भगवान् शिव

शिव एक हैं

लोकत्रयस्थितिलयोदयकेलिकार:

कार्येण यो हरिहरद्रुहिणत्वमेति।

देव: स विश्वजनवाङ्मनसातिवृत्त-

शक्ति: शिवं दिशतु शश्वदनश्वरं व:॥

परात्पर सच्चिदानन्द परमेश्वर शिव एक हैं; वे विश्वातीत हैं और विश्वमय भी हैं। वे गुणातीत हैं और गुणमय भी हैं। वे एक ही हैं और अनेक रूप बने हुए हैं। वे जब अपने विस्ताररहित अद्वितीय स्वरूपमें स्थित रहते हैं, तब मानो यह विविध विलासमयी असंख्य रूपोंवाली विश्वरूप जादूके खेलकी जननी प्रकृतिदेवी उनमें विलीन रहती है। यही शक्तिकी शक्तिमान् में अक्रिय, अव्यक्त स्थिति है—शक्ति है, परंतु वह दीखती नहीं है और बाह्य क्रियारहित है। पुन: जब वही शिव अपनी शक्तिको व्यक्त और क्रियान्विता करते हैं, तब वही क्रीड़ामयी शक्ति—प्रकृति शिवको ही विविध रूपोंमें प्रकटकर उनके खेलका साधन उत्पन्न करती है। एक ही देव विविध रूप धारणकर अपने-आप ही अपने-आपसे खेलते हैं। यही विश्वका विकास है। यहाँ शिवशक्ति दोनोंकी लीला चलती है। शक्ति क्रियान्विता होकर शक्तिमान् के साथ तब प्रत्यक्ष-प्रकट विलास करती है। यही परात्पर परमेश्वर शिव, महाशिव, महाविष्णु, महाशक्ति, गोकुल-विहारी श्रीकृष्ण, साकेताधिपति श्रीराम आदि नाम-रूपोंसे प्रसिद्ध हैं। सच्चिदानन्द विज्ञानानन्दघन परमात्मा शिव ही भिन्न-भिन्न सर्ग-महासर्गोंमें भिन्न-भिन्न नाम-रूपोंसे अपनी परात्परताको प्रकट करते हैं। जहाँ जटाजूटधारी श्रीशिवरूप सबके आदि-उत्पन्नकर्ता और सर्वपूज्य महेश्वर उपास्य हैं तथा अन्य नाम-रूपधारी उपासक हैं, वहाँ वे शिव ही परात्पर महाशिव हैं तथा अन्यान्य देव उनसे अभिन्न होनेपर भी उन्हींके स्वरूपसे प्रकट, नाना रूपों और नामोंसे प्रसिद्ध होते हुए सत्त्व-रज-तम गुणोंको लेकर आवश्यकतानुसार कार्य करते हैं। उस महासर्गमें भिन्न-भिन्न ब्रह्माण्डोंमें ब्रह्मा, विष्णु , रुद्र आदि देवता भिन्न-भिन्न होनेपर भी सब उन एक ही परात्पर महाशिवके उपासक हैं। इसी प्रकार किसी सर्ग या महासर्गमें महाविष्णुरूप परात्पर होते हैं और अन्य देवता उनसे प्रकट होते हैं; किसीमें ब्रह्मारूप, किसीमें महाशक्तिरूप, किसीमें श्रीकृष्णरूप और किसीमें श्रीरामरूप परात्पर ब्रह्म होते हैं तथा अन्यान्य स्वरूप उन्हींसे प्रकट होकर उनकी उपासनाकी और उनके अधीन सृष्टि, पालन और विनाशकी विविध लीलाएँ करते हैं। इस तरह एक ही प्रभु भिन्न-भिन्न रूपोंमें प्रकट होकर उपास्य-उपासक, स्वामी-सेवक, राजा-प्रजा, शासक-शासितरूपसे लीला करते हैं। हाँ, एक बात ध्यानमें रखनी चाहिये कि सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले, परात्परसे प्रकट त्रिदेव उनसे अभिन्न और पूर्ण शक्तियुक्त होते हुए भी तीनों भिन्न-भिन्न प्रकारकी क्रिया करते हैं तथा तीनोंकी शक्तियाँ भी अपने-अपने कार्यके अनुसार सीमित ही देखी जाती हैं।

यह नहीं समझना चाहिये कि परात्पर महाशिव परब्रह्मके ये सब भिन्न-भिन्न रूप काल्पनिक हैं। सभी रूप भगवान् के होनेके कारण नित्य, शुद्ध और दिव्य हैं। प्रकृतिके द्वारा रचे जानेवाले विश्वप्रपंचके विनाश होनेपर भी इनका विनाश नहीं होता; क्योंकि ये प्रकृतिकी सत्तासे परे स्वयं प्रभु परमात्माके स्वरूप हैं। जैसे परमात्माका निराकार रूप प्रकृतिसे परे नित्य निर्विकार है, इसी प्रकार उनके ये साकार रूप भी प्रकृतिसे परे नित्य निर्विकार हैं। अन्तर इतना ही है कि निराकार रूप कभी शक्तिको अपने अंदर इस प्रकार विलीन किये रहता है कि उसके अस्तित्वका ही पता नहीं लगता और कभी निराकार रहते हुए ही शक्तिको विकासोन्मुखी करके गुणसम्पन्न बन जाता है; परंतु साकार रूपमें शक्ति सदा ही जाग्रत् , विकसित और सेवामें नियुक्त रहती है। हाँ, कभी-कभी वह भी अन्त:पुरकी महारानीके सदृश बाहर सर्वथा अप्रकट-सी रहकर प्रभुके साथ क्रीड़ारत रहती है और कभी बाह्य लीलामें प्रकट हो जाती है, यही नित्यधामकी लीला और अवतार-लीलाका तारतम्य है।

नित्यधामके शिव-शक्ति, विष्णु-लक्ष्मी, ब्रह्मा-सावित्री, कृष्ण-राधा और राम-सीता ही समय-समयपर अवताररूपसे प्रकट होकर बाह्य लीला करते हैं। ये सब एक ही परम-तत्त्वके अनेक, नित्य और दिव्य स्वरूप हैं। अवतारोंमें, कभी तो परात्पर स्वयं अवतार लेते हैं और कभी सीमित शक्तिसे कार्य करनेवाले त्रिदेवोंमेंसे किसीका अवतार होता है। जहाँ दण्ड और मोहकी लीला होती है, वहाँ दण्डित एवं मोहित होनेवाले अवतारोंको त्रिदेवोंमेंसे तथा दण्डदाता और मोह उत्पन्न करनेवालेको परात्पर प्रभु समझना चाहिये, जैसे नृसिंहरूपको शरभरूपके द्वारा दण्ड दिया जाना और शिवरूपका विष्णुद्वारा मोहिनीरूपसे मोहित होना आदि। कहीं-कहीं परात्परके साक्षात् अवतारमें भी ऐसी लीला देखी जाती है, परंतु उसका गूढ़ रहस्य कुछ और ही होता है जो उनकी कृपासे ही समझमें आ सकता है!

शिवके रूप कल्पना नहीं हैं

आज श्रीशिवस्वरूपकी कुछ चर्चा करके लेखनीको पवित्र करना है। कुछ लोगोंकी अनुभवहीन समझ, सूझ या कल्पना है कि भगवान् शिवका साकार स्वरूप कल्पनामात्र है। उनके एकमुख, पंचमुख, सर्पभूषित, नीलकण्ठ, मदनदहन, वृषभ, कार्तिकेय, गणेश आदि सभी काल्पनिक रूपक हैं। इसलिये इन्हें वास्तविक न मानकर रूपक ही समझना चाहिये। परंतु वास्तवमें ऐसी बात नहीं है। ये सभी सत्य हैं। जिन भक्तोंने भगवान् श्रीशिवकी कृपासे इन रूपों और लीलाओंको देखा है या जो आज भी भगवत्कृपासे प्राप्त साधन-बलसे देख सकते हैं अथवा देखते हैं तथा साक्षात् अनुभव करते हैं, वे ही इस तत्त्वको समझते हैं और उन्हींकी बातका वस्तुत: कुछ मूल्य है। उल्लूको सूर्य नहीं दीखता—इससे जैसे सूर्यके अस्तित्वमें कोई बाधा नहीं आती, इसी प्रकार किसीके मानने-न-माननेसे भगवत्स्वरूपका कुछ भी बनता-बिगड़ता नहीं। हाँ, माननेवाला लाभ उठाता है और न माननेवाला हानि। एक बात ध्यानमें रखनी चाहिये कि भगवान् की प्रत्येक लीला वास्तवमें इसी प्रकारकी होती है, जिससे पूरा-पूरा आध्यात्मिक रूपक भी बँध सके; क्योंकि वे जगत् की शिक्षाके लिये ही अपने नित्य-स्वरूपको धरातलमें प्रकट करके लीला किया करते हैं। वेद, महाभारत, भागवत, विष्णुपुराण, शिवपुराण आदि सभी ग्रन्थोंमें वर्णित भगवान् की लीलाओंके रूपक बन सकते हैं। परंतु रूपक ठीक बैठ जानेसे ही असली स्वरूपको काल्पनिक मान लेना वैसी ही भूल है जैसी पिताके छायाचित्र (फोटो)-को देखकर उसके अस्तित्वको न मानना!

शिवपूजा

कुछ लोग कहते हैं कि शिव-पूजा अनार्योंकी चीज है, पीछेसे आर्योंमें प्रचलित हो गयी। इस कथनका आधार है वह मिथ्या कल्पना या अन्धविश्वास, जिसके बलपर यह कहा जाता है कि ‘आर्य-जाति भारतवर्षमें पहलेसे नहीं बसती थी। पहले यहाँ अनार्य रहते थे। आर्य पीछेसे आये।’ दो-चार विदेशी लोगोंने अटकलपच्चू ऐसा कह दिया; बस, उसीको ब्रह्मवाक्य मानकर लगे सब उन्हींका अनुकरण करने! शिव-पूजाके प्रमाण अब उस समयके भी मिल गये हैं, जिस समय इन लोगोंके मतमें आर्य-जाति यहाँ नहीं आयी थी। इसलिये इन्हें यह कहना पड़ा कि शिव-पूजा अनार्योंकी है! जो भ्रान्तिवश वेदोंके निर्माण-कालको केवल चार हजार वर्ष पूर्वका ही मानते हैं, उनके लिये ऐसा समझना स्वाभाविक है, परंतु वास्तवमें यह बात नहीं है। भारतवर्ष निश्चय ही आर्योंका मूल निवास है और शिव-पूजा अनादि कालसे ही प्रचलित है; क्योंकि सारा विश्व शिवसे ही उत्पन्न है, शिवमें स्थित है और शिवमें ही विलीन होता है। शिव ही इसको उत्पन्न करते हैं, शिव ही इसका पालन करते हैं और शिव ही संहार करते हैं। विभिन्न तीन कार्योंके लिये ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र—ये तीन नाम हैं। जब शिव अनादि हैं, तब शिवकी पूजाको परवर्ती बतलाना सरासर भूल है। परंतु क्या किया जाय? वे लोग चार-पाँच हजार वर्षसे पीछे हटना ही नहीं चाहते। उनके चारों युग इसी कालमें पूरे हो जाते हैं। उनके इतिहासकी यही सीमा है। इससे पहलेके कालको तो वे ‘प्रागैतिहासिक युग’ मानते हैं। मानो उस समय कुछ था ही नहीं और कहीं कुछ था तो उसको समझने, जानने या लिखनेवाला कोई नहीं था। प्राचीनताको—चारों युगोंको चार-पाँच हजार वर्षकी सीमामें बाँधकर वेद, रामायण, महाभारत, पुराण आदि समस्त ग्रन्थोंमें वर्णित घटनाओंको तथा उनके ग्रन्थोंको इसी कालके अंदर सीमित मानकर तरह-तरहकी अद्भुत अटकलोंद्वारा इधर-उधरके कुलाबे मिलाकर मनगढ़ंत बातोंका प्रचार करते हैं और इसीका नाम आज नवीन शोध या रिसर्च है। इस विचित्र रिसर्चके युगमें प्राचीनताकी बातें सुनना बेवकूफी समझा जाता है। भला, बेवकूफी कौन करे? अत: स्वयं बेवकूफीसे बचनेके लिये पूर्वजोंको बेवकूफ बनाना चाहते हैं। कुछ लोग श्रीशिव आदिके स्वरूप और उनकी लीलाएँ तथा उनकी उपासना-पद्धतिका पूरा रहस्य न समझनेके कारण उनमें दोष देखते हैं, फिर इनके रहस्यसे सर्वथा अनभिज्ञ विद्वान् माने जानेवाले अन्यदेशीय आधुनिक शिक्षाप्राप्त प्रसिद्ध पुरुष भगवान् के इन स्वरूपों, लीलाओं तथा पूजा-पद्धतिका जब उपहास करते हैं तथा इन्हें माननेवालोंको मूर्ख बतलाते हैं, तब तो इन लोगोंको आदर्श विद्वान् समझनेवाले एतद्देशीय उपर्युक्त पुरुषोंकी दोषदृष्टि और भी बढ़ जाती है और प्रत्यक्षदर्शी तत्त्वज्ञ ऋषियोंद्वारा रचित इन ग्रन्थोंसे, इनमें वर्णित घटनाओंसे, इनके सिद्धान्तोंसे लज्जाका अनुभव करते हुए, घरमें, देशमें इन्हें कोसते हैं और बाहर अपने धर्म तथा देशको लज्जा तथा उपहाससे बचानेके लिये उन कथाओंसे नये-नये रूपकोंकी कल्पना कर विदेशी विद्वानोंकी दृष्टिमें अपने धर्म और इतिहासको तथा देवतावादको निर्दोष एवं विज्ञान-सम्मत उच्च दार्शनिक भावोंसे सम्पन्न सिद्ध करनेका प्रयत्न कर उसके असली तत्त्वको ढँक देते हैं और इस तरह तत्त्वसे सर्वथा वंचित रह जाते हैं। शास्त्ररहस्यसे अनभिज्ञ, अतत्त्वविद् आधुनिक विद्वानोंकी बुद्धिको ही सर्वांशमें आदर्श मानकर उनसे उत्तम कहे जानेके लिये भारतीय विद्वानोंने भारतीय धर्म-ग्रन्थोंमें वर्णित तत्त्व तथा इतिहासोंको एवं भगवान् की लीलाओंको, अपनी सभ्यताके और ग्रन्थोंके गौरवको बढ़ानेकी अच्छी नीयतसे भी जो सर्वथा उड़ाने तथा उनका बुरी तरह अर्थान्तर करने और उन्हें समझानेकी चेष्टा की है एवं कर रहे हैं, उसे देखकर रहस्यविद् तत्त्वज्ञ लोग हँसते हैं। साथ ही इन लोगोंकी इस प्रकारकी प्रगतिका अशुभ परिणाम सोचकर खिन्न भी होते हैं। रहस्य खुलनेपर ही पता लगता है कि हमारे शास्त्रोंमें वर्णित सभी बातें सत्य हैं और हमें लजानेवाली नहीं, वरं संसारको ऊँची-से-ऊँची शिक्षा देनेवाली हैं। परंतु इस रहस्यका उद्घाटन भगवत्कृपासे प्राप्त योग्य तत्त्वज्ञ सद्‍गुरुकी कृपासे ही हो सकता है। खेद है कि आजकल गुरुमुखसे ग्रन्थोंका रहस्य जाननेकी प्रणाली प्राय: नष्ट होकर अपने-आप ही अध्ययन और मनमाना अर्थ करनेकी प्रथा चल पड़ी है, जिससे रहस्य-मन्दिरके दरवाजेपर ताले-पर-ताले लगते जा रहे हैं। पता नहीं, इसके परिणामस्वरूप हमारा जीवन कितना बहिर्मुख और जड-भावापन्न हो जायगा।

शिव तामसी देवता नहीं हैं

इनके अतिरिक्त कुछ लोग भगवान् शिवको मानते तो हैं, किंतु उन्हें तामसी देव मानकर उनकी उपासना करनेमें दोष समझते हैं। वास्तवमें यह उनका भ्रम है, जो बाह्य दृष्टिवाले साम्प्रदायिक आग्रही मनुष्योंका पैदा किया हुआ है। जिन भगवान् शिवका गुणगान वेदों, उपनिषदों और वैष्णव कहे जानेवाले पुराणोंमें भी गाया गया है, उन्हें तामसी बतलाना अपने तमोगुणी होनेका ही परिचय देना है। परात्पर महाशिव तो सर्वथा गुणातीत हैं, वहाँ तो गुणोंकी क्रिया ही नहीं है। जिस गुणातीत, नित्य, दिव्य, साकार चैतन्य रसविग्रह-स्वरूपमें क्रिया है, उसमें भी गुणोंका खेल नहीं है। भगवान् की दिव्य प्रकृति ही वहाँ क्रिया करती है और जिन त्रिदेव-मूर्तियोंमें सत्त्व, रज और तमकी लीलाएँ होती हैं, उनमें भी उनका स्वरूप गुणोंकी क्रियाके अनुसार नहीं है। भिन्न-भिन्न क्रियाओंके कारण सत्त्व, रज, तमका आरोप है। वस्तुत: ये तीनों दिव्य चेतन-विग्रह भी गुणातीत ही हैं।

शिव मोक्षदाता हैं

कुछ लोग भगवान् शंकरपर श्रद्धा रखते हैं, उन्हें परमेश्वर मानते हैं, परंतु मुक्तिदाता न मानकर लौकिक फलदाता ही समझते हैं और प्राय: लौकिक कामनाओंकी सिद्धिके लिये ही उनकी भक्ति या पूजा करते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि परम उदार आशुतोष, भगवान् सदाशिवमें दयाकी लीलाका विशेष प्रकाश होनेके कारण वे भक्तोंको मनमानी वस्तु देनेके लिये सदा ही तैयार रहते हैं, परंतु इससे इन्हें मुक्तिदाता न समझना बड़ा भारी प्रमाद है। जब भगवान् शिवके स्वरूपका तत्त्वज्ञान ही मुक्तिका नामान्तर है, तब उन्हें मुक्तिदाता न मानना सिवा भ्रमके और क्या हो सकता है? वास्तवमें लौकिक कामनाओंने हमारे ज्ञानको हर लिया है, इसीलिये हम अपने अज्ञानका परमज्ञानस्वरूप शिवपर आरोप करके उनकी शक्तिको लौकिक कामनाओंकी पूर्तितक ही सीमित मान लेते हैं और शिवकी पूजा करके भी अपनी मूर्खतावश परम लाभसे वंचित रह जाते हैं। भगवान् शिव शुद्ध, सनातन, विज्ञानानन्दघन परब्रह्म हैं, उनकी उपासना परम लाभके लिये ही या उनका पुनीत प्रेम प्राप्त करनेके लिये ही करनी चाहिये। सांसारिक हानि-लाभ प्रारब्धवश होते रहते हैं, इनके लिये चिन्ता करनेकी आवश्यकता नहीं। शंकरकी शरण लेनेसे कर्म शुभ और निष्काम हो जायँगे, जिससे आप ही सांसारिक कष्टोंका नाश हो जायगा और पूर्वकृत कर्मोंके शेष रहनेतक कष्ट होते भी रहें तो क्या आपत्ति है। उनके लिये न तो चिन्ता करनी चाहिये और न भगवान् शंकरसे उनके नाशार्थ प्रार्थना ही करनी चाहिये। नाम-रूपसे सम्बन्ध रखनेवाले, आने-जानेवाले सुख-दु:खोंकी भक्त क्यों परवा करने लगा? लौकिक सुखका सर्वथा नाश होकर महान् विपत्ति पड़नेपर भी यदि भगवान् का भजन होता रहे तो भक्त उस विपत्तिको परम सम्पत्ति मानता है, परंतु उस सम्पत्ति और सुखका वह मुँह भी नहीं देखना चाहता जो भगवान् के भजनको भुला देते हैं। भजन बिना जीवन, धन, परिवार, यश, ऐश्वर्य—सभी उसको विषवत् भासते हैं। भक्तको तो सर्वथा देवी पार्वतीकी भाँति अनन्य प्रेमभावसे भगवान् शिवकी उपासना ही करनी चाहिये। एक बात बहुत ध्यानमें रखनेकी है, भगवान् शिवके उपासकमें जगत् के भोगोंके प्रति वैराग्य अवश्य होना चाहिये। यह निश्चित सिद्धान्त है कि विषय-भोगोंमें जिनका चित्त आसक्त है, वे परमपदके अधिकारी नहीं हो सकते और उनका पतन ही होता है। ऐन्द्रिय विषयोंको प्राप्त करके अथवा विषयोंसे भरपूर जीवनमें रहकर उनसे सर्वथा निर्लिप्त रहना जनक-सरीखे इने-गिने पूर्वाभ्यास-सम्पन्न पुरुषोंका ही कार्य है। अनुभव तो यह है कि विषयोंके संग तो क्या, उनके चिन्तनमात्रसे मनमें विकार उत्पन्न हो जाते हैं। भगवान् भोलेनाथ विषय माँगनेवालेको विषय और मोक्ष माँगनेवालेको मोक्ष दे देते हैं और प्रेमका भिखारी उनके प्रेमको प्राप्तकर धन्य होता है। वे कल्पवृक्ष हैं। मुँहमाँगा वरदान देनेवाले हैं। यदि उपासकने उनसे विषय माँगा तो वे विषय दे देंगे, परंतु विषय उसके लिये विषका कार्य करेगा और अन्तमें दु:खदायी होगा। कामनासे घिरे हुए विषयपरायण मूढ़ पुरुष ही असुर हैं। ऐसे असुरोंके अनेकों दृष्टान्त प्राप्त होते हैं, जिन्होंने भगवान् शिवजीकी उपासना करके उनसे विषय माँग लिये और जो यथार्थ लाभसे वंचित रह गये। अतएव भगवान् शिवके उपासकको जगत् के विषयोंकी आसक्ति छोड़कर यथार्थ वैराग्यसम्पन्न होकर परमवस्तुकी चाहना करनी चाहिये, जिससे यथार्थ कल्याण हो। याद रखना चाहिये कि शिव स्वयं कल्याणस्वरूप ही हैं, इससे उनकी उपासनासे उपासकका कल्याण बहुत ही शीघ्र हो जाता है। केवल विश्वास करके लग जाने मात्रकी देर है। भगवान् के दूसरे स्वरूप बहुत छान-बीनके अनन्तर फल देते हैं, परंतु औढरदानी शिव तत्काल फल दे देते हैं।

औढरदानी या आशुतोषका यह अर्थ नहीं करना चाहिये कि विज्ञानानन्दघन शिवस्वरूपमें बुद्धि या विवेककी कमी है। ऐसा मानना तो प्रकारान्तरसे उनका अपमान करना है। बुद्धि या विवेकके उद्‍गम-स्थान ही भगवान् शिव हैं। उन्हींसे बुद्धि प्राप्तकर समस्त देव, ऋषि, मनुष्य अपने-अपने कार्योंमें लगे रहते हैं। अलग-अलग रूपोंमें कुछ अपनी-अपनी विशेषताएँ रहती हैं। शंकररूपमें यही विशेषता है कि वे बहुत शीघ्र प्रसन्न होते हैं और भक्तोंकी मन:कामना-पूर्तिके समय भोले-से बन जाते हैं। परंतु संहारका मौका आता है तब रुद्ररूप बनते भी उन्हें देर नहीं लगती।

शिवरूपका रहस्य गहन है

भगवान् शंकरको भोलानाथ मानकर ही लोग उन्हें गँजेड़ी, भँगेड़ी, नशेबाज और बावला समझकर उनका उपहास करते हैं। विनोदसे भक्त सब कुछ कर सकते हैं और भक्तका आरोप भगवान् स्वीकार भी कर ही लेते हैं। परंतु जो वस्तुत: शिवको पागल, श्मशानवासी औघड़, नशेबाज आदि समझते हैं, वे गहरी भूलमें हैं। शंकरका श्मशाननिवास, उनकी उन्मत्तता, उनका विष-पान, उनका सर्वांगीपन आदि बहुत गहरे रहस्यको लिये हुए हैं, जिसे श्रीशिवकी कृपासे शिव-भक्त ही समझ सकते हैं। जैसे व्यभिचारप्रिय लोग भगवान् श्रीकृष्णकी रासलीलाको व्यभिचारका रूप देकर प्रकारान्तरसे अपने पापमय व्यभिचार-दोषका समर्थन करते हैं, इसी प्रकार सदाचारहीन, अवैदिक क्रियाओंमें रत नशेबाज मनुष्य शिवके अनुकरणका ढोंग रचकर अपने दोषोंका समर्थन करना चाहते हैं। वस्तुत: शिवभक्तको सदाचारपरायण रहकर गाँजा, भाँग, मतवालापन, अपवित्र वस्तुओंके सेवन, अपवित्र आचरण आदिसे सदा बचते रहना चाहिये—यही शंकरका आदेश है।

कल्याणरूप शिव

भगवान् शिवको परात्पर मानकर सेवन करनेवालेके लिये तो वे परमब्रह्म हैं ही। अन्यान्य भगवत्-स्वरूपोंके उपासकोंके लिये, जो शिवस्वरूपको परमब्रह्म नहीं मानते, भगवान् शिव मार्गदर्शक परमगुरु अवश्य हैं। भगवान् विष्णुके भक्तके लिये भी सद्‍गुरुरूपसे शिवकी उपासना आवश्यक है। वैष्णवग्रन्थोंमें इसका यथेष्ट उल्लेख है और साधकोंके अनुभव भी प्रमाण हैं। शक्तिके उपासक शक्तिमान् शिवको छोड़ ही कैसे सकते हैं? शिव बिना शक्ति अकेली क्या करेगी? गणेश और कार्तिकेय तो शिवके पुत्र ही हैं। पुत्रको पूजे और पिताका अपमान करे, यह शिष्ट मर्यादा कभी नहीं हो सकती। सूर्यदेव तो भगवान् शिवके तेजोलिंगके ही नामान्तर हैं। इसके सिवा अन्यान्य मतावलम्बियोंके लिये भी कम-से-कम श्रद्धा-विश्वासरूप शक्ति-शिवकी आवश्यकता रहती ही है। योगियोंके लिये तो परमयोगीश्वर शिवकी आराधनाकी आवश्यकता है ही। ज्ञानके साधक परमकल्याणरूप शिवकी ही प्राप्ति चाहते हैं। न्याय, वैशेषिक आदि दर्शन भी शिवविद्याके ही प्रचारक हैं। तन्त्र तो शिवोपासनाके लिये ही बना है। ऐसी अवस्थामें जिस किसी भी दृष्टिसे शिवको परम परमात्मा, महाज्ञानी, महान् विद्वान् , योगीश्वर, देवदेव, जगद्‍गुरु, सद्‍गुरु, महान् उपदेशक, उत्पादक, संहारक—कुछ भी मानकर उनकी उपासना करना सबके लिये कर्तव्य है। और सुख—कल्याणकी इच्छा स्वाभाविक होनेके कारण प्रत्येक जीव कल्याणरूप शिवकी ही उपासना करता है।

लिंग-शब्दका अर्थ

कुछ लोग भगवान् शिवकी लिंगपूजामें अश्लीलताकी कल्पना करते हैं, यह वास्तवमें उनकी मूर्खता, नास्तिकता और अनभिज्ञता ही है। यह सत्य है कि लिंग-शब्दके अनेक अर्थोंमें लोकप्रसिद्ध अर्थ अश्लील है, परंतु वैदिक शब्दोंका यौगिक अर्थ लेना ही समीचीन है। यौगिक अर्थमें कोई अश्लीलता नहीं रह जाती। इसके अतिरिक्त यह बात भी है कि अश्लीलता प्रसंगसे ही आती है। विषयात्मक वर्णनमें भी जो अश्लील या अनुचित प्रतीत होता है, वही वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक वर्णनोंमें श्लील तथा सर्वथा समुचित हो जाता है।

लिंग-शब्दका साधारण अर्थ चिह्न या लक्षण है। सांख्यदर्शनमें प्रकृतिको, प्रकृतिसे विकृतिको भी लिंग कहते हैं। देव-चिह्नके अर्थमें लिंग-शब्द भगवान् शंकरकी लिंगमूर्तिके ही लिये आता है। अन्य देवप्रतिमाओंको मूर्ति कहते हैं। यह असलमें अरूपका चिह्न है। दूसरोंका आकार मूर्तिमान् के ध्यानके अनुसार होता है, परंतु इसमें आकार या रूपका प्रदर्शन नहीं है। यह चिह्नमात्र है। कोई-कोई इसे परमात्माकी दिव्य ज्योतिका द्योतक स्वरूप मानते हैं, इसीलिये ज्योतिर्लिंग भी नाम है। एक जगह ‘लयनाल्लिंगमुच्यते’ कहा है अर्थात् लय या प्रलय होता है उसे लिंग कहते हैं। भगवान् रुद्र ही प्रलय करते हैं, संहारके देवता वही हैं। प्रलयके समय सब कुछ उनमें—शिवलिंगमें समा जाता है और फिर सृष्टिके आदिमें पुन: लिंगसे ही सब कुछ प्रकट होता है। इसलिये लयसे लिंग-शब्दका उदय माना गया है। उसीसे लय या प्रलय होता है और उसीमें सम्पूर्ण विश्वका लय होता है। भगवान् शंकर निर्विकार हैं, इसलिये चिह्नमात्र ही उनका स्वरूप है। भगवान् शिवका कारण स्वरूप निराकार है, अत: शिवलिंग भी किसी विशेष आकृतिसे रहित है, जैसे शालग्राम शिला है। साथ ही सारे जगत् के कर्ता, विधाता, उत्पत्ति-स्थल भी भगवान् शिव ही हैं। देवीपीठ तथा शिवलिंगसे इस सिद्धान्तकी भी सूचना होती है। लिंगका एक अर्थ है ‘कारण।’ भगवान् शिव समस्त जगत् के कारण हैं, अत: कारणवाचक लिंगके नामसे उनका पूजन होता है। अत: इसमें अश्लीलताकी कल्पना किसी भी दृष्टिसे कदापि नहीं करनी चाहिये और भगवान् शंकरकी भक्तिभावसे शास्त्रानुमोदित पूजा-अर्चा करनी चाहिये।

शिवनिर्माल्य

भगवान् शंकरपर चढ़ायी हुई वस्तु ग्रहण करनी चाहिये या नहीं, इस सम्बन्धमें तरह-तरहकी बातें कही जाती हैं। सिद्धान्त यह है कि जिन पुरुषोंने शिव-मन्त्रकी दीक्षा ली है, उनके लिये तो शिवजीका नैवेद्य—प्रसाद भक्षण करनेकी विधि है, परंतु जिनके अन्य देवताकी दीक्षा है, उनके लिये निषेध है। शास्त्रमें कहा गया है कि शिवजीपर जो निर्माल्य या नैवेद्य चढ़ता है, वह चण्डेश्वरका भाग है, उसका ग्रहण किसीको नहीं करना चाहिये—‘चण्डाधिकारो यत्रास्ति तद्भोक्तव्यं न मानवै:’ (शिवपुराण-विद्येश्वरसंहिता २२।१६) अर्थात् ‘जहाँ चण्डका अधिकार है वहाँ मनुष्यको शिव-नैवेद्यका भक्षण नहीं करना चाहिये।’ परंतु वहीं इसी श्लोकमें यह भी कहा है कि जिसमें चण्डका अधिकार नहीं है, उसका भक्तिपूर्वक भक्षण करना चाहिये—‘चण्डाधिकारो नो यत्र भोक्तव्यं तच्च भक्तित:।’ शास्त्रोंमें यह निर्णय किया गया है कि भूमि, वस्त्र, भूषण, सोना, चाँदी, ताँबा आदिको छोड़कर श्रीशिवजीपर चढ़े हुए पुष्प, फल, मिष्ठान्न, जल—इन सबको, जो शिवदीक्षासे रहित हैं, उनको ग्रहण नहीं करना चाहिये। पर ये भी यदि शालग्रामजीसे स्पर्श हो जायँ तो ग्रहणके योग्य हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त जहाँ शालग्राम-शिलाकी उत्पत्ति होती है—वहाँ उत्पन्न लिंगमें, पारेके लिंगमें, पाषाण, चाँदी या सोनेसे बने हुए लिंगमें, देवता तथा सिद्धोंके द्वारा स्थापित लिंगमें, स्फटिक या रत्ननिर्मित लिंगमें, केसरसे बने हुए लिंगमें तथा सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकाल, परमेश्वर, केदारनाथ, भीमशंकर, विश्वनाथ, त्र्यम्बक, वैद्यनाथ, नागेश, रामेश्वर और घुश्मेश्वर—इन बारह ज्योतिर्लिंगोंमें चढ़ा हुआ शिव-नैवेद्य ग्रहण करनेयोग्य होता है। जिनको शैवी दीक्षा नहीं है, वे भी उपर्युक्त लिंगोंके नैवेद्यको ग्रहण कर सकते हैं, क्योंकि इन लिंगोंके निर्माल्यमें चण्डका अधिकार नहीं है।

सारांश यह है कि जिनको शिवदीक्षा नहीं है, परंतु जो शिवजीके भक्त हैं उनके लिये पार्थिव लिंगको छोड़कर सभी शिवलिंगोंपर निवेदित की हुई वस्तुओंको तथा शिवजीकी प्रतिमापर चढ़ाये हुए प्रसादको ग्रहण करनेका अधिकार है। और जो वस्तुएँ शिवलिंगका स्पर्श नहीं करतीं अलग रखकर शिवजीको निवेदन की जाती हैं, वे अत्यन्त पवित्र हैं, उन्हें भी ग्रहण करनेका अधिकार है। शिवजीकी पूजामें नारी तथा शूद्र सभीका अधिकार है, उन्हें केवल वैदिकपूजा नहीं करनी चाहिये।*