराजसे उसके सगे भाई मिले थे।
(५)
युक्तप्रान्त—लखनऊके पास किसी स्टेशनकी घटना है। किसी भले घरकी चार-पाँच महिलाओंको कुछ गुंडे भगाये लिये जा रहे थे। बेचारी महिलाएँ आर्तभावसे मन-ही-मन अशरण-शरण भगवान् को पुकार रही थीं—प्रभु! तुमने द्रौपदीकी लाज रखी, गजराजका उद्धार किया, आज हमारी भी इन राक्षसोंके हाथोंसे तुम्हीं रक्षा कर सकते हो। हमारे पास और बल ही क्या है नाथ! एकमात्र समर्थ चरणकमलोंका सहारा है। प्रभु! दया करो, नाथ!’ इसी प्रकार रो-रोकर भगवान् से प्रार्थना कर रही थीं कि इतनेहीमें उसी डिब्बेमें एक टिकट-चेकर आया। उसे देखकर उन अबलाओंमेंसे एकने उसके पैरको अपने पैरसे दबाकर संकेत किया। उस टिकट-चेकरने समझा, सम्भव है मेरा पैर उसके पैरसे भूलसे दब गया होगा और उसने उस ओर ध्यान नहीं दिया। पर दूसरी और फिर तीसरी बार भी जब वही संकेत हुआ, तब उसका ध्यान गया और तुरंत बाहर जाकर पुलिसको साथ लिये लौटा। उसने उन महिलाओंके साथ जो गुंडे थे उनसे पूछा, ‘ये महिलाएँ कौन हैं? किसके साथ हैं?’ गुंडोंने जवाब दिया—‘हमारे घरकी स्त्रियाँ हैं।’ यह सुनकर उन स्त्रियोंने अपना सिर हिलाकर इनकार किया। इसपर टिकट-चेकरने एक महिलाका बुरका हटाया तो क्या देखा कि उसके हाथ पीछेकी ओर बँधे हैं और मुँहमें कपड़ा ठूँसकर ऊपरसे पट्टी बँधी है। चारों महिलाओंका यही हाल था। गुंडे गिरफ्तार किये गये, स्त्रियोंके बन्धन खुले और वे उनके अपने स्थान पहुँचायी गयीं। उन महिलाओंने यह बतलाया कि हमारे आदमियोंको पता नहीं है कि इन्होंने क्या किया। हमारे सब आभूषण भी इन टीफिन-केरियरोंमें भरकर रखे हैं।
(६)
एक घटना ऐसी सुननेमें आयी थी कि एक गुंडा किसी भले घरकी लड़कीको भगाकर लिये जा रहा था। रेलके जिस डिब्बेमें वह लड़की बुरकेमें छिपी हुई मन-ही-मन अशरण-शरण भगवान् को रो-रोकर पुकार रही थी, उसीमें उसीके पास भले घरकी एक स्त्री अपने पतिके साथ आकर बैठ गयी। तब इस लड़कीने बहुत सावधानीसे अपनी विपद्-गाथा लिखकर उस महिलाको दी। उसने वह परचा अपने पतिको दिया। उसने अगले स्टेशनपर जब गाड़ी रुकी, पुलिसको इत्तला दी और पुलिसको उस गुंडेके पीछे लगा दिया। अगले किसी बड़े स्टेशनपर गुंडेको गिरफ्तार करके उस लड़कीको उसके घर पहुँचा दिया गया।
(७)
पूर्व-बंगालके एक गाँवमें चारों ओर लूट-पाट मची हुई थी। एक गुंडा किसी घरमें घुसा। उस समय घरमें कोई पुरुष नहीं था। एक अट्ठाईस वर्षकी लड़की घरमें थी। गुंडेने पहले तो जो कुछ गहना-कपड़ा हाथ लगा सो लूटा। फिर वह उस लड़कीकी ओर झपटा। वह पहलेसे ही डरी हुई थी और भगवान् को पुकार रही थी। जब दुष्ट उसकी ओर बढ़ा, तब उसके मनमें न जाने कहाँसे साहस आ गया। वह जोरसे आगे बढ़ी और बड़े जोरसे उस झपटते हुए बदमाशकी छातीपर एक लात जमा दी। सहसा लात लगते ही वह पीछेकी ओर गिर पड़ा और उसी क्षण हृदयकी गति बंद होनेसे मर गया। इतनेमें लड़कीके भाई और पिता आ गये। लड़कीका सतीत्व तथा घरका सामान बच गया!
(८)
कालीपद नामक एक बंगीय सज्जनने बताया था कि एक दिन दो गुंडोंने उसे घेर लिया और वे मारनेको तैयार हो गये। वह उनसे डरकर जोर-जोरसे अशरण-शरण भगवान् को पुकारता हुआ भागा। संध्या हो चली थी। वह डरकर एक जले हुए घरमें घुस गया। दोनों गुंडे पीछे-पीछे गये। वह तो घरके पीछेसे निकल गया और उन दोनोंपर जली हुई छतसे एक लकड़ी टूट पड़ी, जिससे दोनों घायल होकर वहीं गिर पड़े!
पता नहीं, ऐसी कितनी घटनाएँ हुआ करती हैं।