मनन करनेयोग्य

‘ग्रन्थोंके भरोसे मत पड़े रहो, अब इसी बातकी जल्दी करो कि मनको देहभावसे खाली करके भगवान् के प्रेमसे भर दो। दूसरे साधन कालके मुँहमें डाल देंगे, गर्भवासके कष्टोंसे कोई भी मुक्त नहीं करेगा।’

‘भगवान् के पास मोक्षका कोई थैला थोड़े ही रखा है, जो उसमेंसे थोड़ा-सा निकालकर वे तुम्हें भी दे देंगे? इन्द्रिय-विजयसे मनको साधो, निर्विषय बन जाओ। बस, मोक्षका यही मूल है।....तुका कहता है, फल तो मूलके ही पास है; उस मूलको पकड़ो; शीघ्र श्रीहरिकी शरण लो।’

‘उन करुणाकरसे करुणा माँगो, अपने मनको साक्षी रखकर उन्हें पुकारो। कहीं दूर जाना-आना नहीं पड़ता; वे तो अन्तरमें साक्षीरूपसे विराजमान हैं। तुका कहता है वे कृपाके सिन्धु हैं, भवबन्धनको तोड़ते उन्हें कितनी देर लगती है!’

‘ग्रन्थोंको देखकर फिर कीर्तन करो, तब उसमें (ज्ञानमें) फल लगेगा। नहीं तो व्यर्थ ही गाल बजाया और वासना तो हृदयमें रह ही गयी। तप-तीर्थाटन आदि कर्मोंकी सिद्धि तभी होगी जब बुद्धि हरिनाममें स्थिर होगी। तुका कहता है, अन्य झगड़ोंमें मत पड़ो। बस, यही एक संसार-सार हरि-नाम धारण कर लो।’

‘श्रीहरि-गोविन्द नामकी धुन जब लग जायगी, तब यह काया भी गोविन्द बन जायगी, भगवान् से दुराव—कोई भेदभाव नहीं रह जायगा। मन आनन्दसे उछलने लगेगा, नेत्रोंसे प्रेम बहने लगेगा। कीट भृंग बनकर जैसे कीटरूपमें फिर अलग नहीं रहता, वैसे तुम भी भगवान् से अलग नहीं रहोगे।’

‘जो जिसका ध्यान करता है, उसका मन वही हो जाता है। इसलिये और सब बातोंको अलग करो, पाण्डुरंगकी ध्यान-धारणा करो।’

—संत तुकाराम