भगवान् को पानेका उपाय

सत्संग

आसक्ति या संग अवश्य ही आत्माको फँसानेवाली अक्षय फाँसी है, परंतु वही आसक्ति या संग यदि संतोंमें किया जाय तो वह खुला हुआ मोक्षका दरवाजा है। जो पुरुष सहनशील, दयालु, सब जीवोंके सुहृद्, शान्त और शत्रुरहित हैं (जिनके मनमें किसीसे शत्रुता नहीं है), वे ही संत हैं। शास्त्रोंमें वर्णित सुशीलता ही इन संतोंका आभूषण है। ये साधुजन अनन्य भावसे भगवान् की दृढ़ भक्ति करते हैं और भगवान् के लिये समस्त स्वजन-बान्धवोंका मोह त्याग देते हैं। यहाँतक कि सम्पूर्ण कर्म और देहके अभिमानको त्यागकर वे भगवान् में लीन हो जाते हैं। वे भगवान् के चरित्रोंकी पवित्र कथाएँ सुनते और कहते हैं। उनका चित्त सब समय श्रीभगवान् में लगा रहता है। इसीलिये आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक तीनों प्रकारके ताप उन्हें संतप्त नहीं कर सकते। वे संत आसक्तिरहित होते हैं, इसीलिये आसक्तिका परिणाम जो बन्धन है, उसको वे हरनेवाले होते हैं। ऐसे पवित्र संतोंका ही नित्य संग करना चाहिये। ऐसे महात्माओंके संगसे उनके द्वारा हृदय और कानोंको सुख देनेवाली भगवान् की पवित्र लीलाओंके अमृतसे भरी कथाएँ सुननेको मिलती हैं। जिनके सुननेसे भगवान् में श्रद्धा, रति और भक्ति होती है। साधक लीलाओंका चिन्तन करता है और भक्तिके प्रभावसे उसके चित्तमें इस लोक और परलोकके सब सुखोपभोगोंसे वैराग्य हो जाता है। फिर वह सब प्रकारसे चित्तको भगवान् के अर्पण करनेका यत्न करता है। इस प्रकार मायाके गुणोंका सेवन न करनेसे वैराग्ययुक्त ज्ञानके प्रभावसे और भगवान् की अनन्य दृढ़ भक्तिके प्रतापसे वह इसी शरीरमें भगवान् को प्राप्त कर लेता है। (श्रीमद्भागवत)