युगल सरकारकी उपासना और ध्यान

यन्नखेन्दुरुचिर्ब्रह्म ध्येयं ब्रह्मादिभि: सुरै:।

गुणत्रयमतीतं तं वन्दे वृन्दावनेश्वरम्॥

एक सज्जनने बहुत-से प्रश्न लिख भेजे हैं और बड़े आग्रहके साथ अपने प्रश्नोंके उत्तर देनेकी आज्ञा की है। उनके आज्ञानुसार प्रश्नोंको सिलसिलेवार जँचाकर उनका उत्तर लिखनेका प्रयत्न किया जाता है। उत्तरमें जो कुछ लिखा जायगा, उसका आधार शास्त्र और संतवाक्य हैं। उत्तर यथार्थ ही होगा इस बातका कोई दावा नहीं है। हाँ, इस बहाने भगवत्सम्बन्धी विचारोंमें कुछ समय लगेगा यही सोचकर उत्तर लिखनेका प्रयास किया जाता है।

भगवान् का रूप

प्रश्न—भगवान् के अनेक रूप बतलाये जाते हैं, उनमें क्या कोई न्यूनाधिकता है, है तो क्यों और कैसी? साधकको किस रूपकी उपासना करनी चाहिये?

उत्तर—एक ही भगवान् अनेक नाम-रूपोंमें पूजित होते हैं, इसलिये उनमें न्यूनाधिकताकी या छोटे-बड़ेकी किसी कल्पनाको कोई स्थान नहीं है। ब्रह्म, शिव, विष्णु , नारायण, राम, कृष्ण, शक्ति, सूर्य, गणेश आदि सब उन्हीं एक भगवान् के दिव्य नाम-रूप हैं। लीलाकी दृष्टिसे न्यूनाधिकताकी कल्पना हो सकती है, जैसे एक ही मनुष्य भिन्न-भिन्न समय, भिन्न-भिन्न कार्योंमें लगा हुआ भिन्न-भिन्न नामोंसे पुकारा जा सकता है, जैसे एक ही मनुष्य लौकिक सम्बन्धके कारण किसीका पिता, किसीका पति, किसीका पुत्र, किसीका मित्र, किसीका गुरु, किसीका शिष्य कहलाता है, और इस प्रकार उसमें छोटे-बड़ेकी कल्पना होती है, ऐसे ही लीलामय भगवान् भी विभिन्न लीलाओंके कारण विभिन्न रूपोंमें अपनेको प्रकट करते हैं और लीलाको न समझनेवाले व्यक्ति मोहसे और लीलाके संगी भगवान् के अनुचरगण लीलासे उनमें छोटे-बड़ेकी कल्पना करते हैं। वास्तवमें भगवान् एक हैं और वे सब समय सब लीलाओंमें सब ओरसे पूर्णतम हैं, इसलिये जो साधक जिस रूपकी उपासना करता है, उसे उसी रूपकी उपासना करनी चाहिये और यह मानना चाहिये कि हमारे ही उपास्यदेव समस्त ब्रह्माण्डोंमें भिन्न-भिन्न नाम-रूपोंसे पूजित होते हैं। शिवका उपासक यह समझे कि हमारे भोलानाथ शिव ही राम, कृष्ण आदिके रूपमें प्रकट हैं और राम, कृष्णके उपासक यह मानें कि हमारे राम या कृष्ण ही शिव, शक्ति आदिके रूपमें लोगोंके द्वारा पूजित होते हैं। इस प्रकार किसी भी रूपकी उपासनाका विरोध न करके अपने उपास्य इष्टकी उपासना अनन्यभावसे करनी चाहिये। और उसीको सर्वेश्वर, सर्वलोकमहेश्वर, सर्वशक्तिमान् , सर्वाधार, सर्वतश्चक्षु, सच्चिदानन्दघन एकमात्र प्रभु मानना चाहिये।

निराकार और साकारके उपासककी गति

प्रश्न—क्या निराकार और साकारके उपासक दोनों एक ही गतिको प्राप्त होते हैं?

उत्तर—अवश्य ही तत्त्वत: परमात्मा एक होनेसे एक ही गतिको प्राप्त होते हैं। लीलाकी दृष्टिसे लीला-जगत् में अन्तर माना जाता है और वह रहता भी है, परंतु तत्त्वदृष्टिसे वस्तुत: कोई अन्तर नहीं है।

शक्तिसहित उपासना

प्रश्न—कुछ लोग कहते हैं कि भगवान् की उपासना उनकी शक्तिसहित करनी चाहिये और कुछ लोग कहते हैं कि अकेले भगवान् की ही उपासना करनी चाहिये। इन दोनोंमें कौन-सी बात ठीक है?

उत्तर—भगवान् और भगवान् की शक्ति दो अलग-अलग वस्तु नहीं हैं। जैसे अग्नि और उसकी दाहिका शक्ति एक ही वस्तु है, इसी प्रकार भगवान् और उनकी शक्ति है। दाहिका शक्ति है इसीलिये वह अग्नि है, नहीं तो उसका व्यक्त अग्नित्व ही नहीं रहता और अग्नि न हो तो दाहिका शक्तिका कोई आधार नहीं रहता। अतएव दोनों मिलकर ही एक अग्नि बना है या अग्निके ही ये दो नाम हैं, इसी प्रकार भगवान् और भगवान् की शक्ति सर्वथा अभिन्न हैं, इनमें भेद मानना ही पाप है। इस दृष्टिसे जो भगवान् की उपासना करता है वह उनकी शक्तिकी उपासना करता ही है और जो शक्तिका उपासक है, वह भगवान् की उपासना करनेको बाध्य है, अतएव एककी उपासनामें ही दोनोंकी उपासना आप ही हो जाती है, परंतु उपासक यदि चाहें तो विग्रहके रूपमें दोनोंकी अलग-अलग मूर्तियोंमें भी उपासना कर सकते हैं। इतना याद रखना चाहिये कि लक्ष्मी-नारायण, गौरी-शंकर, राधा-कृष्ण, सीता-राम आदि सब एक ही हैं, इनमें अपनी-अपनी रुचि और भावनाके अनुसार किसी भी युगल रूपकी उपासना हो सकती है। यहाँ इतना जरूर कह देना चाहिये कि युगल रूपकी उपासना विशेष अधिकारीको ही करनी चाहिये। नहीं तो, उसमें अनर्थ होनेका डर है। जगज्जननी लक्ष्मी, उमा, राधा या सीताके स्वरूपमें कहीं पापभावना हो गयी तो सारी उपासना नष्ट होकर उलटा विपरीत फल हो सकता है, और जो लोग वैराग्यवान् नहीं हैं, उनके द्वारा स्त्रीरूपकी उपासनामें मनमें विकार होनेका डर है ही; क्योंकि ऐसे लोग भगवान् की दिव्य स्वरूपाशक्तिके तत्त्वको न जानकर अपने अज्ञानसे इन्हें प्राकृत स्त्री ही समझ लेते हैं और प्राकृत स्त्रीरूपका आरोप करके विषयासक्तिके कारण विकारके वश हो जाते हैं। भगवान् की रासलीला देखनेवाले एक मनुष्यने तथा श्रीराधाजीका ध्यान करनेवाले एक दूसरे मित्रने अपनी ऐसी दुर्घटनाएँ सुनायी थीं, इससे यह पता चलता है कि दिव्य अनन्तसौन्दर्य-सुधामयी इन स्वरूपा-शक्तियोंके साथ भगवान् की उपासना करनेवाले सच्चे अधिकारी बिरले ही होते हैं। अतएव साधारण श्रेणीके साधकोंको भगवान् की अकेले ही पुरुषरूपमें उपासना करनी चाहिये।

प्रश्न—श्रीराधा, सीता, उमा आदि भगवान् की स्वरूपा-शक्तियोंकी उपासनाके अधिकारीमें कौन-कौन-सी बातें होनी चाहिये?

उत्तर—सबसे पहली बात तो यही है कि उसे कामविजयी होना चाहिये। कामी पुरुष दिव्य स्वरूपा-शक्तियोंकी उपासनाका अधिकारी कदापि नहीं है। इसके सिवा अन्यान्य आवश्यक बातें दूसरे प्रश्नोंके उत्तरमें आगे आ सकती हैं।

प्रश्न—मैं यह तो नहीं कहता कि मुझे वैराग्य प्राप्त है, परंतु इतना अवश्य है कि भगवत्कृपासे विषयोंकी ओर मेरा चित्त बहुत कम जाता है। मैं समझता हूँ कि भगवान् ही मेरी रक्षा करते हैं, मुझे श्रीराधा-कृष्णका स्वरूप अत्यन्त प्रिय है। मैं यत्किंचित् इन युगल सरकारकी उपासना करता हूँ और इसीमें अपना जीवन बिता देना चाहता हूँ। कृपया बतलाइये किन साधनोंसे और किस भावसे उपासना करनेपर मैं पूर्ण सच्चिदानन्दघन परमात्मा श्रीराधा-कृष्णके दर्शन और उनके दुर्लभ प्रेमको प्राप्त कर सकता हूँ। मैंने सुना है इस उपासनामें द्वादश सिद्धि, पंचप्रकार पूजा, न्यास, प्रपत्ति, शरणागति, आत्मसमर्पण आदि विभिन्न साधनोंकी आवश्यकता होती है, इन साधनोंके रूप भी बतलाइये।

उत्तर—आपका चित्त भगवत्कृपासे विषयोंकी ओर बहुत कम जाता है, यह बड़े ही आनन्दका विषय है। भगवान् की कृपाके बलसे असम्भव भी सम्भव हो सकता है। भगवत्कृपाकी शक्ति अनन्त है, परंतु सदा सावधान रहना चाहिये। कहीं भगवत्कृपाके आश्रयकी विस्मृति न हो जाय, अभिमान न पैदा हो जाय। विषयोंमें बहुत बड़ा प्रलोभन होता है। कई बार तो ऐसा धोखा हो जाता है कि मनुष्य भगवान् के नामपर विषयोंका सेवन करता रहता है। शृंगार, भोग, उत्सव, कीर्तन आदिकी शोभा और महत्ता इसीलिये भक्तके मनमें होनी चाहिये कि वे भगवान् से सम्बन्ध रखते हैं। भगवान् से ही शृंगारकी शोभा है, भगवान् का प्रसाद होनेसे ही भोगमें परम स्वाद है, भगवान् की स्मृति करानेवाला होनेके कारण ही उत्सव कर्तव्य है और भगवान् का नाम-गुणगान होनेके कारण ही कीर्तन भक्तका परम आदरणीय साधन है। यदि भगवान् को भुलाकर केवल शृंगारकी शोभामें, अन्नके स्वादमें, उत्सवकी चहल-पहलमें और संगीतकी ध्वनिमें ही आकर्षण है तो वह विषयसेवन ही है। अवश्य ही भगवान् से सम्पर्क हो जानेके कारण किसी अंशमें वह भी है शुभ ही। भगवान् श्रीराधाकृष्णके दिव्य स्वरूपको समझकर ही उनकी उपासना करनी चाहिये, उन्हें विषयलोलुप इन्द्रियासक्त भोगकामी आशिक-माशूकोंकी तरह मानकर ही नहीं। ऐसा न होगा तो पतन ही होगा। भगवान् श्रीराधाकृष्णके स्वरूपका किंचित् दिग्दर्शन आगे चलकर आपके दूसरे प्रश्नके उत्तरमें कराया जायगा। इसके पहले आप द्वादश शुद्धि, पंचप्रकार पूजा, न्यास, प्रपत्ति, शरणागति और आत्मसमर्पणको संक्षेपमें समझ लें और दूसरे मुख्य साधनों तथा भावोंको भी कुछ जान लें।

द्वादश शुद्धि

द्वादश शुद्धि दो प्रकारकी है। जिनमें एक प्रकार है—चार मनकी, चार वाणीकी और चार शरीरकी। १—विशुद्ध और अनन्य प्रेम, २—श्रद्धापूर्वक भगवच्चिन्तन, ३—चित्तकी प्रसन्नता और ४—प्राणिमात्रकी हितकामना—ये चार मनकी शुद्धि हैं। १—भगवन्नाम-गुणका कीर्तन करना, २—सत्य बोलना, ३—हितकर बात कहना और ४—मीठे शब्दोंमें बोलना—ये चार वाणीकी शुद्धि हैं। एवं १—दूसरोंकी सेवा करना, २—हाथोंसे सात्त्विक दान करना, ३—शरीरके आरामको छोड़कर तप करना और ४—ब्रह्मचर्यका पालन करना—ये शरीरकी शुद्धि हैं। यों त्रिविध बारह प्रकारकी शुद्धि है।

द्वादश शुद्धिका दूसरा प्रकार है—

गृहोपलेपनं चैव तथानुगमनं हरे:।

भक्त्या प्रदक्षिणं चैव पादयो: शोधनं पुन:॥

पूजार्थं पत्रपुष्पाणां भक्त्यैवोच्चयनं हरे:।

करयो: सर्वशुद्धीनामियं शुद्धिर्विशिष्यते॥

तन्नामकीर्तनं चैव गुणानामपि कीर्तनम्।

भक्त्या श्रीकृष्णदेवस्य वचस: शुद्धिरिष्यते॥

तत्कथाश्रवणं चैव तस्योत्सवनिरीक्षणम्।

श्रोत्रयोर्नेत्रयोश्चैव शुद्धि: सम्यगिहोच्यते॥

पादोदकं च निर्माल्यमालानामपि धारणम्।

उच्यते शिरस: शुद्धि: प्रणतस्य हरे: पुर:॥

आघ्राणं तस्य पुष्पादेर्निर्माल्यस्य तथा प्रिये।

विशुद्धि: स्यादन्तरस्य प्राणस्यापि विधीयते॥

पत्रपुष्पादिकं यच्च कृष्णपादयुगार्पितम्।

तदेकं पावनं लोके तद्धि सर्वं विशोधयेत्॥

भगवान् श्रीहरिके मन्दिरमें जाकर उसके आँगन लीपनसे, मूर्तिके पीछे-पीछे चलनेसे और भक्तिपूर्वक प्रदक्षिणा करनेसे दोनों चरणोंकी शुद्धि होती है। भक्तिसहित भगवान् की पूजाके लिये पुष्पादिका चयन करनेसे दोनों हाथ शुद्ध होते हैं, सब शुद्धियोंमें यह शुद्धि विशेष है। भक्तिपूर्वक परमदेव श्रीकृष्णके नाम और गुणोंका कीर्तन करनेसे वाणीकी शुद्धि होती है। श्रीहरिकी कथा सुननेसे कानोंकी और उनके उत्सव देखनेसे नेत्रोंकी भलीभाँति शुद्धि होती है। सिर झुकाकर भगवान् का चरणोदक लेनेसे और उनकी निर्माल्य माला धारण करनेसे मस्तककी शुद्धि होती है। भगवान् के निर्माल्य पुष्पादिके सूँघनेसे ही अन्त:करण और प्राणोंकी शुद्धि होती है। सारांश यह कि श्रीकृष्णके चरणयुगलपर चढ़ी हुई पत्र-पुष्पादि कोई भी वस्तु सबको पवित्र करनेवाली होती है। यह द्वादश शुद्धिका दूसरा प्रकार है। दोनों ही प्रकारोंसे शुद्ध होना आवश्यक है।

पंचप्रकार पूजा

पंचप्रकार पूजाके भी दो प्रकार हैं—

प्रथम यह है—

मनसे भगवान् का चिन्तन करना, वाणीसे भगवान् के गुण गाना, हाथोंसे भगवान् की पूजा करना, मस्तकसे भगवान् को प्रणाम करना और अपना सर्वस्व भगवान् के निवेदन कर देना।

दूसरा प्रकार यह है—

इसमें अभिगमन, उपादान, योग, स्वाध्याय और इज्या—ये पाँच प्रकार माने गये हैं—

तत्त्वाभिगमनं नाम देवतास्थानमार्जनम्।

उपलेपं च निर्माल्यदूरीकरणमेव च॥

उपादानं नामगन्धपुष्पादिचयनं तथा।

योगो नाम स्वदेवस्य स्वात्मनैवात्मभावना॥

स्वाध्यायो नाममन्त्रार्थसन्धानपूर्वको जप:।

सूक्तस्तोत्रादिपाठश्च हरे: संकीर्तनं तथा॥

तत्त्वादिशास्त्राभ्यासश्च स्वाध्याय: परिकीर्तित:।

इज्या नाम स्वदेवस्य पूजनं च यथार्थत:॥

अपने इष्टदेवके स्थान साफ करने और उसे लीपने और इष्ट विग्रहके निर्माल्य उतारनेका नाम अभिगमन है। गन्ध-पुष्पादिके चयनका नाम उपादान और इष्टदेवके साथ अपने आत्माको एक कर देनेकी भावनाका नाम योग है। मन्त्रके अर्थका ध्यान करते हुए जप करने, सूक्त-स्तोत्रादिके पाठ, हरिनाम-संकीर्तन और तत्त्वनिरूपण करनेवाले शास्त्रोंके अभ्यासको स्वाध्याय कहते हैं, एवं अपने इष्टदेवकी यथार्थ रूपसे पूजा करना ही इज्या है।

न्यास

भगवान् के चरणकमल ही मेरे एकमात्र जीवनाधार, रक्षक, स्वामी और सहायक हैं। ऐसा दृढ़ विश्वास करके अन्य सब आश्रयोंके त्यागको न्यास कहते हैं।

प्रपत्ति

मैं एकमात्र भगवान् के श्रीचरणोंका ही गुलाम हूँ। श्रीचरणोंकी कृपासे जो कुछ हो रहा है और होगा उसीमें मेरा परम कल्याण है। श्रीचरण ही मेरे एकमात्र अवलम्बन हैं। दृढ़ श्रद्धाके साथ किये हुए ऐसे निश्चित संकल्पका नाम प्रपत्ति है।

शरणागति

‘अपना भला किस बातमें है, इस बातको न जाननेवाला मैं दु:खपीड़ित अज्ञानी जीव आपके (प्रभुके) श्रीचरणोंके शरण हूँ, आपके चरणोंकी शरणमें ही मेरा परम कल्याण है। मैं कहीं भी, किसी भी दशामें रहूँ, सदा आपके श्रीचरणोंकी शरण मुझे प्राप्त रहे।’ इस निश्चयके साथ भगवान् के प्रत्येक विधानमें आनन्द मानना, भगवान् के परममंगलमय नामका चिन्तन निरन्तर करते रहना, भगवान् की रुचिके अनुकूल आचरण करना और भगवान् के भरोसेपर अपनेको छोड़कर उनसे किसी भी अवस्थामें कुछ भी न माँगना, भगवान् को परम पिता, परम पति, परम गति, परम धाम, परम सुहृद् मानकर उनके चरणोंपर सदाके लिये लुट पड़ना शरणागति है।

आत्मसमर्पण

मैं भगवान् का हूँ, मेरा सब कुछ भगवान् का है, मेरा ‘मैं’ भी मेरा नहीं, उन्हींका है, इस अपनी वस्तुको वे चाहे जैसे उपयोगमें लावें, चाहे जैसे भोगें, चाहे सो करें;—इस भावसे अपनेको भगवच्चरणोंमें निवेदन कर देना आत्मसमर्पण कहलाता है।

वस्तुत: न्यास, प्रपत्ति, शरणागति और आत्मसमर्पण एक ही साधनकी उत्तरोत्तर विकसित स्थिति हैं। पूर्ण आत्मसमर्पण तो मनुष्य कर नहीं सकता। इसकी तो वह तैयारीमात्र करता है। फिर भगवान् उसे स्वयं उसी प्रकार खींच लेते हैं, जैसे निखालिस लोहेको चुम्बक खींच लेता है।

प्रश्न—‘न्यास’ शब्दसे क्या अंगन्यास और करन्यास नहीं लिया जा सकता है?

उत्तर—क्यों नहीं? तन्त्रमें तो अंगन्यास और करन्यासके बिना काम ही नहीं चलता। हाँ, भक्ति-साधनामें न्यासका अर्थ अंगन्यास, करन्यास नहीं किया जाता। अंगन्यास-करन्यासके सम्बन्धमें मन्त्र-सम्बन्धी प्रश्नके उत्तरमें कुछ कहा जायगा। अब युगल सरकार श्रीराधाकृष्णके दर्शन और उनके दुर्लभ प्रेमकी प्राप्तिके कुछ मुख्य साधनों और भावोंके सम्बन्धमें कुछ देखना है।

मुख्य साधन और भाव

दम्भ, द्रोह, द्वेष, काम, क्रोध, लोभ और विषयासक्तिके त्यागसे ही इस प्रेममार्गकी साधना आरम्भ होती है। जिन पुरुषोंमें दम्भादि छ: दोष हैं और जो विषयोंमें आसक्त हैं अर्थात् जिनका मन सुन्दर रूप, बढ़िया स्वादिष्ट पदार्थ, मनोहर गन्ध, कोमल स्पर्श और सुरीले गायनपर रीझा रहता है, वे इस मार्गपर नहीं चल सकते। त्यागी-विरागी महज्जन ही इस प्रेमपन्थके पथिक हो सकते हैं; क्योंकि इस उपासनामें दिव्य प्रेमराज्यमें प्रवेश करना पड़ता है और वहाँ बिना गोपी-भावको प्राप्त किये किसीका प्रवेश हो नहीं सकता। एवं गोपी-भावकी प्राप्ति विषयासक्त पुरुषको कदापि होना सम्भव नहीं। जो विषय-लोलुप भी हैं और अपनेको श्रीराधाकृष्णके प्रेमी बतलाते हैं, वे या तो स्वयं धोखेमें हैं अथवा जान या अनजानमें जगत् को धोखा देना चाहते हैं। उपर्युक्त छ: दोषोंसे बचकर और विषयासक्तिको त्यागकर निम्नलिखित रूपमें मुख्य साधना करनी चाहिये।

१—अपनेको श्रीराधिकाजीकी अनुचरियोंमें एक तुच्छ अनुचरी मानना।

२—श्रीराधाजीकी सेविकाओंकी सेवामें ही अपना परम कल्याण समझना।

३—सदा यही भावना करते रहना कि मैं भगवान् की प्रियतमा श्रीराधिकाजीकी दासियोंकी दासी बना रहूँ और श्रीराधाकृष्णके मिलन-साधनके लिये विशेषरूपसे यत्न कर सकूँ।

यह बहुत ही रहस्यका विषय है। इसलिये इस विषयपर विशेषरूपसे लिखना अनुचित है। हरेकको इस ओर आकर्षित नहीं होना चाहिये। इस मार्गपर पैर रखना आगपर खेलना है। जो बिना इसका रहस्य समझे इस पथमें प्रवेश करना चाहता है वह पतित हो जाता है। जिसके हृदयमें तनिक-सा काम-विकार हो, उसे इस मार्गसे डरकर सदा अलग ही रहना चाहिये। अवश्य ही जो अधिकारी साधक हैं, उन्हें इस मार्गमें जो अतुल दिव्य आनन्द है, उसकी प्राप्ति होती है। श्रीराधिकाजीकी सेविकाओंकी सेवामें सफल होनेपर स्वयं श्रीराधिकाजीकी सेवाका अधिकार मिलता है और श्रीराधिकाजीकी सेवा ही युगलस्वरूपकी कृपा प्राप्त करनेका प्रधान उपाय है। जो ऐसा नहीं कर सकते उन्हें युगलस्वरूपकी प्राप्ति बहुत ही कठिन है। भगवान् श्रीकृष्णने स्वयं देवदेव शंकरसे कहा है—

यो मामेव प्रपन्नश्च मत्प्रियां न महेश्वर।

न कदापि स चाप्नोति मामेवं ते मयोदितम्॥

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन मत्प्रियां शरणं व्रजेत्।

आश्रित्य मत्प्रियां रुद्र मां वशीकर्तुमर्हसि॥

इदं रहस्यं परमं मया ते परिकीर्तितम्।

त्वयाप्येतन्महादेव गोपनीयं प्रयत्नत:॥

हे महेश्वर! (युगलस्वरूपकी कृपा चाहनेवाला) जो पुरुष मेरी शरण होता है परंतु मेरी प्रिया श्रीराधिकाजीकी शरण नहीं होता, वह मुझको (युगलस्वरूपमें) वस्तुत: नहीं प्राप्त होता, यह मैं आपसे सत्य कहता हूँ। अतएव पूरे प्रयत्नसे मेरी प्रिया (श्रीराधिकाजी)-की शरण ग्रहण करो। मेरी प्रियाका आश्रय ग्रहण करनेवाला मुझे अपने वशमें कर लेता है। मैंने आपसे यह परम रहस्यकी बात कही, आप भी इसे यत्नसे गुप्त ही रखियेगा।

युगलस्वरूपकी उपासनाका विषय कितना रहस्यमय है, यह उपर्युक्त भगवद्वचनोंसे सिद्ध है। मुख्य उपासना तो यही है।

इसके अतिरिक्त इस उपासनासे गौणरूपसे कायिक, वाचिक और मानस—तीन प्रकारके व्रत भी किये जाते हैं। इन व्रतोंसे मुख्य उपासनाके दर्जेतक पहुँचनेमें बड़ी सहायता मिलती है। देवर्षि नारदने भक्त अम्बरीषसे कहा है—

एकभुक्तं तथा नक्तमुपवासमयाचितम्।

इत्येवं कायिकं पुंसां व्रतमुक्तं नरेश्वर॥

वेदस्याध्ययनं विष्णो: कीर्तनं सत्यभाषणम्।

अपैशुन्यमिदं राजन् वाचिकं व्रतमुच्यते॥

अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यमकल्पता।

एतानि मानसान्याहुर्व्रतानि हरितुष्टये॥

दिनभरमें एक बार अपने-आप जो कुछ मिल जाय सो खा लेना और रातको उपवास करना। राजन्! यह कायिक व्रत कहलाता है। वेदका अध्ययन, भगवान् के नामगुणोंका कीर्तन, सत्यभाषण और किसीकी निन्दा या चुगली न करना—वाचिक व्रत कहा जाता है और अहिंसा, सत्य, किसीकी वस्तुपर मन न चलाना, मनसे भी ब्रह्मचर्यका पालन करना और कपट न करना—मानस व्रत कहलाता है।

इसके सिवा भगवान् की उपासनामें अनन्यभावका होना परम आवश्यक है। बस, प्रेमी साधक केवल एक भगवत्प्रेमको ही चाहे और वह भी प्रेममय भगवान् से ही चाहे। गोस्वामी तुलसीदासजी महाराजने कहा है—

यह बिनती रघुबीर गुसाईं।

और आस-बिस्वास-भरोसो, हरो जीव-जड़ताई॥

चहौं न सुगति सुमति संपति कछु रिधि-सिधि बिपुल बड़ाई।

हेतु-रहित अनुराग राम-पद बढ़ु अनुदिन अधिकाई॥

बस, दिन-पर-दिन केवल अहैतुक प्रेम ही बढ़ता रहे। मोक्ष, ज्ञान, ऐश्वर्य, ऋद्धि, सिद्धि या महान् कीर्ति कुछ भी नहीं चाहिये। और यह प्रेमकी भीख भी भगवान् ही दें। दूसरेकी या दूसरी आशा करना अथवा दूसरेपर या दूसरा विश्वास-भरोसा करना तो हृदयकी जडता है। इस जडताको समर्थ वीर श्रीरघुनाथजी हर लें, बस यही विनती है।

पार्वतीजी तो यहाँतक कहती हैं—

भुक्तिमुक्तिस्पृहा यावत् पिशाची हृदि वर्तते।

तावत् प्रेमसुखस्यात्र कथमभ्युदयो भवेत्॥

जबतक भोग या मोक्षकी पिशाची इच्छा हृदयमें वर्तमान है, तबतक वहाँ प्रेमानन्दका उदय कैसे हो सकता है?

वास्तवमें यह विषय बहुत ही रहस्यमय है। अधिकारी पुरुषको श्रीराधाकृष्णतत्त्वके ज्ञाता किसी प्रेमप्राप्त सद्‍गुरुकी सेवामें रहकर इस विषयको जाननेकी चेष्टा करनी चाहिये।

सद्‍गुरु

प्रश्न—ऐसे सदगुरुके क्या लक्षण हैं? और उनकी प्राप्ति कैसे हो सकती है

उत्तर—कान फूँकने और द्रव्यादिकी आशा रखनेवाले गुरु तो संसारमें बहुत मिलते हैं, परंतु सद्‍गुरु—खास करके प्रेममार्गके गुरु तो कोई बिरले ही मिलते हैं। ऐसे सद्‍गुरुमें निम्नलिखित गुणोंका होना तो अत्यन्त आवश्यक है।

शान्तो विमत्सर: कृष्णे भक्तोऽनन्यप्रयोजन:।

अनन्यसाधनो धीमान् कामक्रोधविवर्जित:॥

श्रीकृष्णरसतत्त्वज्ञ: कृष्णमन्त्रविदां वर:।

कृष्णमन्त्राश्रयो नित्यं लोभहीन: सदा शुचि:॥

सद्धर्मशासको नित्यं सदाचारनियोजक:।

सम्प्रदायी कृपापूर्णो विरागी गुरुरुच्यते॥

गुरु उन्हें कहते हैं जो शान्त हों, किसीसे डाह न करते हों, श्रीकृष्णके भक्त हों, श्रीकृष्णके सिवा जिनको दूसरा कोई प्रयोजन न हो, श्रीकृष्ण ही जिनका अनन्य साधन हो, जो बुद्धिमान् हों, काम और क्रोध जिनमें बिलकुल ही न हो, जो श्रीकृष्णरसतत्त्वके जाननेवाले हों, श्रीकृष्णके मन्त्रज्ञाताओंमें श्रेष्ठ हों, जो सदा श्रीकृष्णके मन्त्रका ही आश्रय रखते हों, लोभसे सर्वथा रहित हों, अंदर और बाहरसे—मनमें और व्यवहारमें पवित्र हों, सच्चे धर्मका उपदेश करनेवाले हों, सदाचारके नियोजक हों, श्रीराधाकृष्णतत्त्वके जाननेवाले सम्प्रदायमें हों, जिनका हृदय कृपासे पूर्ण हो और जो भोग-मोक्ष दोनोंमें ही राग न रखते हों।

ऐसे ही सद्‍गुरुकी शरणमें जाकर अधिकारी शिष्यको श्रीकृष्ण-मन्त्रकी दीक्षा ग्रहण करनी चाहिये।

अधिकारी शिष्य

प्रश्न—अधिकारी शिष्यके क्या लक्षण हैं?

उत्तर—प्रेममार्गके अधिकारी शिष्यमें पहला आवश्यक गुण तो भगवान् में सहज भक्ति है। श्रीकृष्णमें जिनकी भक्ति नहीं है, वे अन्य सब गुणोंसे विभूषित होनेपर भी अधिकारी नहीं हैं—

अत्राधिकारी न भवेत् कृष्णभक्तिविवर्जित:।

भक्तिके साथ ही कृतज्ञता, निरभिमानिता, विनय, सरलता, श्रद्धा आदि गुणोंका होना भी आवश्यक है। दम्भी, लोभी या कामी, क्रोधीको गुरु यह विषय न बतावे। शास्त्रमें कहा है—

श्रीकृष्णेऽनन्यभक्ताय दम्भलोभविवर्जिते।

कामक्रोधविमुक्ताय देयमेतत् प्रयत्नत:॥

जो श्रीकृष्णका अनन्य भक्त हो और दम्भ, लोभ, काम और क्रोधसे रहित हो उसी पुरुषको यह विषय बतलाना चाहिये। परंतु ऐसे अधिकारीको भी सालभर उसकी परीक्षा करनेके बाद ही बतलाना उचित है—

नाशुश्रूषुं प्रति ब्रूयान्नासंवत्सरसेविनम्।

अधिकारी शिष्यके कर्तव्य

प्रश्न—अधिकारी शिष्यको मन्त्रदीक्षा ग्रहण करनेके बाद क्या करना चाहिये?

उत्तर—मुख्य साधना तो ऊपर बतलायी ही जा चुकी है। परंतु अधिकारी शिष्यका कर्तव्य बतलाते हुए भगवान् शंकरने कई बातें और बतलायी हैं, उनमेंसे कुछ ये हैं—

मन्त्रदीक्षा प्राप्त होनेपर बुद्धिमान् शिष्य भक्तिपूर्वक गुरु महाराजकी सेवा करते हुए निरन्तर इष्टदेवके भजनमें लगे रहें। दूसरोंको कोई दु:ख न दें, किसीको भी कटु शब्द न कहें, इस लोक और परलोककी सारी चिन्ताओंको छोड़ दें। इस लोकमें पूर्वकर्मके अनुसार फल मिलेगा और परलोकमें भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं मंगल करेंगे, ऐसा सोचकर निश्चिन्त हो जायँ और श्रीकृष्णकी पूजामें लगे रहें। परंतु पूजामें यह भाव कभी मनमें न आने दें कि मेरे इस लोक और परलोककी भलाईके लिये मैं पूजा करता हूँ। भगवान् के पूजनको विषय-सुखका साधन कभी न बनावें। और—

सुचिरं प्रोषिते कान्ते यथा पतिपरायणा।

प्रियानुरागिणी दीना तस्य सङ्गैककांक्षिणी॥

तद्‍गुणान् भावयेन्नित्यं गायत्यभिशृणोति च।

श्रीकृष्णगुणलीलादे: स्मरणादि तथाचरेत्॥

‘बहुत समयसे विदेश गये हुए पतिकी पतिपरायणा स्त्री जैसे केवल उस पतिपर ही प्रेम करती हुई एकमात्र उसीके संगकी आकांक्षा करती हुई दीन होकर सदा-सर्वदा पतिके गुणोंका स्मरण करती है, पतिके गुणोंको गाती और सुनती है, इसी प्रकार अधिकारी शिष्यको एकमात्र श्रीकृष्णमें आसक्त होकर उनके गुणों और लीलाओंको सुनना, गाना और स्मरण करना चाहिये।’

पतिपरायणा साध्वी पत्नी जैसे अपने सर्वस्वको पतिके अर्पणकर पतिको ही परम गति मानकर प्रतिक्षण बिना विराम शरीर-मन-वाणीसे पतिकी सेवामें लगी रहती है और इसीमें परमानन्दका अनुभव करती है, इसी प्रकार अधिकारी शिष्यको श्रीकृष्णकी सेवामें प्रेमपूर्वक निरन्तर लगे रहना और इसीमें परमानन्दका अनुभव करना चाहिये। एकमात्र श्रीकृष्णके ही अनन्यशरण होना चाहिये। दूसरा कुछ भी उसके लिये साध्य या साधन नहीं होना चाहिये। दूसरे देवताको न तो इष्टभावसे पूजना चाहिये और न किसी अन्य देवकी निन्दा करनी चाहिये। उसे अपने इष्टको छोड़कर दूसरेको स्मरण करनेका भी अवसर क्यों मिले? दूसरेका जूँठा भोजन न करे। दूसरेके पहने हुए वस्त्र न पहने, दूसरे विचारवालोंसे वाद-विवाद न करे, श्रीकृष्णकी, किसी अन्य देवताकी और भक्तकी निन्दा न सुने। अपने इष्टदेवके अनुकूल आचरण करे, प्रतिकूलका सर्वथा त्याग कर दे। निरन्तर अनन्य होकर चातकी वृत्तिसे श्रीकृष्णका स्मरण करता रहे। गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी महाराज चातकी वृत्तिका सुन्दर वर्णन करते हुए कहते हैं—

जौं घन बरषै समय सिर जौं भरि जनम उदास।

तुलसी या चित चातकहि तऊ तिहारी आस॥

उपल बरषि गरजत तरजि डारत कुलिस कठोर।

चितव कि चातक मेघ तजि कबहुँ दूसरी ओर॥

चढ़त न चातक चित कबहुँ प्रिय पयोद के दोष।

तुलसी प्रेम पयोधि की ताते नाप न जोख॥

जिअत न नाई नारि चातक घन तजि दूसरहि।

सुरसरिहू को बारि मरत न माँगेउ अरध जल॥

हे बादल! चाहे तुम ठीक समयपर बरसो या जीवनभर कभी न बरसो, प्रेमी याचक चातकको तब भी तुम्हारी ही आशा बनी रहेगी, वह तो तुम्हें छोड़कर दूसरेकी ओर ताकेगा ही नहीं। जल न बरसाकर यदि मेघ उलटे चातकके ऊपर ओले बरसाने लगे, डरा-डराकर गरजे और कठोर वज्र गिरावे, तब भी प्रेमी चातक क्या मेघको छोड़कर कभी दूसरेकी ओर ताकता है? प्रेमी चातकका अपने प्रियतम मेघके दोषोंकी ओर कभी ध्यान ही नहीं जाता, चाहे वह कुछ भी करे, प्रेमके समुद्रका नाप-तौल कभी हो नहीं सकता। चातक अपनी टेकपर अड़ा रहता है, उसने जीते-जी तो मेघको छोड़कर दूसरेके सामने गर्दन झुकायी नहीं और मरते हुए भी गंगा-जलमें अर्धजली नहीं माँगी।

शास्त्र कहते हैं कि इसी प्रकार—

सर: समुद्रनद्यादीन् विहाय चातको यथा।

तृषितो म्रियते चापि याचते वा पयोधरम्॥

एवमेव प्रयत्नेन साधनानि विचिन्तयेत्।

स्वेष्टदेवौ सदा याच्यौ गतिस्तौ मे भवेदिति॥

जैसे चातक सहज ही प्राप्त सरोवर, नदी और समुद्र आदिको छोड़कर एकमात्र मेघकी याचना करता है, प्याससे मर जाता है परंतु दूसरेकी ओर नहीं देखता, वैसे ही अधिकारी शिष्य भी एकमात्र अपने इष्टदेवका ही आश्रय करे।

मन्त्र

प्रश्न—अच्छा, युगलस्वरूपकी प्राप्तिके लिये मन्त्र कौन-सा है?

उत्तर—मन्त्र तो वस्तुत: गुरुसे ही पूछना चाहिये। युगल-स्वरूपकी प्रसन्नता प्राप्त करानेवाले अनेक मन्त्रोंका शास्त्रोंमें विधान है। उनमें कुछ ये हैं—

१—‘गोपीजनवल्लभचरणान् शरणं प्रपद्ये’ यह षोडशाक्षर-मन्त्र है। २—‘नमो गोपीजनवल्लभाभ्याम्’ यह दशाक्षर-मन्त्र है। ३—‘क्लीं राधाकृष्णाभ्यां नम:’ यह अष्टाक्षर-मन्त्र है। ऐसे ही और भी मन्त्र हैं। श्रद्धा-विश्वासपूर्वक इनमेंसे किसी भी मन्त्रका आश्रय ग्रहण करनेपर श्रीराधाकृष्णकी सन्निधि प्राप्त हो सकती है। इन मन्त्रोंमें प्रधान सहायक श्रद्धा-विश्वास ही है। न्यास, देश-काल, नियम, शोधन आदिकी खास आवश्यकता नहीं है। तथापि कोई करना चाहे तो पहले दो मन्त्रोंमें मन्त्रोंके प्रथम वर्ण ‘ग’ पर अनुस्वार लगाकर ‘गं’ बीज और ‘नम:’ शक्ति मानकर शेष मन्त्राक्षरोंके द्वारा अंगन्यास-करन्यास कर ले। तीसरे मन्त्रमें तो बीज तथा ‘नम:’ है ही और श्रीराधाकृष्णकी मूर्तिकी यथाविधि गन्ध-पुष्पादिसे पूजा करे।

दीक्षा

प्रश्न—मन्त्रकी दीक्षा कैसे ग्रहण करनी चाहिये?

उत्तर—सद्‍गुरुकी शरणमें जाकर उनके बताये हुए साधनोंमें लगे रहकर गुरुकी सेवा करे। फिर गुरु जब जो उचित समझें तब वही मन्त्र शिष्यको दे दें। सद्‍गुरु न प्राप्त हों तो किसी शुभ दिनमें जब चित्त भगवान् को पानेके लिये आतुर हो—मन-ही-मन भगवान् को परम गुरु मानकर उन्हींसे मानस-मन्त्र ग्रहण कर ले। गोपीभावके उपासकोंको ललितादि किसी महान् प्रेमिका गोपीको गुरु मानकर उनसे मानस-मन्त्र ग्रहण करना चाहिये। दीक्षाके अनेक भेद हैं, परंतु वे सब तान्त्रिक साधकोंके लिये जानने आवश्यक हैं। भक्तिके साधकोंको उनकी उतनी आवश्यकता नहीं है।

श्रीराधाकृष्णका तात्त्विक स्वरूप

प्रश्न—अब भगवान् श्रीकृष्ण और श्रीराधिकाजीके तात्त्विक स्वरूपका कुछ वर्णन कीजिये।

उत्तर—भगवान् श्रीकृष्ण और उनकी स्वरूपाशक्ति श्रीराधिकाजीके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान उन्हींको है। दूसरा कोई भी यह नहीं कह सकता कि इनका स्वरूप ऐसा ही है, जो कुछ भी वर्णन होता है, वह स्थूलरूपका और आंशिक ही होता है। भगवान् क्या हैं इस बातको भगवान् ही जानते हैं। अतएव उनका पूर्ण वर्णन कौन कर सकता है? परंतु जो कुछ वर्णन होता है सो उन्हींका होता है, इस दृष्टिसे सभी वर्णन यथार्थ हैं। भगवान् का पूर्ण स्वरूप सदा पूर्ण है, सब ओरसे पूर्ण है, सब लीलाओंमें पूर्ण है। भगवान् श्रीकृष्ण ही विज्ञानानन्दघन निराकार निर्विकार मायातीत ब्रह्म हैं, भगवान् ही अक्षर आत्मा हैं, भगवान् ही देवता हैं, भगवान् ही जीवात्मा, प्रकृति और जगत् हैं, जो कुछ है सो वही हैं, जो कुछ नहीं है सो भी वही हैं, इतना ही नहीं ‘हैं’ और ‘नहीं’ से जिसका वर्णन नहीं होता, वह भी वही हैं। इतना होनेपर भी अपनी वाणीको पवित्र करनेके लिये भगवान् का स्वरूपवर्णन लोग करते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण समग्र ब्रह्म या पुरुषोत्तम हैं। ब्रह्म, परमात्मा, आत्मा सब इन्हींके विभिन्न लीलास्वरूप हैं। श्रीराधाजी इन्हींकी स्वरूपाशक्ति हैं। श्रीराधाजी और श्रीकृष्ण सर्वथा अभिन्न हैं। भगवान् श्रीकृष्ण दिव्य चिन्मय आनन्दविग्रह हैं और श्रीराधाजी दिव्य चिन्मय प्रेमविग्रह हैं। वे रसराज हैं, ये महाभाव हैं। भगवान् की इन्हीं स्वरूपाशक्तिसे अनन्तकोटि शक्तियाँ उत्पन्न होती हैं, जो जगत् का सृजन, पालन और संहार करती हैं। श्रीराधाजी ही श्रीलक्ष्मी, श्रीउमा, श्रीसीता, श्रीरुक्मिणी हैं। इनमें कोई भेद नहीं है। जैसे चन्द्र-चन्द्रिका, सूर्य और प्रभा एक-दूसरेके सर्वथा अभिन्न हैं, इसी प्रकार युगलस्वरूप भी सर्वथा अभिन्न है। भगवान् ने स्वयं कहा है—जो नराधम हम दोनोंमें भेदबुद्धि करता है, वह चन्द्र-सूर्यकी स्थितिकालतक कालसूत्र नामक नरकमें रहता है।

आवयोर्भेदबुद्धिं च य: करोति नराधम:।

तस्य वास: कालसूत्रे यावच्चन्द्रदिवाकरौ॥

दूसरे प्रसंगमें भगवान् श्रीराधाजीसे कहते हैं—

‘जो तुम हो, वही मैं हूँ। हम दोनोंमें किंचित् भी भेद नहीं है, जैसे दूधमें सफेदी, अग्निमें दाहिका शक्ति और पृथ्वीमें गन्ध है उसी प्रकार मैं तुममें हूँ।’

यथा त्वं च तथाहं च भेदो हि नावयोर्ध्रुवम्।

यथा क्षीरे च धावल्यं यथाग्नौ दाहिका सति।

यथा पृथिव्यां गन्धश्च तथाहं त्वयि संततम्॥

राधातापिनीमें कहा है—

येयं राधा यश्च कृष्णो रसाब्धि-

र्देहश्चैक: क्रीडनार्थं द्विधाभूत्।

देहो यथा छायया शोभमान:

शृण्वन् पठन् याति तद्धाम शुद्धम्॥

‘जो यह राधा और जो यह कृष्ण आनन्दरसके सागर हैं, वह एक ही लीला करनेके लिये दो रूप बन गये हैं। जैसे छायासे देह शोभित होती है, इसी प्रकार श्रीराधाजीसे श्रीकृष्णजी शोभायमान हैं। इनके चरित्र पढ़ने-सुननेसे जीव इनके शुद्ध परमधामको प्राप्त होता है।’

लीलाविहारी भगवान् श्रीकृष्ण रसेश्वर हैं और नित्यविहारिणी, नित्यविहारकी बीजभूता, रस-सागरा, महारासकी अधिष्ठात्री देवी योगमाया भगवती श्रीराधिकाजी रसेश्वरी हैं। रसेश्वर और रसेश्वरीका महामिलन ही महारास है जो नित्य अखण्ड और अनन्त है। ये श्रीराधाकृष्ण सबसे परे, सबमें भरे और सर्वरूप हैं। भगवान् शिव देवर्षि नारदसे कहते हैं—

देवी कृष्णमयी प्रोक्ता राधिका परदेवता।

सर्वलक्ष्मीस्वरूपा सा कृष्णाह्लादस्वरूपिणी॥

तत: सा प्रोच्यते विप्र ह्लादिनीति मनीषिभि:।

तत्कलाकोटिकोट्यंशा दुर्गाद्यास्त्रिगुणात्मिका:॥

सा तु साक्षान्महालक्ष्मी: कृष्णो नारायण: प्रभु:।

नैतयोर्विद्यते भेद: स्वल्पोऽपि मुनिसत्तम॥

इयं दुर्गा हरी रुद्र: कृष्ण: शक्र इयं शची।

सावित्रीयं हरिर्ब्रह्मा धूमोर्णासौ यमो हरि:॥

बहूनां किं मुनिश्रेष्ठ विना ताभ्यां न किंचन।

चिदचिल्लक्षणं सर्वं राधाकृष्णमयं जगत्॥

(पद्मपुराण, पातालखण्ड ५०।५३ से ५७)

ये कृष्णमयी होनेके कारण परम देवता हैं। ये सर्वलक्ष्मीस्वरूपा और श्रीकृष्णकी आह्लादस्वरूपा हैं। विप्र! इसीसे मनीषिगण इन्हें ह्लादिनी कहते हैं। त्रिगुणात्मिका दुर्गा आदि शक्तियाँ इन्हींकी कोटि-कोटि कला और अंश हैं। ये साक्षात् महालक्ष्मी हैं और श्रीकृष्ण भगवान् नारायण प्रभु हैं। मुनिसत्तम! इनमें परस्पर जरा भी भेद नहीं है। ये दुर्गा हैं, श्रीकृष्ण रुद्र हैं। ये शची हैं, श्रीकृष्ण इन्द्र हैं। ये सावित्री हैं, श्रीकृष्ण ब्रह्मा हैं। ये धूमोर्णा हैं, श्रीकृष्ण यमराज हैं। मुनिवर! अधिक क्या, इनको छोड़कर और कुछ भी नहीं है। यह जड-चेतन जगत् सब बस, राधाकृष्णमय ही है। संक्षेपमें श्रीराधाकृष्णका यही स्वरूप है।

प्रश्न—यह तो सगुण स्वरूप है। मुनियोंका कहना है कि भगवान् तो निराकार, निर्गुण, निष्क्रिय, परात्पर ब्रह्म हैं। इस सगुण स्वरूपमें ये लक्षण कैसे हो सकते हैं?

उत्तर—भगवान् में सभी लक्षण हो सकते हैं। निराकार-साकार, निर्गुण-सगुण, ब्रह्म-माया, परमात्मा-जीवात्मा सब कुछ एक ही कालमें एक ही भगवान् बने हैं। वे सर्वभवनसमर्थ हैं। भगवान् का एक निर्गुण निराकार निष्क्रिय रूप भी है ही। परंतु भगवान् जिस मंगलमय दिव्य विग्रहरूपमें परधाममें विराजमान हैं, मायासे अतीत दिव्य सच्चिदानन्दमय होनेके कारण उस स्वरूपमें भी ये सब लक्षण भलीभाँति सिद्ध हैं। स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—

प्रकृत्युत्थगुणाभावादनन्तत्वात् तथेश्वरम्।

असिद्धत्वान्मद्‍गुणानां निर्गुणं मां वदन्ति हि॥

अदृश्यत्वान्ममैतस्य रूपस्य चर्मचक्षुषा।

अरूपं मां वदन्त्येते वेदा: सर्वे महेश्वर॥

व्यापकत्वाच्चिदंशेन ब्रह्मेति च विदुर्बुधा:।

अकर्तृत्वात् प्रपंचस्य निष्क्रियं मां वदन्ति हि॥

(पद्मपुराण, पातालखण्ड ५१।६८ से ७०)

महेश! मुझमें प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाले कोई गुण नहीं हैं, और मेरे गुणोंको कोई सिद्ध नहीं कर सकता, इसीलिये मुझे सब निर्गुण कहते हैं। मेरा यह दिव्य स्वरूप चर्मचक्षुओंसे कोई देख नहीं सकता, इसीसे वेद मुझको अरूप या निराकार कहते हैं। चैतन्यांशके द्वारा मैं जगत् भरमें व्याप्त हूँ, इसीसे पण्डित मुझे ब्रह्म कहते हैं। और विश्वप्रपंचका कर्ता न होनेके कारण बुद्धिमान् पुरुष मुझको निष्क्रिय कहते हैं।

इस प्रकार भगवान् साकार सगुण होकर ही निर्गुण और निराकार हैं। कर्ता होकर भी अकर्ता हैं।

श्रीराधा-कृष्णका ध्यान

प्रश्न—अच्छा, अब भगवान् श्रीकृष्ण और श्रीराधाजीके महान् सुन्दर ध्यानस्वरूपोंका कुछ वर्णन कीजिये।

उत्तर—सौन्दर्यमाधुर्यनिधि श्रीराधाकृष्णके ध्यानस्वरूपोंका वर्णन कौन कर सकता है? यहाँ ‘गिरा अनयन नयन बिनु बानी’ वाली कहावत सिद्ध होती है। तथापि पद्मपुराणमें एक स्थानपर लीलाविहारी श्रीराधाकृष्णके स्वरूपका बहुत ही सुन्दर निरूपण है, वही यहाँ उद्‍धृत कर दिया जाता है। भगवान् शिव देवर्षि नारदजीसे कहते हैं—

भगवान् श्रीकृष्ण पीताम्बर पहने हैं, सुन्दर द्विभुज हैं, वनमालासे विभूषित हैं, उनका वर्ण नवजलधरके समान श्याम है, मस्तकपर मयूरपिच्छ शोभा पा रहा है, मुखमण्डल करोड़ों चन्द्रमाओंके समान मनोहर है। वे नेत्रोंको घुमा रहे हैं, कानोंमें कनेरके फूल खोंसे हुए हैं, भालमें गोल-गोल चन्दनका तिलक लगाये हैं जिसके बीचमें केसरका विन्दु सुशोभित है। दोनों कानोंमें बालसूर्यके समान कान्तिवाले कुण्डल विराजमान हैं। दर्पणके समान आभायुक्त कपोलोंपर स्वेदकण अत्यन्त शोभा पा रहे हैं। भगवान् की दृष्टि श्रीप्रियाजीके बदनकमलकी ओर लगी हुई है, भौंहें लीलासे ऊपरकी ओर उठी हुई हैं और उनकी ऊँची नासिकाके अग्रभागमें मोती लटक रहा है। उनके पके हुए बिम्बफलके समान लाल-लाल होठ दाँतोंकी कान्तिसे प्रकाशित हो रहे हैं। भगवान् अपनी भुजाओंमें केयूर और अंगद आदि आभूषण धारण किये हुए हैं और उनके करकमल मुद्रिकाओंसे अलंकृत हैं। वे दाहिने हाथमें मुरली और बायें हाथमें लीलाकमल धारण किये हुए हैं। उनकी कमरमें करधनी सुशोभित है और चरणोंमें नूपुर विराजमान है। वे प्रेमके आवेशसे चंचल हो रहे हैं और उनके नेत्रयुगल भी चलायमान हैं। वे श्रीप्रियाजीके साथ हँस रहे हैं और उन्हें भी बार-बार हँसा रहे हैं। इस प्रकार वृन्दावनमें कल्पवृक्षके नीचे रत्नसिंहासनके ऊपर श्रीप्रियाजीके साथ विराजमान भगवान् नन्दनन्दनका ध्यान करे। इसके अनन्तर उनके वामभागमें स्थित श्रीराधिकाजीका इस प्रकार ध्यान करे। श्रीप्रियाजी नीला अंगा धारण किये हुए हैं, उनके श्रीअंगोंकी कान्ति तपाये हुए सोनेके समान है। उनके मन्दहास्ययुक्त मुखारविन्दका आधा भाग उनकी रेशमी साड़ीके अंचलसे ढका हुआ है। वे चंचल नेत्रोंसे चकोरीकी भाँति अपने प्रियतमके मुखचन्द्रकी ओर निहार रही हैं और अपने अँगूठे और तर्जनीसे उनके मुखमें कुटे हुए पानके सहित सुपारीका चूर्ण अर्पण कर रही हैं। उनके सुन्दर पीन और उन्नत वक्ष:स्थलपर मोतियोंका हार लटक रहा है, उनका कटिप्रदेश अत्यन्त कृश है और स्थूल नितम्बपर करधनी विराजमान है। वे रत्नजटित ताटंक (कर्णफूल), केयूर (बाजूबन्द), अँगूठी और कंकण धारण किये हुए हैं। उनके चरणोंमें कड़े, नूपुर और रत्नजटित छल्ले सुशोभित हैं। उनके समस्त अंग इतने सुन्दर हैं मानो वे लावण्यके सार ही हैं। वे आनन्दरसमें डूबी हुई हैं, अत्यन्त प्रसन्न हैं और उनके अंगोंमें नवयौवन झलक रहा है। ब्राह्मणदेव! उनकी सखियाँ उन्हींके समान गुण और अवस्थावाली हैं और उनपर चँवर डुला रही हैं तथा पंखा झल रही हैं। (पद्मपुराण, पातालखण्ड ५०।३५ से ५०)

यह श्रीराधाकृष्णके स्वरूपका ध्यान है। यहाँ एक बार फिर चेतावनी दे देना उचित है कि परम वैराग्यवान् पुरुषको ही इस साधनामें प्रवृत्त होना चाहिये। नहीं तो, अनिष्टकी आशंका है।

स्वरूप-साक्षात्कार

प्रश्न—क्या इस स्वरूपका साक्षात्कार भी हो सकता है? हो सकता है तो किस उपायसे?

उत्तर—अवश्य ही हो सकता है। जब युगलसरकार कृपा करके अपने दुर्लभ दर्शन देना चाहें तभी दर्शन हो सकते हैं। उनकी कृपा ही साक्षात्कारका उपाय है।

प्रश्न—क्या साक्षात्कारमें भगवान् की मुरलीध्वनि, नूपुरध्वनि सुनायी दे सकती है, क्या उनके श्रीअंगकी मधुर दिव्य गन्ध और उनके दिव्य चिन्मय चरणोंका स्पर्श प्राप्त हो सकता है?

उत्तर—दर्शन होनेपर उनकी कृपासे सभी कुछ हो सकता है। परंतु एक बात याद रखनी चाहिये कि ये सब बातें ध्यानमें भी हो सकती हैं। जैसे स्वप्नमें देखना, सुनना, सूँघना, स्पर्श करना सब कुछ होता है परंतु वस्तुत: वहाँ अपनेसे कोई भिन्न वस्तु नहीं होती, सब मनकी ही कल्पना होती है। इसी प्रकार ध्यानकालमें भी मनोनिर्मित विग्रहका स्पर्श, मुरलीध्वनि या नूपुरध्वनिका श्रवण, मधुर गन्धका ग्रहण हो सकता है। उसमें और साक्षात्कारमें बड़ा अन्तर है, परंतु इस अन्तरका पता साक्षात्कार होनेपर ही लगता है, पहले नहीं। ध्यान होना भी बड़े ही सौभाग्यका विषय है।

सरल साधन

१—भगवन्नामजप

प्रश्न—भगवान् की कृपा प्राप्त करनेका कोई सरल उपाय भी है?

उत्तर—है क्यों नहीं। भगवन्नामका जप-कीर्तन और कातर भावसे रो-रोकर भगवान् से प्रार्थना करना उनकी कृपा-प्राप्तिके सरल उपाय हैं।

भगवान् शंकर देवी पार्वतीसे कहते हैं—

हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्।

हरे राम हरे कृष्ण कृष्ण कृष्णेति मंगलम्॥

एवं वदन्ति ये नित्यं न हि तान् बाधते कलि:।

अत आन्तरकर्माणि कृत्वा नामानि च स्मरेत्॥

कृष्ण कृष्णेति कृष्णेति कृष्णेत्याह पुन: पुन:।

मन्नाम चैव त्वन्नाम यो जपित्वाव्यतिक्रमात्॥

सोऽपि पापाद् विमुच्येत तूलराशेरिवानल:।

जयाद्येतत्त्वया वाप्यथवा श्रीशब्दपूर्वकम्॥

तच्च मे मंगलं नाम जपात् पापात्प्रमुच्यते।

दिवा निशि च संध्यायां सर्वकालेषु संस्मरेत्॥

अहर्निशं स्मरन्नाम कृष्णं पश्यति चक्षुषा।

(पद्मपुराण, पातालखण्ड ५१।३ से ७)

केवल एक हरिनाम ही उद्धारका उपाय है। जो व्यक्ति नित्य (अखण्डरूपसे) हरे राम हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण आदि नामोंका उच्चारण करता है, कलियुगका उसपर असर नहीं हो सकता। अतएव प्रतिदिन आन्तर कर्मोंको करके बार-बार कृष्ण कृष्ण कृष्ण इन नामोंको स्मरण करना चाहिये। ऐसा मुनिगण भी कहते हैं। जो व्यक्ति मेरा (शिव) नाम और तुम्हारा (पार्वती) नाम (अथवा गौरी शंकर नाम) जप करता है, रूईका ढेर जैसे आगसे जल जाता है, वैसे ही वह भी पापोंसे मुक्त हो जाता है। अर्थात् नाम-जप पापोंको भस्म कर डालता है। जो पुरुष जय श्रीकृष्ण, जय श्रीशंकर, जय श्रीपार्वती, इस प्रकार आगे या पीछे ‘जय’ और ‘श्री’ जोड़कर मंगलमय नामका जप करता है वह पापोंसे छूट जाता है। क्या दिन, क्या रात, क्या संध्या—सभी समय भगवान् के नामोंका स्मरण करना चाहिये। रात-दिन अखण्ड नाम-जप करनेसे भगवान् श्रीकृष्णके साक्षात् दर्शन हो सकते हैं।

इस प्रकार अखण्ड नाम-जप और स्मरणसे सहज ही पापोंका नाश होता है और भगवान् के साक्षात् दर्शन हो सकते हैं।

२—प्रार्थना

दूसरा उपाय प्रार्थना है। एकान्तमें आर्तभावसे और सच्चे हृदयसे इस तरह भगवान् से प्रार्थना करनी चाहिये।

संसारसागरान्नाथौ पुत्रमित्रगृहाकुलात्।

गोप्तारौ मे युवामेव प्रपन्नभयभंजनौ॥

योऽयं ममास्ति यत्किंचिदिह लोके परत्र च।

तत्सर्वं भवतोरद्य चरणेषु समर्पितम्॥

अहमस्म्यपराधानामालयस्त्यक्तसाधन:।

अगतिश्च ततो नाथौ भवन्तावेव मे गति:॥

तवास्मि राधिकाकान्त कर्मणा मनसा गिरा।

कृष्णकान्ते तवैवास्मि युवामेव गतिर्मम॥

शरणं वां प्रपन्नोऽस्मि करुणानिकराकरौ।

प्रसादं कुरुतं दास्यं मयि दुष्टेऽपराधिनि॥

(पद्मपुराण, पातालखण्ड ५१।४२ से ४६)

हे नाथ! पुत्र, मित्र, गृह आदिसे घिरे हुए संसार-सागरसे आप ही मेरी रक्षा करते हैं, आप ही शरणागत जनोंका भय भंजन करते हैं। यह मैं, मेरा यह देह और इस लोक तथा परलोकमें जो कुछ भी मेरा है, आज वह सब मैं आपके चरणोंमें अर्पण करता हूँ। मैं अपराधोंका घर हूँ, मेरे अन्य कोई भी साधन नहीं है। मेरी कोई गति नहीं है। हे नाथ! आप ही मेरी गति हैं। हे श्रीराधाकृष्ण! मैं तन, मन, वचनसे आपका ही हूँ, आप ही मेरी अनन्य गति हैं। मैं आपके शरण हूँ, आपके चरणोंमें पड़ा हूँ, आप दयाकी खान हैं। मुझ दुष्ट अपराधीपर दया करके मुझे अपना दास बना लीजिये मेरे युगल सरकार!

इस प्रकार नाम-जप और आर्त तथा दीन प्रार्थनासे भगवत्कृपा प्राप्त होती है और भगवत्कृपासे दुर्लभ भी परम सुलभ हो जाता है। आपने प्रश्नोंका उत्तर बहुत विस्तारसे चाहा था, मैंने संक्षेपमें लिखना चाहा था तो भी उत्तर कुछ बड़ा हो गया है, इससे आपको कुछ संतोष हो और पाठकोंको लाभ हो तो बड़े आनन्दकी बात है। भूल-चूक और प्रमादके लिये क्षमाप्रार्थी हूँ।