वह दिन कब आयेगा
प्यारे नटनागर! तुम्हीं बताओ कि मेरा चिरवांछित वह सुदिन कब आयेगा? दुलारे चितचोर! तुम्हीं कहो कि वह शुभ घड़ी, वह सुहावना सरस समय, वह परम प्रिय अनमोल पल, वह भाग्योदयका मुहूर्त कब होगा, जब ये चिरतृषित नेत्र उस अनूप रूपमाधुरीका पानकर अन्य किसी भी छबिको न देख सकेंगे? अहा! वह समय बड़ा ही अनमोल होगा, जब प्रियतमका करोड़ों चन्द्रमाओंको लजानेवाला मोहन मुखड़ा घनश्याम मेघसे निकल पड़ेगा और अपनी विश्वविमोहिनी चटकीली चाँदनीसे विश्वको चमका देगा। उस समय कोयल पंचम स्वरसे ‘कुहू-कुहू’ की ध्वनिसे अपने प्राणाधारको पुकार उठेगी। पपीहा ‘पी कहाँ’ की रटसे प्रेमिकाको अधीर कर देगा। मोरके शोरसे सहसा हृदयमें चोट लग जायगी। योगी चंचल चितवनसे उस नवीन चन्द्रकी ओर त्राटक लगा लेंगे और प्रकृतिदेवी उस अलौकिक सौन्दर्यकी झाँकीपर थिरक-थिरक नाचने लगेगी।
भक्त-मन-चोर! सच कहना, यह चोरीकी कला तुमने किससे और कब सीखी? सुनते हैं, तुम व्रजललनाओंसे बड़े इठलाते हो, उनका माखन चुरा लेते हो और कोई-कोई तो यहाँतक कहते हैं कि उनका सर्वस्व लूट लेते हो! यदि बात सत्य है तो क्या मैं भी तुम्हारी इस लूटपाटका एक नवीन पात्र बन सकता हूँ? क्या मैं भी तुमसे कह सकता हूँ कि ऐ अनोखे चोर! मेरा भी ‘चित्त’ चुरा लो? क्या मेरी ओरसे तुम्हारा नाम ‘मन-चोर’ न पड़े?
मेरे राम! वह दिन कब आयेगा जब मैं भी मुनि-शापसे शिला हो जाऊँगा और तुम्हारे चरण-रज-स्पर्शसे मुझे उस परमानन्दकी प्राप्ति होगी जिसके लिये योगिजन लाखों वर्षोंतक निराहार रहकर तुम्हारी उपासना किया करते हैं। भव-भयहारी राम! वह शुभ घड़ी कब आयेगी कि जब नटखट केवटकी नाईं मुझे भी कठौतेमें तुम्हारे कोमल चरणकमलको अपने इस कठोर हाथोंसे खूब मल-मलकर धोनेकी अनुमति मिल जायगी?
गोपीकुमार! वह समय कब आयेगा जब मैं तुम्हें कदम्बपर मंद-मंद हास्य करते हुए बाँसुरीके मधुर स्वरोंको गाते सुनूँगा, जिन्हें सुनकर व्रजललनाएँ अपने घर-द्वार, पति-पुत्र, परिवारको परित्यागकर तुम्हारी ओर बलात् खिंच जाती थीं। लीलामय! सुना है, तुम्हारी मुरलीमें विचित्र आकर्षण है! उसके स्वरोंमें अपार अनोखापन है। बाँसुरी तो मैंने बहुत सुनी है पर तुम्हारी बाँसुरी तो गजब कर देती है। देवता और मनुष्योंकी कौन कहे, पशु-पक्षीतक उस ध्वनिको सुनकर स्तब्ध होकर खाना-पीना भूल जाते हैं।
सुना है, अब भी तुम वृन्दावनकी कुंजोंमें वही राग-तान छेड़ते हो और भाग्यवान् भक्तोंको अब भी तुम्हारी वंशीकी ध्वनि साफ-साफ सुनायी देती है। यदि तुम्हारी कृपादृष्टि हो गयी तो तुम उन्हें अपने मोहन मुखड़ेका दर्शन दे कृतकृत्य कर देते हो। पतितपावन! क्या मुझे प्रेमके प्यालेकी एक बूँद पान करनेका भी अवसर न मिलेगा? क्या तुम्हारी यही इच्छा है कि तुम्हारा एक प्रेम-पथ-पथिक तुम्हारे प्रेम-पथसे गुमराह हो जाय और कँटीले जंगलोंमें भटकता रहे? यह तो बिलकुल सही है कि मेरे अंदर व्रजललनाओंका-सा प्रेम नहीं, केवटके-से प्रेम-लपेटे अटपटे बैन नहीं, गजका-सा आर्तनाद नहीं, प्रह्लादकी-सी अनन्यता, निष्कामता नहीं, ध्रुवका-सा विश्वास नहीं, द्रौपदीकी-सी पुकार नहीं, सूरदासकी-सी लगन नहीं और गोस्वामी तुलसीदासका-सा भरोसा नहीं, फिर भी तुम ठहरे पतितपावन और मैं ठहरा तुम्हारा एक पतित। यदि तुम्हारा दावा है कि मैं पतित-से-पतितका भी उद्धार करता हूँ तो मैं इसी नाते तुमसे कहता हूँ और करबद्ध प्रार्थना करता हूँ कि वह दिन कब आयेगा जब तुम इस पतितका उद्धार कर अपने पतितपावन नामको सार्थक करोगे।
मेरे हृदयके राजा! वह दिन कब आयेगा जब मैं सांसारिक झंझटोंको छोड़, विषयोंसे मुखमोड़, सोनेकी बेड़ी तोड़ तुम्हारे पादपद्मोंसे सम्बन्ध जोड़ूँगा? कब तुम्हारे चरणोंका स्पर्शकर शान्ति-लाभ करूँगा, तुम्हारे कमलनयनोंको देखकर तृषित नेत्रोंको शान्त करूँगा, तुम्हारे मुखकंजको निरख-निरख कलेजेकी कसकको मिटाऊँगा और तुम्हारी सुखमयी गोदमें बैठकर तुम्हारे शीतल कर-स्पर्शसे उस आनन्दका अनुभव करूँगा जिसका करोड़ों जिह्वाएँ भी मिलकर वर्णन नहीं कर सकतीं।
वह दिन कब आयेगा जब मैं भी सूरदासकी नाईं कहूँगा—
बाँह छुड़ाये जात हो, निबल जानिकै मोहि।
हृदयसे जब जाहुगे, मर्द बदौंगो तोहि॥
तुम आगे-आगे भागते जाओगे और मैं पीछे-पीछे दौड़ता रहूँगा और तबतक नहीं छोड़ूँगा जबतक तुम पकड़ न जाओगे।
मेरे जीवनाधार! अब न तरसाओ! बस, बहुत हो चुका। सभी बातोंकी एक हद होती है, सभी कामोंका एक अन्त होता है ‘का बरषा जब कृषी सुखाने’ अगर मिलना ही है तो अभी मिलो, इसी क्षण मिलो, मैं कबसे तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूँ। देखते-देखते आँखें फूट गयीं। रोते-रोते आँसू सूख गये। पुकारते-पुकारते गला बैठ गया, पर तुम न आये! हृदय-कपाट हर समय तुम्हारे लिये खुले पड़े हैं और प्रेमशय्या भी बिछी है, तुम जब चाहो उसपर शयन कर सकते हो। तुम्हें यह कहनेका भी मौका नहीं मिलेगा कि ‘द्वार खटखटाया पर उत्तर न मिला।’ द्वार खुला रहनेसे चोर-डाकू बड़ा तंग करते हैं पर तुम्हारे ही कारण मैंने उन्हें खोल रखा है और तबतक खुला रखूँगा जबतक उनका तनिक भी अस्तित्व रह जायगा। यदि मैं यह समझ लूँ कि तुम नहीं आओगे तब भी मुझे विश्वास नहीं हो सकता; क्योंकि तुम्हें आना ही पड़ेगा। अवश्य ही अब मैंने समझा, तुम्हारे कर्णरन्ध्रतक मेरी करुण पुकार नहीं पहुँची है, नहीं तो तुम अपना वाहन छोड़ पैदल ही दौड़े चले आते।
याद रखो, यदि देर करके आये तो तुम मुझे नहीं पा सकते।
प्रान तृषातुरके रहें, थोड़ेहू जलदान।
पीछे जल भर सहस घट, डारेहु मिले न प्रान॥