प्रेममें ही सबका कल्याण है
यह वस्तुत: बड़े ही दु:खका विषय है कि पिछले दिनों हिंदुस्थानमें हिंदू-मुसलमान एक-दूसरेके विश्वासी बन्धु, मित्र, सहायक और सेवक न होकर परस्पर अविश्वाससे भरपूर पराये, शत्रु, संहारक और विनाशक बन गये थे। वह दोनोंके ही लिये महान् अनिष्टकर प्रसंग था। राजनीतिक लाभके उद्देश्यसे मियाँ जिन्ना-सरीखे नेताओंकी कुटिल नीतिका यह भीषण परिणाम था। जीव न हिंदू है, न मुसलमान; वह अपनी कर्मपरम्परासे कर्मफल-भोगके लिये मानव-शरीरमें आता है और कर्मफल भोगनेके साथ ही नवीन शुभाशुभ कर्मोंका बड़ा भारी संचय लेकर चला जाता है। फिर नाना योनियोंमें उन्हीं अतीतकालके कर्मोंके अनुसार फल भोगता है। परस्पर द्वेष और वैरको लेकर जिनका जीवन जाता है, वे यहाँ तो शान्ति पाते ही नहीं, अपने द्वेष तथा वैरजनित कुकर्मोंके कारण अगले जन्मोंमें भी सुख-शान्तिसे वंचित ही रहते हैं। मानव-जन्मकी इससे अधिक विफलता और क्या होगी। महात्मा गाँधी इसीलिये उस समय पूर्व-बंगालके गाँवोंमें पैदल घूमे थे कि किसी प्रकार दोनों जातियोंके हृदयोंमें प्रेमका प्रादुर्भाव हो। वे बड़े आशावादी थे, इसलिये आशाको साथ लेकर ही चल रहे थे। यदि भगवत्कृपासे उनकी आशा पूर्ण हो जाती तो मानव-जातिका बहुत बड़ा कल्याण होता। जबतक दुराग्रह तथा द्वेषपरायण नेताओंका हृदय नहीं बदलता, तबतक एक बार महात्माजीके प्रभावसे गाँवोंके मुसलमानोंमें सद्भाव पैदा होनेपर भी उसके स्थायी होनेमें सन्देह ही था। महात्माजीने एक पत्रमें लिखा था—‘इस बारका काम मेरी जिंदगीमें सबसे ज्यादा अटपटा काम है। ‘मार्ग सूझे नहिंघोर रजनीमें, निज शिशुको संभाल—मेरा जीवन पंथ उजाल’—इस भजनको आज मैं सौ फीसदी वाजिब तौरपर गा सकता हूँ। मुझे याद नहीं पड़ता कि मेरे रास्तेमें ऐसा अँधेरा पहले कभी आया हो और रात लंबी दिखायी पड़ती है। संतोष सिर्फ यह है कि मैं न तो हारा हूँ और न नाउम्मेद हुआ हूँ। जो होना होगा, सो होकर रहेगा। खयाल है कि यहीं करना और यहीं मरना। ‘करने’ का मतलब यह है कि या तो हिंदू-मुसलमान दोस्तकी तरह रहने लग जायँ, या इस कोशिशमें मैं मर मिटूँ। यह काम कठिन है। ‘हरि करे सो होय!’
इन वाक्योंमें गाँधीजीके हृदयकी तड़पनका पता लगता है। सचमुच कोई भी साधुहृदय पुरुष यह नहीं चाह सकता कि हिंदू-मुसलमान आपसमें लड़ें। असलमें साधारण जनतामें सभी बुरे नहीं होते। बुराईकी जड़ तो वे नेता होते हैं जो अपने राजनीतिक उद्देश्यकी सिद्धिके लिये बेचारे नासमझ लोगोंको धर्मके नामपर भड़काकर उनका अनिष्ट करवाते हैं। पर उनके लिये भी क्या कहा जाय। भगवान् उनको सुबुद्धि दें। परंतु इतना सभीको स्मरण रखना चाहिये कि पापसे पापका उच्छेद नहीं हुआ करता। इसलिये पापके बदलेमें पाप करनेकी प्रवृत्ति किसीमें भी नहीं होनी चाहिये। यदि मुसलमानोंने कहीं शिशु-हत्या की, अबलापर बलात्कार किया, किसीको बलात् धर्मान्तरित किया और निरीह निर्दोषकी हत्या की तो हिंदुओंको भी ऐसा करना चाहिये—यह विचार कदापि अभिनन्दनीय नहीं है। इन कुकृत्योंका ऐसे ही कुकृत्योंद्वारा बदला लेनेकी भावना सचमुच बड़ी भयंकर है। उचित तो यह है कि भगवान् से ऐसी करुण प्रार्थना की जाय कि वे सबको सुबुद्धि दें। किसीके भी हृदयमें ऐसी पापभावना न पैदा हो और किसीके भी द्वारा ऐसा कुकृत्य न बने। ऐसा करनेके साथ ही आवश्यकतानुसार बलसंग्रह भी किया जाय, जिससे अत्याचार करनेवाले मनुष्यका साहस टूट जाय। एक बार साहस टूट गया, कुकृत्य नहीं बन सका तो सम्भव है आगे चलकर उसकी मति भी बदल जाय। बलसंग्रह और आवश्यकता पड़नेपर बलप्रयोग करते समय भी मनमें द्वेष या वैर तो कदापि नहीं आना चाहिये।
संसारमें सबसे बड़ी चीज प्रेम है। मानवमात्रमें ही नहीं, जीवमात्रमें प्रेम होना चाहिये। फिर हिंदू-मुसलमान तो सदियोंसे एक ही स्थानमें पड़ोस-पड़ोसमें बसते हैं। समझदार मुसलमान तथा समझदार हिंदू भाइयोंको परस्पर प्रेम बढ़े, इसके लिये सच्चे मनसे सदा प्रयत्न करना चाहिये। मानव-जीवनको हिंस्र पशुओंकी भाँति मार-काटमें और पिशाच-राक्षसोंकी भाँति पापकर्मोंमें लगाये रखना बहुत बड़ी हानि है और बहुत बड़े दु:खका कारण है। इस बातको समझना चाहिये और परस्पर सौहार्द, प्रेम, विश्वास तथा अपनापन बढ़े, इसके लिये कोशिश करनी चाहिये। प्रेममें ही सबका कल्याण है।