नम्र निवेदन

भगवद‍्गीता एक ऐसा विलक्षण ग्रन्थ है, जिसका आजतक न तो कोई पार पा सका, न पार पाता है, न पार पा सकेगा और न पार पा ही सकता है। गहरे उतरकर इसका अध्ययन-मनन करनेपर नित्य नये-नये विलक्षण भाव प्रकट होते रहते हैं। हमारे परमश्रद्धेय श्रीस्वामीजी महाराजको भी इस अगाध गीतार्णवमें गोता लगानेपर अनेक अमूल्य रत्न मिले हैं और अब भी मिलते जा रहे हैं। पिछले वर्ष मथानिया (जोधपुर) में चातुर्मासके समय भी आपको गीतामेंसे भगवान‍्के सगुण-स्वरूप तथा भक्ति-सम्बन्धी अनेक विलक्षण भाव मिले। उन्हीं भावोंको लेकर प्रस्तुत पुस्तककी रचना की गयी है। आशा है, विचारशील तथा भगवत्प्रेमी साधकोंको यह पुस्तक एक नयी दृष्टि प्रदान करेगी और सुगमतापूर्वक भगवत्प्राप्तिका मार्ग दिखायेगी।

पाठकोंसे नम्र निवेदन है कि वे इस पुस्तकको मनोयोगपूर्वक पढ़ें, समझें और लाभ उठायें।