पाँच दिशाएँ

भगवान् बुद्धका सृगाल नामक एक शिष्य प्रतिदिन स्नान करके पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊपर और नीचे—इन छहों दिशाओंको प्रणाम किया करता था। एक दिन भगवान् ने कृपा करके उसे इन दिशाओंकी पूजाका रहस्य इस प्रकार समझाया—

माता-पिताको पूर्व दिशा समझना, गुरुको दक्षिण दिशा, पत्नीको पश्चिम, मित्र-बान्धवोंको उत्तर, सेवकोंको नीचेकी और साधु-ब्राह्मणोंको ऊपरकी दिशा समझना।

पूर्व दिशा अर्थात् माता-पिताकी पूजाके पाँच अंग हैं—

१—उनके काम करना, २—भरण-पोषण करना, ३—कुलमें प्रचलित सत्कार्योंको चालू रखना, ४—उनकी सम्पत्तिका हिस्सेदार बनना और ५—मरनेपर उनके नामसे दान-धर्म करना। इन पाँच अंगोंके द्वारा पूजित माता-पिता संतानपर पाँच प्रकारसे अनुग्रह करते हैं—१—उसको पापसे बचाते हैं, २—कल्याणकारी मार्गपर ले जाते हैं, ३—कला-कौशल सिखलाते हैं, ४—योग्य पत्नीके साथ उसका विवाह कर देते हैं और ५—उपयुक्त समयपर अपनी सम्पत्ति सौंप देते हैं।

दक्षिण दिशा अर्थात् गुरुकी पूजाके पाँच प्रकार हैं—१—गुरुके समीप आनेपर उठकर खड़े हो जाना, २—बीमार पड़नेपर उनकी सेवा करना, ३—उनकी दी हुई शिक्षाको श्रद्धापूर्वक समझ लेना, ४—उनके काम करना और ५—वे जो विद्या-दान करें उसे उत्तम रीतिसे ग्रहण करना। इन पाँच प्रकारोंसे पूजित गुरु अपने उस शिष्यपर पाँच प्रकारसे अनुग्रह करते हैं। १—सदाचार सिखाते हैं, २—उत्तम रूपसे विद्या-दान करते हैं, ३—अपनी सीखी हुई सम्पूर्ण विद्या सिखा देते हैं, ४—अपने आत्मीयस्वजनोंमें उसका गुण वर्णन करते हैं और ५—शिष्यको कहीं भी खान-पानकी अड़चन न भोगनी पड़े, इसकी व्यवस्था करते हैं।

पश्चिम दिशा अर्थात् पत्नीकी पूजाके पाँच अंग हैं—

१—उसका सम्मान करना, २—अपमान न होने देना, ३—एकपत्नीव्रतका पालन करना, ४—घरका कारोबार उसे सौंप देना और ५—वस्त्रालंकारकी कमी न होने देना। इन पाँच अंगोंसे पूजित पत्नी पतिपर पाँच प्रकारसे अनुग्रह करती है। १—घरमें सुव्यवस्था रखती है, २—नौकर-चाकरोंकी प्रेमसे सँभाल करती है, ३—पतिव्रता होती है, ४—पतिसे प्राप्त की हुई सम्पत्तिकी रक्षा करती है और ५—समस्त गृहकार्योंमें तत्पर रहती है।

उत्तर दिशा अर्थात् मित्रमण्डलकी पूजाके पाँच अंग हैं—

१—उन्हें प्रदान करनेयोग्य वस्तु देना, २—उनके साथ मीठा बोलना, ३—उनके उपयोगी बनना, ४—उनके साथ समताका बर्ताव करना और ५—निष्कपट व्यवहार करना। इन पाँच अंगोंसे पूजित मित्रमण्डल पाँच प्रकारसे अनुग्रह करता है। १—अचानक संकट आ पड़नेपर उसकी रक्षा करते हैं, २—ऐसे अवसरपर उसकी सम्पत्तिकी भी रक्षा करते हैं, ३—संकटमें घबरा जानेपर उसे धीरज देते हैं, ४—विपत्तिकालमें छोड़कर नहीं जाते और ५—उसके बाद उसकी संततिका भी उपकार करते हैं।

नीचेकी दिशा अर्थात् सेवकोंकी पूजाके पाँच अंग हैं—

१—उनकी शक्ति देखकर तदनुसार काम देना, २—पर्याप्त वेतन देना, ३—बीमार पड़नेपर देख-भाल करना, ४—उत्तम भोजन देना और ५—समय-समयपर उत्तम कामके बदलेमें उन्हें पुरस्कार देना। इन पाँच अंगोंसे पूजित सेवक अपने स्वामीपर पाँच प्रकारसे अनुग्रह करते हैं—१—स्वामीके उठनेसे पहले उठते हैं, २—स्वामीके सोनेके बाद सोते हैं, ३—स्वामीके सामानकी चोरी नहीं करते, ४—उत्तम प्रकारसे काम करते हैं और ५—स्वामीका यशोगान करते हैं।

ऊपरकी दिशा अर्थात् साधु-ब्राह्मणोंकी पूजाके भी पाँच अंग हैं—१—शरीरसे उनका आदर करना, २—वाणीसे आदर करना, ३—मनसे आदर करना, ४—भिक्षा लेने आवें तब उनका किसी प्रकार भी अपमान न करना और ५—उन्हें उपयोगी वस्तु देना। इन पाँच प्रकारसे पूजित साधु-ब्राह्मण गृहस्थपर पाँच प्रकारसे अनुग्रह करते हैं—१—उसको पापसे बचाते हैं, २—उसे कल्याणकारी मार्गपर ले जाते हैं, ३—प्रेमपूर्वक उसपर दया करते हैं, ४—उसे उत्तम धर्म सिखाते हैं और ५—शंका-निवारण करके उसके मनका समाधान करते हैं एवं उसे स्वर्गका मार्ग दिखाते हैं।

दान, प्रियवचन, अर्थचर्या(उपयोगी बनना)और समानात्मता— सबको अपने समान समझना—ये चार लोकसंग्रहके साधन हैं। माता-पिता यदि इन साधनोंका उपयोग न करते तो केवल जन्म देनेमात्रसे पुत्र उनका गौरव नहीं मानता। विज्ञ पुरुष इन चार साधनोंका उपयोग करके जगत् में ऊँचा पद प्राप्त करते हैं।