भीख
‘नारायण! नारायण!!’
‘कौन है?’
‘एक भिखारी’
‘ठहरो, लाती हूँ’
इतना कहकर नन्दरानीने बहुमूल्य हीरे-मोतियोंका थार भरा और स्वयं लेकर बाहर आयीं। परंतु वह देखते ही सहम गयीं। देखा गलेमें साँप, जटाजूटमें साँप, साँपका कंकण, हाथमें डमरू और सुन्दर गौर-शरीरपर भभूत रमाये एक मस्त योगी खड़ा है। समाधिके नशेमें उसकी आँखें चढ़ी जा रही हैं। नन्दरानीने समझा कि कोई सिद्ध योगेश्वर है। वह बोली—
‘नाथजी! यह लो भीख, मेरे लालको असीस दो, जिससे उसके सारे अमंगल टल जायँ।’
‘मैया! तेरी यह भीख मुझे नहीं चाहिये। मुझे तो एक बार अपने लालका मुखड़ा दिखला दे। उसे देखते ही मेरे सब अमंगल टल जायँगे।’
‘नाथजी! मेरा साँवरा अभी निरा बच्चा है, तुम्हारे भेषको देखकर डर जायगा। भीख थोड़ी हो तो और ला दूँ, देखो, मेरे लालका किसी तरह अमंगल न हो, उसके सारे कुग्रह टल जायँ।’
‘अरी मैया! तेरा लाल कालका भी काल है, उसीके डरसे सूर्य, चन्द्र, यमराज सब अपना-अपना कार्य कर रहे हैं। वह किससे डरेगा? साक्षात् मृत्युदेवता भी उसके नामसे डर जाते हैं। मुझे और कोई भीख नहीं चाहिये माता! मुझे तो एक बार अपने उस सलोने साँवरेकी हँसीली, छबीली, निराली, मतवाली, काली छबिका दर्शन करा दे। बस, एक बार उसकी झाँकी कर लेने दे।’
‘ना, ना, नाथजी! मैं अपने लालको बाहर न लाऊँगी। आजकल व्रजमें असुरोंका बड़ा उत्पात है। अभी उस दिन पूतना आयी थी। भगवान् ने रक्षा की। मैं अभी-अभी उसकी माँग सवाँरकर और उसकी आँखोंमें काजल डालकर आयी हूँ, कहीं नजर लग जाय तो फिर तुम्हें कहाँ ढूँढ़ती फिरूँ?’
शिवजी हँसकर मन-ही-मन यशोदाके भाग्यकी सराहना करने लगे। बोले—‘मेरी मैया! तू धन्य है, जो सर्वाधार त्रिलोकीनाथको अपनी गोदमें खिलाती है, अपने हाथों शृंगारके सागरका शृंगार करती है, तेरे समान बड़भागी कौन होगा? अरी! जिसकी भृकुटि-विलाससे सारे विश्वका सृजन और संहार होता है उसको नजर कैसी?’
‘तुम क्या कहते हो, बाबा! मैं यह सब नहीं समझती। तुम्हारे वेदान्तका हम गँवारी ग्वालिनोंको क्या पता? भीख लेनी हो तो ले लो, मेरे श्यामसुन्दरको भूख लगी होगी, मैं अब और यहाँ नहीं ठहर सकती।’
‘माँ! मैं तेरे पैरों पड़ता हूँ, एक बार मुझे उस प्राणधनके दर्शन करा दे, तेरा मंगल होगा, नहीं तो, मैं यहीं धरना दिये बैठा रहूँगा, बिना दर्शन किये तो यहाँसे हटूँगा नहीं।’
यशोदा साधु बाबाके दु:खसे दु:खी हुई, उसका कोमल हृदय द्रवित हो गया, भगवान् ने मति फेर दी। उसने कहा—
‘अच्छा, लाती हूँ, पर अधिक देर न ठहरना भला! देखकर ही चले जाना।’
इतना कहकर वह अंदर गयी और नजरसे बचानेके लिये माथेपर काजलकी बिंदी लगाकर लालको गोदमें लिये बाहर लौटी। देवदेव शंकर त्रिभुवन-मोहिनी बालछबिको देखकर मुग्ध हो गये। एकटक देखने लगे। यशोदाने कहा—
‘लो, अब जाती हूँ, बहुत देर हो गयी।’
अब, महाराजकी प्रेम-समाधि भंग हुई। वे बोले—
‘तनिक ठहर जा मैया! मुझे दो बात तो कर लेने दे।’ शिवजीने नेत्रोंकी मूक भाषामें ही मोहन प्यारेसे बातें कीं। फिर मुग्ध होकर गाने लगे—
सफल मम ईस जीवन आज।
निरखि अगुन अरूप को गुनपूर्न छबिमय साज॥
सच्चिदानँद अलख, अज, अव्यक्त, अमित, अनंत।
प्रगट सो सिसुरूप रस-सौन्दर्य-निधि भगवंत॥
धन्य व्रजके गोप-गोपी गौ मयूर तृनादि।
सगुन बपु धरि रहत जिनमहँ ब्रह्म अचल अनादि॥
सर्वसक्ति समेत पूर्न प्रभाव सह परमेस।
करत लीला चित्र मधुर सो धारि बालक भेस॥