दस प्रकारकी नौ-नौ बातें

(माननेकी और छोड़नेकी)

१—किसी व्यक्तिके घर आनेपर नौ अमृत खर्च करें—(१)मीठे वचन, (२) सौम्य दृष्टि, (३)सौम्य मुख, (४)सौम्य मन, (५) खड़े होना, (६) स्वागत पूछना, (७) प्रेमसे बातचीत करना, (८) पास बैठना और (९) जाते समय पीछे-पीछे जाना।

इससे गृहस्थकी उन्नति होती है।

२—दूसरोंको बहुत कम खर्चकी नौ वस्तुएँ गृहस्थोंको जरूर देनी चाहिये—(१) आसन, (२) पैर धोनेको जल, (३) यथाशक्ति भोजन, (४) जमीन, (५) बिछौना, (६) घास, (७) पीनेको जल, (८) तेल और (९) दीपक।

इनसे गृहस्थकी अभीष्टसिद्धि होती है।

३—नौ बातें उन्नतिमें बाधक हैं; इसलिये उनका त्याग करना चाहिये—(१) चुगली या निन्दा, (२) परस्त्री-सेवन, (३) क्रोध, (४) दूसरेका बुरा करना, (५) दूसरेका अप्रिय करना, (६) झूठ, (७) द्वेष, (८) दम्भ और (९) जाल रचना।

इनके त्यागसे उत्तम लोकोंकी प्राप्ति होती है।

४—नौ काम गृहस्थोंको रोज अवश्य करने चाहिये—(१) स्नान, (२) संध्या, (३) जप, (४) होम, (५) स्वाध्याय, (६) देवपूजन, (७) बलिवैश्वदेव, (८) अतिथिसेवा और (९) श्राद्ध-तर्पण।

इनसे सुखकी प्राप्ति होती है।

५—नौ बातें गृहस्थको गुप्त रखनी चाहिये—(१) जन्म-नक्षत्र, (२) मैथुन, (३) मन्त्र, (४) घरके छिद्र, (५) वंचना, (६) आयु, (७) धन, (८) अपमान और (९) स्त्री।

इनके प्रकाश करनेसे अनेकों प्रकारकी हानियाँ होती हैं।

६—नौ बातें गृहस्थको प्रकाश करनी चाहिये—(१) छिपकर किया हुआ पाप, (२) निष्कलंकता, (३) ऋणदान, (४) ऋणशोधन, (५) उत्तम वंश, (६) खरीद, (७) बिक्री, (८) कन्यादान और (९) गुण-गौरव।

इनसे गृहस्थकी उन्नति होती है।

७—नौ जनोंको गृहस्थको जरूर दान देना चाहिये—(१) माता, (२) पिता, (३) गुरु, (४) दीन, (५) अनाथ, (६) उपकार करनेवाला, (७) सत्पात्र, (८) मित्र और (९) विनयशील।

यह दान अनन्त फलदायक होता है।

८—नौ आदमियोंको दान नहीं देना चाहिये—(१)खुशामदी, (२) स्तुति करनेवाला, (३) चोर,(४)कुवैद्य, (५) व्यभिचारी, (६) धूर्त, (७) शठ, (८) कुश्तीका पेशा करनेवाला और (९) अपराधी।

इनको देनेसे कोई फल नहीं होता।

९—नौ वस्तुओंको किसी हालतमें विपत्ति पड़नेपर भी नहीं

देना चाहिये—(१) संतानके रहते सर्वस्व-दान, (२) पत्नी, (३) शरणागत, (४) दूसरेकी रखी हुई चीज, (५) बन्धक रखी हुई चीज, (६) कुलकी वृत्ति, (७) आगेके लिये रखी हुई चीज, (८) स्त्री-धन और (९) पुत्र।

इनके देनेपर प्रायश्चित्त किये बिना शुद्धि नहीं होती।

१०—ये नौ नवक अवश्य पालन करनेयोग्य हैं। इनसे सुख-समृद्धिकी वृद्धि होती है। अब एक नवक और है, जो धर्मरूप है और जिसके पालनसे अत्यन्त पारमार्थिक लाभ होता है।

(१) सत्य, (२) शौच, (३) अहिंसा, (४) क्षमा, (५) दान, (६) दया, (७) मनका निग्रह, (८) अस्तेय और (९) इन्द्रियोंका निग्रह।

इन दस नवकोंका पालन करनेसे लोक, परलोक दोनों बनते हैं।

(स्कन्दपुराण-काशीखण्ड, पूर्वार्द्ध)