ईश्वर

ईश्वर बुद्धिगम्य नहीं है

ईश्वर क्या है? उनका वास्तविक स्वरूप कैसा है? वह निराकार हैं या साकार? निर्गुण हैं या सगुण? इस जगत् के साथ उनका क्या सम्बन्ध है? इत्यादि प्रश्नोंका एकमात्र निश्चित उत्तर न तो कोई आजतक दे सका है और न दे सकता है। आजतक ईश्वरके सम्बन्धमें जितना वर्णन हुआ है, वह सब मिलकर भी ईश्वरके यथार्थ स्वरूपका निर्देश नहीं कर सकता; क्योंकि ईश्वर मनुष्यकी बुद्धिके परे है, वह परम वस्तु मनुष्यकी बुद्धिमें नहीं समा सकती। बुद्धि प्रकृतिका कार्य होनेसे जड और परिच्छिन्न है, वह उस अनन्त, सर्वव्यापी, सर्वाधार, सर्वान्तर्यामी, नित्य ज्ञानानन्दघन चेतनका आकलन किस प्रकार कर सकती है? जो वस्तु ज्ञानका विषय होती है, वह सीमित, प्रमेय और धर्मी वस्तु ही होती है; जो सीमित है, जिसका परिमाण हो सकता है, जो किसी धर्मवाली है, वह वस्तु ईश्वर नहीं हो सकती; बुद्धि या ज्ञान जिस पदार्थका निरूपण करता है, उस पदार्थका कोई एक निश्चित रूप ज्ञानमें रहता है, ऐसा ज्ञेय पदार्थ सबका प्रकाशक, सबका आधारज्योति नहीं हो सकता। जिसका प्रकाश बुद्धि करती है, वह बुद्धिको प्रकाश देनेवाला कैसे हो सकता है? परमात्मा ईश्वर ज्ञेय नहीं है, प्रमेय नहीं है, प्रकाश्य नहीं है, वह तो स्वयं ज्ञाता, प्रमाता, चेतनज्योतिरूप सबका प्रकाशक स्वयंप्रकाश है। वह किसी भी बुद्धिका चिन्त्य विषय नहीं है, सारी बुद्धियोंमें चिन्ताप्रवणता उसीसे आती है। वह स्वयं प्रमाणरूप और ज्ञानरूप है। वस्तुत: ऐसा कहना भी उसको सीमाबद्ध करना है—उसका माप करना है। उसे कालातीत-गुणातीत कहना भी उसका परिमाण बाँधना है। इसीलिये मनीषीगण यह कहा करते हैं कि ईश्वरका तत्त्व ईश्वर ही जानता है, वह स्वानुभवरूप है, दूसरा कोई उसे जान ही नहीं सकता, तब वर्णन कैसे कर सकता है? जबतक दूसरा रहता है, तबतक जानता नहीं और दूसरा न रहनेपर वर्णनका प्रसंग ही असम्भव है।

ईश्वरकी उपासना करनी चाहिये

‘ईश्वर अतर्क्य है, अज्ञेय है, वह कभी मनुष्यकी बुद्धिमें आ ही नहीं सकता, संसारकी किसी वस्तुसे तुलना करके वह समझाया नहीं जा सकता, ऐसी स्थितिमें उसे मानने-जानने या उसकी चर्चा और जाननेकी चेष्टा करनेसे क्या लाभ है? जो चीज सिद्ध नहीं हो सकती, दीख नहीं सकती, उससे उदासीन रहना ही बुद्धिमानी है।’ यों विचारकर परमात्माकी चर्चा छोड़ देना तो मृत्युसे भी बढ़कर मरण है। परमात्माकी ऐसी विलक्षण शक्ति है कि वह ज्ञेय न होनेपर भी ज्ञेय-सा बनकर उपासकके अज्ञानावरणको हटा देता है, जिससे वह उसके स्वरूपको पहचानकर कृतकृत्य हो जाता है। इसीलिये उस परमतत्त्वको ज्ञेय मानकर उसकी उपासना करना परम आवश्यक माना गया है।

इसीलिये तत्त्वज्ञ ईश्वरगतप्राण ऋषि-महर्षियोंने अपने-अपने विलक्षण सत्य अनुभवोंको (जो सचमुच ही उन्होंने ‘अघटनघटनापटीयसी’ शक्तिके आधार और स्वामी भगवान् की कृपासे समय-समयपर प्राप्त किये हैं) तर्क और उक्तियोंके द्वारा सिद्ध कर लोगोंके सामने रखा और यथोचित साधनविधि बतलाकर भगवत्-प्राप्तिका मार्ग सुलभ कर दिया है। दर्शन, पुराण आदिमें इन्हीं साधनोंका उल्लेख है।

ईश्वरका स्वरूप

हमारी बुद्धि जहाँ जाकर थक जाती है और अपनेको आगे बढ़नेमें सर्वथा असमर्थ पाती है, वहींसे भगवत्कृपाका प्रकाश और बल हमारा पथप्रदर्शक और सहायक होकर हमें उस बुद्धिके परे, बुद्धिके अगोचर परम तत्त्वका साक्षात्कार करा देता है। नहीं तो, जो सर्वथा अव्यक्त और अचिन्त्य है, जो एक, केवल, शुद्ध सच्चिदानन्दघन रहते हुए ही अपने सगुणरूपके द्वारा संकल्पमात्रसे विचित्र ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि करते हैं; सगुण, साकार, दिव्य, नित्य, विग्रहरूपसे अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंमें अनन्तकोटि ब्रह्मा, विष्णु और रुद्ररूपोंसे विभक्त-से प्रतीत होकर पृथक्-पृथक् सृजन, पालन और संहार करते हैं, जो विविध देशों और कालोंमें विविध स्वरूपोंमें अवतरित या प्रकट होकर आवश्यकतानुसार न्यूनाधिक शक्तिका प्रकाशकर अपनी विश्वविमोहिनी लीलाओंसे जगत् को मुग्ध और पावन करते हैं, जो जीवमात्रमें अन्तर्यामी आत्मारूपसे विराजित होकर विभिन्न-से भासते हुए जीवलीलामें वर्तमान रहते हैं। (यहाँ यह समझनेकी बात है कि जिस प्रकार अनन्तकोटि व्यष्टिशरीरोंमें एक ही परमात्मा त्रिगुण-संवलित जीवात्मारूपसे विराजमान है, ऐसे ही अनन्तकोटि ब्रह्माण्डशरीरोंमें ‘विधि-हरि-हर’ त्रिगुणमूर्तिसे एक ही परमात्मा विराजमान हैं, त्रिगुणमूर्ति होनेपर भी तीनों एक ही हैं और गुणातीत हैं।) जो अनन्त विश्व-ब्रह्माण्डोंमें प्रकृतिके विकाररूपसे भासनेवाले जड दृश्य-प्रपंचका भेष धारणकर अपनेको छिपाये हुए हैं और प्रत्येक रूपमें प्रत्येक समय एकरस और पूर्ण हैं, उन परात्पर महाविष्णु, महाशिव, महाप्रजापति, महादेव, महाशक्ति, श्रीकृष्ण, श्रीराम आदि विविध नामों और रूपोंसे आख्यात और पूजित नित्य, अविनाशी, अनन्त, अखण्ड, परमसत्य, परमब्रह्म, सच्चिदानन्दघन, अनन्तशक्ति परात्पर भगवान् का जरा-सा आभास भी मनुष्यकी बुद्धिको उसके अपने बलपर कैसे मिल सकता है? जो संतोंके वाक्योंपर विश्वास कर उनके शरणापन्न होता है, जो बुद्धिका अभिमान छोड़कर उनकी कृपाका आश्रित होता है, वही शुद्ध और सूक्ष्मबुद्धि श्रद्धामय पुरुष भगवान् की कृपाका बल प्राप्तकर उसके दिव्यलोकमें परमात्म-प्रकाशकी ओर आगे बढ़ता है।

उन परमात्मा महेश्वरके अखण्ड नियमके अनुसार उनकी लीलासे जब उनकी सारी शक्तियाँ सिमटकर साम्यस्थितिको प्राप्त हो जाती हैं, तब शक्ति और शक्तिकी अभिन्नताके रूपमें एक ब्रह्म-स्वरूप ही प्रकाशित रहता है। पुन: जब उनकी अनन्त शक्तियाँ विविध विचित्र मूर्ति धारणकर क्रिया करती हैं, तब वही भगवान् ब्रह्म अनेक स्वरूपोंमें प्रकाशित और प्रसरित रहते हैं, वस्तुत: अनन्तकोटि विश्व-ब्रह्माण्डोंमें जो कुछ उत्पन्न हुआ है, जो स्थित है और जो लयको प्राप्त होता है, वह सब ईश्वरमें ही होता है। ईश्वरकी ही यह सृष्टि, स्थिति और संहाररूप त्रिविध मूर्तियाँ हैं। समस्त विश्व-ब्रह्माण्ड अनन्त तरंगोंकी भाँति उन एक ही अनन्त, असीम परमात्म-सागरमें स्थित हैं। वे भगवान् देवोंके देव, ईश्वरोंके ईश्वर, पतियोंके पति और गतियोंकी गति हैं; ये निराकार भी हैं, साकार भी हैं, निराकार भी नहीं हैं; साकार भी नहीं हैं, सबमें हैं, सबसे परे हैं, उनके लिये यह कहना या समझना कि ‘ये ऐसे ही हैं’ वस्तुत: उनका उपहास करना और अपनी अक्लका पर्दाफास करना है। हमारी बुद्धि जिस ईश्वरका वर्णन करती है, वह तो उनके एक बहुत ही स्वल्प-से अंशका, आभासका या अनुमानका ही वर्णन होता है। वे तो गूँगेके गुड़ हैं; उनका वर्णन कोई कैसे करे? क्षुद्र-सा जल-सीकर जलनिधिकी क्या थाह लगावे? हमारी जो बुद्धि आँखोंके सामने प्रत्यक्ष दीखनेवाले पदार्थोंकी तहतक भी नहीं पहुँच सकती, वह अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंमें व्याप्त सर्वलोकमहेश्वर अनन्तशक्ति, शुद्ध सच्चिदानन्दघन परमात्माके सम्बन्धमें निश्चयरूपसे क्या कह सकती है? उन ईश्वरके सम्बन्धमें तो सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि जगत् के महापुरुष उन्हींकी कृपासे प्राप्त अनुभवोंके द्वारा उनकी सत्ता समझाकर हमें उनकी उपासना करनेका उपदेश देते हैं। महापुरुषोंके वचनोंमें विश्वास करनेवाले श्रद्धालु पुरुषोंके लिये तो ईश्वरका होना सहज ही सिद्ध है, उनके लिये तो ऐसी कोई वस्तु ही नहीं, जो ईश्वरसे अधिक प्रत्यक्ष और सर्वप्रमाणसिद्ध हो, परंतु यह सौभाग्य सबको प्राप्त नहीं। ईश्वरमें विश्वास होना सहज बात नहीं है; ईश्वर-विश्वास भगवान् के अन्ताराज्यका पर्दा हटा देता है, जिससे मनुष्य ईश्वरके तत्त्वको समझकर सर्वपाप-ताप-शून्य और कृतकृत्य हो जाता है।

ईश्वर-विश्वास और ईश्वर-कृपा

जैसे सूर्यके पूर्ण उदय होनेसे पूर्व ही अमावस्याकी घोर निशाका नाश हो जाता है, इसी प्रकार भगवान् का पूर्ण विश्वास होनेके पूर्व ही, थोड़े ही विश्वाससे पाप-तापरूपी तम नष्ट हो जाता है। मनुष्य तभीतक पापाचरण करता है और तभीतक संसारके विविध दु:खोंके दावानलमें दग्ध होता रहता है, जबतक कि उसका ईश्वरके अस्तित्वमें विश्वास नहीं होता; ‘ईश्वर है’ इस विश्वाससे ही मनुष्य निर्निराधार, निर्विकार, नि:शंक, निर्भय और निश्चिन्त हो जाता है। भगवान् पर विश्वास करनेवाला पुरुष इस बातको जानता है कि भगवान् सर्वव्यापी, सर्वदर्शी, सर्वशक्तिमान्, परम दयालु, योगक्षेमवाहक, विश्वम्भर और परम सुहृद् हैं। ऐसी अवस्थामें वह काम, लोभ या भय किसी कारणसे भी पाप नहीं करता। जब एक पुलिस-अफसरको देखकर मनुष्य कानून-विरुद्ध काम करनेमें हिचकता है, जब किसी सुयोग्य गुरुजनके सामने पाप करनेमें मनुष्य सकुचाता है, तब वह सबके स्वामी और परमगुरु भगवान् को सामने समझकर पाप कैसे कर सकेगा? जब भगवान् विश्वम्भर और योगक्षेमका निर्वाह करनेवाले हैं, तब वह अपने और परिवारके भरण-पोषणादिके लिये न्यायपथको छोड़कर पाप-पथमें क्यों जायगा? जब वह अपने परम सुहृद्, परम दयालु, सर्वशक्तिमान् परमात्माको सर्वव्यापीरूपसे सर्वत्र देखेगा, तब ऐसा कौन-सा ताप या भय है, जो उसे जला सकेगा या पापके मार्गमें ले जायगा? ईश्वरका विश्वासी पुरुष तो वस्तुत: ईश्वरकी ही दयापर भरोसा करनेवाला बन जायगा, उसे पद-पदपर, पल-पलमें भगवत्कृपाका प्रत्यक्ष होता रहेगा। जो भगवत्कृपापर निर्भर रहता है, वह किसी कालमें दु:खी नहीं हो सकता। वह प्रत्येक बातमें भगवान् का विधान समझकर और भगवान् के विधानको उनकी दयासे ओतप्रोत देखकर प्रफुल्लित होता रहता है, वह समझता है कि मेरे नाथने मेरे लिये जो कुछ विधान कर दिया है, वही परम कल्याणरूप है और वास्तवमें है भी ऐसा ही। उसकी बुद्धिमें यथार्थ ही यह भाव नहीं आता कि भगवान् का कोई विधान कभी जीवके लिये अमंगलरूप होता है। मंगलमय भगवान् अपने ही अंश जीवका अमंगल कभी कर ही नहीं सकते। जब कभी वे किसीके लिये कोई दु:खका विधान करते हैं, तब वह अत्यन्त ही दयाके वश हो उसके कल्याणके अर्थ ही करते हैं। जैसे जननी अपने बच्चेके कल्याणके लिये कभी-कभी उसके साथ ऐसा व्यवहार करती है जो बच्चेको बड़ा क्रूर मालूम होता है और वह भूलसे मातासे नाराज भी होता है, परंतु माता उसके नाराज होनेकी कुछ भी परवा न कर अपने उस व्यवहारको नहीं छोड़ती; क्योंकि उसका हृदय स्नेहसे भरा है, वह बच्चेका परम हित चाहती है। इसी प्रकार स्नेह-सुधाके असीम सागर भगवान्, जिनके स्नेहकी एक बूँदने ही विश्वकी सारी माताओंके हृदयोंमें पैठकर उनको अनादिकालसे स्नेहमय बना रखा है, अपने प्यारे बच्चोंके लिये उनके हितार्थ ही दण्ड-विधान किया करते हैं। उनका दण्ड-विधान वैसा ही होता है, जैसे माता बच्चेको आगके समीप जानेसे रोककर उसे अलग कर देती है, नहीं मानता तो कभी-कभी बाँध देती है, अथवा उसके हाथसे छूरी या और कोई ऐसी चीज, जो उसको नुकसान पहुँचानेवाली है और उसने मोहवश ले रखी है, जबरदस्ती छीन लेती है; और बुरे आचरण न छोड़नेपर डराती-धमकाती है। भगवान् के विधानद्वारा मनुष्यमें विषय-भोगोंके योग्य शक्ति न रहना, विषयोंसे अलग होनेको बाध्य होना, विषयोंका जबरदस्ती छिन जाना या नाश हो जाना आदि कार्य इसी श्रेणीके हैं। वास्तवमें विषय-भोग—दुनियाके धन-धाम, यश-कीर्ति, स्त्री-पुत्र आदि पदार्थ तो मनुष्यको नरकाग्निकी ओर ले जानेवाले हैं, जो इनमें रचता-पचता है वह दु:ख-दावानलमें दग्ध होनेसे नहीं बच सकता। भला, भगवान् जो हमारे परम सुहृद् और परम हितैषी हैं, ये वस्तुएँ हमें क्यों देने लगे? और क्यों हमें इनमें आसक्त रहनेकी स्वतन्त्रता प्रदान करने लगे? जो लोग केवल इन वस्तुओंकी रक्षा और प्राप्तिमें ही भगवान् की दया समझते हैं, वे बड़ी भूल करते हैं। ये वस्तुएँ तो हमें संसार-सागरमें डुबोनेवाली हैं, दयालु भगवान् हमें संसार-समुद्रमें ढकेलनेके लिये इनको कैसे दे सकते हैं? माता क्या कभी प्यारी संतानको जान-बूझकर आरम्भमें मीठे लगनेवाले जहर-भरे लड्डू दे सकती है? क्या कभी उसे सोनेकी पिटारीमें रखकर कालनाग सर्प दे सकती है? क्या कभी उसे लाल-लाल लपटोंवाली आगमें झोंक सकती है? फिर भगवान् ही ये विषय-भोग देकर ऐसा क्यों कर सकते हैं? इसीलिये जब ये विषय नहीं रहते, जब विषय-नाशरूप सांसारिक दृष्टिका कोई दु:ख आता है, तब भगवान् के विश्वासी भक्तोंका चित्त हर्षसे नाच उठता है, वे उसको भगवत्कृपासे ओतप्रोत देखकर उसमें भगवत्कृपाकी माधुरी मूरतिके दर्शनकर शिशुकी भाँति उसको जोरसे पकड़ लेते हैं। उसमें उन्हें बड़ा आनन्द मिलता है, इस बातका प्रत्यक्ष अनुभव होता है कि हमपर भगवान् की बड़ी भारी दया है।

इसका यह अर्थ नहीं कि भगवान् से सांसारिक वस्तु माँगनेवालोंको वह नहीं मिलतीं। मिलती है, क्योंकि प्रत्येक वस्तु आती उन्हींके भंडारसे है, परंतु ऐसी चीजोंके माँगनेवाले गलती करते हैं। भगवान् पर ही आस्था रखनेवाले विश्वासी अर्थार्थी भक्त यदि कोई ऐसी चीज माँगते हैं तो भगवान् उन्हें दे देते हैं और फिर उसी तरह उसकी सँभाल भी रखते हैं, जैसे माता छोटे शिशुके हठ पकड़ लेनेपर उसे चाकू दे देती है, पर कहीं लग न जाय इस बातकी ओर सतर्क दृष्टि भी रखती है। भगवान् की दयाके रहस्यको जाननेवाला सच्चा निर्भर भक्त तो ऐसी चीजें माँगता ही नहीं। माँग भी नहीं सकता। उसकी दृष्टिमें इनका कोई मूल्य ही नहीं रहता। वह तो भगवान् की इच्छामें ही परम सुखी होता है। कभी माँगता है तो बस, यही माँगता है कि ‘भगवन्! मैं सदा तेरे इच्छानुसार बना रहूँ, तेरी इच्छाके विपरीत मेरे चित्तमें कभी कोई वृत्ति ही न उदय हो।’ भगवान् मंगलमय हैं, उनकी अनिच्छामयी इच्छा भी कल्याणमयी है, अतएव इस प्रकारकी प्रार्थना करनेवाला भक्त भी मंगलमयी इच्छावाला अथवा सर्वथा इच्छारहित-नि:स्पृह बन जाता है। वह नित्य-निरन्तर भगवान् के चिन्तनमें ही लगा रहता है और उसीमें उसको शान्ति मिलती है, जरा-सी देर भी किसी कारणसे भगवान् का विस्मरण हो जाता है तो वह उस मछलीसे भी अनन्तगुणा अधिक व्याकुल होता है, जो जलसे अलग करते ही छटपटाने लगती है। वह संसारमें सर्वत्र, सब ओर, सब समय अपने प्रभुकी मुनि-मन-मोहिनी छबिको देखता और पल-पलमें पुलकित होता रहता है। सारा विश्व उसे अपने प्रभुसे भरा दीखता है, इससे स्वाभाविक ही वह सबकी सेवा करता है, सबको सुख पहुँचाता है। किसी भी भेषमें आये हुए पिताको पहचान लेनेपर जैसे सुपुत्र उसका अपमान और अहित नहीं कर सकता, उसे किंचित् भी दु:ख नहीं पहुँचा सकता, इसी प्रकार संसारके प्रत्येक जीवके भेषमें भक्त अपने भगवान् को पहचानकर उनका सत्कार और हित करता है तथा प्राणपणसे सुख पहुँचानेकी ही चेष्टा करता है। जो लोग केवल किसी एक स्थान और मूर्तिविशेषमें ही भगवान् को मानकर अन्यान्य स्थानोंमें उनका अभाव मानते हैं, वे भगवान् के स्वरूपको बहुत छोटा बना देते हैं, वे एक प्रकारसे भगवान् का तिरस्कार करते हैं, ऐसे लोगोंकी पूजासे भगवान् प्रसन्न नहीं होते, ऐसा भागवतमें कहा है।

मूर्ति-पूजा

इसका यह अर्थ नहीं कि मूर्ति-पूजा नहीं करनी चाहिये। संसारमें ऐसा कौन है जो किसी-न-किसी प्रकारसे मूर्ति-पूजा नहीं करता; सारा जगत् ही मूर्तिपूजक है। जो अपनेको मूर्तिपूजक नहीं मानते, वे भी अपने किसी गुरु या नेताके चित्र या स्टेच्यू (पाषाण-निर्मित मूर्ति)-को देखकर उसका सम्मान करते हैं। भगवान् को न माननेवाला रूसी भी लेनिनकी मूर्तियोंके सामने सलामी करता है। झंडेका अभिवादन क्या मूर्ति-पूजा नहीं है? झंडा कौन-सा सजीव पदार्थ है? परंतु उसका लोग बड़ा सम्मान करते हैं और उसके तनिक-से अपमानमें अपना और अपने देशका अपमान समझते हैं। समाधि या कब्रपर फूल चढ़ाना, उसे नमस्कार करना क्या मूर्ति-पूजा नहीं है। मातृभूमि—स्वदेश आदि नाम और उनके कल्पित रूपोंपर प्राण दे देना क्या प्रतीकपूजा नहीं है? मुसलमान भाई मूर्तिका खण्डन करके क्या प्रकारान्तरसे मूर्तिको महत्त्व नहीं देते? परंतु इसमें और हिंदू भक्तोंकी मूर्ति-पूजामें बड़ा अन्तर है, हिंदू भक्त पाषाण या धातुकी मूर्तिकी पूजा ही नहीं करता, वह तो केवल अपने प्रभुकी पूजा करता है। मूर्तिमें वह उन्हीं सच्चिदानन्दघन इष्टदेवको देखता है, उसकी दृष्टिमें वह पत्थर, मिट्टी या धातु नहीं है, वही सच्चिदानन्दघन सर्वव्यापी भगवान् हैं जिनके एक अंशमें सारे जड-चेतन विश्व-ब्रह्माण्ड भरे हैं, परंतु जो भक्तपर प्रसन्न होकर यहाँ श्यामसुन्दररूपसे विराजित हो उसकी पूजा ग्रहण कर रहे हैं। इसीसे कहीं-कहींपर भगवत्-मूर्तियोंका चलना, बोलना, हँसना, वरदान देना आदि सुना जाता है, जो वास्तवमें सत्य है। मूर्ति चैतन्य होनेपर सहज ही ऐसा होता है। यही ‘अर्चावतार’ है। भगवान् कब, कहाँ नहीं हैं? वे भक्तके भावसे प्रसन्न होकर चाहे जहाँ, चाहे जिस रूपमें अथवा अपने नित्य दिव्य विग्रहस्वरूपमें, चाहे जब प्रकट हो सकते हैं।

‘हरि ब्यापक सर्बत्र समाना।

प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना॥’

श्रीरामचरितमानसमें भगवान् शिवजीके ये वचन हैं, जो सर्वथा सत्य हैं। अग्नि अव्यक्तरूपसे सब चीजोंमें व्याप्त है, परंतु साधन करनेपर किसी भी वस्तुमें वह प्रकट हो सकती है, इसी प्रकार सर्वत्र निराकाररूपसे व्याप्त भगवान् भी भक्तके वश होकर व्यक्त हो जाते हैं। अवतार लेनेका भी यही रहस्य है।

अवतार

कुछ लोग कहते हैं कि भगवान् अवतार नहीं ले सकते। परंतु ऐसा कहना भगवान् की सर्वशक्तिमत्तामें कमी करना है। भगवान् क्या नहीं कर सकते? इसीसे वे जब जहाँपर आवश्यक समझते हैं, वहीं अपने दिव्य विग्रहको प्रकट करते हैं। एक बात यह ध्यानमें रखनेकी है कि भगवान् के अवतारोंमें कोई छोटा-बड़ा नहीं है। सबमें पूर्ण भगवत्-शक्ति पूर्णरूपसे निहित है, साक्षात् भगवान् ही जब अवतरित होते हैं—हमारे बीचमें आते हैं, तब उनकी शक्तिमें न्यूनाधिकताका तो कोई सवाल ही नहीं रह जाता। यह दूसरी बात है कि कहीं वे आवश्यक न समझकर अपनी कम शक्तियोंको प्रकट करें और कहीं अधिकको! कहीं अधिक समयतक लीला करें, कहीं अल्प कालमें ही अन्तर्धान हो जायँ। परंतु इससे उनके स्वरूपमें कोई अन्तर नहीं पड़ता। वह सदा एकरस और समान है। उनका निर्गुण ब्रह्मरूप गुणातीत है, उसमें किसी भी गुण या गुणात्मक जगत् का भाव नहीं है। उनका विष्णुरूप शुद्ध सत्त्वगुणसम्पन्न है, जो भृगुजीकी लात सहकर उनके पैर पलोटनेको तैयार हो जाता है, उनका विश्वरूप अच्छे-बुरे सभी गुणोंसे सम्पन्न है—‘ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये। मत्त एवेति तान्विद्धि’ ‘मत्त: परतरं नान्यत् किंचिदस्ति धनंजय’ भगवान् कहते हैं, सारे सात्त्विक, राजस, तामस-भाव मुझसे ही उत्पन्न जानो, हे धनंजय! मेरे अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं। इसी प्रकार उनके गुणस्वरूप हैं। ब्रह्माण्डोंमें स्थित श्रीविष्णु सत्त्वस्वरूप हैं, श्रीब्रह्मा रजोगुणरूप हैं और श्रीशंकर तामसरूप हैं, यही शंकर जहाँ समष्टि-सदाशिवरूपमें रहते हैं, वहाँ परम कल्याणमय, सत्त्वगुणसे भी ऊँचे उठे होते हैं। इसी प्रकार भगवती काली संहाररूपिणी—तमोमयी हैं, माता शक्ति जगज्जननी सृजनकारिणी—रजोमयी हैं, जगद्धात्री माता उमा पोषणकारिणी—सत्त्वमयी हैं। इनके अतिरिक्त भक्तोंको परम आनन्द देनेवाले, भक्तोंके जीवन-धन, उनकी परम गति, परम आश्रय वे दिव्य अवतार-विग्रह हैं। इनमें लीला और शक्तिके प्रकाशके तारतम्यसे श्रीराम और श्रीकृष्ण दो विशेष हैं। इनमें लीलाकी दृष्टिसे श्रीराम मर्यादाके आदर्श और सत्त्वगुणसम्पन्न हैं और श्रीकृष्ण लीलामय और सर्वगुणसम्पन्न हैं। ये और इसी प्रकार अन्यान्य सभी उन एक ही भगवान् के स्वरूप हैं, इनमेंसे जो स्वरूप, जिसको अच्छा लगे, जिसकी जिस स्वरूपमें प्रीति हो, वह अपनी प्रकृतिके अनुसार सद्‍गुरुकी आज्ञासे उसीको अपने जीवनका ध्येय, परम इष्टदेव मानकर अनन्यभावसे उसीकी उपासनामें प्राणोत्सर्ग कर दे। न दूसरेको बुरा बतावे और न दूसरेकी ओर ललचावे, ‘स्वधर्मे निधनं श्रेय:’ की भगवदुक्तिको याद रखते हुए संदेह-संशयरहित होकर निश्चल चित्तसे परम श्रद्धाके साथ सदा-सर्वदा अपने इष्टकी ही उपासना, सेवा और चिन्तनमें लगा रहे। श्रीशंकरकी अनन्य उपासिका, अपना अनन्त जीवन सदाके लिये श्रीशिवके चरणोंमें समर्पण कर देनेवाली भगवती उमाकी यह उक्ति सदा याद रखनी चाहिये—

महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम।

जेहि कर मन रम जाहि सन तेहि तेही सन काम॥

साकार रूप मायिक नहीं है

कुछ लोग भगवान् के साकार, सगुण दिव्य स्वरूपको मायिक बतलाते हैं और यह समझते हैं कि इसकी उपासना मन्द अधिकारियोंके लिये है, जो ऊँचे अधिकारी हैं वे तो इस मायासे परे शुद्ध सच्चिदानन्द ब्रह्मकी अभेद-भावसे उपासना करते हैं। शुद्ध ब्रह्मकी अभेदोपासना भी उत्तम है, इसमें कोई संदेह नहीं, परंतु भगवान् के साकार दिव्य स्वरूपको मायिक और मन्द अधिकारियोंके सेवनयोग्य ही बतलाना बड़ी भारी गलती है। भगवान् ने तो श्रीगीता और श्रीभागवतमें इस दिव्य स्वरूपकी बड़ी महिमा गायी है। बल्कि कुछ भक्तोंके मतमें तो भगवान् ने ब्रह्म-शब्दवाच्य निर्विशेष स्वरूपको अपने आधारपर स्थित बतलाया है। कम-से-कम भगवान् का स्वरूप दिव्य, नित्य अमायिक है और ब्रह्मज्ञानियोंके द्वारा भी सेव्य है, इसमें तो कोई संदेह नहीं है। हाँ, उस परम आनन्दमय दिव्य विग्रहकी अवहेलना करनेसे ज्ञानमार्गके उपदेशक उसके महान् सुखसे वंचित अवश्य रह जाते हैं। मायिक माननेवालेके सामने भगवान् उस मुनिमनहारी अपने दिव्य साकार स्वरूपसे प्रकट नहीं होते। इसीसे तो संतोंका यह परम रहस्यमय मत है कि ज्ञानमार्गके पन्थी भगवान् के दिव्य साकार स्वरूपके दर्शन नहीं कर सकते। उनके मनमें माया घुसी रहती है, इससे उन्हें जहाँ-तहाँ माया ही दीखती है। वे भगवान् में भी मायाका आरोप करते हैं, कोई-कोई साकार, सगुण भगवान् को ब्रह्मसे अभिन्न मानकर भी प्राय: कह देते हैं कि यह विद्याकी उपाधिसे युक्त हैं और हमारे लिये वैसे ही हैं जैसे महान् अमृत-समुद्रमें डूबे हुएके लिये एक गिलास जल। यह एक गिलास जल भी उस अमृत-समुद्रका ही अभिन्नांश है; परंतु एक तो अलग गिलासमें है (मायामें है), दूसरे अंश है, हम जब पूर्णमें स्थित हैं तो हमें इस उपाधियुक्त अंशसे क्या प्रयोजन है? वास्तवमें यह अहंकारोक्ति है। ऐसा कहना और मानना—अनुचित है, परंतु जो ऐसा मानते हैं, मानें, उनके मानने-न-माननेसे भगवान् के स्वरूपमें कोई हानि-लाभ नहीं होता; अवश्य ही उनकी मूढ़तापर भगवान् हँसते हैं। भगवान् ने कहा है—

अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।

परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्॥

मूढ़ लोग मेरे इस परम रहस्यको न जानकर कि मैं समस्त विश्व-ब्रह्माण्डोंका अधीश्वर भक्तोंके प्रेमवश और अपनी जगत्-लीलाको व्यवस्थित रखनेके लिये दिव्य विग्रह प्रकटकर दिव्य लीला करता हूँ, मुझ मनुष्य-शरीरधारी भगवान् को नहीं पहचानते हैं। मायासे उनके हृदयमें मोह हो रहा है। मेरी अलौकिकी मायासे तरनेका उपाय मुझ मायापतिकी शरणागति ही है। (गीता ७।१४) परंतु वे लोग मुझको नहीं भजते। मैं जो क्षर जड-संसारसे अतीत अक्षर आत्मासे उत्तम हूँ, (गीता १५।१८) सबकी प्रतिष्ठा हूँ, (गीता १४।२७) सब पुरुषोंसे श्रेष्ठ पुरुषोत्तम हूँ—

यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्।

स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत॥

(गीता १५। १९)

हे अर्जुन! इस प्रकार जो मूढ़तासे रहित तत्त्वज्ञ पुरुष मुझ पार्थसखा वासुदेव श्रीकृष्णको ‘पुरुषोत्तम’ जानता है, वह सब कुछ जान गया है, वह फिर सर्वभावसे केवल मुझको ही भजता है।

भगवान् को न पहचाननेवाला, शरीरधारी समझकर उनकी अवहेलना करनेवाला ‘भगवान्’ के शब्दोंमें ही ‘मूढ’ है और उनको सर्वश्रेष्ठ पुरुषोत्तम जाननेवाला ही ‘असंमूढ’ है। भगवान् ने इसको गुह्यतम रहस्य बतलाया है। (गीता १५। २०)

यही भगवान् निराकाररूपसे विश्वमें उसी प्रकार व्याप्त हैं जिस प्रकार सूर्यकी रश्मियाँ निराकाररूपसे जगत् में पसरी हुई हैं। यह दृष्टान्त पूरा भाव नहीं बतला सकता, केवल शाखाचन्द्रन्यायसे समझानेके लिये है। मतलब यह कि भगवान् के साकार विग्रह दिव्य और नित्य हैं और वे महान् रहस्यमय परम तत्त्व हैं। इसका यह मतलब नहीं कि निराकार तत्त्व उनसे पृथक् है या उनका अपेक्षाकृत लघु स्वरूप है। निराकार ही साकार है, साकार ही निराकार है, निराकार साकारका रश्मि-स्वरूप है, तो साकार भी निराकारका ही प्रकट अग्निकी भाँति व्यक्त स्वरूप है। एक होते हुए ही दोनों स्वरूप नित्य हैं। यद्यपि यथार्थ ज्ञानी और भक्त निराकार-साकारमें वस्तुत: कोई स्वरूपगत भेद नहीं समझते तथापि ज्ञानीको निराकार और भक्तको साकार स्वरूप ही अधिक प्रिय है। ज्ञानी भगवान् के निराकार-स्वरूप ब्रह्ममें मिल जाना चाहता है, और भक्त सदा-सर्वदा भगवान् के साकार विग्रहके चरणोंकी सेवामें ही परमानन्दका अनुभव करता है। इसीसे यह रहस्य माना जाता है कि ज्ञानी ब्रह्म बन सकता है, परंतु (साकार सगुण) भगवान् नहीं बन सकता। जहाँ वह भगवान् बनना चाहता है, वहाँ ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। उस अवस्थामें उसे साकार सगुण भगवान् की सेवा और लीलाके आनन्दसे वंचित होना पड़ता है, जो भक्तके लिये सबसे बड़ा दु:ख है। इसीलिये भक्त इस वासना-बीजको अपने अंदर बड़ी सतर्कतासे सुरक्षित रखता है कि ‘मैं कभी भगवान् की लीलासे अलग न रहूँ।’ जन्म-जन्मान्तरकी परवा नहीं करता, कितने ही जन्म हों, किसी भी योनिमें जाना पड़े, परंतु प्यारे भगवान् का हृदयसे कभी विछोह न हो, श्यामसुन्दर कभी आँखोंसे ओझल न हों, वह प्राणधन प्रियतम मोहन सदा सामने नाचता रहे, उसकी भ्रुकुटिको देखता हुआ मैं सदा अपने जीवनको उसकी रुचिके अनुकूल बिताता रहूँ। जीवन उसकी लीलाका क्रीडनक बन जाय, उसमें अपनापन कुछ रहे ही नहीं। भक्त कहते हैं—

न नाकपृष्ठं न च पारमेष्ठ्यं

न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम्।

न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा

समंजस त्वा विरहय्य काङ्क्षे॥

(श्रीमद्भा० ६।११।२५)

‘भगवन्! तुम्हें छोड़कर मुझको ध्रुवलोक, इन्द्रपद, सार्वभौम-राज्य, पाताल-राज्य, योगसिद्धि और अपुनर्भव—मुक्ति आदि किसीकी भी इच्छा नहीं है।

वरं देव मोक्षं न मोक्षावधिं वा

न चान्यं वृणेऽहं वरेशादपीह।

इदं ते वपुर्नाथ गोपालबालं

सदा मे मनस्याविरास्तां किमन्यै:॥

(पद्मपुराण)

देव! आप वरदाता ईश्वरोंके भी ईश्वर हैं, आप सब कुछ दे सकते हैं; परंतु मैं आपसे मोक्ष या मोक्षतकका कोई भी पदार्थ लेना नहीं चाहता। नाथ! आप श्रीगोपालबालमूर्तिसे मेरे मन-मन्दिरमें सदा विराजित रहें, इसके सिवा मुझे और कुछ भी नहीं चाहिये।

धर्मार्थकाममोक्षेषु नेच्छा मम कदाचन।

त्वत्पादपंकजस्याधो जीवितं दीयतां मम॥

मोक्षसालोक्यसारूप्यान् प्रार्थये न धराधर।

इच्छामि हि महाभाग कारुण्यं तव सुव्रत॥

(नारदपांचरात्र)

भगवन्! धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—इन चारोंमेंसे मुझे किसीकी भी इच्छा नहीं है। मेरे इस जीवनको सदा अपने चरणतलमें लुटाये रखें। हे धरणीधर! हे महाभाग! मैं सालोक्य, सारूप्यादि मोक्षकी प्रार्थना नहीं करता। हे सुव्रत! मैं तो केवल आपकी करुणा चाहता हूँ।

दिवि वा भुवि वा ममास्तु वासो

नरके वा नरकान्तक प्रकामम्।

अवधीरितशारदारविन्दौ

चरणौ ते मरणेऽपि चिन्तयामि॥

(मुकुन्दमाला)

हे नरकान्तक! मेरा निवास स्वर्गमें हो, पृथ्वीपर हो, चाहे नरकमें हो, इसका मुझे कोई दु:ख नहीं है और तो क्या, मृत्यु-समयमें भी मैं तुम्हारे शरत्कालीन अरविन्दकी अवज्ञा करनेवाले चरणारविन्दका चिन्तन करूँगा।’

इसी परम कल्याणमय वासना-बीजके कारण वह भगवान् की नित्य-लीलामें नित्य सम्मिलित रहता है, इसका यह अभिप्राय नहीं कि वह भगवत्तत्त्वके ज्ञानसे शून्य होता है या उसे कर्मबन्धनमें बँधे रहना पड़ता है, उसका कर्मबन्धन तो उसी दिन टूट गया था, जिस दिन उसने भगवान् को अपने प्राण सौंप दिये थे। ज्ञानकी तो बात ही क्या है, जब ज्ञानके मूल स्रोत भगवान् स्वयं उसके बाहर-भीतर नित्य विहार करते हैं, तब ज्ञान तो उसे स्वयमेव ही प्राप्त है। ज्ञानका चरम फल मुक्ति उसके चरणोंका आश्रय पानेके लिये सदा लालायित रहती है, परंतु वह मुक्तिको पिशाचिनी समझकर उससे दूर रहता है और भक्तिको बड़े प्रेमसे सदा हृदयमें छिपाये रखता है। ‘मुक्ति निरादर भगति लुभाने।’*

भगवान् की नित्य-लीला

भगवान् की नित्य-लीलामें कभी विराम नहीं है, स्थूल जगत् की लीला तो हम सभी देखते हैं, परंतु दुर्भाग्यवश भ्रमसे उसको उनकी लीला न समझकर कुछ और ही समझे हुए हैं। भगवान् तो स्पष्ट इशारा करते हैं कि तुम जगत् का जो रूप देखते हो, वह असली नहीं है, ‘ऐसा मिलेगा नहीं’, ‘न रूपमस्येह तथोपलभ्यते’, हो तो मिले। परंतु हम भगवान् की इस उक्तिपर ध्यान ही नहीं देते, और अपने मन:कल्पित स्वरूपको सत्य समझकर तुच्छ विषयोंके पीछे मारे-मारे फिरते और नित्य नया दु:ख मोल लेते हैं। इस स्थूलके पीछे एक सूक्ष्म जगत् —अन्तर्जगत् है। उसमें प्रधानतया दो स्तर हैं—एकमें स्थूल विश्व-ब्रह्माण्डोंके संचालन-सूत्रोंको हाथमें लिये हुए भगवान् की विभिन्न अनन्त शक्तियाँ अनवरत क्रिया करती हैं, स्थूल जगत् के बहुत बड़े-बड़े परिवर्तन इस अन्तर्जगत् की शक्तियोंके जरा-से यन्त्र घुमानेसे ही हो जाते हैं। यह स्तर स्थूल और अपेक्षाकृत बाह्य है, दूसरा सूक्ष्म और आभ्यन्तर स्तर है, जिसमें भगवान् अपने परिकरोंसहित नित्य-लीला करते हैं, जो संसारकी समस्त लीलाओंका आधार है और जिसमें एक-से-एक आगे अनेक स्तर हैं। भगवान् की परम कृपासे ही इन सारे रहस्योंका पता लगता है। सगुण साकार भगवत्-स्वरूपके अनन्य भक्त ही अन्तर्जगत् के इस सूक्ष्मतर स्तरमें प्रवेश कर सकते हैं और भगवत्कृपासे अधिकार-प्राप्त होकर वे आगे बढ़ते-बढ़ते एक स्तरके बाद दूसरे स्तरमें प्रवेश करते हुए अन्तमें उस सर्वोपरि परम सूक्ष्मतम स्तरमें पहुँच जाते हैं, जहाँ भगवान् की अत्यन्त गुह्यतम मधुर लीलाएँ होती रहती हैं, इसी सूक्ष्मतम स्तरको विशेष स्तरभेदसे श्रीरामभक्त ‘साकेत’, श्रीकृष्णभक्त ‘गोलोक’, श्रीशिवभक्त ‘कैलास’, परमधाम, महाकारण आदि कहते हैं। यही भगवान् का लौकिक-सूर्य-चन्द्रके प्रकाशसे परे, वरं इन सबको प्रकाश देनेवाले दिव्य प्रकाशसे संयुक्त नित्य दिव्यधाम है, इसकी लीलाएँ अनिर्वचनीय होती हैं। यहींकी लीलाओंका कुछ स्थूल अंश और वह भी बहुत ही थोड़े परिमाणमें—अनन्त जलनिधिके एक जलकणसे भी अल्प परिमाणमें श्रीअयोध्या, जनकपुर, चित्रकूट, पंचवटी और श्रीवृन्दावन, मथुरा और द्वारकामें उस समय प्रकट हुआ था, जिस समय स्वयं भगवान् अपने प्रिय परिकरोंसहित अयोध्यामें श्रीरामरूपमें और व्रजमें श्रीकृष्णरूपमें प्रकट हुए थे। उनका यह नित्यविहार आज भी वहाँ होता है, भाग्यवान् जन देख पाते हैं! वस्तुत: भगवान् के अवतरणके साथ ही उनके नित्यधामका भी अवतरण होता है। उसीमें भगवान् की लीलाएँ होती हैं, इसीसे लीलाधामोंकी इतनी महिमा है!

ईश्वर-विश्वासकी आवश्यकता

जो यथार्थ ज्ञानमार्गके उपासक या सच्चे भक्त हैं, उनके लिये तो यह प्रश्न ही नहीं बन सकता कि ‘ईश्वर हैं या नहीं’। उनकी दृष्टिमें यह प्रश्न पागलके प्रलापके सिवा और कुछ नहीं है। जो चराचर विश्वको भगवान् में और भगवान् को विश्वमें व्याप्त देखते हैं या जिनकी आँखोंके सामने भगवान् ललित त्रिभंग नवीन घनश्यामस्वरूपसे सदा थिरकते रहते हैं, उनके सामने ईश्वरके होने-न-होनेकी चर्चा करना उनका अपमान करना है, ईश्वरको कोई माने या न माने, इससे उनका कुछ भी बनता-बिगड़ता नहीं और न ईश्वरका ही कुछ बनता बिगड़ता है। उल्लूके सूर्यको न माननेसे सूर्यके अस्तित्वमें कोई बाधा नहीं पड़ती; ईश्वरके होनेकी बात तो उन लोगोंसे कहनी है जो मनुष्य होकर भी ईश्वरको भूले हुए हैं और इसके परिणामस्वरूप जो दु:खके अनन्त सागरमें डूबनेवाले हैं। भारतवर्षमें भी अनीश्वरवादी इन्द्रियाराम मनुष्य हुए थे; परंतु यहाँ इस बातका निर्णय ऋषि-मुनियोंने प्रत्यक्ष अनुभवके आधारपर बहुत पहले कर दिया था, लोग प्राय: मान गये थे। कुछ ही समय पूर्वतक भारतमें ऐसे आदमीका खोजनेपर मिलना कठिन था, जो ईश्वरपर अविश्वास रखता हो। श्रीआद्यशंकराचार्य-सदृश वेदान्तके महान् आचार्यसे लेकर ग्रामीण अशिक्षित किसानतक सभी स्त्री-पुरुष सरलभावसे ईश्वर और उनकी लीलाओंमें विश्वास करते थे। इसीलिये हमारे इधरके ग्रन्थोंमें ईश्वर-सिद्धिपर विशेष उल्लेख नहीं मिलता, जो कुछ मिलता है वह अधिकांश ईश्वर-प्राप्तिके साधनोंके विषयमें ही मिलता है। ईश्वरके सम्बन्धमें जब कोई शंका ही नहीं रह गयी थी, तब उसके निराकरणकी क्या आवश्यकता थी? इधर कुछ समयसे विदेशी-भाषा-भावके अत्यधिक संसर्गसे हमारी संस्कृतिमें विकृति आरम्भ हुई और उसीका यह कटु फल है कि आज भारतमें जन्मे हुए भी कुछ लोग ईश्वरको और धर्मको स्वीकार करनेमें सकुचाते हैं, अथ च विद्याबुद्धिमें अपनेको किसीसे कम नहीं मानते। यह जडता अत्यन्त ही दुष्परिणामकारिणी होगी। भगवान् सुबुद्धि दें, जिससे भारत अपने सनातन सत्य आदर्शसे च्युत न हो। आज जो दु:ख-कष्टके पहाड़ टूट रहे हैं, इनका बहुत कुछ कारण भगवान् के आश्रयको भुला देना है। और जबतक भगवान् के अधिष्ठानसे शून्य सुखका प्रयत्न जारी रहेगा, तबतक सुख-शान्तिका स्वप्न कदापि सत्य नहीं हो सकता।

सब फल ईश्वर ही देता है

यदि हमें सुख-शान्तिकी अभिलाषा है तो हमारा सर्वप्रथम यही कर्तव्य होना चाहिये कि हम सर्वतोभावेन ईश्वरका आश्रय ग्रहण करें और उनके बलपर शान्तिके मार्गपर आगे बढ़ें। यह स्मरण रखना चाहिये कि सुख-शान्तिका स्रोत भगवान् के चरणोंसे ही निकलता है। हमें किसी अन्य उपायसे—साधनसे या किसी अन्य देवताकी उपासनासे—जो सुख या सुखोत्पादक भोग मिलते हैं वे भी, वहींसे आते हैं; कारण, खजाना वहीं है। और जिस पदार्थ, मनुष्य या देवतासे मनुष्य विषयोंको प्राप्त करता है, वह पदार्थ, मनुष्य या देवता भी वस्तुत: भगवान् ही है। भगवान् ने कहा है—

कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञाना: प्रपद्यन्तेऽन्यदेवता:।

तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियता: स्वया॥

यो यो यां यां तनुं भक्त: श्रद्धयार्चितुमिच्छति।

तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्॥

स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते।

लभते च तत: कामान्मयैव विहितान्हि तान्॥

(गीता ७। २०—२२)

‘विषयासक्त मनुष्य विषय-भोगोंकी कामनासे ज्ञानसे रहित हो जाते हैं और विषयोंकी प्राप्तिके लिये अपने-अपने स्वभावानुसार भाँति-भाँतिके नियम धारण करते हुए अन्य देवताओंको पूजते हैं। जो भक्त देवताके रूपमें मेरे ही जिस स्वरूपको श्रद्धासे पूजना चाहता है, उसकी मैं उसी स्वरूपमें श्रद्धा स्थिर कर देता हूँ, फिर वह मनुष्य श्रद्धाके साथ उसी देवताकी आराधना करता है और उसीके फलसे उक्त देवस्वरूपके द्वारा उसे इच्छित वस्तुएँ मिल जाती हैं, परंतु मिलती हैं मेरे विधानके अनुसार ही यानी उतनी ही, जितनी मेरे उक्त देवस्वरूपके अधिकारमें होती हैं और जितनी प्रदान करनेका उसका अधिकार होता है।’

एक आदमी किसी जिलेके अफसरकी सेवा करके उसे प्रसन्न करता है, जिलाधीश प्रसन्न होकर उसे उतना ही पुरस्कार दे सकता है, जितना देनेका उसको सरकारसे अधिकार मिला हुआ होता है और वह देता भी है राज्यके कोषसे ही। वह जिलाधीश राजाका प्रतिनिधि राजसत्ताका एक अंग है, राज्य-शरीरका एक अवयव है, इससे उसकी पूजा प्रकारान्तरसे राज्याधीश नरेशकी ही पूजा होती है, परंतु वह एक क्षुद्र जिलेके अफसरके रूपकी होती है, इससे उसे वह फल नहीं मिल सकता, जो स्वयं राजाकी सीधी पूजासे मिल सकता है। जिलाधीशका पुजारी राजाके महलका अन्तरंग सेवक नहीं बन सकता, परंतु राजाका सेवक महलके अंदर जानेका अधिकारी हो जाता है। ‘मद्भक्ता यान्ति मामपि।’ भगवान् ने आगे कहा भी है—

येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विता:।

तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्॥

(गीता ९। २३)

‘अर्जुन! श्रद्धालु भक्त जो किसी फल-सिद्धिके लिये दूसरे देवताओंको पूजते हैं, वे भी वस्तुत: मेरी ही पूजा करते हैं; क्योंकि वे देव-स्वरूप भी मेरे ही हैं, परंतु उनकी वह पूजा अविधिपूर्वक होती है।’ भगवान् ही सबके आधार, संचालक, फलदाता, फलभोक्ता स्वामी हैं, इस बातको नहीं जाननेके कारण ही मनुष्य भगवान् को छोड़कर सुखके लिये अन्य देवताओंका एवं अन्यान्य जड उपायोंका आश्रय लेते हैं। इसीसे वे बार-बार दु:खोंमें गिरते हैं ‘च्यवन्ति ते।’ देवताओंके उपासक देवलोकमें तो जा सकते हैं, परंतु ईश्वरके अस्तित्वको न मानकर जड प्रकृतिके या केवल अर्थके उपासकोंकी तो बहुत बुरी गति होती है, चाहे वह अर्थोपासना व्यक्तिगत सुखके लिये हो या जाति अथवा राष्ट्रके हितकी कामनासे हो। जहाँ ईश्वरको भुलाकर केवल अर्थ-लाभसे सुख, समृद्धि और अभ्युदयकी इच्छा और चेष्टा होगी, वहाँ पाप-पुण्य या सत्कर्म-दुष्कर्मका विचार नहीं रहेगा, व्यक्तिगत स्वार्थके लिये दूसरे व्यक्तिका और जाति या राष्ट्रके स्वार्थके लिये दूसरी जाति या राष्ट्रका सर्वनाश करनेमें कुछ हिचकिचाहट नहीं होगी, मनुष्य स्वार्थसे अंधा हो जायगा, परिणाममें उसे अन्धतम गति ही मिलेगी! आजके मनुष्यों, जातियों और राष्ट्रोंमें इसी भावका पोषण हो रहा है और इसीसे द्वेष, वैर, हिंसा और हत्याओंकी संख्या बढ़ रही है। ईश्वररहित अहिंसा या सत्य भी शीघ्र ही विकृत होकर प्रकारान्तरसे हिंसा और असत्यका रूप धारण कर लेते हैं; अभिमान, ईर्ष्या, दर्प, असहिष्णुता आदि दोष तो सद्‍गुणका बाना पहिनकर बढ़ते रहते ही हैं। भगवद्भक्तिसे शून्य केवल कुछ बाह्य आचरणोंसे सिद्धि, सुख और शान्ति नहीं मिल सकती।

दैवीसम्पत्तिकी आवश्यकता

इसका यह अर्थ नहीं कि दैवीसम्पत्तिके गुणोंकी भक्तिमें जरूरत नहीं है, प्रत्युत भक्तिकी तो कसौटी ही दैवीगुणोंका प्रादुर्भाव है। ईश्वर-भक्तमें ही दैवीगुण नहीं होंगे तो और किसमें होंगे? जो लोग यह मानते हैं कि ईश्वर-भक्तिमें दैवीगुणोंकी कोई आवश्यकता नहीं या कोई ईश्वर-भक्त होकर भी दैवीगुणोंसे हीन रह सकता है, वे भ्रम फैलाते हैं। यह बात वैसे ही है, जैसे कोई यह कहे कि सूर्यमें अन्धकार है, या अग्निमें दाहकता नहीं है। जहाँ यथार्थ भक्ति है, वहाँ दैवीगुण अवश्य ही रहते हैं। हाँ, ईश्वर-भक्तिके बिना केवल दैवीगुण चिरकालतक नहीं टिक सकते, किसी कारणसे कुछ आते हैं, परंतु शीघ्र ही उनका विनाश हो जाता है। जहाँ स्थायी दैवीगुण है, वहाँ भक्ति अवश्य है और जहाँ यथार्थ भक्ति है, वहाँ दैवीगुण भी अवश्य होने चाहिये।

ईश्वरवादियोंके पाप

इस बातको न माननेके कारण ही तो बड़ा अनर्थ हो गया। ईश्वरको माननेका दावा करनेवाले लोग दैवीगुणोंकी परवा न करके इस भ्रममें पड़ गये कि दैवीगुण हों या न हों, चाहे हम कितना ही पाप क्यों न करते रहें, ईश्वर-भक्तिसे हमारा सब कुछ आप ही ठीक हो जायगा। इसमें कोई संदेह नहीं कि ईश्वर-भक्तिसे बड़े-से-बड़े महापातक भी आगमें सूखे ईंधनके समान तत्काल भस्म हो जाते हैं, परंतु जो भक्तिके बलपर पापोंको आश्रय देते हैं, भक्तिके सहारे पाप करते हैं, ईश्वरके नामपर मनमाना अनाचार, अत्याचार और व्यभिचार करते हैं, उनके पाप तो वज्रलेप होते हैं। बात-बातमें ईश्वरका नाम करनेवाले लोग जब दम्भसे भर गये, मनमाना पाप करने लगे, ईश्वर-भक्तिके स्वाँगमें अनाचार होने लगा, भक्तका वेश व्यभिचारी लोगोंके कामाचारका साधन बन गया, दूसरोंपर झूठा रोब जमाकर उन्हें फुसलाकर झूठी तसल्ली या आश्वासन देकर उनसे धन ऐंठना, उनसे पूजा प्राप्त करना और उनकी बहिन-बेटियोंपर बुरी नजरोंसे देखना आरम्भ हो गया, मन्दिरों और तीर्थोंपर व्यभिचारके अड्डे बन गये, भगवान् की मूर्तितकके गहने पुजारियोंद्वारा ही चुराये जाने लगे, तब स्वाभाविक ही ऐसे ईश्वरवादियोंके प्रति लोगोंमें अश्रद्धा, घृणा और दुर्भावना उत्पन्न हुई और साथ ही यह भी भाव जाग्रत् हुआ कि जब ईश्वर इन लोगोंका कुछ भी नहीं करता जो उसके नामपर इतना जुल्म करते हैं, तब उस ईश्वरको माननेमें क्या लाभ है? यद्यपि लोगोंका यह निश्चय भ्रमपूर्ण है तथापि गहरा विचार न करनेपर ऐसा होना अस्वाभाविक नहीं है। आज जो अनीश्वरवादकी लहर बह रही है, इसमें इन भेड़की खालमें घुसे हुए भेड़ियोंने—ज्ञानी और भक्तरूपको कलंकित करनेवाले मनुष्योंने बड़ी मदद की है। यह सब हुआ और हो रहा है, परंतु वास्तवमें बात तो यह है कि ऐसे लोगोंको ईश्वरवादी मानना ही भूल है, जो ईश्वरके नामपर पाप करता है, सर्वव्यापी ईश्वरको मानकर भी पाप करते नहीं सकुचाता, छिपकर पाप करनेमें कोई संकोच नहीं करता, वह वास्तवमें ईश्वरको मानता ही कहाँ है? इनपर लोगोंके आचरणोंसे ईश्वरकी सत्तामें कोई अन्तर नहीं पड़ता और न सच्चे ईश्वरभक्तोंका ही कुछ बिगड़ता है।

हमें क्या करना चाहिये?

ईश्वरमें विश्वास होना यद्यपि बड़े सौभाग्यका विषय है, परंतु यह सौभाग्य हमलोगोंको प्राप्त करना ही पड़ेगा। सत्संग, ईश्वरविश्वासी महात्माओंकी वाणी, सत्-शास्त्रोंका अध्ययन, ईश्वर-प्रार्थना आदि उपायोंसे ईश्वरमें विश्वास बढ़ता है; इसलिये मनुष्यको बड़ी सावधानीके साथ अपने आसपास सभी प्रकारका ऐसा वातावरण रखना चाहिये जिसमें ईश्वर-विश्वास बढ़ानेवाली ही सब चीजें हों। ऐसा करनेमें यदि कोई सांसारिक हानि हो तो उसे ईश्वरका आशीर्वाद समझकर सहर्ष स्वीकार करना चाहिये; क्योंकि ईश्वरमें अविश्वास करनेसे बढ़कर अन्य कोई भी हानि नहीं है, इससे मनुष्यका जितना पतन होता है, उतना अन्य किसी बातसे नहीं होता।

नित्य नियमपूर्वक भगवान् में विश्वास बढ़ानेवाले ग्रन्थ पढ़ने चाहिये। भगवद्विश्वासी पुरुषोंसे यथावसर मिलनेकी चेष्टा करनी चाहिये। उनके अनुभव और उनकी शिक्षाओंको सत्य समझकर श्रद्धाके साथ उनके बतलाये हुए साधनोंको कार्यान्वित करना चाहिये। ऐसा करते-करते जब भगवत् में विश्वास बढ़ जायगा, तब भगवत्कृपाका सूर्य उदय होकर हमारे सारे अन्धकारको दूर कर देगा, फिर हमें सर्वत्र आनन्द, सब ओर शान्ति, सबमें विज्ञानानन्दघन परमात्माका भाव दिखायी देगा। यदि और भी सौभाग्य हुआ तो सारी चेतनता, समस्त आनन्द, सम्पूर्ण प्रेम, अखिल ज्ञान और दिव्य माधुर्यकी घनमूर्ति, नव-जलधर, नवकिशोर, नटवर, ललित त्रिभंगभंगीसे मधुर-मुरलीमें सुर भरते हुए हमारे दृष्टिगोचर होंगे, उस अनन्त सौन्दर्यराशि, स्मित-हास्य, पीतवसन और वनमालाधारी, गोप-गोपिका-परिवेष्टित श्याम मूरतिको देखकर फिर कुछ भी देखना, करना-धरना शेष न रह जायगा। उस दिव्य आनन्द-रस-महोदधिमें डूबकर हम गा उठेंगे—

मुकुटके रंगनिपर इन्द्रको धनुष वारौं,

अमल कमल वारौं लोचन बिसालपर।

कुंडलकी प्रभा पै कोटिक प्रभाकर वारौं,

कोटिक मदन वारौं वदन रसालपर॥

तनके बरन पै नीरद सजल वारौं,

चपला चमकि मनमोहनकी मालपर।

चाल पै मराल वारौं, मेरो तन मन वारौं,

कहा कहा वारि डारौं नंदजूके लालपर॥