हमारा पाप

एक शिक्षित सज्जनने लम्बा पत्र लिखा है, उसमें उन्होंने बड़े दु:खके साथ एक घटनाका वर्णन किया है। उनके पत्रका सार है—‘मैं अपने कुछ मित्रों और उनकी पत्नियोंके साथ, बड़ी प्रशंसा सुनकर एक महात्माके पास गया। वहाँ जानेपर उनकी बहुत बड़ाई सुनी। भक्तलोग उनको साक्षात् भगवान् का अवतार बतलाते थे। महात्माजी विशेष पढ़े-लिखे तो नहीं थे, परंतु उनके उपदेश बहुत आकर्षक होते थे। वे अपने उपदेशोंमें शरणागति, समर्पण और गुरु-सेवापर बड़ा जोर देते। हमने देखा—बहुत-से नर-नारी बड़ी श्रद्धाके साथ उनकी सेवा करते हैं। हमारी भी इच्छा हुई। हमलोगोंने उनसे वैष्णवी दीक्षा ली और परम कल्याणकी आशासे वहीं रहकर उनकी सेवा करने लगे। हमलोगोंमें एक सज्जनको उन्होंने अपने अन्तरंग सेवकोंमें ग्रहण कर लिया। उन सज्जनने उनकी कई बातें संदेहजनक देखीं; परंतु श्रद्धाके कारण उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया। उनकी नवयुवती पत्नी भी महात्माजीके द्वारा दीक्षा प्राप्त कर चुकी थी। वे उसको गुरुजीके पास उपदेश-ग्रहणके लिये भेजते। किसीके मनमें कोई सन्देह था ही नहीं। एक दिन उन महात्माजीने एकान्तमें उस देवीके साथ गंदी चेष्टा की। लड़कीने पहले तो समझा कि गुरुजी उसकी परीक्षा कर रहे हैं; परंतु जब बात आगे बढ़ी तो वह बेचारी काँप गयी और किसी तरह वहाँसे भाग आयी। उसके पतिको सब हाल मालूम हो गया। बात फूटनेपर महात्माजीने उन दोनोंसे एकान्तमें क्षमा माँगी और यहाँतक कहा कि ‘हम तो इन धनियोंको उल्लू बनाकर अपना मतलब साधा करते हैं। तुमसे बड़ी आशा थी, परंतु अब हमारी यह बात किसीसे कहना मत। नहीं तो हमारी बड़ी अप्रतिष्ठा हो जायगी।’ महात्माजीने और भी एक नवयुवती स्त्रीके साथ ऐसी ही चेष्टा की और पता लगनेपर कह दिया कि हम तो उसकी परीक्षा करते थे। पत्र-लेखकका कहना है कि ये महात्मा भगवान् के नामपर भयंकर अनाचार फैला रहे हैं। लोगोंका धन और भले घरोंकी देवियोंका शील हरण कर रहे हैं।

पत्रमें लिखी घटना यदि सत्य है तो बड़ी भयानक है, परंतु इसमें आश्चर्यकी बात कुछ भी नहीं है। ऐसी घटना बिरली ही नहीं होती। आये दिन ऐसी और इससे भी अधिक भयानक घटनाओंके समाचार सुने और पढ़े जाते हैं। अधिकांश घटनाएँ तो प्रकाशमें ही नहीं आतीं। इसका कारण यह है कि हमलोगोंमें वस्तुत: भगवत्परायण पुरुष बहुत ही थोड़े हैं, सब इन्द्रियपरायण ही हैं। इसीसे आध्यात्मिक, धार्मिक, राजनीतिक और सामाजिक—सभी क्षेत्रोंमें ऐसे पाप होते हैं। शिक्षालय, त्यागी पुरुषोंके आश्रम, सदाचारके स्थान और विधवाश्रम आदि पवित्र स्थान भी इस दोषसे नहीं बचे हैं। वनवासी त्यागी पुरुषोंके मनोंमें भी संगदोषसे विकार पैदा हो जाते हैं, फिर आजकलके दूषित वातावरणमें रहनेवाले इन्द्रियपरायण लोगोंके जीवनमें ऐसा हो जाना कोई अस्वाभाविक नहीं है। दु:खकी बात तो यह है—कुछ लोग जान-बूझकर महात्मा, संत या साधुके वेषमें दुराचार करते हैं और परमार्थ-पथके बदले अपने साथ ही अपने पास आनेवाले नर-नारियोंको भी नरकके मार्गपर घसीट ले जाते हैं। असलमें यह महात्मा या साधुसमाजका, वैष्णवादि किसी सम्प्रदायका दोष नहीं है। दोष तो उन दाम्भिक मनुष्योंका है, जो ऊपरसे महात्मा, साधु या भक्त बनकर, उद्धारक और सहायकका बाना पहनकर, सच्चे महात्मा, भक्त और सहायकोंको भी संदेहास्पद बना देते और बदनाम करते हैं। सबसे बड़े दु:खकी बात तो यह है कि भगवान् के नामपर भी ऐसा होता है! और-और कारणोंके साथ ही नास्तिकताकी वृद्धिका यह भी एक प्रबल कारण है। यह बड़ा पाप है जो लोगोंके मनमें भगवान् के मार्गमें अविश्वास पैदा करवाकर उन्हें नास्तिकताकी ओर ले जाता है। इसके लिये, जो झूठा स्वाँग बनाकर अपना स्वार्थ-साधन करते हैं उनसे तो कुछ कहना ही नहीं है, वे हमारी बात क्यों सुनने लगे। जबतक उनके पापका भण्डा नहीं फूटेगा, तबतक वे तो अपना काम चलाना ही चाहेंगे। विधि-निषेधके परे पहुँचे हुए जीवन्मुक्त महापुरुषोंसे भी कुछ कहना हमारे लिये अनधिकार चर्चा है। उनसे तो इतनी ही प्रार्थना है कि लोकसंग्रहकी दृष्टिसे उनको भी शास्त्रमर्यादाका पालन ही करना चाहिये। हमारी प्रार्थना तो उन भोले साधकोंसे है जो यथार्थमें भगवान् के मार्गकी ओर बढ़नेकी इच्छा रखते हुए भी कुसंगवश या पूजा-प्रतिष्ठाके लोभमें पड़कर धन और स्त्रियोंके संसर्गमें आकर उनके प्रलोभनमें पड़ जाते हैं और आखिर पापपंकमें पड़कर उसमें फँस जाते हैं, तथा अपनी ही भूलसे अपने जीवनको दोषमय बनानेका कारण बनते हैं। उन्हें सावधान होना चाहिये। वे विलासिता तथा इन्द्रियोंके आरामकी ओर न ताककर संयम-नियमोंका दृढ़ताके साथ पालन करें और जहाँतक हो—धन और स्त्रीके संसर्गसे अपनेको बचाये रखें। चुपचाप अपना साधन करें। किसीको भी शिष्य न बनावें। कम-से-कम स्त्रियोंको तो कभी शिष्य बनावें ही नहीं। किसी स्त्रीसे एकान्तमें तो कभी मिलें ही नहीं।

दूसरे, हम उन भाइयोंसे प्रार्थना करते हैं जो अपनी स्त्रियों और बहिन-बेटियोंको दीक्षा, उपदेश आदिके लिये एकान्तमें किन्हींके पास भेजते हैं। याद रखना चाहिये कि इन्द्रियोंपर सर्वथा विजय पाये हुए पुरुष बहुत थोड़े ही होते हैं। एकान्तमें स्त्री-पुरुषका एक साथ रहना बड़े-बड़े संयमी पुरुषोंके लिये भी पतनका कारण होता है। जो अपने घरकी स्त्रियोंको इस प्रकार एकान्तमें भेजते हैं, उनके घरमें तो पाप आता ही है, वे उन साधकों और महात्माओंके भी पतनमें सहायक होते हैं। अन्तमें हम अपनी माता-बहिन और पुत्रियोंसे नम्रतापूर्वक प्रार्थना करते हैं—वे इस बातका ध्यान रखें कि आजकलका वातावरण बहुत ही बिगड़ा हुआ है। कोई कितना भी सात्त्विक स्वभावका आदमी हो—है तो वह इसी वातावरणमें रहनेवाला मनुष्य ही न? पता नहीं कब किसकी बुद्धिमें विकार आ जाय। दूसरी बात, ऐसे लोग भी कम नहीं हैं जो वास्तवमें असाधु होनेपर भी साधु या भक्त सजे हुए हैं और जिस किसी प्रकारसे अपनी पाप-वासनाकी पूर्ति करना चाहते हैं। अतएव किसी भी पुरुषसे, चाहे वह कितना ही बड़ा महात्मा या भक्त क्यों न माना जाता हो—एकान्तमें नहीं मिलना चाहिये। युवती स्त्रियोंके लिये किसी भी पुरुषको गुरु बनाकर उनसे एकान्तमें दीक्षा लेना और मिलना सर्वथा अनुचित है। सधवा स्त्रियोंके गुरु उनके पति हैं। भगवान् तो सभीके गुरु हैं। अतएव सधवा, विधवा सभीको चाहिये कि वे श्रीभगवान् को गुरु बनाकर उन्हींके मन्त्रसे दीक्षित हों और उनके आज्ञानुसार शास्त्र-मर्यादाको मानकर अपने गृहस्थधर्मका पालन करती हुई अपने जीवनको सफल बनावें।

धर्म और भगवान् के नामपर भी जब यहाँतक होने लगा है तब सहशिक्षा, युवतीविवाह, सिनेमाओंमें अभिनय आदिका परिणाम कितना भयंकर होगा, भगवान् ही जानें!

पत्रलेखक महोदयसे निवेदन है कि वे इस घटनाको शिक्षारूप समझें। उनमें साहस हो तो सच्ची बातको प्रकाशित कर दें और ऐसा करनेमें कोई विपत्ति आवे तो उसको खुशीसे सहन करें। इस घटनासे उन्हें जो वैष्णव-सम्प्रदाय और वैष्णव-चिह्नोंसे घृणा हो चली है सो ठीक नहीं है। जो लोग वैष्णव-सिद्धान्तके विरुद्ध पापाचार करते हैं, वे तो वस्तुत: वैष्णव ही नहीं हैं। उनके दोषसे सम्प्रदायको दोषी मानना और उसके चिह्नोंसे घृणा करना उचित नहीं है।