श्रीभगवान् के पूजन और ध्यानकी विधि

(अम्बरीष-नारद-संवाद)

राजा अम्बरीष—मुनिवर! श्रीहरिकी आराधनाको छोड़कर ऐसा कोई भी प्रायश्चित्त मुझे नहीं दिखायी देता, जिससे जीवोंके अपार पापोंका नाश हो जाय। सुना गया है कि श्रीहरिकी एक दृष्टिसे ही सारी सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। सब क्लेशोंके नाश करनेवाले उन केशवकी आराधना किस प्रकार की जाती है? जगत् के स्त्री-पुरुष उन नारायणकी उपासना कैसे करें—मुनिवर! जगत् के हितके लिये आप मुझको वही बतलाइये। सुना है, भगवान् भक्तिप्रिय हैं। अत: वे किस भक्तिसे प्रसन्न होते हैं, वह भक्ति कैसे होती है और कैसे सब लोग उनकी आराधना कर सकते हैं—यह सब बतलाइये। ब्रह्मन्! हे ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ! आप श्रीहरिके प्यारे हैं, परम वैष्णव हैं और परमार्थतत्त्वके जाननेवाले हैं; इसीसे मैं आपसे पूछ रहा हूँ। सुना है, श्रीहरिका चरणोदक (गंगाजल) जिस प्रकार पवित्र करनेवाला है, वैसे ही श्रीहरिविषयक प्रश्न भी प्रश्नकर्ता, श्रोता और वक्ता—सबको पवित्र कर देता है।

दुर्लभो मानुषो देहो देहिनां क्षणभंगुर:।

तत्रापि दुर्लभं मन्ये वैकुण्ठप्रियदर्शनम्॥

संसारेऽस्मिन् क्षणार्द्धोऽपि सत्संग: शेवधिर्नृणाम्।

यस्मादवाप्यते सर्वं पुरुषार्थचतुष्टयम्॥

‘जीव-देहोंमें मनुष्यदेह दुर्लभ है, परंतु है वह क्षणभंगुर; इस दुर्लभ और क्षणभंगुर मनुष्यदेहमें वैकुण्ठप्रिय—हरिके प्यारे संतके दर्शन और भी दुर्लभ हैं। इस संसारमें आधे क्षणका भी सत्संग मनुष्योंके लिये एक अमूल्य निधि है; क्योंकि इस सत्संगसे ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूप चारों पुरुषार्थोंकी प्राप्ति होती है।’

हे भगवन्! जैसे बच्चोंके लिये माता-पिताका मिलना महान् आनन्द और कल्याणका देनेवाला है, वैसे ही आपके दर्शन भी सब जीवोंके लिये कल्याणकारी हैं।.....अतएव भगवन्! आप मुझे भागवत-धर्मका उपदेश कीजिये।

नारद—राजन्! आप स्वयं भगवान् के भक्त हैं। ‘भगवान् की सेवा ही परम धर्म है’ आप इस बातको भलीभाँति जानते हैं। जिन भगवान् की आराधना करनेसे सारे विश्वकी सेवा हो जाती है, जिन सर्वदेवमय हरिके संतुष्ट होनेपर सभी संतुष्ट हो जाते हैं और जिनके स्मरणमात्रसे महान् पातकोंका समूह डरकर उसी क्षण भाग जाता है, उन श्रीहरिकी ही सब प्रकारसे सेवा करनी चाहिये। जो समस्त कार्य-कारणोंके कारणके कारण हैं, जिनका कोई कारण नहीं है; जो जगन्मय होकर जगत् के जीवोंके रूपमें वर्तमान हैं, जो अणु होते हुए ही बृहत् , कृश होते हुए ही स्थूल, निर्गुण होते हुए ही महान् गुणवान् हैं—उन जन्मत्रयातीत अज भगवान् श्रीहरिका ध्यान करना चाहिये। पुरुषश्रेष्ठ! आप भागवत-धर्मके विषयमें सब कुछ जानते हुए भी जगत् के कल्याणके लिये ही मुझसे पूछ रहे हैं। भगवान् की कथा ऐसी ही है, उनका कीर्तन साधुओंके आत्मा, मन और कानोंको तृप्त करनेवाला है। इसीलिये आप मुझसे पूछ रहे हैं।

ज्ञानी पुरुष जिनको परम ब्रह्म और परात्पर प्रधान कहते हैं, जिनकी मायासे इस समस्त विश्वका अस्तित्व है, वे ही अच्युतभगवान् हैं। भक्तिपूर्वक पूजा करनेपर वे पुत्र, कलत्र, दीर्घ आयु, राज्य, स्वर्ग और मोक्ष आदि सभी अभीष्ट प्रदान करते हैं। उनकी पूजाके कायिक, वाचिक और मानसिक—तीन प्रकारके व्रत होते हैं—

दिनमें एक बार अयाचित पवित्र भोजन करना और रातको कुछ न खाना कायिक व्रत है।

वेदाध्ययन, श्रीभगवान् के नाम-गुणोंका कीर्तन, सत्य बोलना और किसीकी निन्दा-चुगली न करना वाचिक व्रत है। और—

अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, निष्कपटता आदि मानसिक व्रत हैं। इनसे श्रीहरि संतुष्ट होते हैं।

श्रीहरिके नामोंका कीर्तन सदा सर्वत्र किया जा सकता है, इसमें कोई अशौच बाधक नहीं होता। श्रीहरिका कीर्तन ही मनुष्यको भलीभाँति शुद्ध करता है। वर्णाश्रमधर्मका पालन करनेवाले पुरुषोंको एकमात्र श्रीभगवान् को ही परम पुरुष और उद्धारके एकमात्र साधन मानकर सदा उन्हींका आराधन करना चाहिये। स्त्रियोंको चाहिये कि वे दयामय श्रीभगवान् को परमपति मानकर सदाचारका पालन करती हुई मन, वचन और शरीरका संयम करके उन्हींकी आराधना करें।

श्रीभगवान् भक्तिप्रिय हैं, वे केवल भक्तिसे जितने संतुष्ट होते हैं उतने पूजन, यज्ञ और व्रतसे नहीं होते। भगवान् की पूजाके लिये ये आठ पुष्प सर्वोत्तम हैं—अहिंसा, इन्द्रियनिग्रह, प्राणियोंपर दया, क्षमा, मनका निग्रह, ध्यान, सत्य और श्रद्धा। इन आठ प्रकारके पुष्पोंसे पूजा करनेपर भगवान् बहुत ही प्रसन्न होते हैं।

सूर्य, अग्नि, ब्राह्मण, गौ, भक्त, आकाश, वायु, जल, पृथ्वी, आत्मा और समस्त प्राणी—ये सभी भगवान् की पूजाके स्थान हैं। अर्थात् इनको भगवान् से पूर्ण—भगवान् समझकर इनकी सेवा करनी चाहिये। इनमें गौ और ब्राह्मण प्रधान हैं। जिसके पितृकुल और मातृकुलके पूर्व-पुरुष नरकोंमें पड़े हों, वह भी जब श्रीहरिकी सेवा-पूजा करता है तो उन सबका नरकसे उसी क्षण उद्धार हो जाता है और वे स्वर्गमें चले जाते हैं। जिनका चित्त विश्वमय वासुदेवमें आसक्त नहीं है, उनके जीवनसे और पशुकी तरह चेष्टा करनेसे क्या लाभ है?

किं तेषां जीवितेनेह पशुवच्चेष्टितेन किम्।

येषां न प्रवणं चित्तं वासुदेवे जगन्मये॥

अब श्रीभगवान् के ध्यानकी महिमा सुनिये—राजन्! अग्नि-रूपधारी दीपक जैसे वायुरहित स्थानमें निश्चलभावसे जलता हुआ सारे अन्धकारका नाश करता है, वैसे ही श्रीकृष्णका ध्यान करनेवाले पुरुष सब दोषोंसे रहित और निरामय हो जाते हैं। वे निश्चल और निराश होकर वैर और प्रीतिके बन्धनोंको काट डालते हैं और शोक, दु:ख, भय, द्वेष, लोभ, मोह एवं भ्रम आदि इन्द्रिय-विषयोंसे सर्वथा छूट जाते हैं। दीपक जैसे जलती हुई शिखाके द्वारा तेलका शोषण करता है, वैसे ही श्रीकृष्णका ध्यान करनेवाला पुरुष ध्यानरूपी अग्निसे कर्मोंको जलाता रहता है। अपनी-अपनी स्थिति और रुचिके अनुसार भगवान् के निराकार और साकार दोनों ही रूपोंका ध्यान किया जा सकता है। निराकार ध्यान करनेवाले विचारके द्वारा ज्ञानदृष्टिसे इस प्रकार देखें—

‘वे परमात्मा हाथ-पैरवाले न होकर भी सब वस्तुओंको ग्रहण करते हैं और सर्वत्र जाते-आते हैं। मुख-नासिका न होनेपर भी वे आहार करते और गन्ध सूँघते हैं। कान न होनेपर भी वे जगत्पति सर्वसाक्षी भगवान् सब कुछ सुनते हैं। निराकार होकर भी वे पंचेन्द्रियोंके वश होकर रूपवान्-से प्रतीत होते हैं। सब लोकोंके प्राण होनेके कारण वे ही चराचरके द्वारा पूजित होते हैं। वे जीभ न होनेपर भी वेद-शास्त्रानुकूल सब वचन बोलते हैं। त्वक् न होनेपर भी समस्त शीतोष्णादिका स्पर्श करते हैं। वे सर्वदा आनन्दमय, एकरस, निराश्रय, निर्गुण, निर्मम, सर्वव्यापी, सर्वदिव्यगुणसम्पन्न, निर्मल ओजरूप, किसीके वश न होनेवाले, सर्वदा अपने वशमें रखनेवाले, सबको यथायोग्य सब कुछ देनेवाले और सर्वज्ञ हैं। उनको कोई माँ नहीं उत्पन्न करती, वे ही सर्वमय विभु हैं।’

जो पुरुष एकान्त चित्तसे इस प्रकार ध्यानके द्वारा सर्वमय भगवान् को देखता है, वह अमूर्त अमृतमय परम धामको प्राप्त होता है।

अब साकार ध्यानके विषयमें सुनिये—

‘उनका सजल मेघोंके समान श्यामवर्ण और अत्यन्त चिकना शरीर है। सूर्यके समान शरीरका तेज है। उन जगत्पति भगवान् के चार बड़ी सुन्दर भुजाएँ हैं। दाहिनी भुजाओंमें महामणियोंसे जड़ा हुआ शंख और भयानक असुरोंको मारनेवाली कौमोदकी गदा है। बायीं भुजाओंमें कमल और चक्र शोभा पा रहे हैं। भगवान् शर्ङ्गधनुष धारण किये हैं। उनका गला शंखके समान गोल, मुखमण्डल और नेत्र कमल-पत्रके सदृश हैं। उन हृषीकेशके कुन्द-से अति सुन्दर दाँत हैं। उन पद्मनाभभगवान् के अधर प्रवालके तुल्य लाल हैं, मस्तकपर अत्यन्त तेजपूर्ण उज्ज्वल किरीट शोभा पा रहा है। उन केशवभगवान् के हृदयपर श्रीवत्सका चिह्न है, वे कौस्तुभमणि धारण किये हुए हैं। उन जनार्दनके दोनों कानोंमें सूर्यके समान चमकते हुए कुण्डल विराजमान हैं। वे हार, बाजूबंद, कड़े, करधनी और अँगूठियोंके द्वारा विभूषित हैं और स्वर्णके समान पीताम्बर धारण किये गरुड़जीपर विराजित हैं!’

राजन्! पापसमूहका नाश करनेवाले भगवान् के साकार स्वरूपका इस प्रकार ध्यान करनेसे मनुष्य शारीरिक, वाचिक और मानसिक—तीनों पापोंसे छूट जाता है और सारे मनोरथोंको पाकर तथा देवताओंके द्वारा पूजित होकर श्रीभगवान् के दिव्य परमधामको प्राप्त होता है।

यं यं चाभिलषेत् कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्।

पूज्यते देववर्गैश्च विष्णुलोकं स गच्छति॥

(पद्मपुराणके आधारपर)