यज्ञ

भारतवर्ष आज गरीबोंका देश है। करोड़ों नर-नारी ऐसे हैं, जिनको भर पेट अन्न और लज्जा-निवारणके लिये पर्याप्त वस्त्र नहीं मिलता। ऐसी दशामें जो सम्पन्न भारतवासी, इन गरीब भाइयोंके दु:खोंकी कुछ भी परवा न कर केवल अपने शरीर और परिवारको आराम पहुँचानेमें ही व्यस्त रहते हैं, उन्हें कुछ विचार करना चाहिये। शास्त्रोंमें यज्ञसे बचे हुए अन्नको अमृत बतलाया है और वैसे अमृतरूप पवित्र अन्नपर जीवन-धारण करनेवालेको ब्रह्मकी प्राप्ति होती है, ऐसा कहा है। मेरी समझसे इन भूखे भाइयों और बहिनोंके पेटमें जो क्षुधाका दावानल धधक रहा है, उसीमें अन्नकी आहुति देनी चाहिये, तभी हमारा शेष अन्न अमृत होगा। मतलब यह कि हम जो कुछ भी उपार्जन करें; उसमेंसे कुछ भाग इन गरीब भाइयोंके हितार्थ पहले व्यय करें, तभी हमारा उपार्जन सार्थक है।

एक घरमें दो भाई भूखों मरें और एक भाई खूब माल उड़ावे। दो बहिनोंको कपड़ा न मिले और एक बहिन रेशमी साड़ियोंसे संदूकें भरी रखे, यह बहुत ही लज्जाकी बात है। उचित तो यह है कि हमलोग स्वयं कष्ट भोगकर कष्टमें पड़े हुए इन भाई-बहिनोंको कष्टसे बचावें, दु:ख सहकर इन्हें सुख दें। परंतु यह बात तो दूरकी है। हम तो आज अपने सुखके लिये इन्हें दु:ख पहुँचा रहे हैं, अपने आरामके लिये इनको संकटमें डाल रहे हैं। यदि इनको भी अपने-जैसे मनुष्य समझकर अपने ही समान इन्हें भी आराम पहुँचानेका खयाल रखें तो इनका बहुत-सा संकट दूर हो सकता है। हमारे मौज-शौककी सामग्री और अनाप-शनाप खाने-पीनेके खर्चमें कुछ कमी कर उससे बचे हुए पैसे इन गरीब भाइयोंकी सेवामें लगा दिया करें तो बिना ही प्रयास इनके दु:ख कम हो सकते हैं और हमारी अनेक बुरी आदतें सहज ही छूट सकती हैं। अपने आरामके लिये प्रत्येक क्रिया करते समय हम इन्हें स्मरण कर लिया करें और पहले इनके लिये कुछ देकर फिर क्रिया आरम्भ करें तो हमारी वही क्रिया यज्ञरूप हो सकती है। भारतमें इस यज्ञकी अभी बड़ी आवश्यकता है।