श्रीकृष्णकी नित्य प्रात:क्रिया
भगवान् श्रीकृष्ण नित्य प्रात:काल क्या-क्या क्रिया करते थे, इसका वर्णन भागवतमें किया गया है। भगवान् की नित्य क्रियाओंको देखनेसे पता लगता है कि आर्य द्विजातियोंका आदर्श उस समय क्या था और आज उनमें कितना बुरा परिवर्तन हो गया है। भगवान् की प्रात:क्रियाका वर्णन करते हुए शुकदेवजी कहते हैं—
ब्राह्मे मुहूर्त उत्थाय वार्युपस्पृश्य माधव:।
दध्यौ प्रसन्नकरण आत्मानं तमस: परम्॥
एकं स्वयंज्योतिरनन्यमव्ययं
स्वसंस्थया नित्यनिरस्तकल्मषम्।
ब्रह्माख्यमस्योद्भवनाशहेतुभि:
स्वशक्तिभिर्लक्षितभावनिर्वृतिम्॥
अथाप्लुतोऽम्भस्यमले यथाविधि
क्रियाकलापं परिधाय वाससी।
चकार संध्योपगमादि सत्तमो
हुतानलो ब्रह्म जजाप वाग्यत:॥
उपस्थायार्कमुद्यन्तं तर्पयित्वाऽऽत्मन: कला:।
देवानृषीन् पितृन् वृद्धान् विप्रानभ्यर्च्य चात्मवान्॥
धेनूनां रुक्मशृंगीणां साध्वीनां मौक्तिकस्रजाम्।
पयस्विनीनां गृष्टीनां सवत्सानां सुवाससाम्॥
ददौ रूप्यखुराग्राणां क्षौमाजिनतिलै: सह।
अलंकृतेभ्यो विप्रेभ्यो बद्वं बद्वं दिने दिने॥
गोविप्रदेवतावृद्धगुरून् भूतानि सर्वश:।
नमस्कृत्यात्मसम्भूतीर्मङ्गलानि समस्पृशत्॥
(श्रीमद्भा० १०।७०।४—१०)
‘भगवान् श्रीकृष्णने ब्राह्म मुहूर्तमें उठकर हाथ-पैर धोकर जलसे आचमन करके सब इन्द्रियोंको प्रसन्न करके मनको प्रकृतिसे आत्मामें लगा दिया अर्थात् आत्मध्यान करने लगे। वे केवल, स्वप्रकाश—उपाधिशून्य, अविनाशी, अखण्ड, अज्ञानरहित और जगत् की उत्पत्ति तथा नाशका कारण जो अपनी शक्तियाँ हैं, उनके द्वारा ही जिनकी सत्ता समझमें आती है, ऐसे श्रीकृष्ण ब्रह्म नामक अपने ही सच्चिदानन्द-स्वरूपके ध्यानमें मग्न हो गये। तदनन्तर सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्णजीने शुद्ध जलमें स्नान करके पवित्र वस्त्र पहने और विधिपूर्वक संध्योपासनादि नित्य-क्रिया और अग्निमें हवन करके वे मौन होकर गायत्री-मन्त्रका जप करने लगे। फिर सूर्य उदय होनेपर श्रीहरिने खड़े होकर सूर्यका उपस्थान किया, पश्चात् अपने ही अंशरूप देवता, ऋषि और पितरोंका तर्पण करके उन आत्मवान् स्वरूपस्थित परमात्मा श्रीकृष्णने बड़े-बूढ़े और ब्राह्मणोंकी पूजा की। इसके बाद आपने ब्राह्मणोंको वस्त्र, आसन और तिलसहित १३,०८४ गौएँ दान दीं। आप प्रतिदिन ही इतनी गौएँ दान दिया करते थे। उन गौओंके सींग सोनेसे और खुर चाँदीसे मँढ़े हुए थे, गलेमें मोतीकी मालाएँ पड़ी थीं, वदनपर सुन्दर झूले उढ़ायी हुई थीं। ऐसी दुधारी, एक बारकी ब्याई, सुशीला, बछड़ेसहित गौएँ देकर श्रीकृष्णने अपनी विभूति गौ, ब्राह्मण, देवता, वृद्ध, गुरु और सम्पूर्ण प्राणियोंको प्रणाम किया और मांगलिक पदार्थोंका स्पर्श किया।’
यह श्रीकृष्णकी दैनिक प्रात:कालकी नित्यक्रिया थी, इसके साथ आजके भारतीय द्विजातियोंकी क्रियाका मिलान कीजिये—
तब — ब्राह्म मुहूर्तमें उठना, आत्माका ध्यान करना, शुद्ध जलमें स्नान करना, संध्योपासना करना, हवन करना, गायत्री-जप करना, देवता, ऋषि, पितृ-तर्पण, बड़े-बूढ़े और ब्राह्मणोंको पूजना, ब्राह्मणोंको गौदान देना।
अब — आठ बजेतक पड़े रहना, अखबार पढ़ते हुए संसारके प्रपंचोंका स्मरण करना, चर्बीमिश्रित साबुन और प्राय: मद्ययुक्त सुगन्ध—लगा नलके अपवित्र जलमें नहाना, परचर्चा करना, धूम्रपान करना, जप करनेवालोंकी दिल्लगी उड़ाना, अपने व्यक्तिगत स्वार्थकी चिन्तामें परिवारके लोगोंका बुरा सोचना, बड़े-बूढ़ोंको मूर्ख बताना और ब्राह्मण-निन्दा करना, ब्राह्मण-अतिथियोंको घरसे निकाल देना।
विचार कीजिये और अपना कर्तव्य निश्चित कीजिये।