साध्य और साधन

१—सच्चिदानन्दघन परमात्मा स्वयं ही अपने स्वरूपके ज्ञाता हैं, वे अनिर्वचनीय हैं, अनुभवगम्य हैं।

२—भगवान् ही सब कुछ हैं, भगवान् ही सब रूपोंमें भासते हैं। भगवान् ही अपनी मायाशक्तिके द्वारा सब रूपोंमें परिणत हैं, भगवान् मेंसे ही सबकी उत्पत्ति है, उन्हींमें सबका निवास है, उन्हींमें सब लय होते हैं। सृष्टि-स्थिति-प्रलयके आधार, निवास और कर्ता वही हैं। वे सत् हैं, सत्-असत् हैं, सत्-असत् दोनोंसे परे हैं। सब कुछ उनमें है, वे सब कुछमें हैं, ‘सब कुछ’ कुछ नहीं है, केवल वे ही हैं। ये सभी बातें अपनी-अपनी सीमामें सत्य हैं। इतनेपर भी भगवान् इन सबसे विलक्षण हैं। जितना भी परमात्माके स्वरूपका वर्णन होता है, सब शाखा-चन्द्रन्यायसे उनका लक्ष्य करानेके लिये ही है।

३—भगवान् सर्वाधार, सर्वव्यापी, सर्वेश्वर, सर्वशिरोमणि, सर्वनियन्ता, सर्वज्ञ, सर्वरूप, सर्वगुणनिधि, शुद्ध, बुद्ध, सत्य, शिव, सुन्दर, गुणातीत और कालातीत हैं। वे निर्गुण हैं, सगुण हैं, निराकार हैं, साकार हैं, दोनोंसे परे हैं, उनमें सब कुछ सम्भव है। अनवकाशमें अवकाश और अवकाशमें अनवकाश कर देना उनकी लीलामात्र है। वे ‘कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुम् समर्थ’ हैं।

४—वे एकदेशीय, एककालीन न होते हुए ही अवतार लेते हैं, प्रकट होते हैं, भक्तको उसके इच्छानुसार दिव्य साकार दिव्य विग्रहमें दर्शन देकर कृतार्थ करते हैं। यह सर्वथा सत्य है। वे परम दयालु, परम सुहृद्, परम न्यायकारी, परम पिता, स्नेहमयी माता, स्वामी, सखा सब हैं। वे पतितपावन, दीनबन्धु, अशरण-शरण, भक्तवत्सल हैं, इसीलिये अपना दिव्य साकाररूप प्रकट करते हैं। वे सम, उदासीन, पक्षपातहीन, सबके आश्रय, शुभ-प्रेरक, अशुभबाधक, रक्षक, योगक्षेमवाहक, शरणागतवत्सल, प्रेममय और पावनकर्ता हैं।

५—उनको प्राप्त करनेके अनेक मार्ग हैं, अपने-अपने अधिकारके अनुसार मार्गोंका अनुसरण होता है। अनेकों नाम-रूपोंसे आख्यात भगवान् वास्तवमें एक ही हैं, उनको पानेके मार्ग भिन्न हैं। जैसे भगवान् की एकतामें कभी द्वैत नहीं हो सकता, ऐसे ही सभी मार्गोंकी कभी एकता नहीं हो सकती। लक्ष्य-स्थान एक है, परंतु वहाँ पहुँचनेके पथ सदा ही अलग-अलग रहेंगे।

६—अपनी-अपनी दिशासे अपने पथपर चलकर सबको भगवान् की ओर बढ़ना चाहिये। मनुष्य-जीवनका यही परम और चरम उद्देश्य है।

७—जो इस उद्देश्य-सिद्धिमें लगे हैं वही बुद्धिमान् हैं, शेष सब लोग भूलमें हैं। इस भूलका परिणाम महान् दु:खदायी होगा।

८—ईश्वरके न होनेकी बात करना और सुनना वस्तुत: महापाप है। इस महापापसे सबको सदा बड़ी सावधानीसे बचना चाहिये।

९—‘ईश्वर है’ यह विश्वास दृढ़ और पूर्ण होनेपर सारे दोष आप ही मिट जायँगे और सदाके लिये परम शान्ति प्राप्त हो जायगी। ईश्वर-कृपापर भरोसा करनेसे ही ईश्वरमें विश्वास होगा।

१०—इसके लिये संत-महात्माओं और शास्त्रोंकी वाणीका विश्वासपूर्वक श्रवण, मनन करना चाहिये तथा शरणागत होकर भगवान् से आर्त प्रार्थना करनी चाहिये।

११—भगवान् के नामका जप प्रेमसहित सदा करते रहना चाहिये। जीवन बीता जा रहा है। यह व्यर्थ चला जायगा तो फिर पछतावेका पार नहीं रहेगा।