धर्मरक्षाके लिये भगवदाश्रयकी आवश्यकता
धर्म नित्य है। ईश्वरकी सृष्टिमें धर्मका कभी विनाश नहीं हो सकता। धर्मका नाश नहीं, परंतु धर्मपर चलनेवाले लोगोंकी ही न्यूनाधिकता हुआ करती है। जब धर्मपर आरूढ़ मनुष्योंकी संख्या बढ़ती है, तब धर्मकी उन्नति कहलाती है और जब उनकी संख्या कम हो जाती है या बहुत घट जाती है, तब उसे धर्मका ह्रास या नाश कहते हैं। इसलिये धर्मरक्षाका अर्थ धार्मिक मनुष्योंकी रक्षा और वृद्धि ही है। जब युगप्रभाव, कुसंगति, कुसंस्कार, राज्यदोष आदि एक या अनेक कारणोंसे जगत् में अनाचार बढ़ जाता है, तब धर्म और धार्मिकोंका विरोध ही उन्नतिका स्वरूप समझा जाने लगता है। ईश्वर और धर्मके विनाशकी व्यर्थ चेष्टा ही उस समयके विषय-विलास-विमोहित, काम-भोगपरायण मनुष्योंकी जीवनचर्या बन जाती है। वे बुद्धिमें विपर्यय हो जानेके कारण अपनी समझसे बड़ी अच्छी नीयतसे ही ऐसा किया करते हैं। ऐसी अवस्थामें उनका विरोध करने, उनके लिये मानवी दण्डकी व्यवस्था करने अथवा श्रद्धा और साधनासे उपलब्ध होनेवाले तत्त्वको उन्हें समझानेकी चेष्टासे काम नहीं चलता। जबतक उनकी समझमें परिवर्तन नहीं होगा, तबतक वे अपनी चाल कदापि नहीं छोड़ेंगे और त्याग, तप आदि उत्तम एवं छल-बल-कौशलादि मध्यम एवं अधम उपायोंसे अपने कार्यको जारी रखना ही कर्तव्य समझेंगे। इस स्थितिमें उनकी बुद्धिके पलटनेका एकमात्र उपाय है तो वह श्रद्धायुक्त धार्मिक पुरुषोंद्वारा किया जानेवाला भगवदाराधन ही है। प्राचीन कालमें ऋषिगण प्राय: यही किया करते थे और सफल होते थे।
आज जगत् में अनाचारकी वृद्धि हो रही है और धर्मविरोधी लोगोंकी संख्या क्रमश: बढ़ी चली जा रही है। आजके अधिकांश शिक्षालय, उपदेशक और पथप्रदर्शक लोग मनुष्योंको यही शिक्षा देना और इसी मार्गपर चलाना अपना कर्तव्य समझते हैं। इसीसे आज धर्मका नाश या ह्रास हो चला है, परंतु इसका वास्तविक प्रतीकार जिस भगवदाराधनसे ही हो सकता है, उससे लोग उदासीन-से होते चले जाते हैं और उन्हीं छल, बल, कौशलादि उपायोंका आश्रय लेते हैं कि जिनमें स्वाभाविक ही वे अपने प्रतिद्वन्द्वियोंकी बराबरी नहीं कर सकते। इसीसे सफलता भी प्राय: नहीं मिलती। मेरा यह अभिप्राय नहीं है कि धर्मरक्षाके लिये यत्न नहीं किया जाय, जो लोग धर्मरक्षाके लिये शास्त्रविहित निर्दोष उपायोंका अवलम्बन करते हैं और स्वार्थत्यागपूर्वक यथाशक्ति प्रयत्न कर रहे हैं वे सर्वथा आदरणीय और स्तुत्य हैं। इस धर्म-विरोधी वातावरणमें उनका यह सत्साहस और धर्मका आग्रह सर्वथा आदर्श है और प्रत्येक धार्मिक नर-नारीको तन, मन, धनसे यथाशक्ति इस धर्मरक्षाके कार्यमें जी खोलकर सहायता करनी चाहिये। अधर्म चाहे एक बार युगप्रभाव आदि कारणोंसे बढ़ता हुआ नजर आये, परंतु अन्तमें धर्मकी जय निश्चित है। इतना होनेपर भी मेरी तुच्छ बुद्धिके अनुसार बिना भगवदाश्रय और भगवदाराधनके वास्तविक सफलता शीघ्र नहीं मिल सकती। भगवदाश्रयरहित धर्म, यथार्थमें धर्म ही नहीं है। अतएव धर्मरक्षाके लिये प्रत्येक धर्मप्रेमी व्यक्तिको भगवान् का ही प्रधान सहारा लेकर श्रद्धा-विश्वासपूर्वक भगवदाराधन करते हुए ही धर्मरक्षाके लिये अन्यान्य उपायोंसे प्रयत्न करना चाहिये, तभी शीघ्र और पूर्ण सफलता होगी।