सेवाकी सात आवश्यक बातें
सेवकमें जब ये सात बातें होती हैं, तब सेवा सर्वांगसुन्दर तथा परम कल्याणकारिणी होती है—१. विश्वास, २. पवित्रता, ३.गौरव, ४.संयम, ५.शुश्रूषा, ६.प्रेम और ७.मधुरभाषण।
इसका भाव यह है कि सेवकको अपने तथा अपने सेवाकार्यमें विश्वास होना चाहिये। विश्वास हुए बिना जो सेवा होगी, वह ऊपर-ऊपरसे होगी—दिखावामात्र होगी। सेवकके हृदयमें विशुद्ध सेवाका पवित्र भाव होना चाहिये, वह किसी बुरी वासना-कामनाको मनमें रखकर सेवा करेगा (जैसे इनको सेवासे संतुष्ट करके इनके द्वारा अमुक शत्रुको मरवाना है, आदि) तो सेवा अपवित्र हो जायगी और उसका फल अध:पतन होगा। जिसकी सेवा की जाय, उसमें गौरवबुद्धि—पूज्यबुद्धि होनी चाहिये। अपनेसे नीचा मानकर या केवल दयाका पात्र मानकर अहंकारपूर्ण हृदयसे जो सेवा होगी, उसमें सेव्यका असम्मान, अपमान और तिरस्कार होने लगेगा, जिससे उसके मनमें सेवकके प्रति सद्भाव नहीं रहेगा और ऐसी सेवाको वह अपने लिये दु:खकी वस्तु मानेगा। अत: सेवाका महत्त्व ही नष्ट हो जायगा। इसीलिये कहा गया है कि जिसकी सेवा की जाय, उसे भगवान् मानकर सेवा करे। सेवककी इन्द्रियाँ संयमित होनी चाहिये—मन-इन्द्रियोंका गुलाम सच्ची सेवा कभी नहीं कर सकेगा। जिसके मनमें बार-बार विषय-सेवनकी प्रबल लालसा होगी, वह सेवा क्या करेगा? सेवकको सेवापरायण होना पड़ेगा। जो मनुष्य किसी सेवाको नीची मानकर उसे करनेमें हिचकेगा, वह सेवा कैसे करेगा। सेवकमें सेव्य तथा सेवाके प्रति प्रेम होना चाहिये। प्रेम होनेपर कोई भी सेवा भारी नहीं लगेगी तथा सेवा करते समय आनन्दकी अनुभूति होगी, जिससे नया-नया उत्साह मिलेगा। और साथ ही सेवकको मीठा बोलनेवाला होना चाहिये। कटुभाषी सेवककी सेवा मर्माहत करती है और मधुरभाषीकी बड़ी प्रिय लगती है। मधुर भाषण स्वयं ही एक सेवा है।