कुसंग छोड़कर महापुरुषोंका संग करो
भगवान् श्रीकृष्ण भक्तराज उद्धवजीसे कहते हैं—
संगं न कुर्यादसतां शिश्नोदरतृपां क्वचित्।
तस्यानुगस्तमस्यन्धे पतत्यन्धानुगान्धवत्॥
(श्रीमद्भा० ११।२६।३)
केवल स्त्रीसंग और पेट-पालनेमें लगे हुए दुष्ट पुरुषोंका संग कभी नहीं करना चाहिये। जैसे अन्धेके पीछे चलनेवाला अन्धा गढ़ेमें गिरता है वैसे ही ऐसे दुष्ट पुरुषका अनुसरण करनेवाला पतित होता है।
ततो दु:संगमुत्सृज्य सत्सु सज्जेत बुद्धिमान्।
सन्त एतस्यछिन्दन्ति मनोव्यासंगमुक्तिभि:॥
(श्रीमद्भा० ११।२६।२६)
इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि दुष्ट पुरुषोंका संग छोड़कर सत्पुरुषोंका संग करे, क्योंकि सत्पुरुष सदुपदेशसे उसके मनकी आसक्तिको मिटा देते हैं।
सन्तोऽनपेक्षा मच्चित्ता: प्रशान्ता: समदर्शिन:।
निर्ममा निरहंकारा निर्द्वन्द्वा निष्परिग्रहा:॥
(श्रीमद्भा० ११।२६।२७)
सब प्रकारकी अपेक्षासे रहित, चित्तको मुझे अर्पण कर देनेवाले, प्रशान्त, समदर्शी, ‘मेरा और मैं’ पनसे रहित, सुख-दु:खादि द्वन्द्वोंसे रहित तथा अपरिग्रही जन ही सत्पुरुष हैं।
तेषु नित्यं महाभाग महाभागेषु मत्कथा:।
सम्भवन्ति हिता नृृणां जुषतां प्रपुनन्त्यघम्॥
(श्रीमद्भा० ११।२६।२८)
महाभाग उद्धव! उन महाभाग्यशाली सत्पुरुषोंमें सदा मेरी कथाएँ ही हुआ करती हैं, जिन हितकारिणी कथाओंके सुननेसे श्रोताओंके सब पाप नष्ट हो जाते हैं और हृदय निर्मल हो जाता है।
ता ये शृण्वन्ति गायन्ति ह्यनुमोदन्ति चादृता:।
मत्परा: श्रद्दधानाश्च भक्तिं विन्दन्ति ते मयि॥
(श्रीमद्भा० ११।२६।२९)
मेरे परायण रहनेवाले जो पुरुष उन कथाओंको श्रद्धा और आदरपूर्वक कहते, सुनते, गाते और अनुमोदन करते हैं, वे मेरी भक्तिको प्राप्त होते हैं।
भक्तिं लब्धवत: साधो: किमन्यदवशिष्यते।
मय्यनन्तगुणे ब्रह्मण्यानन्दानुभवात्मनि॥
(श्रीमद्भा० ११।२६।३०)
साधो! मुझ अनन्त गुणशाली, आनन्द तथा अनुभवस्वरूप ब्रह्मकी भक्ति प्राप्त होनेपर फिर और कौन विषय उसे मिलना बाकी रह जाता है?
यथोपश्रयमाणस्य भगवन्तं विभावसुम्।
शीतं भयं तमोऽप्येति साधून् संसेवतस्तथा॥
(श्रीमद्भा० ११।२६।३१)
जैसे भगवान् अग्निदेवका आश्रय लेनेसे शीत, भय, अन्धकारका नाश हो जाता है वैसे ही सत्पुरुषोंका सेवन करनेवालोंके भी पाप, भय, अज्ञान दूर हो जाते हैं।
निमज्ज्योन्मज्जतां घोरे भवाब्धौ परमायनम्।
सन्तो ब्रह्मविद: शान्ता नौर्दृढेवाप्सु मज्जताम्॥
(श्रीमद्भा० ११।२६।३२)
जैसे जलमें डूबकर डुबकी खानेवालेके लिये दृढ़ नौका परम आश्रय है वैसे ही इस भवसागरमें डुबकी यानी नीची-ऊँची योनियोंमें आने-जानेवाले जीवोंके लिये शान्त ब्रह्म महापुरुष ही एकमात्र गति हैं।
अन्नं हि प्राणिनां प्राण आर्तानां शरणं त्वहम्।
धर्मो वित्तं नृणां प्रेत्य सन्तोऽर्वाग् बिभ्यतोऽरणम्॥
(श्रीमद्भा० ११।२६।३३)
जैसे अन्न प्राणियोंका प्राण है, जैसे मैं (भगवान्) आर्तजनोंका आश्रय हूँ, जैसे मरनेके बाद धर्मरूप धन ही मनुष्योंके साथ जाता है, वैसे ही महापुरुष संसारसमुद्रमें पड़नेसे डरते हुए पुरुषकी रक्षा करनेवाले हैं।
सन्तो दिशन्ति चक्षूंषि बहिरर्क: समुत्थित:।
देवता बान्धवा: सन्त: सन्त आत्माहमेव च॥
(श्रीमद्भा० ११।२६।३४)
सूर्य बाहरी नेत्रोंको प्रकाशित करते हैं, परंतु महापुरुष तो हृदयके अंदरके ज्ञानरूप नेत्रोंको प्रकाशित करते हैं। ऐसे महापुरुष ही यथार्थ देव और बान्धव हैं तथा ऐसे महापुरुष ही मेरी आत्मा और मेरा रूप हैं।