पिता-पुत्रका कल्याणकारी संवाद

प्राचीन कालमें किसी एक स्वाध्याय-सम्पन्न ब्राह्मणके मेधावी नामक एक बहुत ही बुद्धिमान् पुत्र था। मोक्षधर्ममें कुशल उस पुत्रने अपने वेदपाठी पिताको मोक्ष-लाभसे वंचित देखकर कहा—‘पिताजी! मनुष्यकी आयु क्षण-क्षणमें क्षय हो रही है। यह जानकर बुद्धिमान् पुरुषको क्या करना चाहिये, आप मुझे बतलाइये।’

पिताने कहा—‘वत्स! मनुष्यको पहले ब्रह्मचर्यव्रत धारण करके वेद पढ़ना चाहिये, फिर पितरोंको तारनेके लिये पुत्र उत्पन्न करना चाहिये, तदनन्तर अग्निस्थापनपूर्वक यज्ञादि करने चाहिये और अन्तमें वनमें जाकर मुनिवेष धारण करना चाहिये।’

पुत्रने कहा—‘पिताजी! जब लोग सब ओरसे नष्ट हुए चले जा रहे हैं, चारों ओरसे अव्यर्थ आपत्तियाँ आ रही हैं, तब आप यह शान्त समयकी-सी निश्चिन्त बातें किस तरह कर रहे हैं?’

पिताने कहा—‘वत्स! मनुष्योंका कैसा नाश हो रहा है, किसने इनपर चढ़ाई की है और कौन-सी अव्यर्थ विपत्तियाँ आ पड़ी हैं, तू ऐसी बातोंसे मुझको क्यों डरा रहा है?’

पुत्रने कहा—‘पिताजी! मृत्यु मनुष्यका संहार कर रही है। बुढ़ापेने चढ़ाई कर रखी है। ये दिन-रात नयी-नयी आपत्तियाँ आ रही हैं, तब भी आप क्यों नहीं जागते? जब मैं यह जानता हूँ कि मृत्यु तनिक भी नहीं ठहरती, हमें तैयार होनेके लिये क्षणभरका भी मौका नहीं देती, उसी क्षण जीवको धर घसीटती है, तब यह जानकर भी मैं कैसे उसकी प्रतीक्षा करूँ? जैसे थोड़े जलके तालाबमें रहनेवाली मछलीको सुख नहीं मिलता, ऐसे ही हर रातको जिसकी उम्र घट रही है उस मनुष्यको कैसे सुख मिल सकता है? जैसे माली पेड़ोंसे फूलोंको तोड़ लेता है वैसे ही मनुष्यका मन चाहे जहाँ विचर रहा हो; उसका काम चाहे अधूरा पड़ा हो, मौत उसे पकड़कर ले ही जाती है। अतएव कल करनेके कामको आज और तीसरे पहरके कामको अभी कर डालना चाहिये; क्योंकि मृत्यु यह नहीं देखती कि इसने यह काम किया है या नहीं किया है। इसलिये जो काम हमारे कल्याणका हो उसे अभी ही कर डालना चाहिये। समय नहीं खोना चाहिये, न मालूम कब किसकी मृत्यु हो जाय! काम भले ही अधूरे पड़े हों, मृत्यु जीवको खींच ले जाती है, अतएव बुढ़ापेकी बाट न देखकर अभी जवानीमें ही धर्म कमा लेना चाहिये; क्योंकि जीवनका कोई भरोसा नहीं है। धर्मके आचरणसे इस लोक और परलोकमें सुख मिलता है। मोहसागरमें डूबा हुआ मनुष्य धर्म और अधर्मका ध्यान छोड़कर दिन-रात स्त्री-पुत्रोंको ही संतुष्ट रखनेमें लगा रहता है, ऐसे पुत्र और पशु आदिसे सम्पन्न विषयासक्त मनुष्यको काल वैसे ही अचानक बहा ले जाता है जैसे जलकी बाढ़ सुखसे सोते हुए बाघको। नाना प्रकारके मनोरथोंमें फँसे हुए भोगोंसे अतृप्त मनुष्यको काल वैसे ही घसीटकर ले जाता है जैसे भेंड़के बच्चेको बाघिन ले जाती है। मनुष्य इस उधेड़-बुनमें ही लगा रहता है कि मैंने यह कार्य कर लिया, यह करना बाकी है, यह काम आधा हो गया है, बस आधा ही शेष है, इतनेमें ही मृत्यु उसके किसी भी कामका तनिक-सा भी विचार न कर, मनुष्यको किये हुए कर्मका फल मिलनेके पहले ही पकड़कर ले जाती है। मकान बन रहा है, बहुत-सा बन चुका है, उसमें रहनेका मौका आता ही नहीं और मनुष्यको मौतका शिकार बन जाना पड़ता है। मनुष्य चाहे खेतमें हो या बाजारमें, दूकानमें या घरमें काम करता हो, दुर्बल हो या बलवान् हो, मूर्ख हो या बुद्धिमान् हो, कायर हो या शूरवीर हो, चाहे उसकी एक भी इच्छा पूरी न हुई हो, समय आनेपर मृत्यु उसको पकड़कर ले ही जाती है। मनुष्य मृत्यु, बुढ़ापा, रोग और अन्य अनेकों कारणोंसे उत्पन्न दु:खोंके पंजेसे छूट ही नहीं सकता। इतनेपर भी पिताजी! आप निश्चिन्त-से होकर कैसे बैठे हैं? प्राणी जबसे जन्म लेता है, तभीसे काल और जरा उसका विनाश करनेके लिये उसके पीछे लगे रहते हैं। बुढ़ापा मृत्युकी सेना है और विषयासक्ति मृत्युका मुँह है। अरण्य देवताओंका स्थान है और ग्राममें रहनेकी इच्छा अर्थात् भोगकी इच्छा बन्धन करनेवाली रस्सी है। पुण्यवान् पुरुष इस रस्सीको काटकर मुक्ति पाते हैं। पापी पुरुष इस बन्धन-रज्जुको नहीं काट सकते।

जो पुरुष मन, वाणी और शरीरसे किसी प्राणीकी हिंसा नहीं करता, जो किसीके भी जीविकाके साधनोंका नाश करके किसीको कष्ट नहीं पहुँचाता, उस पुरुषकी कोई हिंसा नहीं करता। अतएव बुद्धिमान् पुरुषको सत्य बोलना चाहिये, सत्य आचरण करना चाहिये, सत्यपरायण रहना चाहिये और सत्यकी ही कामना करनी चाहिये। सब प्राणियोंमें और सब स्थितियोंमें समभाव रखना, इन्द्रियोंका दमन करना और सत्यके द्वारा मृत्युको जीतना चाहिये। अमृत और मृत्यु दोनों हमारे साथ हैं। विषयोंमें मोहसे मृत्यु होती है और सत्यसे ब्रह्मरूप अमृतकी प्राप्ति होती है। अतएव मैं अहिंसाव्रतसे रहकर काम-क्रोधसे दूर रहूँगा। मोक्षसुखका आश्रय लेकर क्षेमके लिये सत्यका अवलम्बन कर मृत्युपर विजय प्राप्त करूँगा। इन्द्रियोंका दमन करके शान्तियज्ञमें रत हुआ ब्रह्म-यज्ञमें स्थित रहूँगा। मनसे आत्म-विचाररूप मनोयज्ञ, वाणीसे भगवन्नामजपरूप वाक्-यज्ञ और शरीरसे अहिंसा, शौच और गुरुसेवादि कर्म-यज्ञ करूँगा। मैं हिंसायुक्त पशु-यज्ञ कभी नहीं कर सकता। मैं स्वयं आत्म-यज्ञ करूँगा। मेरे पुत्र नहीं है तो क्या है? अपने उद्धारके लिये पुत्रकी कोई आवश्यकता नहीं है। जिस पुरुषकी वाणी और मन वशमें हैं जिसने तप, त्याग और योग किया है वह सब वस्तुओंको पा जाता है। ज्ञानके समान कोई नेत्र नहीं है, ब्रह्म-विद्याके समान कोई फल नहीं है, आसक्तिके समान कोई दु:ख नहीं है और त्यागके समान कोई सुख नहीं है। एकान्तवास, समता, सत्यता, सच्चरित्रता, दण्डधारण (मन, वाणी, शरीरसे हिंसाका त्याग), सरलता और उपरामता—द्विजोंका यही असली धन है, इसके समान और कोई भी धन नहीं है। आप ब्राह्मण हैं और आपको मरना है। फिर आपको धनसे, स्त्रीसे तथा बन्धुओंसे क्या प्रयोजन है? विचार कीजिये—आपके पिता और दादाजी कहाँ गये? अतएव आप अपने आत्माकी गुफामें प्रवेशकर आत्माका पता लगाइये!’

पुत्रकी इन बातोंको सुनकर पिता सावधान होकर उसी क्षणसे सत्य और आत्मपरायण हो गया। (महाभारतके आधारपर)