पंचमहायज्ञ
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धन:।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंग: समाचर॥
(गीता ३। ९)
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन! यज्ञके निमित्त किये जानेवाले कर्मको छोड़कर अन्य कर्ममें लगनेवाला यह मनुष्य कर्मद्वारा बँधता है, अतएव तुम आसक्तिरहित होकर यज्ञके लिये कर्मका भलीभाँति आचरण करो।
यज्ञार्थ कर्म क्या है?
‘यज्ञो वै विष्णु:’ इस श्रुतिके अनुसार यज्ञका अर्थ भगवान् विष्णु होता है; विष्णु समस्त चराचरमें व्याप्त हैं, इन विश्वरूप भगवान् की पूजाके लिये किया जानेवाला प्रत्येक कर्म यज्ञार्थ-कर्म है। यज्ञार्थ-कर्मसे बन्धन नहीं होता, बन्धन होता है स्वार्थ-कर्मसे। जो स्वार्थको छोड़कर, कर्म और उसके फलमें आसक्तिका त्याग कर केवल भगवत्-प्रीत्यर्थ अपने वर्णाश्रमानुकूल कर्तव्य-कर्म करता है वही यथार्थमें यज्ञार्थ-कर्म करनेवाला है और उसीको भगवत्कृपासे भवबन्धनसे मुक्ति प्राप्त होती है। इस बातको ध्यानमें रखकर मनुष्य अपनी प्रत्येक वैध चेष्टाको मुक्तिका साधन बना सकता है।
पंचमहायज्ञ
इसमें भी पंचमहायज्ञ तो प्रत्येक गृहस्थके लिये अत्यावश्यक नित्यकर्म हैं। इनका नाम महायज्ञ इसीलिये है कि इनका सम्बन्ध समस्त विश्वसे है। अन्यान्य यज्ञ प्रधानतया व्यक्तिगत लाभके लिये होते हैं, परंतु इन महायज्ञोंके तो सिद्धान्तमें ही विश्वकल्याण भरा है। विश्वरूप बने हुए भगवान् के पाँच स्वरूप हैं—ऋषि, देवता, पितर, मनुष्य और अन्यान्य भूत-प्राणी (पशु, पक्षी, वृक्ष, औषध, लता, गुल्म आदि)। इन पाँचोंका सम्बन्ध प्रत्येक प्राणीसे है। मनुष्य-प्राणी-जगत् में विवेकसम्पन्न है, वह इस बातको भलीभाँति हृदयंगम कर सकता है कि इन पाँचोंकी सहायतासे ही हमारा जीवन-निर्वाह होता है। वस्तुत: भगवान् की सृष्टिमें ऐसा एक भी पदार्थ नहीं है जो व्यर्थ हो और जिससे किसीको लाभ न पहुँचता हो एवं जिसकी सृष्टि, स्थिति या संहारके कार्यमें कहीं-न-कहीं आवश्यकता न हो। सभी प्राणियोंका परस्पर सम्बन्ध है। प्राणियोंके हितमें ही विश्वका हित है। अतएव भगवान् की सृष्टिका कोई भी पदार्थ, विश्वरूप भगवान् का कोई भी क्षुद्रतम स्वरूप, अथवा विश्व-शरीररूप कार्य-ब्रह्मका कोई भी अंग उपेक्षणीय नहीं है। इसलिये मनुष्यको विश्वके समस्त अंगोंका प्रतिनिधित्व करनेवाले इन पाँच अंगोंकी सेवा सदा करनी चाहिये। इनकी सेवासे सारे विश्वकी सेवा होती है, जहाँ विश्वका कल्याण है, वहाँ आत्मकल्याण तो है ही।
पंचमहायज्ञके सिद्धान्तको समझनेमें ही मनुष्यकी व्यष्टिगत क्षुद्रता नष्ट हो जाती है। वह देखता है कि भगवान् स्वयं विश्वमें अनेक रूप धारण करके स्थित हैं, वे ही ऋषि बनकर जगत् को ज्ञाननेत्र प्रदान करते हैं, वे ही देवता बनकर सबका पालन-पोषण करते हैं, वे ही पितर बनकर सबका कल्याण करते हैं, वे ही मनुष्य बनकर सबकी सहायता करते हैं और वे ही भूत-प्राणी बनकर सबका उपकार करते हैं। इस प्रकार भगवान् को सर्वत्र देखकर वह विनम्रभावसे उन्हें भोग लगाकर बचा हुआ प्रसाद स्वयं पाना चाहता है। यह प्रसाद ही अमृत है। अपनी कमाईसे पहले इन पाँचोंको तृप्त करे, इसके बाद जो कुछ बच रहे, उसे भगवत्प्रसाद समझकर स्वयं ग्रहण करे; ऐसा करनेवाला मनुष्य समस्त पापोंसे छूट जाता है। भगवान् कहते हैं—
यज्ञशिष्टाशिन: सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषै:।
भुंजते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥
(गीता ३।१३)
‘यज्ञसे शेष बचे हुए अन्नको खानेवाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापोंसे छूट जाते हैं, परंतु जो पापी मनुष्य केवल अपने लिये ही पकाते (कमाते) हैं वे पाप खाते हैं।’
अभिप्राय यह कि संसारमें मनुष्य जो कुछ भी उपार्जन करे उसको पहले ऋषि, देवता, पितर, मनुष्य और अन्य भूत-प्राणियोंकी सेवामें लगावे। फिर जो कुछ बच रहे उसीसे अपना निर्वाह करे। ऐसा करनेवाला ही पापोंसे छूटता है। जो ऐसा नहीं करता, केवल अपने मौज-शौक या अपने शरीर-पालनके लिये ही कमाता-खाता है, वह तो पाप कमाता है और पाप ही खाता है। पंचमहायज्ञका यही व्यापक अर्थ है और इसीके अनुसार सबको यथासाध्य करना चाहिये। यह विश्वरूप भगवान् की पूजा है और निष्कामभावसे इस प्रकार पूजा करनेवाले मनुष्यको भगवत्प्राप्ति होती है।
इसके सिवा दो बातें और विचारणीय हैं, एक तो यह कि इन पाँचोंसे हमारा बड़ा उपकार होता है। यदि हम उपकारका बदला कुछ भी न दें तो हम कृतघ्न होते हैं और कृतघ्नकी बहुत बुरी गति होती है। दूसरे, मनुष्यके जीवन-निर्वाहके लिये अनेकों जीवोंकी नित्य अनिवार्य हिंसा होती है, उसके पापसे बचनेके लिये भी शास्त्रविधिके अनुसार पंचमहायज्ञकी आवश्यकता है। इन दोनों बातोंको कुछ समझ लेना है—पहले तो यह समझ लेना है कि ऋषि, देवता, पितर, मनुष्य और अन्य प्राणियोंसे हमारा क्या उपकार होता है; और दूसरे यह समझना है कि मनुष्यके लिये प्रतिदिन अनिवार्य हिंसा कौन-सी होती है और उसके पाप-नाशके लिये शास्त्रमें क्या विधान है।
ऋषि
वेदके मन्त्रोंको अथवा सृष्टिके गुह्यतम रहस्योंको दिव्य दृष्टिसे देखनेवाले तत्त्वज्ञानी, ईश्वरभक्त, तपस्वी, सदाचारी, त्यागी, नि:स्वार्थी, अरण्यवासी, पुण्यजीवन, प्रात:स्मरणीय ऋषियोंकी कृपासे ही शास्त्रोंकी रचना हुई, जिनके द्वारा मनुष्योंके ज्ञाननेत्र खुले और उन्हें विविध भाँतिकी आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक विद्याओं और कलाओंकी प्राप्ति हुई। उन परम पूजनीय महापुरुषोंने अपना सारा तप:पूत जीवन अकेले जंगलोंमें रहकर ज्ञानके अर्जनमें लगाया और बड़े ही उदारभावसे अपने उपार्जित ज्ञानको बिना किसी बदलेकी भावनासे केवल लोकोपकारार्थ—भगवान् के सृष्टियज्ञमें पवित्र आहुति देनेके भावसे—ग्रन्थित करके वे हमलोगोंको दे गये और आज भी ग्रन्थोंके अतिरिक्त स्वयं वे हमारे बिना ही माँगे और बिना ही पहचाने परोक्षरूपसे हमारी सहायता कर रहे हैं। यदि भगवद्रूप ऋषिगण शास्त्रोंद्वारा हमें ज्ञान प्रदान न करते तो हमारी न मालूम क्या दशा होती और हमारा वह पशुजीवन प्राकृतिक पशुओंसे भी न मालूम कितना नीचे गिरा हुआ होता! ये ऋषिगण भगवान् की आध्यात्मिक शक्तिके अधिष्ठाता हैं और जगत् में सदा-सर्वदा आनन्दमय अध्यात्म-ज्ञानकी ज्योतिका विस्तार करते रहते हैं। इनके उपकारका कभी बदला नहीं चुकाया जा सकता।
देवता
देवताओंके द्वारा ही सृष्टिका समस्त कार्य चल रहा है। देवता श्रीभगवान् की अधिदैवशक्तिके अधिष्ठाता हैं और प्रत्येक क्रियामें इन देवताओंका हाथ रहता है। देवताओंके द्वारा ही विश्वकी समस्त क्रियाएँ सुसम्पन्न और सुरक्षित होती हैं। हमारे मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर आदि सब, इन देवताओंकी सहायतासे ही बराबर कार्य करते हैं। देवताओंकी शक्तिसे ही कर्म जड होनेपर फल उत्पन्न करता है। जल, अग्नि, वायु, अन्न आदिरूपमें देवता ही हमारा पोषण करते हैं। समयपर वर्षा बरसना, चन्द्र-सूर्यका नियमितरूपसे उदय और अस्त होना, ऋतुओंका बदलना आदि कार्य देवताओंके ही हैं। जगत् में स्वास्थ्य, आवश्यक पदार्थ और सुख-शान्तिकी प्राप्ति देवताओंकी कृपासे ही होती है। देवताओंका हमपर बड़ा भारी उपकार है। देवता नित्य और नैमित्तिक-भेदसे दो प्रकारके हैं। रुद्र, आदित्य, वसु, इन्द्र, प्रजापति, महाशक्ति आदि देव-देवियाँ नित्य हैं और सुकर्मवश देवयोनिको प्राप्त होनेवाले जीव एवं ग्रामदेवता, वनदेवता, कुलदेवता आदि नैमित्तिक हैं। दोनों ही प्रकारके देवताओंसे हमें सहायता मिलती है।
पितर
देवताओंकी भाँति पितर भी दो प्रकारके हैं—नित्य और नैमित्तिक। अर्यमा, अग्निष्वात्ता, सोमपा आदि पितर नित्य हैं, जो सृष्टिके आदिकालसे ही हमारी सहायतामें लगे हैं; तथा कर्मवश पितृलोकमें गये हुए हमारे पूर्वज नैमित्तिक पितर हैं। पितर भगवान् की आधिभौतिक शक्तिके अधिष्ठाता हैं। व्यक्तिगत और देशगत स्वास्थ्य, संतान, धन, विद्या आदिकी उन्नतिमें पितरोंका बहुत हाथ है। पितरोंकी कृपासे जगत् सुखी होता है। हमारे माता-पिता हमारे लिये कितना कष्ट सहते हैं, किस प्रकारसे स्वयं कष्ट सहकर हमारा पालन करते हैं, हमारे लिये उनके हृदयमें स्नेहका कितना अटूट भंडार भरा रहता है, इस बातका प्राय: सबको अनुभव है। माता-पिताके महान् उपकारका बदला संतान कब चुका सकती है? इसी प्रकार मरनेके बाद पितरलोकमें गये हुए पितर भी अपनी संतानकी हित-कामना और उनका हित-साधन करते रहते हैं। नित्य पितर तो माता-पिताकी भाँति नित्य ही स्नेहपूरित हृदयसे सबका उपकार करते रहते हैं।
मनुष्य
मनुष्योंसे मनुष्योंके उपकारका तो सबको अनुभव है। यहाँ तो परस्परकी सहायता बिना एक मिनट भी काम नहीं चल सकता। संसारमें ऐसा कोई मनुष्य नहीं है जो यह कह सके कि मेरी जीवनयात्रा किसी भी दूसरे मनुष्यकी सहायताके बिना केवल अपने ही बलपर चल रही है। देश, जाति और समाजका संगठन ही पारस्परिक सहायतासे जीवनको सहज और सुखमय बनानेके लिये है। राजा, बादशाह, विद्वान् आदि सभी दूसरे मनुष्योंसे सहायता प्राप्त करते हैं।
भूतप्राणी
भूतप्राणियोंका तो कहना ही क्या है? पशु-पक्षियोंसे और ओषधि, लता, गुल्म और वृक्षादिसे मनुष्यका कितना भारी उपकार हो रहा है, इसका कोई सीमा-निर्देश नहीं कर सकता। गाय, बैल, भैंस, घोड़े, ऊँट, हाथी, खच्चर, गदहे, कुत्ते आदिसे तो प्रत्यक्ष ही हमारा उपकार होता है; परंतु विचारकर देखा जाय और प्राणिजगत् के रहस्यको समझनेकी चेष्टा की जाय तो पता लगेगा कि जिन प्राणियोंको मनुष्य हिंसक और भयानक समझकर सदा मारनेके लिये तैयार रहता है, वे प्राणी भी न मालूम हमारा कितना उपकार करते हैं। एक विद्वान् पुरुषने बतलाया था कि यदि साँप न होते तो जहरीली हवा फैल जाती जिससे मनुष्य रह नहीं सकते। जहरीली हवाको साँप भक्षण कर जाते हैं।
इस प्रकार ऋषि, देवता, पितर, मनुष्य और अन्यान्य भूतप्राणी सभी हमारे उपकारी सिद्ध होते हैं। इनका ऋण किसी अंशमें चुकाकर कृतज्ञता प्रकट की जाय तथा इनको पुष्ट एवं प्रसन्न करके विश्वको लाभ पहुँचाया जाय, इसके लिये पंचमहायज्ञ अवश्य करने चाहिये।
दूसरी बात है नित्य होनेवाली अनिवार्य हिंसाकी। गृहस्थमें विशेषरूपसे हिंसा पाँच प्रकारसे होती है। मनु महाराज लिखते हैं—
पंच सूना गृहस्थस्य चुल्ली पेषण्युपस्कर:।
कण्डनी चोदकुम्भश्च बध्यते यास्तु वाहयन्॥
(मनु० ३।६८)
‘गृहस्थके घरमें पाँच हिंसाके स्थान हैं—चूल्हा, चक्की, झाड़ू, ऊखल और जलघट; इन वस्तुओंका उपयोग करनेवाला गृहस्थ पापके बन्धनमें पड़ता है।’ इस पापसे छूटनेका उपाय वे बतलाते हैं—
तासां क्रमेण सर्वासां निष्कृत्यर्थं महर्षिभि:।
पंच क्लृप्ता महायज्ञा: प्रत्यहं गृहमेधिनाम्॥
(मनु० ३।६९)
‘इन सब हिंसाओंके प्रायश्चित्तके लिये महर्षियोंने गृहस्थोंके लिये क्रमसे नित्य पंचमहायज्ञ निर्माण किये।’—
पंचैतान्यो महायज्ञान्न हापयति शक्तित:।
स गृहेऽपि वसन्नित्यं सूनादोषैर्न लिप्यते॥
(मनु० ३। ७१)
‘जो पुरुष अपनी शक्तिके अनुसार इन पाँच महायज्ञोंको करता है, वह गृहस्थाश्रममें रहनेपर भी नित्य हिंसाके पापसे लिप्त नहीं होता।’
यद्यपि आजकल पाश्चात्य सभ्यताके प्रसारसे हमारे घरोंमें प्राय: चक्की-ऊखलका बहिष्कार-सा होने लगा है, परंतु इनके बदलेमें बड़े-बड़े हिंसाके कार्य इतने बढ़ गये हैं, जिनका कोई ठिकाना नहीं। चक्की-ऊखलका काम भी मशीनोंद्वारा होता ही है, जहाँ और भी अधिक हिंसा होती है। सच पूछा जाय तो आजकल मनुष्य विषयभोग और शारीरिक आरामके पीछे पागल होकर जिस लापरवाहीसे जीव-हिंसा कर रहा है, उतनी शायद पहले कभी नहीं होती थी। लाखों प्रकारकी पशु-पक्षियोंकी हिंसासे बननेवाली दवाइयाँ और मौज-शौकके सामान, बड़ी-बड़ी इमारतें, मिलें, रेल, कारखाने, मशीनें, कपड़े, जूते और न मालूम कितनी ऐसी मनुष्यकी बढ़ी हुई राक्षसी आवश्यकताओंको पूरी करनेवाली चीजें हैं, जिनके निर्माणमें असंख्य जीवोंकी हिंसा होती है। परंतु मनुष्यको इसका आज कोई खयाल नहीं है। प्राचीन कालके यज्ञोंमें होनेवाली हिंसा आजकी इस हिंसाके सामने समुद्रमें कणके समान है। आज मनुष्यके सुखके लिये एक-एक आविष्कारके प्रयोगमें न मालूम कितने निर्दोष प्राणियोंके प्राण हरण किये जाते हैं। आज एक मनुष्यके लिये दिनभरमें जितनी हिंसा होती है, उतनी शायद हिंसक जन्तु अपनी उदरपूर्तिके लिये नहीं कर सकता होगा। इस हिंसामय जीवनका उद्धार तो भगवान् के भजनसे ही होगा। परंतु कम-से-कम पंचमहायज्ञ तो जरूर ही करने चाहिये।
पंचमहायज्ञ किस प्रकार करें?
अध्यापनं ब्रह्मयज्ञ: पितृयज्ञस्तु तर्पणम्।
होमो दैवो बलिर्भौतो नृयज्ञोऽतिथिपूजनम्॥
(मनु० ३।७०)
ऋषियज्ञं देवयज्ञं भूतयज्ञं च सर्वदा।
नृयज्ञं पितृयज्ञं च यथाशक्ति न हापयेत्॥
(मनु० ४।२१)
‘अध्यापन (स्वाध्याय) ब्रह्मयज्ञ या ऋषियज्ञ है, तर्पण पितृयज्ञ है, होम देवयज्ञ है, बलि भूतयज्ञ है और अतिथि-सत्कार मनुष्ययज्ञ है। इस ऋषियज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ, मनुष्ययज्ञ और पितृयज्ञको सदा-सर्वदा यथाशक्ति करना चाहिये; इसका त्याग कभी नहीं करना चाहिये।’
अब इनमेंसे प्रत्येकपर कुछ-कुछ विचार करना है।
ऋषियज्ञ या ब्रह्मयज्ञ
महान् तपस्वी महर्षियोंके ऋणसे मुक्त होना तो हमारे लिये सम्भव ही नहीं है और न ऋषियोंको ही किसीसे कुछ कामना है, परंतु अपनी कृतज्ञता प्रकट करनेके लिये हमे ऋषियज्ञ या ब्रह्मयज्ञ अवश्य करना चाहिये। ब्रह्मयज्ञसे ब्रह्मकी प्राप्ति होती है और ऋषिगण प्रसन्न होकर आध्यात्मिक प्रकाश फैलाते हैं, जिससे अपने परम कल्याणके साथ ही विश्वका कल्याण होता है। ऋषियज्ञ करनेके प्रकार हैं—
१—अपने-अपने अधिकार और योग्यताके अनुसार वेद, पुराण, महाभारत, रामायण, गीता, स्मृति आदि सद्ग्रन्थोंको पढ़ना, सुनना और उनमें वर्णित ज्ञानको ग्रहण करना।
२—ऋषियोंके बतलाये हुए मार्गके अनुसार शुद्ध आचरण करना।
३—ऋषियोंके बनाये हुए आश्रम-धर्मके विधानपर चलना। ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यासका यथाविधि आचरण करना।
४—ऋषियोंके दिव्य उपदेशका जगत् में प्रचार हो, इसके लिये स्वयं उनके उपदेशानुसार आचरण करते हुए विश्वमें उसका प्रचार करना।
५—तर्पण-दानादिसे ऋषियोंको तृप्त करना।
देवयज्ञ
भगवान् ने श्रीमद्भगवद्गीतामें कहा है—
सहयज्ञा: प्रजा: सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापति:।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्॥
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु व:।
परस्परं भावयन्त: श्रेय: परमवाप्स्यथ॥
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविता:।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव स:॥
(३।१०—१२)
‘प्रजापतिने कल्पके आदिमें यज्ञके साथ ही प्रजाको रचकर कहा कि इस यज्ञद्वारा (देवताओंको प्रसन्न करके तुम) अपनी उन्नति करो। यह यज्ञ तुम्हें इच्छित फल देनेवाला हो। इस यज्ञके द्वारा तुम देवताओंकी उन्नति करो और देवता (अपनी शक्तिसे) तुम्हारी उन्नति करें। यों परस्पर उन्नति करते हुए तुम परम श्रेय (मोक्ष)-को प्राप्त होओगे। यज्ञके द्वारा उन्नत (और शक्तिसंवर्धित) देवता तुम्हें (बिना ही माँगे) इच्छित प्रिय पदार्थोंको देंगे, उनके द्वारा दिये हुए पदार्थोंको जो मनुष्य उन्हें बिना ही दिये स्वयं भोगता है, वह निश्चय ही चोर है।’
इससे देवयज्ञकी सार्थकता और आवश्यकता सिद्ध हो गयी। देवयज्ञसे इस लोकमें समस्त सुख और भगवदाज्ञानुसार निष्कामबुद्धिसे करनेपर परम कल्याण—मोक्षकी प्राप्ति होती है। देवताओंकी प्रसन्नतासे लोककल्याण तो आप ही होता है।
देवताओंके दो स्वरूप हैं—एक देवलोकमें रहनेवाले शरीरधारी देव; दूसरा चन्द्र, सूर्य, जल, अग्नि, वायु, पृथिवी, विद्युत् आदिके रूपमें रहे हुए, तथा पशु-पक्षी आदि जीवोंके अधिष्ठातृ देवता। इन देवताओंकी जितनी उन्नति होगी, इनका कार्य जितना व्यवस्थित और सुचारुरूपसे होगा, उतना ही विश्वको सुख होगा। अब भी सच पूछा जाय तो देवताओंने अपने कर्तव्यको प्राय: नहीं छोड़ा है, वे अपनी प्रतिज्ञापर दृढ़ हैं; परंतु हमलोगोंने देवयज्ञको छोड़कर अपनी शर्त तोड़ दी, इसीलिये दैविक दुर्घटनाएँ आजकल जगत् में विशेष हो रही हैं। इसका कारण यही है कि देवताओंकी क्रियाओंमें हमारे दोषसे कहीं-कहीं गड़बड़ी आ जानेसे अधिदैव जगत् में अस्तव्यस्तता आ गयी है, उसीके फलस्वरूप अनावृष्टि, अतिवृष्टि, बाढ़, अकाल, भूकम्प, संक्रामक रोग आदि होते हैं। इसीका दूसरा नाम ‘दैवीकोप’ है।
सृष्टिकार्यके संचालनमें सबका भाग है। जगन्नाटकके सूत्रधारने प्रत्येक प्राणीको अलग-अलग पार्ट दे रखा है, एक भी पार्टके खराब होने या न होनेसे मालिकके खेलमें गड़बड़ी आ जाती है। इसीलिये सब ओर व्यवस्था रखनेका विधान है और शास्त्रोंकी रचना हुई है। मनुष्योंने अपना कर्तव्य छोड़ दिया, इसीलिये जगत् का खेल कुछ खराब-सा दीखने लगा और मनुष्योंपर विपत्तियाँ आने लगीं। खेल बिगाड़नेवाले अभिनेतापर नाटक-मण्डलीके स्वामीका कोप होना और उसे दण्ड प्राप्त होना स्वाभाविक ही है। यह ऐसी संगठित व्यवस्था है कि ईश्वर-आज्ञानुसार अच्छेका फल अच्छा और बुरेका बुरा अपने-आप ही हो जाता है।
भगवान् कहते हैं—
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भव:।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञ: कर्मसमुद्भव:॥
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्।
तस्मात् सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्॥
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह य:।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति॥
(गीता ३।१४—१६)
‘अन्नसे प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है, अन्नकी उत्पत्ति वृष्टिसे होती है, वृष्टि यज्ञसे होती है और यज्ञ कर्मसे उत्पन्न होता है। कर्म ब्रह्म (वेद)-से उत्पन्न होता है, ब्रह्म (वेद) अक्षर अविनाशी परमात्मासे उत्पन्न है। इसलिये सर्वव्यापक परमात्मा सदा-सर्वदा यज्ञमें स्थित रहता है। हे पार्थ! जो इस लोकमें इस प्रकार चलते हुए सृष्टि-चक्रके अनुसार नहीं चलता (यज्ञ नहीं करता), वह इन्द्रियोंके सुख-भोगमें लगा रहनेवाला (कर्तव्यहीन) पापात्मा मनुष्य व्यर्थ ही जीता है।’
चक्रमें कहीं जरा-सी अस्तव्यस्तता हुई कि सारे रथकी गतिमें गड़बड़ी हो जाती है, इसीलिये देवयज्ञ अत्यन्त आवश्यक है। देवयज्ञ यह है—
(१) देवताओंके लिये शास्त्रविधिके अनुसार होम करना। हवनसे केवल वायुशुद्धि ही नहीं होती, बल्कि दैवजगत् से जो हमारा नित्य-सम्बन्ध है वह और भी दृढ़ होता है और देवताओंकी प्रसन्नतासे हमारे विघ्नबाधाओंके नाश और इच्छित सुख-भोगकी प्राप्तिमें विशेष सुगमता हो जाती है। होम यज्ञका एक प्रधान रूप है।
(२) शास्त्र-निर्णीत समयोंपर विभिन्न देवताओंकी निष्काम उपासना करना।
(३) देव-मन्दिरोंकी स्थापना और यथाविधि देव-पूजा करना।
(४) तर्पण-दानादिसे देवताओंको संतुष्ट करना।
(५) समस्त भूतप्राणियोंके साथ यथायोग्य सद्व्यवहार करके एवं जल, वायु, अग्नि, विद्युत् आदिको पवित्र, क्रियाशील रख उनका यथायोग्य सदुपयोग करके सबके अधिष्ठातृ देवताओंको प्रसन्न और समुन्नत करना।
पितृयज्ञ
मनु महाराजने ‘तर्पण’ को पितृयज्ञ बतलाया है। तर्पणमें तृप्तिका भाव है। इसका प्रधान उद्देश्य है पितरोंको तृप्त करना। उनके तृप्त होनेसे उनके आशीर्वादद्वारा हमारी सुख-समृद्धिकी अपने-आप ही वृद्धि होती है। पितृयज्ञ यह है—
(१) जीवित माता-पिता और गुरुजनादिके चरणोंमें नित्य श्रद्धा-भक्तिसे प्रणाम करना, उनकी सेवा करना; अन्न, धन एवं आवश्यक पदार्थोंद्वारा उनके इच्छानुसार उन्हें तृप्त करना। उनका सच्चे हृदयसे हित चाहना और करना एवं उनकी शास्त्रसे अविरुद्ध सभी आज्ञाओंको स्वार्थ छोड़कर आदरपूर्वक पालन करना।
(२) परलोकगत पितरोंके लिये नित्य श्राद्ध और तर्पण करना एवं उनको प्रिय लगनेवाली वस्तुओंका उनके अर्थ योग्य पात्रको दान करना।
(३) सदाचारपरायण रहकर परलोकगत पितरोंको सुख पहुँचाना; उनके आत्माकी शान्तिके लिये ब्राह्मणभोजन, व्रत, जप, तप, हवन आदि करना-कराना, भगवान् की भक्ति करके उन्हें और भी ऊँची गति अथवा मोक्षकी प्राप्ति करानेके लिये प्रयत्न करना। परलोकगत पितर सदाचारी, हरिभक्त संतानसे बहुत आशा रखते हैं और ऐसे संतानको देखकर वे अत्यन्त ही प्रसन्न होते हैं। यहाँतक कि हर्षके मारे वे नाच उठते हैं। शास्त्रमें कहा है—
आस्फोटयन्ति पितरो नृत्यन्ति च पितामहा:।
मद्वंशे वैष्णवो जात: स नस्त्राता भविष्यति॥
कथा प्रसिद्ध है कि प्रह्लादकी भक्तिसे उसके पितृकुलका उद्धार हो गया था!
(४) हरिनाम-संकीर्तनके द्वारा परलोकगत पितरोंके कष्टोंका हरण करना। यह अनुभवसिद्ध प्रयोग है।
(५) सदाचार, सेवा, सद्व्यवहार और दानादिके द्वारा जगत् में अपने पितरोंकी कीर्ति फैलाना।
एक बात याद रखनेकी है कि हम जो आज मनुष्य-शरीरको प्राप्त हैं सो पहले भी सदासे मनुष्य ही थे ऐसी बात नहीं है; जितनी प्रकारकी योनियाँ भगवान् ने रची हैं, प्राय: सभी योनियोंमें हम उत्पन्न हो चुके हैं, और उन सभी योनियोंके हमारे माता-पिता आदि अब भी (जो मुक्त न हो गये हैं) विश्वमें कहीं-न-कहीं, किसी-न-किसी योनि और स्थितिमें वर्तमान हैं। अत: इस न्यायसे भी हमारा सबके साथ आत्मीय सम्बन्ध है। इसीलिये सबकी तृप्तिके निमित्त श्राद्ध और तर्पणका विधान है। विष्णुपुराणमें कहा है कि तर्पणके समय पितरोंका तर्पण करके इस प्रकार कहता हुआ मनुष्य सब भूतोंकी तृप्तिके लिये सबको जल दे—
‘देव, असुर, यक्ष, नाग, गन्धर्व, राक्षस, पिशाच, गुह्यक, सिद्ध, कूष्माण्ड, पशु, पक्षी, जलचर, स्थलचर और वायुभक्षक सर्प आदि सभी प्रकारके जीव मेरे दिये हुए जलसे तृप्त हों। जो प्राणी सम्पूर्ण नरकोंमें नाना प्रकारकी यातनाएँ भोग रहे हैं, उनकी तृप्तिके लिये मैं जल-दान करता हूँ। जो मेरे बन्धु हैं या अबन्धु हैं अथवा जो दूसरे जन्मोंमें मेरे बन्धु थे एवं और भी जो-जो मुझसे जलकी इच्छा रखते हैं वे सब मेरे दिये जलसे तृप्त हों। भूख-प्याससे व्याकुल जीव कहीं भी क्यों न हों; मेरा दिया हुआ यह तिलोदक उनकी सदा तृप्ति करता रहे।’ (विष्णुपुराण ३। ११। ३२—३७)
देखनेमें यह बहुत ही उदार भावना है; और उदार भावना है भी! परंतु वास्तवमें यह कर्तव्य ही है। सृष्टियज्ञके संचालनार्थ भगवान् के आज्ञानुसार सबकी उन्नति करनेमें ही अपनी उन्नति है। विश्वमात्रके समस्त प्राणियोंको तृप्त करना ही तर्पणका उद्देश्य है।
मनुष्ययज्ञ
मनुष्यका कार्य मनुष्यसे ही चलता है, अतएव प्रत्येक मनुष्यको अपनी-अपनी शक्तिके अनुसार मनुष्यमात्रकी सेवा करनी चाहिये। वह इस प्रकार हो सकती है—
(१) अपने आश्रित जनोंका आदरपूर्वक पालन-पोषण करना।
(२) रोगियोंकी आदर-सत्कार और सावधानीसे सेवा करना।
(३) किसी भी मनुष्यको दु:ख न पहुँचाकर यथासाध्य अन्न, वस्त्र, सत्परामर्श, सद्विद्या और सद्व्यवहार आदिसे सबको सुख पहुँचाना। यथासाध्य सेवा करवानेकी इच्छा न रखकर सेवा करनेकी इच्छा रखना और यत्न करना। इतनेपर भी दूसरोंसे सेवा तो करानी ही पड़ेगी, क्योंकि जीवन-निर्वाहमें इससे बचनेकी गुंजाइश ही नहीं है।
(४) अपने सदाचरण, उत्तम बर्ताव और भगवद्भक्तिसे दूसरे मनुष्योंके लिये उत्तम आदर्श उपस्थित करना।
(५) सदा निष्कामभावसे सबके हितमें संलग्न रहना।
इसमें जिससे जितना अधिक कार्य हो सके, उतना ही करना और अधिकाधिक करनेकी चेष्टा करते रहना। अपनेको मनुष्य-जातिका सेवक मानकर कहीं गर्वमें नहीं फूल उठना चाहिये। वास्तवमें एक मनुष्य असंख्य मनुष्योंसे जितनी सेवा ग्रहण करता है, अकेला उन सबका बदला कभी चुका ही नहीं सकता। अतएव जितनी सेवा हो सके उतनीको ही थोड़ी समझे और सेवा करनेका अवसर भगवान् ने दिया इसके लिये भगवान् की कृपा समझे, एवं सेवा करानेवालोंने हमारी तुच्छ सेवा स्वीकार की इसके लिये उनका उपकार मानकर कृतज्ञ हृदयसे सदा विनम्र रहता हुआ सेवामें लगा ही रहे। शास्त्रकारोंने सबके सुभीतेके लिये केवल अतिथि-सेवनको ही मनुष्ययज्ञमें बतलाया है, अतएव अतिथि-पूजन तो अवश्य ही करे। धन और अन्न पैदा करना, रसोई बनाना आदि सभी कार्य यज्ञरूप हैं। रसोईमें जो कुछ बने, उससे पहले बलिवैश्वदेवके द्वारा सबके लिये भाग निकालकर फिर अतिथिको सादर भोजन कराना चाहिये। ‘अतिथिदेवो भव’ यह श्रुतिवाक्य प्रसिद्ध है। पाराशर-स्मृतिमें कहा है—
वैश्वदेवविहीना ये आतिथ्येन बहिष्कृता:।
सर्वे ते नरकं यान्ति काकयोनिं व्रजन्ति च॥
पापो वा यदि चाण्डालो विप्रघ्नपितृघातक:।
वैश्वदेवे तु सम्प्राप्त: सोऽतिथि: स्वर्गसंक्रम:॥
(१।५७-५८)
‘जो वैश्वदेव नहीं करते तथा अतिथिका सत्कार नहीं करते, वे सब नरकोंमें पड़ते हैं और फिर कौएकी योनिको प्राप्त होते हैं। वैश्वदेवके समय आनेवाला चाहे पापी हो, चाण्डाल हो, ब्रह्महत्यारा हो या अपने पिताको मारनेवाला ही क्यों न हो वह अतिथि है और उसका सत्कार करनेसे स्वर्गकी प्राप्ति होती है।’ मतलब यह कि रसोई बननेके बाद बलिवैश्वदेव होनेपर कोई भी आ जाय, अन्न देकर उसका सत्कार अवश्य करना चाहिये।
विष्णुपुराणमें लिखा है कि ‘वैश्वदेव करनेके बाद गौ दुहनेमें जितना समय लगता है उतने समयतक अथवा इससे भी अधिक देरतक अतिथिकी बाट देखता हुआ आँगनमें खड़ा रहे। अतिथि आ जाय तो उसका स्वागत करे, आसन दे और चरण धोकर सत्कार करे। फिर श्रद्धापूर्वक उसे भोजन करवाकर मीठी वाणीसे कुशल-प्रश्न पूछता हुआ उसके जानेके समय कुछ दूरतक पीछे-पीछे जाकर उसको प्रसन्न करे। जिसके कुल और नामका कोई पता न हो तथा जो दूर देशसे आया हो, उसीको अतिथि माने, गाँवमें रहनेवाले परिचितको नहीं। (परिचित और सम्बन्धीका तो सत्कार करना ही चाहिये) परंतु जिसके पास कोई सामग्री न हो, जिससे कोई सम्बन्ध न हो, जिसके कुल-शीलका कोई पता न हो और जो भोजन करना चाहता हो ऐसे अतिथिका सत्कार किये बिना भोजन करने वाला मनुष्य अधोगतिको प्राप्त होता है। गृहस्थको चाहिये कि अतिथिके अध्ययन, गोत्र, आचरण और कुल आदिके विषयमें कुछ भी पूछताछ न कर हिरण्यगर्भ-भगवान् की बुद्धिसे उसकी पूजा करे। जिसके घरसे अतिथि निराश होकर लौट जाता है उसे वह अपना पाप देकर उसके शुभ कर्मोंका हरण करके ले जाता है। धाता, प्रजापति, इन्द्र, अग्नि, वसु और अर्यमा ये समस्त देव और पितर अतिथिमें प्रविष्ट होकर अन्न-भोजन करते हैं। अतएव मनुष्यको अतिथिपूजनके लिये सदा चेष्टा करनी चाहिये। जो पुरुष अतिथिको भोजन न देकर स्वयं भोजन करता है वह केवल पाप ही खाता है—
स केवलमघं भुङ्क्ते यो भुङ्क्ते ह्यतिथिं विना।
तदनन्तर नैहरमें आयी हुई विवाहिता कन्या, दुखिया, गर्भिणी स्त्री, वृद्ध और बालकोंको संस्कृत अन्नसे भोजन कराकर अन्तमें गृहस्थ स्वयं भोजन करे। इन सबको भोजन कराये बिना ही जो स्वयं भोजन कर लेता है, वह पापमय भोजन करता है और अन्तमें मरकर नरकमें श्लेष्मभोजी कीड़ा होता है। (विष्णुपुराण ३। ११। ८ से ६३, ६८ से ७२)
इसी प्रकार मनु महाराजके भी वचन हैं—
सायंकाल सूर्यास्त हो जानेपर या बलिवैश्वदेवके समय यदि अतिथि घरपर आ जाय तो उसे वापस न करे। घरमें टिकाकर भोजन करावे। घी, दूध, दही आदि जो पदार्थ अतिथिको नहीं खिलाया गया हो उसे स्वयं भी न खाय। अतिथिकी सेवा करनेसे धन, कीर्ति, आयु और स्वर्गकी प्राप्ति होती है। अन्यान्य मित्र, सम्बन्धी आदि घरपर आ जायँ तो यथाशक्ति उनको भी, स्वयं अपनी स्त्रीसहित सेवामें उपस्थित रहकर उत्तम भोजन करावे। सुवासिनी स्त्री, कुमारी कन्या, रोगी और गर्भिणी स्त्रीको अतिथियोंके पहले भोजन करानेमें कोई विचार न करे। जो मूर्ख इन सबको खिलाये बिना ही स्वयं पहले खा लेता है वह इस बातको नहीं जानता कि मरनेके बाद मेरे शरीरको कुत्ते और गीध नोच-नोचकर खायेंगे। ब्राह्मण, अतिथि, सम्बन्धी और माता-पितासे लेकर नौकरतक पोष्यवर्ग आदिको भोजन करानेके बाद बची हुई रसोईको पति-पत्नी भोजन करें। देवता, ऋषि, मनुष्य, पितर और घरके देवताओंका (अन्नके द्वारा) पूजन करके पीछे गृहस्थ उनसे बचा हुआ अन्न खाय। जो मनुष्य पंचमहायज्ञ न करके केवल अपना पेट भरनेके लिये भोजन तैयार करता है वह केवल पाप ही खाता है; क्योंकि यज्ञसे बचा हुआ अन्न ही सत्पुरुषोंको भोजन करना चाहिये, यही शास्त्रविधि है। (मनुस्मृति ३। १०५-१०६, ११३—११८)
इस प्रकार नित्य स्वयं अतिथिसेवन करे। परंतु जहाँतक हो सके किसीका अतिथि बने नहीं। नहीं तो, मुफ्तखोरीकी आदत पड़ जायगी और लोगोंकी श्रद्धा अतिथि-सेवासे हट जायगी। आजकल प्राय: ऐसा ही हो रहा है। मनु महाराज तो कहते हैं—
उपासते ये गृहस्था: परपाकमबुद्धय:।
तेन ते प्रेत्य पशुतां व्रजन्त्यन्नादिदायिनाम्॥
(३।१०४)
पराये भोजनका दोष न जाननेवाले जो गृहस्थ दूसरेके घर अतिथि बनकर भोजन करते हैं, वे मरकर भोजन करानेवालोंके घर पशु होते हैं।
भूतयज्ञ
जगत् में जितने प्राणी हैं, सभी श्रीपरमात्माके स्वरूप हैं। श्रीमद्भागवतमें कहा है—
खं वायुमग्निं सलिलं महीं च
ज्योतींषि सत्त्वानि दिशो द्रुमादीन्।
सरित्समुद्रांश्च हरे: शरीरं
यत्किंच भूतं प्रणमेदनन्य:॥
(११।२।४१)
‘आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, नक्षत्रादि, प्राणी, दिशाएँ, वृक्ष, नदियाँ और समुद्र आदि समस्त भूत भगवान् श्रीहरिके शरीर ही हैं; अत: सबको अनन्यभावसे प्रणाम करे।’ एकान्त-भक्तोंके लिये तो भगवान् अपने भक्त उद्धवसे कहते हैं—
प्रणमेद्दण्डवद्भूमावाश्वचाण्डालगोखरम्॥
(११।२९।१६)
‘कुत्ते, चाण्डाल, गौ और गदहेको भी (मेरा स्वरूप समझकर) पृथ्वीपर गिरकर साष्टांग प्रणाम करे।’
इस प्रकार भगवत्स्वरूप होनेसे सभी प्राणी पूज्य और सेवाके पात्र हैं। जहाँतक हो सके यथायोग्य व्यवहार करते हुए सबके साथ उत्तम-से-उत्तम बर्ताव करना चाहिये। मनुष्यके लिये प्राणियोंकी बहुत बड़ी हिंसा होती है। मनुष्यके श्वाससे नित्य न मालूम कितने जीव मारे जाते हैं। खेती आदिमें तो हिंसा होती ही है। इसके सिवा बड़े दु:खकी बात तो यह है कि मनुष्य अपने पापी पेटको भरने और जीभके स्वादके लिये मूक पशु-पक्षियोंको मारकर उनका मांस खाते हैं। यह बहुत बुरी बात है। श्रीमद्भागवतमें कहा है—
ये त्वनेवंविदोऽसन्त: स्तब्धा: सदभिमानिन:।
पशून् द्रुह्यन्ति विस्रब्धा: प्रेत्य खादन्ति ते च तान्॥
(११।५।१४)
‘यथार्थ तात्पर्यको न जाननेवाले जो लोग अति गर्व और पाण्डित्याभिमानके कारण पशुओंसे द्रोह करते हैं, उनके द्वारा वध किये हुए वे पशु मरकर उन्हींको खाते हैं।’ किसी भी प्राणीको दु:ख पहुँचाना सबके आत्मारूप परमात्मासे ही द्रोह करना है। श्रीमद्भागवतमें कहा है—
द्विषन्त: परकायेषु स्वात्मानं हरिमीश्वरम्।
मृतके सानुबन्धेऽस्मिन् बद्धस्नेहा: पतन्त्यध:॥
(११।५।१५)
‘इस अवश्य नष्ट होनेवाले शरीर और एक दिन अवश्य ही छूट जानेवाले धनमें स्नेह करके जो मनुष्य दूसरे शरीरोंमें स्थित अपने ही आत्मा श्रीहरिसे द्वेष करते हैं, वे अवश्य ही अधोगतिको प्राप्त होते हैं।’
अतएव मांसाहार बिलकुल छोड़ देना चाहिये और यथासाध्य समस्त जीवोंको सुख पहुँचाने और उनका हित करनेकी चेष्टा करनी चाहिये।
अन्न और रसोईमेंसे प्रतिदिन गौ, बैल, कुत्ते, बिल्ली, बंदर, कबूतर, कौए आदि पशु-पक्षियोंको पहले देना चाहिये। घरमें इनका रहना परोक्षरूपसे बड़ा लाभदायक है। इस लाभको हमलोग समझ नहीं सकते, इसीसे उनकी कद्र नहीं करते। अतएव इनका स्वत्व इन्हें देना ही चाहिये। इसके सिवा, हम न मालूम कितनी बार पशु-पक्षी हो चुके हैं, और यदि मुक्त नहीं होंगे तो कितनी बार फिर भी होना पड़ेगा। इस अवस्थामें यदि हम इन्हें अन्न-जलादि देकर सुखी रखेंगे तो वैसी योनि प्राप्त होनेपर हम भी वैसी ही आशा रख सकते हैं। यदि यह प्रथा चल जायगी कि पशु-पक्षियोंको कुछ भी न दिया जाय तो घरमेंसे धर्म तो उठ ही जायगा, साथ ही जब हम उस योनिमें जायँगे तो हमें भी अभावका दु:ख उठाना पड़ेगा। यदि इसके बदलेमें पशु-पक्षियोंको उदारतासे अन्नादि दिये जानेकी प्रथा सुचारुरूपसे चल जाय तो उक्त योनियोंमें जानेवाले आजके सभी मनुष्योंके लिये सुखकी आशा की जा सकती है। इसके अतिरिक्त सर्वभूतस्थित ईश्वरकी सेवा तो होती ही है। और यदि ईश्वरकी सेवाके भावसे किसी प्रकारकी भी कामना न रखकर सब जीवोंकी सेवा की जाय तो उसको फलस्वरूप भगवत्प्राप्ति हो सकती है। अतएव यथासाध्य समस्त भूत-प्राणियोंकी सेवा करनी चाहिये। गौ, कुत्ते, बिल्ली, कबूतर, कौए, चींटी आदि सबको यथासाध्य अन्न-जल देना चाहिये। एवं रसोई बननेपर बलिवैश्वदेवमें सबके लिये बलि देनी चाहिये। विष्णुपुराणमें कहा है—
‘बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशाओंमें क्रमश: इन्द्र, यम, वरुण और चन्द्रमाके लिये हुतशिष्ट सामग्रीसे बलि दे। पूर्व और उत्तर दिशाओंमें धन्वन्तरिके लिये बलि दे तथा इसके अनन्तर बलिवैश्वदेव-कर्म करे। बलिवैश्वदेवके समय वायव्यकोणमें वायुको तथा अन्य सम्पूर्ण दिशाओंमें वायु एवं उन दिशाओंको बलि दे। इसी प्रकार ब्रह्मा, अन्तरिक्ष और सूर्यको भी उनकी दिशाओंके अनुसार बलि दे। फिर विश्वदेवों, विश्वभूतों, विश्वपतियों, पितरों और यक्षोंके लिये यथास्थान बलि-प्रदान करे।’
‘तदनन्तर बुद्धिमान् पुरुष इस प्रकार कहकर समस्त प्राणियोंको बलि दे—‘देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी, सिद्ध, यक्ष, सर्प, दैत्य, प्रेत, पिशाच, वृक्ष तथा चींटी, कीट-पतंग आदि जो कर्म-बन्धनसे बँधे हुए क्षुधातुर होकर मेरे दिये हुए अन्नकी इच्छा करते हैं, उन सबके लिये मैं यह अन्नदान करता हूँ, वे इससे तृप्त और सुखी हों। जिनके माता, पिता अथवा कोई भी और बन्धु नहीं है तथा अन्न बनानेका साधन एवं अन्न भी नहीं है, उनकी तृप्तिके लिये मैंने पृथ्वीपर यह अन्न रखा है, इससे वे तृप्त होकर सुखी हों। सम्पूर्ण प्राणी, यह अन्न और मैं—सभी विष्णु हैं; क्योंकि विष्णुसे भिन्न और कुछ है ही नहीं। अत: मैं समस्त भूत-प्राणियोंको यह अन्न उनके पोषणके लिये दान करता हूँ। यह जो चौदह प्रकारका (सिद्ध, गुह्यक, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, सर्प, विद्याधर, पिशाच, सरीसृप, वानर, पशु, मृग, पक्षी और मनुष्य) भूतसमुदाय है, उसमें जितने भी प्राणी हैं उन सबकी तृप्तिके लिये मैंने यह अन्न प्रस्तुत किया है, इससे वे प्रसन्न हों।’ इस प्रकार कहकर गृहस्थ पुरुष श्रद्धापूर्वक समस्त जीवोंके उपकारके लिये पृथ्वीमें अन्न-दान करे, क्योंकि गृहस्थ ही सबका आश्रय है। तदनन्तर कुत्ता, चाण्डाल, पक्षी एवं अन्यान्य जो कोई पतित और पुत्रहीन पुरुष हों उनको अन्न देकर तृप्त करे।’ (श्रीविष्णुपुराण ३।११।४६ से ५७)
शास्त्रकी ऐसी आज्ञाओंका अनुसरण कर हमलोगोंको पशु-पक्षियोंके साथ परम आत्मीयताका बर्ताव करना चाहिये। भूत-यज्ञके लिये ये कार्य करने उचित हैं—
(१) नियमित बलिवैश्वदेव* प्रतिदिन करना।
(२) यथासाध्य गौ, कुत्ते, बिल्ली, चींटी, कौए, कबूतर आदिको अन्न-जल देना।
(३) किसी भी प्राणीको कष्ट न देना। मांसाहारके विरुद्ध प्रचार करना। गो-हिंसा एवं अन्य पशुपक्षी-हिंसा बंद करानेमें सहायता करना। बैल, भैंसे आदिको निर्दयतापूर्वक दिये जानेवाले कष्टोंसे बचाना।
(४) जिसमें प्राणिहिंसा होती हो, ऐसे खाद्यपदार्थ, दवा, कपड़े, जूते आदिका व्यवहार न करना।
(५) सभी जीवोंको आत्मवत् समझकर सबके साथ सद्व्यवहार करना।
इस प्रकारसे पंचमहायज्ञका अनुष्ठान प्रतिदिन सबको करना चाहिये।
श्रीभगवान् कहते हैं—
वेदाध्यायस्वधास्वाहाबल्यन्नाद्यैर्यथोदयम्।
देवर्षिपितृभूतानि मद्रूपाण्यन्वहं यजेत्॥
(श्रीमद्भा० ११।१७।५०)
‘गृहस्थको चाहिये कि वेदाध्ययन (ऋषियज्ञ), स्वधा (पितृयज्ञ), स्वाहा (देवयज्ञ), बलिवैश्वदेव (भूतयज्ञ) और अन्नदान (मनुष्ययज्ञ) आदिके द्वारा मेरे ही रूप देव, ऋषि, पितर, मनुष्य और अन्य समस्त प्राणियोंका यथाविधि पूजन करता रहे।’ और—
यदृच्छयोपपन्नेन शुक्लेनोपार्जितेन वा।
धनेनापीडयन् भृत्यान् न्यायेनैवाहरेत् क्रतून्॥
(श्रीमद्भा० ११।१७।५१)
‘आप ही प्राप्त हुए अथवा शुद्ध वृत्तिके द्वारा सत्य और न्यायपूर्वक उपार्जित धनसे, अपने द्वारा जिनका भरण-पोषण होता हो उन लोगोंको कष्ट न पहुँचाकर यज्ञादि कर्म करता रहे।’ परंतु इतनी सावधानी जरूर रखे कि—
कुटुम्बेषु न सज्जेत न प्रमाद्येत् कुटुम्ब्यपि।
विपश्चिन्नश्वरं पश्येददृष्टमपि दृष्टवत्॥
(श्रीमद्भा० ११। १७। ५२)
‘अपने कुटुम्ब या किसीमें आसक्त न हो जाय, बड़ा कुटुम्बी होकर प्रमादवश भगवान् के भजनको कभी न भुलावे। बुद्धिमान् विवेकी पुरुषको चाहिये कि इस दृश्य-प्रपंचके समान अदृश्य स्वर्गादिको भी नाशवान् ही जाने।’ और हृदयसे सदा भगवद्भजन करता हुआ भगवान् की प्रीतिके लिये ही सब कर्म करे। भगवत्प्रीत्यर्थ होनेवाले कर्मका नाम ही यज्ञ है और इसीका नाम कर्मयोग है।