मानवताका कल्याण

मनुष्य मूलमें परमात्माका सनातन अंश जीव है, पीछे मनुष्य है, उसके बाद वह अमुक देशवासी, तदनन्तर क्रमश: अमुक वर्ण, अमुक जाति, अमुक सम्प्रदाय और अमुक परिवारका है। मूलमें वह भगवान् का अंश है। भगवान् मेंसे आया है, अब भी भगवान् में है और अन्तमें फिर भगवान् में ही जायगा। उसका मूल आत्मस्वरूप भगवान् से अभिन्न है। जीवके नाते भगवान् उसके अंशी हैं। समस्त चराचर प्राणियोंका भी वस्तुत: यही स्वरूप है। इस नाते सभी भगवत्स्वरूप हैं—सभी आत्मस्वरूप हैं। सभी वन्दनीय हैं और सभी आत्मीय हैं। श्रीमद्भागवतमें कहा गया है—

खं वायुमग्निं सलिलं महीं च

ज्योतींषि सत्त्वानि दिशो द्रुमादीन्।

सरित्समुद्रांश्च हरे: शरीरं

यत्किञ्च भूतं प्रणमेदनन्य:॥

(११।२।४१)

‘आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, नक्षत्र-मण्डल, जीवसमूह, दिशाएँ, वृक्ष-लतादि, नदियाँ, समुद्र आदि जो कुछ भी हैं सभी श्रीहरिके शरीर हैं। यह समझकर अनन्य मनसे सबको प्रणाम करना चाहिये।’

सीय राममय सब जग जानी।

करौं प्रनाम जोरि जुग पानी॥

इसलिये जगत् में कोई भी प्राणी ‘पर’ नहीं है, अतएव द्वेष्य कोई भी नहीं है, सभी प्रेमके पात्र हैं। जो मनुष्य प्राणियोंसे द्वेष करता है उससे भगवान् कभी प्रसन्न नहीं होते।

भक्तके लक्षण बतलाते समय सबसे पहले भगवान् ने बतलाया—

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्र: करुण एव च।

(गीता १२।१३)

‘जो सब प्राणियोंमें द्वेषसे रहित, सबका स्वार्थरहित प्रेमी, मित्र और हेतुरहित दयालु है......वही मेरा प्रिय भक्त है।’

सबमें भगवान् को देखने-समझनेवाला मनुष्य या सबमें अपने आत्माकी तसवीर देखनेवाला मनुष्य कैसे किससे वैर और द्वेष करेगा?

अब हौं कासों बैर करौं?

कहत पुकारत प्रभु निज मुख सो घट घट हौं बिहरौं॥

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उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध।

निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध॥

संक्षेपमें, यह मनुष्यका स्वरूप है और इसके अनुसार उसका कोई भी द्वेष्य नहीं हो सकता।

दूसरी दृष्टिसे देखें, तो भी मनुष्यको किसीसे द्वेष या वैर नहीं करना चाहिये।

मनुष्य जैसा करता है, वैसा ही भोगता है। जो कुछ देता है, वही अनन्तगुना होकर उसे वापस मिलता है—यह नियम है। अतएव एक मनुष्य या एक जाति किसीसे वैर या द्वेष करके उसका बुरा चाहेगी तो बदलेमें उसे भी वैर-द्वेष और बुरा चाहनेवाले ही मिलेंगे। और यह परम्परा यदि चलने लगे तो जगत् में उत्तरोत्तर वैर-विरोध और फलस्वरूप परस्परका अहित-साधन बढ़ता ही जायगा। इस स्थितिमें मनुष्य अपने मूल भगवत्स्वरूप या आत्मस्वरूपको तो भूल ही जायगा। वह मानवताको भी खोकर नृशंस, क्रूर पिशाच हो जायगा। फिर सारा जगत् पैशाचिक कुकृत्योंकी क्रीडा-स्थली—फलत: प्रत्यक्ष घोर नरक ही हो जायगा! इसीलिये शास्त्र, संत और महात्मा पुरुष बारंबार अपने शब्दों, आचरणों, त्याग-तपस्याओं और बलिदानोंसे जगत् के जीवोंको यह शिक्षा देते रहते हैं कि किसीसे वैर-विरोध मत करो, किसीसे द्वेष मत करो, किसीका बुरा मत चाहो और किसीका भी बुरा कभी न करो। इसीमें अपना और विश्वका कल्याण है। बुराईका फल बुराई ही होता है और भलाईका भलाई। अतएव बुराई करनेवालेकी बुराईको भूलकर उसकी भी भलाई करो। श्रीशंकरजीने यही तो कहा है—

उमा संत कइ इहइ बड़ाई।

मंद करत जो करइ भलाई॥

भला करनेवालेका तो भला सभीको करना चाहिये और मनुष्यत्वको प्राप्त प्राणी ऐसा करते ही हैं। उत्तम मनुष्य या संत पुरुष तो वह है कि जो बुरा करनेवालोंका भला करके जगत् के सामने उच्च आदर्श रखता है और जगत् को घोर नरकानलसे निकालकर शान्ति-सुखरूप भगवत्-राज्यकी ओर ले जाना चाहता है। उसके साथी और समर्थक थोड़े ही होते हैं, पर वह जिस सत्यका साक्षात्कार कर चुका है, उसे वह कभी छोड़ नहीं सकता। वह तो प्रह्लाद, अम्बरीष, ईसा, हरिदास आदि भक्तोंकी भाँति मारनेकी चेष्टा करनेवालोंका भी भला ही करता है। स्वयं कष्ट सहकर भी दूसरोंका कल्याण ही करना चाहता है। ऐसे ही महान् पुरुषोंसे जगत् को भलाईकी शिक्षा मिलती है। अतएव भविष्यमें जगत् की और अपनी भलाई हो, इस उद्देश्यसे भी किसीके साथ न तो द्वेष-वैर करना चाहिये और न किसीका कभी अहित ही करना चाहिये। याद रखना चाहिये—

पर हित सरिस धर्म नहिं भाई।

पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥

इतना होनेपर भी, संसार त्रिगुणात्मक है। भगवान् ने इसकी सृष्टि ही गुण-वैषम्यको लेकर की है। इसीसे यहाँ प्रत्येक प्राणीके स्वभाव, स्थिति, रूप और रुचिमें कुछ-न-कुछ वैषम्य अवश्य पाया जाता है। इस वैषम्यमें गुणोंका तारतम्य ही प्रधान कारण है। मनुष्यको निरन्तर ऊँचे उठनेकी चेष्टा करते रहना चाहिये। उसके लिये साधन है। प्रकृति स्वभावत: अधोगामिनी है। वह सहज ही नीचेकी ओर जाती है। सात्त्विक-गुणविशिष्ट पुरुष भी यदि निश्चेष्ट होकर बैठ जायगा तो वह धीरे-धीरे रजोगुणकी ओर बढ़ने लगेगा। इसी प्रकार रजोगुणी मनुष्य तमोगुणकी ओर! अतएव निरन्तर यह चेष्टा करनी चाहिये कि जिससे वह अपनी स्थितिसे उत्तरोत्तर ऊपरको ही उठता रहे। जबतक परमात्माकी प्राप्ति न हो जाय तबतक किसी भी स्थितिमें संतोष न करे। श्रेष्ठ स्थितिका संतोष वस्तुत: संतोष नहीं है, प्रमाद है और इस प्रमादसे उस स्थितिकी मृत्यु हो जाती है और तत्काल उससे निम्नस्तरकी दूसरी स्थिति उत्पन्न होकर वहाँ अपना अधिकार जमा लेती है। इसीसे भगवान् ने चेतावनी दी है—

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।

(६।५)

‘अपने द्वारा आप ही अपना उद्धार करे, अपनेको कभी नीचे न गिरने दे।’ त्रिगुणात्मक संसारमें कर्मवश गुणवैषम्य होता है तथा गुणवैषम्यको लेकर लोगोंमें प्रकृतिभेद होता है और उसीके कारण परस्पर संघर्ष भी होते हैं। संसारमें कोई भी मनुष्य संघर्षसे सहज ही बच नहीं सकता। कई जगह तो संघर्ष आवश्यक हो जाता है। पर संघर्षके समय भी अपने मूल स्वरूपको न भूले तथा उस स्वरूपमें स्थित रहते हुए ही परिस्थितिके अनुसार यथायोग्य वर्णाश्रमोचित एवं न्यायप्राप्त कर्मोंका भगवत्प्रीत्यर्थ आचरण करे। कर्म स्वरूपत: यज्ञ, दान और तप आदि होनेपर भी तामसी भाव होनेपर तामस हो जाते हैं और उनका फल होता है अध:पतन। श्रीमद्भगवद्‍गीताके सत्रहवें और चौदहवें अध्यायमें इसका स्पष्ट उल्लेख है और युद्धरूप घोर कर्म भी शुद्ध धर्मरक्षाकी भावनासे होनेपर सात्त्विक एवं भगवत्प्रीत्यर्थ होनेपर तो भगवत्प्राप्तिका हेतु होता है।

अर्जुनको महान् घोर युद्ध करना पड़ा और उसमें उन्हें अपने गुरुजनोंका भी वध करनेको बाध्य होना पड़ा था। गुरुजनों और आत्मीयोंको युद्धमें एकत्रित देखकर ही अर्जुन घबरा गये थे और उन्होंने भगवान् से कहा था कि—

अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्।

यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यता:॥

(१।४५)

‘अहो! बड़े ही खेदकी बात है कि हमलोग राज्य-सुखके लोभसे स्वजनोंकी हत्या करनेको तैयार होकर महान् पाप करनेका निश्चय कर चुके हैं।’

भगवान् ने अर्जुनको पहले तो यह समझाया कि अपने न्याय्य राज्यकी प्राप्तिके लिये क्षत्रियका धर्मयुद्धमें संलग्न होना पाप नहीं है। क्षत्रियके लिये ऐसा धर्मयुद्ध स्वर्गका मुक्तद्वारस्वरूप है। अत: धर्मयुद्धमें तो पाप लगेगा ही नहीं। हाँ, ‘यदि तुम इस धर्मयुद्धसे मुख मोड़ोगे तो अवश्य तुम्हारे स्वधर्म और सुयशका नाश होगा तथा तुमको पाप लगेगा।’

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि।

तत: स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥

फिर, ‘राज्यसुखका लोभ’ रहनेपर शायद धर्मयुद्धमें कुछ विकृति आ जाय, क्योंकि लोभ पापका मूल है। अतएव भगवान् ने यह कहा कि तुम राज्यके लिये युद्ध मत करो।’ ‘सुख-दु:ख, हानि-लाभ, जय-पराजयको समान समझकर फिर युद्धमें लगो। ऐसा करनेपर तुम्हें पाप होगा ही नहीं।’

सुखदु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।

ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥

(गीता २।३८)

आगे चलकर तो यहाँतक कह दिया कि ‘तुम अपने सारे कर्मोंको अध्यात्मचित्तसे मुझमें समर्पण कर दो और निराशी, निर्मम तथा विगत-संताप होकर युद्ध करो।’ (गीता ३। ३०) अर्थात् भगवत्प्रीत्यर्थ युद्ध करो। गुण-वैषम्ययुक्त जगत् में कर्तव्यपालनके लिये युद्ध अनिवार्य है; वह करना ही होगा। करना धर्म है; न करना पाप है। परंतु करना होगा इस बातको समझकर कि हम जिनके साथ युद्ध कर रहे हैं, वे भी वस्तुत: भगवान् के ही स्वरूप हैं; यथा—

मत्त: परतरं नान्यत् किंचिदस्ति धनंजय॥

‘अर्जुन! मेरे अतिरिक्त किंचिन्मात्र भी दूसरी वस्तु नहीं है।’ (गीता ७। ७) और ‘स्वकर्मोंके द्वारा उन भगवान् की ही पूजा करनी होगी, जिनसे समस्त प्राणी उत्पन्न हुए हैं और जो सबमें व्याप्त हैं एवं इस प्रकार उन्हें पूजकर ही जीवनको पूर्णतया सफल बनाना होगा।’

यत: प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।

स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव:॥

(गीता १८।४६)

सारांश यह कि न तो इस सिद्धान्तको कभी भूलना चाहिये कि जगत् के समस्त प्राणी भगवान् से निकले हैं—उन्हींके सनातन अंश हैं—उन्हींके स्वरूप हैं; और न अपने कर्तव्यकर्मसे ही कभी विच्युत होना चाहिये। निरन्तर भगवान् का स्मरण करते हुए आवश्यकता पड़नेपर युद्धसदृश घोर कर्म भी करना चाहिये। परंतु करना चाहिये केवल भगवान् की प्रीतिके लिये ही, अन्य किसी उद्देश्यसे नहीं। यही गीताकी शिक्षा है।

मनुष्य-जीवनका उद्देश्य है भगवत्प्राप्ति। और मनुष्यकी गति होती है उसके अन्त समयकी मानस-स्थितिके अनुसार। भगवान् ने अर्जुनसे यही कहा है—

अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।

य: प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशय:॥

(गीता ८।५)

‘जो पुरुष अन्तकालमें मुझको (भगवान् को) स्मरण करता हुआ शरीर छोड़कर जाता है, वह मेरे भावको (भगवद्भावको) ही प्राप्त होता है इसमें कुछ भी संदेह नहीं है।’

क्योंकि अन्तकालके भावके अनुसार ही उसको अगली गतिकी प्राप्ति होती है—

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।

तं तमेवैति....................................................॥

(गीता ८। ६)

मान लीजिये—अंग्रेज और जर्मन सिपाहियोंमें युद्ध हो रहा है। दोनोंमें परस्पर द्वेष तथा वैरभाव है और उस वैरभावको लेकर ही वे लड़ रहे हैं। लड़ते-लड़ते किसी अंग्रेजको गोली लगी और वह मर गया। अब यदि मरते समय अन्तिम क्षणमें उसे उस जर्मन वैरीकी स्मृति रहेगी तो सम्भव है वह अगले जन्ममें जर्मन होगा और पूर्वजन्ममें अपनेको जिस अंग्रेज जातिका पुरुष मानकर उसमें ममत्व तथा आसक्तिके पाशमें बद्ध था, अब उसी अंग्रेज जातिका शत्रु बनकर उसे मारनेकी चेष्टा करेगा! पिछले दिनोंके भारतके हिंदू-मुसलमानके झगड़ोंको ही ले लीजिये। यदि कोई मुसलमान हिंदू-वैरका स्मरण करता हुआ मरता है तो सम्भव है वह अगले जन्ममें अन्तकालकी स्मृतिके अनुसार हिंदू होगा और मुसलमानोंको मारेगा। इसी प्रकार मुसलमानके वैरको मनमें रखकर मरनेवाला हिंदू भी मुसलमान बनकर हिंदुओंको मारेगा। अतएव द्वेष और वैर रखनेमें तो कोई लाभ है ही नहीं। सर्वथा हानि-ही-हानि है।

परंतु जहाँ धर्मत: न्यायप्राप्त कर्तव्यवश मरने-मारनेकी आवश्यकता हो, वहाँ कैसे मरना-मारना चाहिये, जिसमें मरने और मारने दोनों ही कर्मोंमें परम कल्याणकी प्राप्ति हो? गीतामें इसकी शिक्षा दी गयी है। अन्तकालकी स्मृतिके अनुसार ही अगले जन्ममें गति प्राप्त होती है, यह कहकर भगवान् ने खास तौरपर अर्जुनसे कहा है—

तस्मात् सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।

मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥

(गीता ८। ७)

अतएव तुम सब समय मेरा स्मरण करो और युद्ध करो। इस प्रकार मुझमें मन-बुद्धि अर्पण कर चुके हुए तुम निस्सन्देह मुझको (भगवान् को) ही प्राप्त होओगे।

इसमें भगवान् ने चार बातें बतलायी हैं—

१—सर्वकालमें भगवत्स्मरण करना;

२—युद्ध करना;

३—इस प्रकार मन-बुद्धिका भगवान् के प्रति अर्पण,

और—

४—फलस्वरूप निस्सन्देह ही भगवत्प्राप्ति।

बस, इसीमें सारा रहस्य भरा है। मनुष्य बुद्धिसे निश्चय करता है और मनसे मनन। बुद्धिसे निश्चय कर लिया कि तत्त्वत: सब कुछ भगवान् हैं और सब कुछ भगवान् का है। श्रद्धा और प्रेमके साथ आज्ञाकारी सेवककी भाँति उनकी आज्ञाके अनुसार उन्हींके प्रीत्यर्थ सब कुछ करना है। उनकी सेवाके सिवा अन्य कुछ भी कर्तव्य नहीं है। और मनको उनकी सेवामें समर्पण करके यह स्वभाव बना लिया कि जिसमें एकमात्र उन परम प्रियतम प्रभुका ही सतत स्मरण होता रहे। मन दूसरी बात सोचे ही नहीं। जैसे पतिव्रता स्त्रीके मन, बुद्धि पतिके समर्पित हो जाते हैं, उसके सारे कर्म पति-सेवाके निश्चयसे ही होते हैं और उसका मन स्वाभाविक ही पतिसेवामें संलग्न रहता है। इससे भी बढ़कर—जैसे परम भाग्यवती प्रेममूर्ति गोपांगनाओंने भगवान् श्यामसुन्दरके मनमें अपने मनको, उनके प्राणोंमें अपने प्राणोंको मिलाकर उनके सुखके लिये समस्त दैहिक सम्बन्धोंको तिलांजलि दे दी थी—

ता मन्मनस्का मत्प्राणा मदर्थे त्यक्तदैहिका:।

(श्रीमद्भा० १०।४६।४)

उसी प्रकार निरन्तर भगवान् का स्मरण करते हुए जीवनके प्रत्येक क्षणको उन्हींकी संलग्नतामें बिताना और उनमें लगाये हुए मन-बुद्धिके द्वारा ही उन्हींके इच्छानुसार युद्ध भी करना। इसका फल निस्सन्देह भगवत्प्राप्ति होगा ही; क्योंकि जब कभी भी मृत्यु होगी—तभी उसके मन-बुद्धि भगवान् में ही लगे रहेंगे। अतएव अन्तकालकी भगवत्स्मृतिके सिद्धान्तानुसार उसे निश्चित ही भगवत्प्राप्ति होगी। वस्तुत: ऐसे भक्त भगवत्प्राप्तिकी भी परवा नहीं करते, वे तो अपने प्रियतम प्रभुकी सेवामें जन्म-जन्मान्तर बितानेकी विशुद्ध प्रेममयी कामना करते हैं। फिर प्रभु उनके लिये जो विधान कर देते हैं, वे उसीमें संतुष्ट रहते हैं; क्योंकि उनको तो जो कुछ भी करना या न करना है सब प्रभु-प्रीत्यर्थ ही है। [इसीलिये उनका ‘कुछ भी न करना’ भी (प्रभु-प्रीत्यर्थ) करना है; और सब कुछ करना भी (अपने लिये न होनेके कारण) न करना है।]

इस प्रकार प्रभुका स्मरण करते हुए मरनेवाला और प्रभुको पहचानकर उनके आज्ञानुसार उनकी सेवाके लिये ही धर्म तथा कर्तव्यकी प्रेरणासे किसीको न्यायोक्त दण्ड देनेवाला—दोनों ही परम कल्याणको प्राप्त होते हैं।

अतएव किसी भी प्राणीसे कभी द्वेष तथा वैर तो कभी भूलकर भी करना ही नहीं चाहिये; परंतु शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार न्यायप्राप्त कर्तव्य आ जानेपर हटना भी नहीं चाहिये। वहाँ अहिंसाका आश्रय लेकर और प्रतीकारशून्य होकर आततायीके हाथों मरने और भीख माँगकर खानेकी प्रवृत्ति धर्मसंगत नहीं है। अर्जुनने यही तो चाहा था। वे आततायियोंको मारनेमें पाप बतलाते थे और उनके हाथों मरनेमें अपना कल्याण मानते थे तथा ऐसे राज्यकी अपेक्षा भीख माँगकर खानेको उत्तम बताते थे। देखिये गीतामें उन्हींके शब्द—

निहत्य धार्तराष्ट्रान्न: का प्रीति: स्याज्जनार्दन।

पापमेवाश्रयेदस्मान् हत्वैतानाततायिन:॥

(१।३६)

यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणय:।

धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्॥

(१।४६)

गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके।

(२।५)

‘हे जनार्दन! धृतराष्ट्रके पुत्रोंको मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी। इन आततायियोंको मारनेपर तो हमें पाप ही लगेगा। इससे तो मैं हथियार छोड़ दूँ और इनका कुछ भी सामना न करूँ एवं ये धृतराष्ट्रके पुत्र हाथमें हथियार लेकर मुझको मार डालें तो वह मारना भी मेरे लिये विशेष कल्याणकारक होगा। अत: इन महानुभाव गुरुजनोंको न मारकर संसारमें मैं भीख माँगकर खाना भी कल्याणकारक समझता हूँ।’

आजकी अहिंसाकी व्याख्याके अनुसार तो हथियार छोड़कर बैठे हुए और कुछ भी प्रतीकार न करनेवाले अर्जुन पूरे सत्याग्रही थे। परंतु धर्मके साक्षात् आधार धर्मसंरक्षक स्वयं भगवान् ने अर्जुनकी इन उक्तियोंको अनार्योचित, स्वर्ग तथा कीर्तिकी नाशक, बिलकुल बेमौकेका मोह, नपुंसकत्व और हृदयका क्षुद्र दौर्बल्य बतलाया (गीता२।२)। और उन्हें सब प्रकारसे समझाकर युद्धके लिये तैयार किया एवं ऐसा उपदेश दिया कि जिससे इस प्रकारका धर्म-युद्ध ही भगवत्पूजन तथा भगवत्प्राप्तिका परम सफल साधन बन गया।

आज भगवान् श्रीकृष्णको, उनकी गीताको और धर्मशास्त्रोंको माननेवाले प्रत्येक भारतवासीको चाहिये कि वह किसी भी वर्ण, जाति या देशविशेषसे, मनुष्यसे, किसी प्राणीसे भी—जरा भी द्वेष न करके यथासाध्य सबकी सेवा करे और समय पड़नेपर कर्तव्यवश भगवत्-सेवाके ही भावसे निष्काम होकर राग-द्वेषरहित बुद्धिसे धर्मरक्षाके लिये कर्तव्यसे भी न चूके।

हाँ, यह बात जरूर याद रखनी चाहिये कि गीताकी किसी शिक्षाका दुरुपयोग कदापि न हो। गीतामें धर्मयुद्धकी आज्ञा है, इसलिये बात-बातमें युद्धकी ही घोषणा न की जाय। भगवान् श्रीकृष्णने स्वयं दूत बनकर यथासम्भव युद्ध टालनेकी ही चेष्टा की थी, परंतु जब दूसरा कोई साधन नहीं रहा, तब युद्ध करना पड़ा। इसी प्रकार धर्मसंगत और अनिवार्य प्रसंग आनेपर ही हथियार उठावें। किसीसे बेमतलब झगड़ा मोल न लें। जहाँतक बने सहनशील और क्षमापरायण हों। अपने प्रेमपूर्ण सद्भावों और सद्‍व्यवहारोंसे दूसरोंके चित्तको जीतनेकी चेष्टा करें। कभी किसीके साथ जरा भी दुर्व्यवहार करें ही नहीं। बल्कि अपनी हानि सहकर भी दूसरेका कल्याण करनेकी चेष्टा करें। हाँ, जब कोई आततायी प्राणी अन्यायपूर्वक उनके धर्मयुक्त अस्तित्वपर ही आक्रमण करे, और प्रेमपूर्ण व्यवहारका सर्वथा अनुचित लाभ उठाया जाय तब सिद्धान्तत: सावधान रहते हुए भगवत्प्रीत्यर्थ ही उस समयके न्यायप्राप्त कर्तव्यका—चाहे वह कितना ही घोर हो—नि:संकोच पालन करें। यही धर्म है और इसीमें मानवताका कल्याण है।