भक्तकी परख

भक्तकी परख तिलक, छापा, माला, कण्ठी, रामनामी, मुण्डन या जटासे नहीं होती। ये सब आवश्यक हैं, उत्तम हैं, परंतु इनसे उसीकी शोभा बढ़ती है जिसका हृदय श्रीभगवान् के प्रेमसे पूर्ण हो गया है। जिसके हृदयमें भगवान् की जगह भोगोंने घर कर रखा हो, उसको न तो यह भक्तोंका बाना धारण करनेका अधिकार है और न इससे कोई लाभ ही है, ऊपरका भेष देखकर किसीने भक्त मान भी लिया तो क्या हुआ? भेषधारीको इससे कोई लाभ नहीं। कंगालको लखपति माननेसे कंगाली नहीं छूट सकती। हृदय पापकी आगसे जलता ही रहेगा। भक्त वह है जो सर्वत्र-सर्वदा अपने भगवान् को देखता है और उसके दिव्य गुण सत्य, प्रेम, करुणा, आनन्द, ज्ञान आदिका अनुसरण प्राणपणसे करता है। बाना हो या न हो।